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मज़दूर-किसान
भारत
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कड़ी मेहनत से तेंदूपत्ता तोड़ने के बावजूद नहीं मिलता वाजिब दाम!  
मध्यप्रदेश में मजदूर वर्ग का "तेंदूपत्ता" एक मौसमी रोजगार है। जिसमें मजदूर दिन-रात कड़ी मेहनत करके दो वक्त पेट तो भर सकते हैं लेकिन मुनाफ़ा नहीं कमा सकते। क्योंकि सरकार की जिन तेंदुपत्ता रोजगार संबंधी सुविधाओं से मजदूरों को मुनाफ़ा होता था, उन पर रोक लग चुकी है।
सतीश भारतीय
28 May 2022
workers
रानगिर के जंगल में बैठे कुछ तेंदूपत्ता मजदूर

भारत में सबसे अधिक वन क्षेत्रफल वाला राज्य मध्यप्रदेश है। जिसका क्षेत्रफल 308,252 वर्ग किमीं है। मध्यप्रदेश के इस क्षेत्रफल में से 77,462 वर्ग किमीं क्षेत्रफल में जंगल फैले हुए हैं। जो कि तक़रीबन समूचे देश के जंगल में से 30 प्रतिशत जंगल वाले क्षेत्र को आच्छादित करते है। प्रदेश के यह जंगलीय क्षेत्र नौरादेही, कान्हा, बांधवगढ़, पन्ना, सतपुड़ा, पचमढ़ी जैसे विभिन्न अभ्यारणों से सटे हुए है। जिनमें इस भीषण गर्मी के मौसम में बीड़ी बनाने वाले श्रमिकों द्वारा‘‘तेंदूपत्ते‘‘ की ताबड़-तोड़ तुड़ाई की जा रही है। ऐसे में तेंदूपत्ते की तुड़ाई को प्रदेश की आवाम एक मौसमी रोजगार मानती है। मगर यह मौसमी रोजगार उतना सरल नहीं है। जितना आप सोच रहे हैं। यह तेंदूपत्ते की तुड़ाई का कामकाज मजदूरों का खून-पसीना एक कर देता है। इस चिलचिलाती प्रचंड गर्मी में, जब प्रदेश का तापमान 47 डिग्री पर है और लोग घरों में एसी, कूलर की हवा में बैठे हैं। तब इस वक्त मजदूूर वर्ग तेंदूपत्ता तोड़ने के लिए कई किमीं पैदल चलने को विवश है। इस तेंदूपत्ता के रोजगार की राह में मजदूर वर्ग संघर्ष कर रहा है।

जब हमने यह जानने के लिए कि तेंदूपत्ता श्रमिकों के सामने किस तरह का संघर्ष और चुनौतियां हैं? मप्र के बुन्देलखंड (सागर) में रानगिर के प्रसिध्द जंगल का भ्रमण किया। जो मप्र के सबसे बडे़ ‘‘नौरादेही‘‘ अभ्यारण (क्षेत्रफल 1196 वर्ग किमीं) से सटा हुआ है। यह रानगिर का जंगल सागर से करीब 30 किमीं दूर सुरखी विधानसभा के बंसिया गांव से प्रारंभ माना जाता है। जब हमने बंसिया गांव से पथरीले रास्ते के जरिए रानगिर के जंगल (फैलाव करीब 50 किमीं) में प्रवेश किया। तब जंगल के भीतर कुछ तेंदूपत्ता तोड़ने वाले मजदूरों से हमारी मुलाक़ात हुयी। जिनसे जब हमने जंगलीय स्थिति जानने की चाह प्रकट की? तब इन मजदूरों में से एक बबलू बताते है कि इस कड़कती गर्मी में भी जंगल काफी हरा-भरा है। क्योंकि जंगल में ज्यादातर तेंदूपत्ते के पेड़ है। जो लहलहा रहे हैं। और तेंदूपत्ते के अलावा, सागौन, गुलमुहार, गुन्जा जैसे अन्य बहुत सारे पेड़ है। जो मकोरा, काकेंर, तेंदू और अचार, जैसे अन्य फल-फूल भी प्रदान करते है। आगे दूसरे शख़्स रामदीन बताते है कि जंगल में शेर, हिरण, मोर, चीता, भालू जैसे बहुत से जीव-जन्तु भी रहते है। लेकिन यह जीव-जंतु लोगों को हानि नहीं पहुंचाते है। फिर वह कहते है कि इस जंगल में 500 फिट से लेकर 1000 फीट ऊंची चोटियां है। जिन पर पेड़ भी लगे हुए है। इन चोटियों पर चढ़कर भी लोग तेंदूपत्ता तोड़ते है।

