NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
जेएनयू का विरोध करने वालों को करतारपुर से इतिहास की शिक्षा लेने की ज़रूरत है
मुस्लिम और सिख समुदाय दोबारा एक नई शुरुआत कर रहे है, अब जेएनयू से नफ़रत करने वालों को विचार करने की ज़रूरत है।
हुमरा कुरैशी
25 Nov 2019
JNU kartarpur

करतारपुर कॉरिडोर के खुलने से मुस्लिम और सिख समुदाय क़रीब आए हैं, अगर मैं ग़लत हूँ तो आप बताएं। विभाजन और उसके बाद की घटनाओं ने दोनों समुदायों में टकराव और एक गहरी खाई पैदा कर दी थी। इसे दूर करने की कुछ लोगों ने व्यक्तिगत कोशिश की। मुझे दिवंगत लेखक खुशवंत सिंह याद आते हैं। खुशवंत ने मुझे बताया था कि जब उन्हें रॉकफ़ेलर फ़ाउंडेशन से सिखों के इतिहास पर लिखने के लिए फ़ेलोशिप मिली, तो उन्होंने जानबूझकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को चुना। खुशवंत के मुताबिक़, "मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी या जेएनयू चुन सकता था, लेकिन मैंने एएमयू को चुना। क्योंकि मैं सिखों और मुस्लिमों के बीच की खाई को पाटने में अपने हिस्से का योगदान देना चाहता था।"

जब खुशवंत ने सिखों के इतिहास पर अपनी किताब के दोनों अंक ख़त्म कर लिए, तो उन्होंने आख़िर में ''ओपस एक्सेगी'' नाम के दो लैटिन शब्द जोड़े। इनका मतलब है 'मेरी ज़िंदगी का काम पूरा हुआ।' सिख धर्म और इसके इतिहास पर लिखना उनकी सबसे बड़ी महत्वकांक्षा थी। इसे पूरा करने के बाद खुशवंत ने महसूस किया कि अब वे अपनी उधार की जिंदगी शांति से बिता सकते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि अगर इस लेखन के बाद, वे कुछ भी नहीं लिखते हैं, तो भी उन्हें परवाह नहीं। 

कश्मीर घाटी में भी सिखों और मुस्लिमों के क़रीब आने के संकेत देखे जा सकते हैं। 90 के दशक की शुरुआत से मैंने यह संबंध देखा है। इसे बनते देखना बेहद ख़ूबसूरत होता है। जैसे बेघरबार लोगों को कश्मीर के गुरुद्वारों में सुकून और खाना मिल जाता है। प्रदेश के आंतरिक हिस्सों में भी आपको ऐसे परिवार मिल जाएंगे जो ख़ुद को कश्मीरी सिख कहते हैं। वे कश्मीरी मुस्लिमों के साथ घुलमिल चुके हैं। कहने की ज़रूरत नहीं है कि कश्मीर में दशकों से बने तनाव के माहौल ने उनके संबंधों को और मज़बूत ही किया है।

मुझसे इन बातों की पुष्टि कश्मीर में मिले लोगों ने भी की। इन्हीं में से एक हैं श्रीनगर के वकील हरदेव सिंह ओबरॉय। उन्होंने कहा, "हालांकि 2014 की बाढ़ में मेरा घर तबाह हो गया था, लेकिन मैने यहां से जाने की कभी नहीं सोची। हम सिख हमेशा यहां रहेंगे। 90 के दशक की विषम परिस्थितियों में भी मेरे परिवार के किसी सदस्य ने कश्मीर नहीं छोड़ा।" ओबरॉय ने बताया कि न केवल वह, बल्कि उनका पूरा कुटुंब घाटी में शांति से रहता है। ओबरॉय के मुताबिक़, मैं परिवार से ज्यादा अपने मुस्लिम दोस्तों के क़रीब हूँ। मुझे लगता है कि वो मेरे लिए जान भी दे सकते हैं। वह केवल एक ही चीज़ के लिए ज़्यादा संवेदनशील होते हैं और वो है उनका मज़हब।

आज जब करतारपुर कॉरिडोर को खोला गया है तो देश के दूसरे हिस्सों में सिख और मुस्लिमों के बीच का दोस्ताना देखने लायक है। अब वे अपने पुराने रिश्तों को दोबारा ताज़ा कर रहे हैं। यह भावनात्मक उभार इतना ज़्यादा है कि कई सिख दोस्तों ने मुझे गले लगाया और कई ने मुझे बार-बार सलाम किया।

