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भारत
राजनीति
गुमराह करती प्रचार मशीनरी के ख़िलाफ़ की गई पत्रकारिता
जो लोग वंचित समुदायों के पक्ष में बोलते हैं, फिर चाहे वे वकील, शिक्षाविद, मानवाधिकार कार्यकर्ता या पत्रकार हों, उन्हें हुकुमत का दुश्मन मान लिया जाता है।
इंडियन कल्चरल फ़ोरम
18 Feb 2021
Translated by महेश कुमार
गुमराह करती प्रचार मशीनरी के ख़िलाफ़ की गई पत्रकारिता
Image © Lucille Clerc

प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत की वैश्विक रैंकिंग में गिरावट एक बड़ा चिंतनीय मुद्दा है। 2015 में, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने भारत को 180 में से 136वें स्थान पर पाया था; पांच साल बाद, यह 142वें स्थान पर फिसल गया है, यानि म्यांमार को तीन और अफगानिस्तान को बीस स्थानों से पछाड़ दिया है। चूंकि किसी देश की वैश्विक स्थिति में बदलाव देश में प्रगति और अन्य देशों में दुर्गति को दर्शा सकता है, इसलिए यह परिवर्तन सही पैमाने को दर्शा नहीं पाता है। देश के भीतर राजनीतिक स्वतंत्रता पर लगती लगाम को समझने के लिए एक अलग ही पैमाने की जरूरत पड़ती है, जिसे विकसीत करना कठिन हो गया है, क्योंकि भारत में स्वतंत्र जमावड़ा और सूचनाओं के सत्यापन पहले के मुक़ाबले तनाव में है-जो काफी हद तक हुकूमत के चरित्र पर सवाल खड़ा करता है।

हुकुमत की प्रचार मशीन से स्वतंत्र प्रेस को अलग कर के देखने का तरीका यह है कि उस देश का घरेलू मीडिया बाहर से देखने पर कितना अलग दिखता है। किसी भी कार्यशील लोकतंत्र में विचलन कम से कम होना चाहिए। यह भारत का सच नहीं है। हुकुमत की विफलताओं के प्रति प्रतिरोध वैचारिक रूप से असुविधाजनक, यहां तक ​​कि उसे माना भी नहीं जाता है- यह स्थिति कुछ वंचित समुदायों की तरह है, जिनकी स्थिति के बारे में ये डेटा बता रहा है। मानव विकास के क्रम में तीसरी दुनिया के देशों में, लिंग भेद और भूख सूचकांक में भारत वैश्विक दर्जे में सबसे कमजोर और निचले पायदान पर है और इसके अलावा पर्यावरण सूचकांक में पृथ्वी के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में से 21वें स्थान पर आता है। यह बढ़ते भ्रष्टाचार के मामले में भी फिसल रहा है, और एशिया में रिश्वतखोरी के मामले में सबसे ऊपर आता है। दूसरी ओर, यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सैन्य खर्च वाला देश है, और इसके कुछ चौंकाने वाले नतीजे सामने आते हैं- देश में धन असमानता तेजी से बढ़ रही है, करों के माध्यम से धन के हस्तांतरण और मानव-विकास पर खर्च में सबसे खराब प्रदर्शन रहा है। ये आंकड़े हमारे लोकतंत्र के स्वास्थ्य की एक झलक पेश करते हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल भारत के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय, आयकर अधिकारियों और सरकार ने बदनामी का अभियान चलाया एवं उनका लगातार उत्पीड़न करते हुए  लोकतांत्रिक प्रक्रिया को धता बताते हुए विगत वर्ष कार्यालय को बंद कर दिया गया।  अप्रत्याशित रूप से, देश वैश्विक लोकतंत्र सूचकांक में फिसल रहा है: नतीजतन 2014 में 27 वें स्थान पर था, 2020 में यह 53 वें स्थान पर है।

