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क्या केजरीवाल सरकार की नई औद्योगिक नीति लघु उद्योगों और श्रमिकों के लिए घातक है?
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि दिल्ली में अब से किसी भी नए औद्योगिक क्षेत्र के अंदर केवल हाईटेक इंडस्ट्री और सर्विस इंडस्ट्री लग सकेंगी। मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री लगाने की इजाजत नहीं होगी। इस निर्णय के बाद दिल्ली का प्रदूषित औद्योगिक क्षेत्र खत्म होगा और दिल्ली में साफ सुथरी और ग्रीन इंडस्ट्री लगेगी।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
05 Nov 2020
 अरविंद केजरीवाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि दिल्ली में अब से किसी भी नए औद्योगिक क्षेत्रों के अंदर केवल हाईटेक इंडस्ट्री और सर्विस इंडस्ट्री लग सकेंगी। मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री (विनिर्माण उद्योग) लगाने की इजाजत नहीं होगी।

उन्होंने दावा किया कि इस निर्णय के बाद दिल्ली का प्रदूषित औद्योगिक क्षेत्र खत्म होगा और दिल्ली में साफ सुथरी और ग्रीन इंडस्ट्री लगेगी। परन्तु इससे बड़े स्तर पर छोटे उद्योगों और उनके श्रमिकों को प्रभावित करने की संभावना जताई जा रही है।

बता दें कि केंद्रीय आवास और शहरी विकास मंत्रालय ने दिल्ली मास्टर प्लान 2021 के तहत 'उद्योग' की परिभाषा को बदलने के लंबे समय से लंबित प्रस्ताव को मंजूरी देने के बाद उन्होंने यह घोषणा की है।

इसके अनुसार औद्योगिक क्षेत्र बहुराष्ट्रीय कंपनियों, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) समूहों और घरानों के साथ-साथ डॉक्टर, वकील, चार्टर्ड एकाउंटेंट जैसे पेशेवरों को अपने काम धंधे लगाने की छूट होगी। जिसमे सरकार कर और भूमि दरों में रियायतें प्रदान भी करेगी। मौजूदा निर्माण उद्योग को सेवाओं के क्षेत्र में बदलने का विकल्प दिया जाएगा। इससे सवाल उठते हैं कि क्या प्रस्तावित उपाय प्रदूषण पर अंकुश लगाने में मदद कर सकता है और इसका राजधानी की कामकाजी आबादी पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

नारायणा इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष आरएन गुप्ता ने न्यूज़क्लिक को बताया कि विनिर्माण इकाइयों को सेवाओं के क्षेत्रो में बदलने का निर्णय इतना आसान नहीं है। उन्होंने कहा, “हम देशव्यापी लॉकडाउन के बाद पिछले छह महीनों से वास्तव में अच्छी स्थिति में नहीं हैं। हम अभी भी उससे उबरने की कोशिश कर रहे हैं। नरेला और ओखला में उद्योग कथित तौर पर मजदूरों की कमी और कम मांग के साथ लॉकडाउन के बाद से अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्होंने दिल्ली सरकार से बिजली बिल माफी जैसी मदद करने के लिए कहा है ताकि उन्हें इस कठिन समय में मदद मिल सके।”

गुप्ता ने कहा कि दिल्ली में छोटे उद्योगों के लिए शिफ्टिंग एक बहुत जटिल काम होगा। उन्होंने कहा, “सेवाओं के लिए संक्रमण का मतलब है कि मोटा निवेश, प्रौद्योगिकी और मैनपॉवर की आवश्यकता होगी। यह भी याद रखना चाहिए कि दिल्ली में ज्यादातर लघु उद्योग हैं और बड़े उद्योग पड़ोसी राज्यों में स्थानांतरित हो चुके हैं।”

हजारों श्रमिकों के अनिश्चित भविष्य और मौजूदा उद्योगों से जुड़े स्व-रोज़गारी लोगों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने पूछा, "आप इन लोगों के साथ क्या करने जा रहे हैं?"