एक साझा इतिहास वाले दोनों समुदायों की यह आत्मीयता दिल को छू जाने वाली है। यह भी है कि दोनों समुदाय सांप्रदायिक हिंसा का भी शिकार हुए हैं। मुझे याद है 1984 के भयावह दंगों के बाद कई सिख दोस्तों ने मुझसे कहा कि वे मुस्लिमों के साथ सहानुभूति रखते हैं। यह सहानुभूति सांप्रदायिक दंगों में मुस्लिमों को जिस हिंसा और ख़राब दौर से गुज़रना पड़ता है, उसके लिए थी।

******

आख़िर हम शैक्षणिक संस्थानों को मिटाकर अपने बच्चों की ज़िंदगी बर्बाद करने पर क्यों आमादा हैं? मैं जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी पर खड़े किए गए बखेड़े से नाराज़ हूँ। टीवी में दिखाई दे रहा है कि हमारे बच्चों को पुलिस घसीट रही है, उनकी पिटाई कर रही है। यह देखना किसी के लिए भी मुश्किल हो सकता है। इसके बावजूद यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर आराम से बैठे हैं।

पिछले कुछ सालों में केंद्र के सत्ताधारी जेएनयू में घुसने पर आमादा हैं। वे वहाँ के छात्रों की रोज़ाना की ज़िंदगी में दख़ल देने की कोशिशों में लगे हैं। दरअसल समस्या यह है कि इस यूनिवर्सिटी ने बड़ी संख्या में साहित्यिक, अकादमिक और सांस्कृतिक पुराधाओं को पैदा किया है। कैंपस में जाने से ही इसके अकादमिक माहौल का पता चल जाता है। किसी बाहरी आकस्मिक यात्री के लिए जेएनयू ''शांति के टापू पर बने अकादमिक दरवाज़े के सपने'' का बिंब नज़र आता है। जब भी मैं इस कैंपस में घूमती हूं, सोचती हूं कि लोग इससे बाहर ही क्यों जाते हैं। जेएनयू एक छोटी टाउनशिप जैसा है, जहां बहुत हरियाली, लंबे पेड़ और शानदार सड़कें हैं, जो छात्रों और शैक्षणिक विभागों को जोड़ती हैं।

इस यूनिवर्सिटी में कुछ तो अलग है जो आज की सरकार को चुभता है। मैंने राकेश बाताब्याल की किताब 'JNU: द मेकिंग ऑफ अ यूनिवर्सिटी' से इन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश की। आख़िर बेइंतहा दबाव के बावजूद यह संस्थान झुकता क्यों नहीं है? बाताब्याल ने जेएनयू के विकास को 1989 तक बताया है। उस साल उन्होंने यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया था। 

यहाँ उस विमर्श का उल्लेख ज़रूरी है जो इस यूनिवर्सिटी को बनाने वाले बिल, ''जेएनयू बिल'' को पेश करने के दौरान राज्यसभा में किया गया था। बाताब्याल ने अपनी किताब में लिखा, "एक बेहद उच्च गुणवत्ता वाले विश्वविद्यालय का दिवास्वप्न कैबिनेट मंत्रियों के दिमाग में पैदा होना शुरू हो गया था। इस बीच ज़मीन से जुड़े कम्यूनिस्ट लीडर भूपेश गुप्ता सामने आए। उन्होंने विमर्श में यथार्थ और व्यवहारिकता को जोड़ा।"

गुप्ता ने कहा कि हमें कैंब्रिज या ऑक्सफ़ोर्ड को ध्यान में रखकर यूनिवर्सिटी नहीं बनाना चाहिए। हमें दरअसल भारत की आर्थिक स्थिति के नज़रिये से सोचना चाहिए। बाताब्याल ने आगे लिखा, "गुप्ता के मुताबिक़, यह तय किया जाना चाहिए कि यूनिवर्सिटी के दरवाज़े कामगारों, मज़दूरों और मध्यवर्ग के बच्चों के लिए खुलें... सरकार को सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृति पहलुओं को ध्यान में रखकर नए विश्वविद्यालय की रूपरेखा बनानी चाहिए। देश के ग़रीब तबक़े को शिक्षा की ज़रूरत है। हमारे जैसे ग़रीब देश में लोगों के लिए एक 'ख़र्चीले उच्च दर्जे' के संस्थान की ज़रूरत नहीं है।"

यह तो बस शुरुआत थी। इसके बाद देश के विश्वविद्यालयों, ख़ासकर जेएनयू में पढ़ाए जाने वाले कोर्स के दृष्टिकोण की योजना, बदलाव और फेरबदल पर बड़े विमर्श की शुरुआत हुई। जेएनयू के मूल में समावेश किए जाने का विचार था, न कि इसमें ज़रूरत से ज़्यादा छात्रों को जगह देने का।