सच्चे तथ्यों के प्रति सरकार की प्रतिक्रिया सूचना को छिपाना या गुमराह करना है। पिछले छह महीनों में, यह दावा किया गया कि लॉकडाउन के दौरान, श्रमिकों, या स्वास्थ्य कर्मियों की मौतों या नौकरी के नुकसान, या किसान आत्महत्याओं का कोई डेटा नहीं है- यह तब है जब लाखों लोग अत्यधिक गरीबी की चपेट में आ गए हैं। स्वतंत्र मीडिया ने इन पर से पर्दा उठाने की चुनौती स्वीकार कर सकता था और करता भी है लेकिन नागरिक स्वतंत्रता के साथ-साथ पत्रकारिता के लिए यह स्पेस कम होता जा रहा है। और एक जटिलता ये भी है: कि सरकार जोकि कॉर्पोरेट के स्वामित्व वाले मीडिया का सबसे बड़े विज्ञापनदाता है वह मुख्यधारा का मीडिया गरीबों पर स्पॉटलाइट डालने या उनके अधिकारों की रक्षा में बहुत कम उपयोग में आता है, और ऐसा करने वाले अन्य लोगों के लिए भी मीडिया में समय कम होता जा रहा है। मुख्यधारा का मीडिया, जैसा कि पी॰ साईनाथ बताते हैं, कि उन संगठनों के लिए एक मिथ्या नाम है जो व्यवस्थित रूप से भारत की 70 प्रतिशत आबादी की अनदेखी करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों का कवरेज राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों के फ्रंट पेज पर औसतन 0.67 प्रतिशत खबरें बनाता है, जबकि उनके मध्य पृष्ठ सामाजिक-क्षेत्र के मुद्दों (पर्यावरण, आवास, गरीबी, खेती, आदि) को नकारते हुए अपराध और मनोरंजन के मुद्दों से भरे होते हैं। उन्होंने बताया कि भारत के सबसे बड़े मीडिया के मालिक मुकेश अंबानी नए कृषि-कानूनों के सबसे बड़े लाभार्थियों में से एक हैं। उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया किसान आंदोलन का कवरेज शत्रुतापूर्ण तरीके से दिखाता है।

एलीटिज़्म और क्रोनिज़्म हमेशा की तरह एक ऐसे देश में व्यापार बन जाता है जहां संसद धन का प्रदर्शन करती है और सांसद होने के नाते आर्थिक मंदी में भी उनके संपत्ति बढ़ती रहती है, लेकिन अब जो खुलासा हो रहा है वह बहुत गंभीर है। जो लोग वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए बोलते हैं, चाहे वे वकील, शिक्षाविद, मानवाधिकार कार्यकर्ता या पत्रकार हों, उन्हें हुकूमत का दुश्मन मान लिया जाता है। केवल सरकार के प्रति उनकी असहमति को चिह्नित करना आसान सी बात होगी, जबकि असल में वे ’अपराध’ सरकार की आलोचना करने में नहीं है जितना कि संवैधानिक गारंटी और प्रक्रियाओं के समर्थन में खड़ा होना है। वे हुकूमत की सक्रिय तोड़फोड़ के खिलाफ संविधान का बचाव कर रहे हैं। यदि ऐसे लोगों को सार्वजनिक रूप से बदनाम किया  जा रहा है और उन्हे कैद किया जा रहा हैं, तो यह हुकूमत के आचरण में अराजकता और बेखौफ नजरिए को दर्शाता है। स्वतंत्र पत्रकार खुद को एक मुश्किल हालत में पाते हैं, उनका खुद भी उसी तरह के दुर्व्यवहार का शिकार होने का खतरा बन जाता है जिनकी कहानियों को वे प्रचारित करना चाहते हैं। फ्री स्पीच कलेक्टिव की रिपोर्ट "बिहाइंड बार्स" से पता चलता है कि पिछले एक दशक में 154 पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया, पूछताछ की गई या उनके पेशेवर काम के संबद्ध में कारण बताओ नोटिस जारी किए गए, इनमें से 67 को अकेले 2020 में प्रताड़ित किया गया है। अनुच्छेद 14 में राजद्रोह के मामलों पर एक डेटाबेस तैयार किया गया है, जो 2014 के बाद से प्रत्येक वर्ष 28 प्रतिशत वृद्धि को दर्शाता है।

