NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पुस्तकें
भारत
राजनीति
लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों को उजाकर करती एम.जी देवसहायम की किताब ‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘
‘‘चुनावी लोकतंत्र?‘‘ किताब बताती है कि कैसे चुनावी प्रक्रियाओं की सत्यता को नष्ट करने के व्यवस्थित प्रयासों में तेजी आयी है और कैसे इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
सतीश भारतीय
24 Feb 2022
M.G. Devasahayam

‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘ नामक किताब का पहला संस्करण फरवरी 2022 में वरिष्ठ पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता द्वारा प्रकाशित किया गया है। यह किताब भारतीय चुनावों की निष्पक्षता और सत्यता की पड़ताल पर आधारित है। जिसके मूल रचनाकार एम.जी देवसहायम है। जो नागरिक आयोग के समन्वयक और पीपल फर्स्ट के अध्यक्ष हैं। वह इससे पहले भी इंडियाज सेकंड फ्रीडम-इन अनटोल्ड सागा जैसी किताबें लिख चुके हैं। वहीं इस किताब में विभिन्न विचारवान् व्यक्तियों ने भी लेखन किया है। जिसमें पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, शोधकर्ता, सिविल सेवक, न्यायधीश और चुनाव आयुक्त भी शामिल हैं।

‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘ नामक इस किताब को लिखे जाने का मूल उद्देश्य भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनाव प्रणाली में व्याप्त खामियां और भ्रष्टाचार को उजागर करना है। तो चलिए हम जरा एक नजर इस किताब के पन्नों पर डालतेे है, ताकि हमें समझ आए कि लेखक एम.जी देवसहायम और उन्हें इस किताब के लेखन में योगदान करने वाले विभिन्न महानुभव इस किताब के जरिए अपना किस तरह का नज़रिया रखते है और उनकी नज़र में किताब के मायने क्या है?

किताब की प्रस्तावना में बताया गया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग के आचरण ने इसकी सबसे बड़ी ताकत रही निष्पक्षता के बारे में संदेह पैदा किया है। जिस तरह आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया गया है। उसके बारें में कई राजनीतिक दल, मीडिया समूह, नागरिक और सेवानिवृत्त अधिकारी जब चुनाव आयोग से स्पष्ट खामियों को रेखांकित करके जवाब मागतें है। तब चुनाव आयोग न कोई जवाब देता है और न अपना बचाव करता है। बल्कि चुप्पी साध लेता है।

किताब में आगे जिक्र किया गया है कि 2019 के लोेकसभा चुनाव के बाद संसद में घोर गिरावट आ गयी है। संसद को लोकतंत्र का मंदिर बताने का कोई मतलब नहीं है यदि ‘हाउस ऑफ द पीपल‘ लोकसभा की प्रतिष्ठा को बेरहमी से नाकाम और अपवित्र कर रहें हो। अब आप कहेगेें कैसे? तब बता दें कि संसद सदस्यों के एक बड़े हिस्से ने आपराधिक रिकॉर्ड घोषित किया है और बहुत बड़ी संपत्ति जमा की है। जो अपने आप में लोकतांत्रिक शासन के अनुकूल नहीं हैै। जैसे उदाहरण के तौर पर 2019 के लोकसभा सांसदों का आपराधिक रिकॉर्ड देखे तब नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के मुताबिक 539 सांसदों में से 233 यानी 43 फ़ीसदी सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज़ है। वहीं 475 यानी 88 प्रतिशत करोड़पति है।

पुस्तक में आगे उल्लेख किया गया कि, पूरा का पूरा संसद सत्र रद्द कर दिया जाता है और प्रश्न काल को घटाकर काफी छोटा किया जा रहा है। देश और उसके महत्वपूर्ण मुद्दो जैसे, बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, किसानी, सार्वजनिक संपत्ति की बेधड़क बिक्री अन्य पर संसद में शायद ही चर्चा की जाती है।

किताब में इससे भी वाकिफ़ कराया गया कि 2019 के बाद भारत ने कई कानूनों और हिसंक नीतियों को निरंकुश तरीके से आते देखा है जैसे, तीन कषि कानून, चुनाव कानून, सीएए, श्रमसंहिता, आरटी आई अधिनियम, शिक्षा नीति, सार्वजनिक उनक्रमों के निजीकरण पर नीतियां सहित अन्य कानून जो मजदूरों, किसानों और गरीबों के हितों के ख़िलाफ़ है।

