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बाज़ार की बंधक बन चुकी दीपावली को कोई कैसे मनाए धूमधाम से!
इन दिनों आ रहीं सभी ख़बरें हमारी अर्थव्यवस्था के मजबूत होने के बेशर्म सरकारी दावों को मुंह चिढ़ा रही हैं। इन्ही दारुण ख़बरों और कोरोना महामारी के ख़ौफ़ के बीच प्रधानमंत्री लोगों से कह रहे हैं कि धूमधाम से दीपावली मनाओ।
अनिल जैन
14 Nov 2020
बाज़ार
Image courtesy: CitySpidey

उत्सव प्रेमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो दिन पहले फरमाया है कि देशवासी खूब धूमधाम से दीपावली मनाएं। उनका यह फरमान आम आदमी के जले पर नमक छिडकने जैसा है। इसलिए कि बगैर सोची-समझी नोटबंदी और दिशाहीन जीएसटी की मार से छोटा और मध्यम कारोबारी तबका अभी उबर भी नहीं पाया था कि हडबडी में लगाए गए लॉकडाउन ने उसकी कमर तोड़ दी है। उसका कारोबार या तो ठप पड़ा हुआ है या खत्म हो गया है। सरकारी और सहकारी बैंकों को अरबों रुपए का चूना लगाकर बेईमान उद्योगपतियों के विदेश भाग जाने का सिलसिला जारी है। अभूतपूर्व महंगाई की मार से आम आदमी त्रस्त है। किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। नौकरियां खत्म होने की वजह से बेरोजगारों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।

देश की आर्थिक समृद्धि का सूचक समझे जाने वाले शेयर बाजार में जबरदस्त फर्जीवाड़ा हो रहा है, इसलिए उसके सूचकांक के गिरने-उठने का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। विश्व बाजार भारतीय रुपये की हैसियत लगातार गिरती जा रही है। भुखमरी की वैश्विक स्थिति में भारत का स्थान और नीचे खिसक चुका है।

ये सभी खबरें हमारी अर्थव्यवस्था के मजबूत होने के बेशर्म सरकारी दावों को मुंह चिढ़ा रही हैं। इन्ही दारुण खबरों और कोरोना महामारी के खौफ के बीच प्रधानमंत्री लोगों से कह रहे हैं कि धूमधाम से दीपावली मनाओ। बाजार की बड़ी ताकतें, समाज का खाया-अघाया तबका, सामाजिक सरोकारों से पूरी तरह कट कर मुनाफाखोरी की लत का शिकार हो चुका मीडिया और इन सबसे समूचा सत्ता प्रतिष्ठान, सब मिलकर पूरी मक्कारी के साथा माहौल यही बना रहे है कि देश में सब कुछ सामान्य है। इसीलिए धूमधाम से दीपावली मनाने को कहा जा रहा है।

दीपावली का पर्व अमावस्या को मनाया जाता है और इस मौके पर रात में दीये जलाए जाते हैं। इससे यह प्रतीक बेहद लोकप्रिय हो गया है कि यह अंधकार पर प्रकाश की और असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है। इस प्रतीकवाद की पुष्टि के लिए ही संस्कृत की उक्ति 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' पेश की जाती है। यह एक ऐसा प्रतीकवाद है, जो आधुनिक भारतीय चित्त को बहुत भाता है, क्योंकि इससे उसका राष्ट्रीय और सामाजिक गौरव बढ़ता है। ज्यादा सच तो यह आख्यान प्रतीत होता है कि चौदह वर्ष का वनवास काटने और लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद राम के अयोध्या लौटने पर अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था और खुशियां मनाई थी। तभी से दीपावली मनाने की परंपरा शुरू हुई। इस लिहाज से यह सुशासन कायम होने का उत्सव है। भारत में सुशासन की कल्पना राम-राज्य से जुड़ी रही है। लेकिन हमारे देश ने इतने लंबे समय तक सुशासन ही नहीं, शासन का भी ऐसा नितांत अभाव देखा है कि राम-राज्य की कसक उसके अंतर्मन में बैठ गई है। आम देशवासियों के इस स्वप्न को जिस व्यक्ति ने पुनर्जाग्रत किया था, उसका नाम था मोहनदास करमचंद गांधी।

आजादी के बाद देश की जनता को महात्मा गांधी की कल्पना के अनुरुप राम-राज्य नही मिला। उसे जो मिला था, वह शुद्ध कांग्रेसी राज था। लंबे समय तक चले कांग्रेसी राज के अलावा देश ने थोड़े-थोड़े अरसे के लिए गैर कांग्रेसी राज का का स्वाद भी चखा। इसी दौरान तथाकथित 'रामभक्तों’ ने भी सत्ता के सूत्र संभाले और अभी भी वही जमात सत्ता पर काबिज है। लेकिन जिस राम-राज्य या सुशासन की कल्पना गांधी ने की थी उससे देशवासियों का परिचय होना अभी भी बाकी है। हां, राम के नाम पर यानी उनका मंदिर बनाने के नाम पर वोट मांगने, धन जुटाने और दंगा-फसाद करने तक जितने भी अनैतिक कृत्य हो सकते हैं वे जरूर पिछले कई वर्षों से देखने को मिल रहे हैं। अभी तक कमोबेश सभी राजनीतिक जमातों की सरकारों से रामराज्य के बदले देश को मिला है तो सिर्फ घपले-घोटालों और भाई-भतीजावाद का राज, जो आज भी अपने भयावह रूप में जारी है।