पिछले सात वर्षों में सरकार की कार्रवाइयों में न केवल तेजी से सत्तावादी प्रवर्ति में वृद्धि हुई है, बल्कि मनमानी शक्ति का इस्तेमाल देखा गया है। उदाहरण के लिए, भारत ने 2020 में किसी भी अन्य देश की तुलना में इंटरनेट बंद का सबसे अधिक सामना किया है, और इस तरह के शटडाउन से वैश्विक आर्थिक नुकसान का आधा अकेले भारत को भुगतना पड़ा है। जो सरकार के प्रशिक्षित मीडिया संगठनों को भी परेशानी में डाल देता है: कि इन वर्षों में सरकार की तथाकथित सफलताओं बताना भी उनके लिए आसान नहीं है। वे यह लाइन नहीं ले सकते हैं कि नए कृषि-कानून नोटबंदी की तरह हैं, पीएम-केयर्स फंड और इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम जैसे पारदर्शी हैं, कोविड़ लॉकडाउन के मामले में मानवीय और दूरदर्शी हैं, साथ ही जीएसटी की तरह तरह योजनाबद्ध हैं, स्वच्छ भारत अभियान, या कि निजीकरण से रोजगार और आय-सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा। जब सरकार की खुद की कारगुजारी से अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है, और संस्थानों ने पेशेवर गरिमा या सुधार के ढोंग को छोड़ दिया है, और संविधान को दमनकारी प्रावधानों के रुप में पेश किया जाने लगे तो जनता के लिए नई सुबह देखना मुश्किल हो सकता है। चाहे आम जनता के खान-पान के तरीके हों या मोहब्बत उसे लव-जिहाद के रूप में कलंकित करना, अधिकारों की लड़ाई को शहरी-नक्सलवाद, टुकडे-टुकडे गिरोह के रूप में कलंकित करना और उनके नागरिक विरोध को पाकिस्तानी, खालिस्तानी, आंदोलनजीवी कह देना भी इस तरह की सत्ता के हथियार हैं जो जनता को प्रचार के गुमराह कुएं में धकेल देते हैं। 

सोमवार, 8 फरवरी को, यह घोषणा हुई कि गई थी कि द कारवां को पत्रकारिता में विवेक और अखंडता के लिए लुई एम॰ लियोन पुरस्कार से नवाजा गया है। उसी दिन, द कारवां के प्रकाशक और कार्यकारी संपादक सर्वोच्च न्यायालय में उनके खिलाफ लगे कई राजद्रोह के मामलों को खारिज करने की दलील पेश कर रहे थे। यह वह दिन भी था जब राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद नरेंद्र मोदी और जोए बाइडेन ने पहली बार टेलीफोन पर बात की थी। उन्होंने कहा कि, मोदी ने "शासन-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था" और "देश और विदेश में लोकतंत्र को मजबूत करने", के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है, उक्त बातें व्हाइट हाउस प्रेस विज्ञप्ति से ली गई हैं। अगली ही सुबह, प्रवर्तन निदेशालय ने न्यूज़क्लिक के खिलाफ कई छापे मारे। इसके प्रधान-संपादक और उनके साथियों को उनके घर पर ही हिरासत में ले लिया गया था, जोकि पटना उच्च न्यायालय के 2013 के फैसले के उल्लंघन था जिसमें कोई भी छापेमारी 36 घंटे से अधिक नहीं चल सकती हैं और यहाँ ये छापे 113 घंटे तक जारी रहे। यहाँ तक कि न्यूज़क्लिक के वकीलों को भी उन तक पहुंचने की अनुमति नहीं दी गई और ईडी ने अभी तक भी इस बारे में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है जबकि मीडिया के कुछ हिस्सों ने न्यूज़क्लिक की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से लीक की गई कुछ खबरों को प्रकाशित किया है। 

सवाल यह है क्या भारत अधिक समय तक वास्तविकता को छिपा सकता है? साहसी पत्रकार हमेशा तथ्यों को पेश करने और सबूतों की जांच करने का काम करेंगे। अब हम सबके के लिए, शहर में एक नया शो चल रहा है: ग्रेटा थुनबर्ग का शैतानी केस, दिशा रवि और महान अंतर्राष्ट्रीय टूलकिट षड्यंत्र (यहां और वहाँ)। साथ ही, आपकी रुचि इसमें भी होनी चाहिए कि गृह मंत्रालय अच्छे नागरिकों को ’साइबर स्वयंसेवक बनने का आमंत्रण दे रहा है और अपने साथी नागरिकों की हरकतों को हुकूमत को रिपोर्ट करने को कह रहा है। एक बार जब अमित शाह का मंत्रालय यह तय कर लेता है कि फलां व्यक्ति या संगठन कानून और व्यवस्था के लिए खतरा है, तो वह व्यक्ति या संगठन इंटरनेट तक अपनी पहुंच खो सकता है। फिर अपने को निर्दोष साबित करने में और अधिकारों को बहाल करवाने में जैसा कि राजद्रोह के मामलों और यूएपीए में होता है, अदालतों के चक्कर काटते-काटते सालों लग जाते हैं।

This article was first published in the Indian Cultural Forum.

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें ।

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