रानगिर के जंगल

आगे जब हमने इन श्रमिकों से यह सवाल पूछा कि आप लोग ये तेंदू पत्ता कब से, क्यों तोड़ते है, और इनका किस तरह उपयोग करते है? तब नारायनपुर गांव के मनोज प्रतिक्रिया देते हुए कहते है कि हम हर साल अप्रैल माह के अंत से लेकर जून माह के अंत तक, करीब 2 माह तेंदूपत्ता की तुड़ाई करते है। यह 2 माह तेंदूपत्ते की तुड़ाई हमें साल में 8 माह (कम ही) पर 100 रुपए दिन का बीड़ी बनाने का रोजगार देती है। जिससे हमारा पेट भरता है। फिर हमारे यह पूछने पर कि आप लोग इतने कम पैसे में गुजर-बसर कैसे करते है, कोई दूसरा रोजगार नहीं मिलता क्या आपको? तब मनोज कहते है कि यहां आसपास जितने गांव है। वह जंगल से सटे हुए हैं। तब यहां तेंदूपत्ता तोड़कर उसकी बीड़ी बनाना ही एक रोजगार का प्रमुख साधन है। और अड़ोस-पड़ोस के गांव में महिने मेें 150 रुपए दिन के हिसाब से दो-चार दिन दिहाड़ी मिल जाती है। फिर वह कहते हैं सरकार की रोजगार संबंधी कोई योजनाएं यहाँ नहीं हैं।

नारायनपुर गांव में एक मजदूर की झोपड़ी पर रखीं तेंदूपत्ते की कुछ गड्डियां

आगे जब हमने यह जानना चाहा कि आप लोग तेंदूपत्ता दिन में कितना तोड़ लेते है और क्या इसे बेचते भी है? तब हिनौता गांव की पूजा बताती है कि हम लोग दिन में 50-80 तेंदूपत्तों की एक गड्डी जैसी 100-150 गड्डियां तेंदूपत्ता तोड़ लेते है। आगे वह तेंदूपत्ते  बेचने के संबंध में हामी भरते हुए कहती हैं कि हमारे तेंदूपत्तों की 100 गड्डीयां 150 रुपए में बड़े-बड़े बीड़ी कारोबारी खरीद लेते है। फिर जब हमने यह प्रश्न किया कि सरकार की तेंदूपत्ता के रोजगार को लेकर क्या नीतियां हैं और उनका आपको कितना लाभ मिलता है? तब इस प्रश्न का जवाब बम्हौरी गांव के रोहित देते है। वह कहते है कि 2 साल पहले हमारे तेंदूपत्ते सरकार खरीदती थी। हमारी तेंदूपत्ते की 100 गड्डीयों का 300 रुपए सरकारी मूल्य तय था। लेकिन बहुत साल से तेंदूपत्ता और बीड़ी उद्योग की दशा खस्ता होती जा रही थी और कोरोना के वक्त लॉकडाउन में यह हालत बद से बदतर हो गयी।