इसके उपरांत किताब में उल्लेख किया गया कि आधार-मतदाता पहचान पत्र को जोड़ना चुनावी लोकतंत्र को डुबो सकता है। क्योंकि आधार में बायोमेट्रिक जानकारियां दर्ज़ रहती हैं। जिसके लीक होने की संभावनाएं हैं। वहीं 2018 में द ट्रिब्यून में प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट से पता चला था कि एक अरब आधार विवरण तक पहुंच प्राप्त करने में केवल ₹500 और 10 मिनट का समय लगता हैं। जबकि ₹300 और खर्च करके ट्रिब्यून टीम को एक एजेंट से ऐसा सॉफ्टवेयर प्राप्त हुआ जो किसी भी व्यक्ति की आधार संख्या दर्ज़ करने के बाद उसके आधार कार्ड को छापने की सुविधा प्रदान करता है।

आगे पुस्तक के खंड दो में अंजली भारद्वाज (सामाजिक कार्यकर्ता) के लेख में अपराधीरण, धनबल और चुनाव पर बात की गयी। जिसमें बताया गया है कि 2014 से 2017 की अवधि के आंकडों के आधार पर केन्द्र सरकार ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि देश भर के विभिन्न राज्यों में 1,765 सांसदों और विधायकों से जुड़े 3,045 आपराधिक मामले लंबित है। आगे जिक्र किया गया कि 2019 में 30 सांसदों के खिलाफ हत्या के प्रयास और 19 पर महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामले दर्ज़ है। आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसद केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में भी शामिल है। एडीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019 में आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे 22 सांसदों को मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया था। इनमें से 16 के ख़िलाफ़ तो गंभीर आपराधिक केस दर्ज़ थे।

किताब के खंड दो में ही लेखक एमजी देवसहायम इस प्रश्न पर गौर फरमाते है कि, क्या भारत में चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष है? वह इस संबंध में अमेरिका स्थित फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट फ्रीडम इन द वर्ल्ड 2021 का जिक्र करते है। जिसमें भारतीयों को शर्मसार कर देने वाली बातें लिखी है। रिपोर्ट में बताया गया कि भारत ने ‘‘मुक्त‘‘ होने का अपना दर्जा खो दिया है। 2014 के बाद से राजनीतिक अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता की स्थिति बदतर हो गयी है। और तो और 2019 के लोकसभा चुनाव को बदलाव लाने वाली उस घटना के रूप में चिन्हित किया जा रहा है जिसके कारण भारत ‘‘मुक्त‘‘ का दर्जा खोकर ‘‘चुनावी तानाशाही‘‘ बन गया है।

पुस्तक में आगे (चुनावी विज्ञानी और राजनीतिक टिप्पणीकार) संजय कुमार ने चुनाव आयोग के पक्षपात पूर्ण और विवादास्पद कामकाज पर एक लेख लिखा है। जिसमें उन्होनें बताया है कि 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में तारीख़ों की घोषणा के पक्षपात को लेकर चुनाव आयोग पर आरोप लगाए गए। दूसरी मर्तबा राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना राज्यों में 2018 के चुनाव में तारीख़ों की घोषणा में पक्षपात के फिर आरोप लगे। वहीं इसके बाद तीसरी दफ़ा चुनाव तारीख़ों की घोषणा को लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग पर फिर आरोप लगे। ऐसे मेें राजनीतिक दलों और आम नागरिकों द्वारा चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोपों को लेकर ना तो चुनाव आयोग कोई जवाब पेश करता है। और ना ही आरोपों का विरोध करता है। जबकि चुनाव आयोग को इन आरोपों का जवाब देने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि संदेश की स्थिति में सत्य सत्य नहीं होता धारणा सत्य होती है।

किताब में आगे वरिष्ठ पत्रकार और साक्षात्कारकर्ता परंजय गुहा ठाकुरता ने लिखा कि मीडिया शासकों की मदद करता है और चुनाव आयोग मुंह मोड़ लेता है। जैसे 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद और खासतौर पर प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के चुनाव के बाद से तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया का अधिकांश हिस्सा सत्तारूढ़ व्यवस्था के प्रति उदासीन हो गया है। उन्होनें आगे जिक्र किया कि फेसबुक समूह के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ भय, असुरक्षा और नफरत फैलाने के लिए दुष्प्रचार का माध्यम बन रहे है। सोशल मीडिया पर सरकार और सत्तधारी पार्टी के आलोचकों पर टोल्स की समन्वित सेेनाओें के बलबूते हमला किया जाता है।