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर इनफॉर्मल सेक्टर के असिस्टेंट प्रोफेसर अविनाश कुमार के अनुसार प्रस्तावित नीतियों में आम आदमी पार्टी की राजनीति है। NewsClick से बात करते हुए उन्होंने कहा, “आम आदमी पार्टी खुद को शहरी आधारित पार्टी के रूप में देखती है जहाँ अधिक सौंदर्यीकरण और शहरीकरण पर अधिक ध्यान दिया जाता है। हालांकि, अगर हम दिल्ली के इतिहास को देखें, तो यह निश्चित रूप से इस शहर की प्रकृति नहीं है।”

उन्होंने कहा “सबसे पहले ऑफिस और आईटी पार्क केवल सीमित रोजगार के अवसर पैदा कर सकते हैं। विनिर्माण उद्योगों को स्थानांतरित करने का कदम प्रदूषण से निपटने में सक्षम नहीं होगा, लेकिन श्रमिकों को प्रभावित जरूर करेगा। दिल्ली सरकार की नई नीति पहले से ही संघर्षरत प्रवासी श्रमिकों को और परेशान करेगी।”

वहीं, मज़दूर संगठन सीटू दिल्ली इकाई के सचिव सिद्धेश्वर शुक्ला के अनुसार दिल्ली में उत्पादन इकाइयाँ अनुमानित 10 लाख श्रमिकों को रोजगार देती हैं।

उन्होंने कहा, “कारखानों को विभिन्न कौशल आधारित कारीगर और कार्यालयों में काम करने वाले लोगों की आवश्यकता होती है। यदि दिल्ली सरकार द्वारा प्रस्तावित संक्रमण होता है, तो विस्थापित श्रमिकों को कौन नौकरी देगा? श्रमिकों को महामारी और उसके बाद के लॉकडाउन में सबसे खराब हालत में देखा गया है। वे अपने कर्ज का भुगतान करने के लिए गहने और घर बेच रहे हैं क्योंकि उन्हें कई-कई जगह छह महीने तक नियोक्ताओं द्वारा भुगतान नहीं किया गया है।”

शुक्ला ने प्रदूषण को रोकने के लिए नीति की प्रभावशीलता पर संदेह व्यक्त किया। उन्होंने पूछा “जहां तक प्रदूषणकारी औद्योगिक इकाइयों का सवाल है, मुझे लगता है कि केवल दो औद्योगिक क्षेत्र हैं जो रिंग रोड और मुख्य शहर के दायरे में आते हैं। कई इकाइयाँ शहर के बाहरी इलाके में स्थित हैं। अब, जब आप उन्हें पानीपत या सोनीपत में स्थानांतरित करना चाहते हैं, तब भी क्या गारंटी है कि उनका प्रदूषण दिल्ली तक नहीं पहुंचेगा? ”

उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सरकार प्रदूषण को रोकने में वास्तव में रुचि रखती है, तो उसे मध्यम वर्ग को कारों का कम उपयोग करने और सार्वजनिक परिवहन में स्थानांतरित करने का निर्देश देना चाहिए ,लेकिन कोई इसपर नहीं बोलेगा।

आईटी मामलों के जानकार और सलाहकार बप्पा सिन्हा के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र आईटी कंपनियों को अपने औद्योगिक क्षेत्रों में स्थापित करने के लिए आकर्षित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन एक शहर से दूसरे शहर में ऐसी कंपनियों का प्रवास करना उस प्रोत्साहन पर निर्भर करेगा जो दिल्ली सरकार उन्हें प्रदान करेगी।

उन्होंने कहा, “आईटी उद्योग को काम करने के लिए मूल रूप से सस्ती अचल संपत्ति यानि जमीन और बिल्डिंग आदि और प्रतिभा पूल की आवश्यकता होती है। वर्तमान में, दिल्ली में अचल संपत्ति इतनी महंगी है कि आईटी उद्योगों ने खुद को गुड़गांव, फरीदाबाद और नोएडा में स्थानांतरित करना उचित समझा है। अब, इन शहरों में आईटी उद्योगों का एक मौजूदा आधार है और अब वे सब माइग्रेट करेंगे यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी।”

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CITU

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