यह किताब जेएनयू के अतीत पर एक बड़ा दस्तावेज़ है। इसमें बताया है कि कैसे विमर्श और बहस से संस्थान की अकादमिक साख बनी। हमें सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी द्वारा फ़ालतू के मुद्दों पर इसको ख़त्म करने की इजाज़त नहीं देनी चाहिए। छात्र केवल बढ़ी हुई फ़ीस और आने-जाने के वक़्त में फेरबदल का विरोध कर रहे हैं। और क्यों न करें? क्या छात्रों को अपनी मांग और उन्हें पूरा करवाए जाने की बात उठाने का अधिकार नहीं है?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Why JNU’s Opponents Need History Lessons From Kartarpur

JNU attacked
Kartarpur Corridor
Communal amity
Indian Partition
Debate over JNU
Sikh Muslim relations

Related Stories

जेएनयू : नक़ाबपोश हमले के एक महीने बाद भी तनाव का माहौल

तिरछी नज़र : जब हिंसा ही देशभक्ति बन जाए…

जेएनयू अपडेट : हमले के बाद क्या-क्या हुआ?

UP में इंसाफ नहीं, JNU के पक्ष में देश और अन्य खबरें

JNU पर नकाबपोशों का हमला: पांच बड़े सवाल!

जेएनयू में हिंसा, दिल्ली विधानसभा चुनाव और अन्य ख़बरें

सिखों के प्रति भाजपा और संघ की ‘हमदर्दी’ के मायने

प्रकाश पर्व : भारत-पाक के टूटे संबंधों को जोड़ती गुरुनानक देव जी की ज़िंदगी

करतारपुर  कॉरिडोर : दोनों तरफ़ के पंजाबियों को भारत-पाक के बेहतर संबंधों की आस

न्यूज़चक्र विद अभिसार शर्मा एपिसोड 5: न्यूज़ चैनल देखना बंद कीजिये


बाकी खबरें

  • MGNREGA
    सरोजिनी बिष्ट
    ग्राउंड रिपोर्ट: जल के अभाव में खुद प्यासे दिखे- ‘आदर्श तालाब’
    27 Apr 2022
    मनरेगा में बनाये गए तलाबों की स्थिति का जायजा लेने के लिए जब हम लखनऊ से सटे कुछ गाँवों में पहुँचे तो ‘आदर्श’ के नाम पर तालाबों की स्थिति कुछ और ही बयाँ कर रही थी।
  • kashmir
    सुहैल भट्ट
    कश्मीर में ज़मीनी स्तर पर राजनीतिक कार्यकर्ता सुरक्षा और मानदेय के लिए संघर्ष कर रहे हैं
    27 Apr 2022
    सरपंचों का आरोप है कि उग्रवादी हमलों ने पंचायती सिस्टम को अपंग कर दिया है क्योंकि वे ग्राम सभाएं करने में लाचार हो गए हैं, जो कि जमीनी स्तर पर लोगों की लोकतंत्र में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए…
  • THUMBNAIL
    विजय विनीत
    बीएचयू: अंबेडकर जयंती मनाने वाले छात्रों पर लगातार हमले, लेकिन पुलिस और कुलपति ख़ामोश!
    27 Apr 2022
    "जाति-पात तोड़ने का नारा दे रहे जनवादी प्रगतिशील छात्रों पर मनुवादियों का हमला इस बात की पुष्टि कर रहा है कि समाज को विशेष ध्यान देने और मज़बूती के साथ लामबंद होने की ज़रूरत है।"
  • सातवें साल भी लगातार बढ़ा वैश्विक सैन्य ख़र्च: SIPRI रिपोर्ट
    पीपल्स डिस्पैच
    सातवें साल भी लगातार बढ़ा वैश्विक सैन्य ख़र्च: SIPRI रिपोर्ट
    27 Apr 2022
    रक्षा पर सबसे ज़्यादा ख़र्च करने वाले 10 देशों में से 4 नाटो के सदस्य हैं। 2021 में उन्होंने कुल वैश्विक खर्च का लगभग आधा हिस्सा खर्च किया।
  • picture
    ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
    डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अर्जेंटीना ने लिया 45 अरब डॉलर का कर्ज
    27 Apr 2022
    अर्जेंटीना की सरकार ने अपने देश की डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के साथ 45 अरब डॉलर की डील पर समझौता किया। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License