जिससे सरकार ने हमारे तेंदूपत्ते खरीदना बंद कर दिया। अब सस्ते मूल्य पर बीड़ी कारोबारी ही हमारे तेंदूपत्ते खरीदते है। आगे राजेश कहते है कि पहले हमारे तेंदुपत्ते मजदूर कार्ड बने थे, जिस पर सालाना सरकार से 1000 के करीब रुपये आता था। लेकिन अब तेंदूपत्ता मजदूर कार्ड बंद करवा दिया गया है। तब हमें तेंदूपत्ता रोजगार से संबंधित कोई सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता है।  
 
आगे जब हमने इन तेंदूपत्ता मजदूरों के सामने यह जिज्ञासा रखी कि पहले के मुकाबले अब तेंदूपत्ता के इस मौसमी रोजगार कि क्या परिवर्तन आया है? तब इस पर अपना विचार रखते हुए रीना बताती है कि पहले हम सालाना 2 माह में 7 हजार गड्डी तेंदूपत्ता तोड़ लेते थे। जिससे थोड़ा-बहुत मुनाफ़ा हो जाता था। लेकिन जंगल में तेंदूपत्ते की भारी तुड़ाई से इसके पेड़ कम होते जा रहे है। जिससे अब तेंदूपत्ता में कमीं भी आ गयी है, ऊपर से जंगल के पास 2 साल पहले से एक बड़ा बांध बन रहा है। जिससे बहुत से तेंदू के पेड़ और अन्य पेड़ कट चुके हैं। तब ऐसे में हमारे रोजगार पर भी आफ़त आ गयी है। आगे रतनेश कहते हैं कि तेंदू पत्ता एक कच्चे माल की भांति है, जिसको बीड़ी का आकार देकर पक्का किया जाता है और बीड़ी ही हमारी आय का मुख्य जरिया हैं, लेकिन अब बीड़ी की जगह सिगरेट ने ले ली है। ऊपर से गुटखा भी दमादम चल रहा है। ऐसे में बीड़ी की साख-धाक गिर गयी है, तब इस स्थिति में तेंदूपत्ता का महत्व भी कम हो गया है।

इसके आगे जब हमने रानगिर के जंगल में बन रहे बांध के बारे पूछा? तब राज बताते है कि पानी संरक्षित करने के लिए यह बांध बनाया जा रहा है। जिसकी लंबाई (करीब 60 किमी) रानगिर के इस जंगल से लेकर दमोह जिले तक रहेगी। आगे वह कहते हैं कि बांध की वजह से जंगल के हजारों पेड़ कट चुके है। और बहुत से पेड़ काटे जाने है। लेकिन अभी फिलहाल बांध के काम में ढील-ढाल चल रही है।

रानगिर के जंगल में तेंदू पत्ता तोड़ती एक युवती 

फिर इसके बाद जब हमने जंगल की झाड़ियों में से गुजरते हुए आगे की ओर रुख़ किया। तब हमारी मुलाक़ात कुछ और तेंदूपत्ता मजदूरों से हुयी। जिनसे हमने यह प्रश्न किया कि आप लोगों को तेंदूपत्ता का रोजगार करने में क्या-क्या परेशानियां और चुनौतियां सामने आती हैं? तब 13 मील गांव की रोशनी कहती है कि तेंदूपत्ता के रोजगार में सबसे बड़ी समस्या हमारे सामने जंगल के लिए ‘‘पैदल चलना‘‘ है। हम लोगों को 20-30 किमीं पैदल चलना पड़ता है। तब जंगल पहुंचते है। जंगल में इस कदर बड़े-बड़े पत्थर है कि वहां साइकिल, मोटर साइकिल और बैलगाड़ी जैसे अन्य साधन नहीं जा सकते है। आगे मीना कहती है कि पैदल चलने तक तो ठीक है। लेकिन सबसे ज्यादा कठिनाई हमें तब आती है। जब हम सिर पर 30-40 किलो तेंदूपत्ते लाद कर जंगल में ऊंची-ऊंची घाटियां चढ़ते है। इसके आगे रमेश बताते है कि जंगल में झाड़ियां बहुत है और झाड़ियों के भीतर भी तेंदूपत्ते के पेड़ लगे होते है। ऐसे में जब हम लोग तेंदूपत्ते तोड़ते है, तब हमारे एक जोड़ी कपड़े 4-5 दिन ही चलते है। और झाड़ियों में फंसकर कपड़े फट जाते हैं। इसके बाद हमें दूसरे कपड़े पहन कर जंगल आना पड़ता है।