वैसे दीपावली खास तौर पर लक्ष्मी की पूजा-आराधना का पर्व ही माना जाता है। लक्ष्मी यानी धन-धान्य और ऐश्वर्य की देवी। इस आधार पर हमारा देश जितना आध्यात्मिक है उतना ही भौतिकवादी भी। हम ज्ञान के साथ-साथ ही समृद्धि की भी उपासना करते आए हैं, क्योंकि हमें अपने परलोक को ही नहीं, इहलोक को भी सुंदर और सफल बनाना है। लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं। हमारे धर्म-शास्त्रों में विष्णु को इस सृष्टि का सूत्रधार माना गया है। वे ही सृष्टि का संचालन और पालन-पोषण करते हैं। जाहिर है कि इस दायित्व का निर्वाह वह अकेले नहीं कर सकते। इसमें उन्हें अपनी पत्नी लक्ष्मी का सहयोग चाहिए। इन पौराणिक प्रतीकों के माध्यम से हमारे शास्त्र-रचयिता ऋषियों-मनीषियों ने संभवतः यह संदेश देना चाहा हो कि हमें धन की उपासना तो अवश्य करनी चाहिए लेकिन वह उपासना इस तरह हो, जैसे पूजा की जा रही हो। अर्थात्‌ भौतिकता के साथ पवित्रता का भाव भी जुड़ा हुआ हो।

अनैतिक साधनों से अर्जित किया गया धन जीवन में अभिशाप ही पैदा करता है। इसकी पुष्टि हमारे देश के मौजूदा हालात देखकर भी होती है। देश ने विदेशी दासता से आजाद होते ही धन की उपासना शुरू कर दी थी। देशी शासकों ने देशवासियों को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए तरह-तरह के यत्न शुरू किए। पंचवर्षीय योजनाएं बनाई जाने लगी। बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाए गए। जीवनदायिनी नदियों का प्रवाह रोक कर या मोड़ कर बड़े-बड़े बांध बनाए गए। हरित क्रांति के जरिए देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना। आर्थिक असमानता दूर करने के लिए जहां जमींदारी प्रथा खत्म की गई तो वहीं सामाजिक गैरबराबरी खत्म करने के लिए दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों को विशेष अवसर दिए गए। स्पष्ट तौर पर यह उपासना समाजवादी संपन्नता की थी।

लेकिन चूंकि इस संपन्नता के लिए अपनाए गए तौर-तरीके कतई समाजवादी नहीं थे, इसलिए गरीबी के विशाल हिन्द महासागर में समृद्धि के कुछ टापू ही उभर पाए। बहुराष्ट्रीय वित्तीय सेवा कंपनी क्रेडिट सुइस की ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट भी इस तथ्य की पुष्टि करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत का मध्यवर्ग दुनिया के कुल मध्यवर्ग का मात्र तीन फीसदी है, जबकि चीन में इस तबके की संख्या भारत से दस गुनी ज्यादा है। जाहिर है कि देश में सपनों का सौदागर मध्यवर्ग अपनी हैसियत पर चाहे जितना इठला ले और कूद-फांद कर ले, पर दुनिया के पैमाने पर अभी उसकी कोई खास हैसियत नहीं बन पाई है। यह स्थिति तब है जबकि हम तथाकथित समाजवाद के रास्ते या कि मिश्रित अर्थव्यवस्था का पूरी तरह परित्याग कर चुके हैं। वर्ष 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार के खाली हो जाने से उपजे संकट से हमारी अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदल गई। हमने उदारीकरण यानी बाजारोन्मुख अर्थव्यवस्था का रास्ता अपना लिया, जो कि पूंजीवाद का ही नया संस्करण है। इसे थोड़े कठोर शब्दों में याराना या आवारा पूंजीवाद भी कहा जा सकता है।

देश में पिछले करीब ढाई दशक से यानी जब से नव उदारीकृत आर्थिक नीतियां लागू हुई है, तब से सरकारों की ओर से आए दिन आंकडों की हेराफेरी के सहारे देश की अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश की जा रही है। आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को भरपेट भोजन तक मयस्सर नहीं है। हमारे लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं। वैश्विक भूख सूचकांक में भारत का स्थान 107 देशों में 94वां है। लेकिन इसके बावजूद ढींगे हांकी जा रही हैं कि भारत तेजी से दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है।