आखिरी में किताब में भारत के 17 वे मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने चुनाव और चुनाव आयोग की खामियों को स्पष्ट करते हुए सुझाव दिया कि चुनाव और चुनाव आयोग को पटरी पर कैसे लाया जाए? उन्होनें इस संबंध में जिक्र किया कि सबसे महत्वपूर्ण सुधार चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया है। यह विडंबना ही है कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली चुनाव आयोग में नियुक्ति की सबसे त्रुटिपूर्ण प्रणाली है। दुनिया में कहीं भी कार्यपालिका विपक्ष से परामर्श किए बिना चुनाव आयोग के सदस्यों की एकतरफ़ा नियुक्ति नहीं करती है। अधिकांश देशों में न केवल विपक्ष से परामर्श किया जाता है। बल्कि संसद इस नियुक्ति को मंजूरी भी देती है। उनका मानना है कि इन चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया यह होगी कि एक कॉलेजियम हो जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायधीश शामिल हो।

वहीं इसके अलावा किताब में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021, बिहार विधानसभा चुनाव 2020, तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2021, ईवीएम-वीवीपीएटी प्रक्रिया में खामियां, लोकतंत्र के सिध्दांत और भारत की चुनाव प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं को भी प्रस्तुत किया गया।'

(सतीश भारतीय एक स्वतंत्र पत्रकार है) 

M.G. Devasahayam
Electoral Democracy
Book
चुनावी लोकतंत्र

Related Stories

किताब: यह कविता को बचाने का वक़्त है

‘शाहीन बाग़; लोकतंत्र की नई करवट’: एक नई इबारत लिखती किताब

पृथ्वी पर इंसानों की सिर्फ एक ही आवश्यक भूमिका है- वह है एक नम्र दृष्टिकोण की

सतत सुधार के लिए एक खाका पेश करती अंशुमान तिवारी और अनिंद्य सेनगुप्ता की किताब "उल्टी गिंनती"

रवींद्रनाथ टैगोर साहित्य पुरस्कार 2021, 2022 के लिए एक साथ दिया जाएगा : आयोजक

तरक़्क़ीपसंद तहरीक की रहगुज़र :  भारत में प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन का दस्तावेज़

समीक्षा: तीन किताबों पर संक्षेप में

मास्टरस्ट्रोक: 56 खाली पन्नों की 1200 शब्दों में समीक्षा 

जन मुक्तियुद्ध की वियतनामी कथा- ‘हंसने की चाह में’

विशेष : सोशल मीडिया के ज़माने में भी कम नहीं हुआ पुस्तकों से प्रेम


बाकी खबरें

  • भाषा
    किसी को भी कोविड-19 टीकाकरण कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता : न्यायालय
    02 May 2022
    पीठ ने कहा, “संख्या कम होने तक, हम सुझाव देते हैं कि संबंधित आदेशों का पालन किया जाए और टीकाकरण नहीं करवाने वाले व्यक्तियों के सार्वजनिक स्थानों में जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाए। यदि पहले से…
  • नाइश हसन
    कितने मसलक… कितनी टोपियां...!
    02 May 2022
    सुन्नी जमात हैं तो गोल टोपी... बरेलवी से हैं तो हरी टोपी...., अज़मेरी हैं तो ख़ादिम वाली टोपी.... जमाती होे तो जाली वाली टोपी..... आला हज़रत के मुरीद हों तो लम्बी टोपी। कौन सी टोपी चाहती हैं आप?
  • शिरीष खरे
    कोरोना महामारी अनुभव: प्राइवेट अस्पताल की मुनाफ़ाखोरी पर अंकुश कब?
    02 May 2022
    महाराष्ट्र राज्य के ग़ैर-सरकारी समूहों द्वारा प्रशासनिक स्तर पर अब बड़ी तादाद में शिकायतें कोरोना उपचार के लिए अतिरिक्त खर्च का आरोप लगाते हुए दर्ज कराई गई हैं। एक नजर उन प्रकरणों पर जहां कोरोनाकाल…
  • सुबोध वर्मा
    पेट्रोल/डीज़ल की बढ़ती क़ीमतें : इस कमर तोड़ महंगाई के लिए कौन है ज़िम्मेदार?
    02 May 2022
    केंद्र सरकार ने पिछले आठ वर्षों में सभी राज्य सरकारों द्वारा करों के माध्यम से कमाए गए 14 लाख करोड़ रुपये की तुलना में केवल उत्पाद शुल्क से ही 18 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की है।
  • ज़ाहिद खान
    सत्यजित रे : सिनेमा के ग्रेट मास्टर
    02 May 2022
    2 मई, 1921 को कोलकाता में जन्मे सत्यजित रे सिनेमा ही नहीं कला की तमाम विधाओं में निपुण थे। उनकी जयंती पर पढ़िये यह विशेष लेख।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License