संयुक्त राष्ट्र के 'वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक-2020’ में भारत का 144वां स्थान है। 156 देशों में भारत का स्थान इतना नीचे है, जितना कि अफ्रीका के कुछ बेहद पिछडे देशों का है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस सूचकांक में चीन जैसा सबसे बड़ी आबादी वाला देश ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, चीन, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे छोटे-छोटे पड़ोसी देश भी खुशहाली के मामले में भारत से ऊपर है। यह रिपोर्ट इस हकीकत को भी साफ तौर पर रेखांकित करती है कि केवल आर्थिक समृद्धि ही किसी समाज में खुशहाली नहीं ला सकती।

भारतीय आर्थिक दर्शन और जीवन पध्दति के सर्वथा प्रतिकूल 'पूंजी ही जीवन का अभीष्ट है' के अमूर्त दर्शन पर आधारित नव उदारीकरण की अर्थव्यवस्था को लागू हुए ढाई दशक से भी ज्यादा समय बीत चुका है और तब से लेकर आज तक हम एकाग्रभाव से बाजारवाद की ही पूजा-अर्चना कर रहे हैं। लक्ष्मी अब लोक की देवी नहीं, बल्कि ग्लोबल प्रतिमा बन गई हैं। उसकी पूजा में अब लोक-जीवन को संपन्न बनाने की इच्छा कम और खुद को समृद्ध बनाने की लालसा ज्यादा व्यक्त की जाती है। डिजायनों और ब्रांडों के बोलबाले ने मिट्टी की लक्ष्मी प्रतिमाओं और कुम्हार के कलाकार हाथों से ढले दीयों को भी डिजायनर बना दिया है। डिजायनर दीयों के साथ ही ब्रांडेड मोमबत्तियां और मोम के दीयों का भी चलन बढ़ गया है। पारंपरिक मिठाइयों की जगह अब ब्रांडेड मिठाइयों और मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चॉकलेटों ने ले ली है।

दीपावली पर उपहारों और मिठाइयों के आदान-प्रदान का चलन पुराना है लेकिन पहले उनमें गहरी आत्मीयता होती थी। अब जिन महंगे उपहारों और मिठाइयों का लेन-देन होता है उनमें से आत्मीयता और मिठास का पूरी तरह लोप हो गया है और उनकी जगह ले ली है दिखावे और स्वार्थ ने। यानी अब राजनीति के साथ-साथ हमारी संस्कृति और सामाजिकता भी बाजार के रंग में रंग गई है दीपावली, दुर्गापूजा, गणेश चतुर्थी, कृष्ण जन्माष्टमी समेत हमारी लोक-संस्कृति से जुड़े तमाम त्योहारों, पर्वो और यहां तक कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले करवा चौथ और हरतालिका तीज जैसे व्रतों को भुनाने में भी बाजार अब पीछे नहीं रहता।

निस्संदेह बाजारवाद से देश में समृद्धि का एक नया वातावरण निर्मित हुआ है। महानगरों में एक बड़े वर्ग के बीच हमेशा उत्सव का माहौल रहता है। लेकिन उनके इस उत्सव में न तो बहुत ज्यादा सामाजिकता और परस्पर आत्मीयता होती है और न ही इसके पीछे किसी प्रकार की कलात्मकता। उसमें जो कुछ होता है, उसे भोग-विलास या आमोद-प्रमोद का फूहड़ और बेकाबू वातावरण ही कह सकते हैं। यह सब कुछ अगर एक छोटे से तबके तक ही सीमित रहता तो, कोई खास हर्ज नहीं था। लेकिन मुश्किल तो यह है कि 'यथा राजा-तथा प्रजा' की तर्ज पर ये ही मूल्य हमारे राष्ट्रीय जीवन पर हावी हो रहे हैं। जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं या जिनकी आमदनी सीमित है, उनके लिए बैंकों ने 'ऋणं कृत्वा, घृतम्‌ पीवेत' की तर्ज पर क्रेडिट कार्डों और कर्ज के जाल बिछा कर अपने खजाने खोल रखे हैं। लोग इन महंगी ब्याज दरों वाले कर्ज और क्रेडिट कार्डों की मदद से सुख-सुविधा के आधुनिक साधन खरीद रहे हैं। विभिन्न कंपनियों के शोरूमों से निकलकर रोजाना सड़कों पर आ रहीं लगभग पांच हजार कारों और शान-ओ-शौकत की तमाम वस्तुओं की दुकानों और शॉपिंग मॉल्स पर लगने वाली भीड़ देखकर भी इस वाचाल स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।

कुल मिलाकर हर तरफ लालसा का तांडव ही ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। तृप्त हो चुकी लालसा से अतृप्त लालसा ज्यादा खतरनाक होती है। देशभर में बढ़ रहे अपराधों-खासकर यौन अपराधों की वजह यही है। यह अकारण नहीं है कि देश के उन्हीं इलाकों में अपराधों का ग्राफ सबसे नीचे है, जिन्हें बाजारवाद ज्यादा स्पर्श नहीं कर पाया है। यह सब कहने का आशय विपन्नता का महिमा-मंडन करना कतई नहीं है, बल्कि यह अनैतिक समृद्धि की रचनात्मक आलोचना है। दीपावली मनाते हुए भी ऐसी आलोचना नहीं होनी चाहिए क्या?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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