आगे जब हमने यह पूछा कि आप लोगों को जंगल में शारीरिक परेशानियां क्या-क्या होती है? तब रमेश बताते है कि झाडियों में लगे तेंदू के पेड़ से तेंदूपत्ते तोड़ते वक्त हमारे हाथ-पैर में खरोंचे आ जाती है। जिनसे खून आने लगता है।फिर वह कहते हैं कि जंगल काटों से भी भरा हुआ है। यहाँ पक्के से पक्का जूता पहनकर आओ तब भी किसी न किसी के पैर में कांटे चुभते रहते हैं। जिससे पीड़ा के चलते अक्सर चलना दूभर हो जाता है। ऐसे में जब हम बमुश्किल से घर पहुंचते हैं। और पैर में चुभे कांटों को सुई से निकालते हैं। तब राहत की सांस मिलती है।

इसके बाद राधा बताती है कि जंगल में जब हम 1 किलोमीटर तक लंबी घाटियां चढ़ते है। तब हमारा सिर चकराने लगता है और शरीर चरमराने लगता है। हाथ-पैर ढीले पड़ने लगते है। सबसे ज्यादा पीड़ा हम लोगों को घाटियाँ चढ़ने में भी भोगनी पड़ती है।

आगे हमारे यह पूछने पर कि आप लोगों को तेंदूपत्ते के रोजगार में वक्त कितना देना पड़ता है? तब राजकुमारी (चितौरा गांव) बताती है कि हमें रात 3 बजे से घर से जंगल की ओर रवाना होना पड़ता है। जब 3 घंटे में जंगल पहुंचते है। तब सुबह 6 बजे से तेंदूपत्ता तोड़ते है। करीब 4 घंटे तेंदूपत्ता तोड़ने के बाद जब घर वापस जाते है। तो 3 घंटे समय फिर लगता है। तब कहीं दोपहर 1 बजे घर पहुंचते है। इसके बाद कम से कम 5 घंटे तेंदूपत्ते को इकट्ठा करके गड्डियां बांधने में लगता है।

आगे जब हमने यह पूछा कि क्या सब मजदूर पैदल तेंदूपत्ता तोड़ने जंगल जाते है? तब बेरखेरी गांव के राजेन्द्र बताते है कि जिनके पास साइकिल, मोटरसाइकिल और बेलगाड़ी है वह उससे तेंदूूपत्ता तोड़ने जंगल आते है। लेकिन यह सब वाहन जंगल में प्रवेश नहीं कर पाते है इसलिए इन वाहनों को पास के गांव नारायनपुर या बैरागों में रखना पड़ता है। और वहां से जंगल में करीब 10 किमीं पैदल जाना पड़ता है। आगे राजिन्द्र कहते है सबसे ज्यादा लोग पैदल ही तेंदूपत्ता तोड़ने जंगल जाते है। जिनकी तादाद हज़ारों में हैं।  

आगे जब हमने इन तेंदूपत्ता मजदूरों से यह सवाल पूछा कि सरकार आपके तेंदूपत्ता के रोजगार को कैसे सशक्त बना सकती है और सरकार से आपकी क्या मांगें है? तब अधिकतर तेंदूपत्ता मजदूरों की यह प्रतिक्रिया आती है कि सबसे पहले तो सरकार हमारे तेंदूपत्ता का पहले के जैसा उचित मूल्य निश्चित करे। हमारे तेंदूपत्ता कार्ड चालू करें। और जंगल तक रोड का निर्माण करवाए, ताकि हमें तेंदूपत्ता तोड़ने के लिए जंगल आने-जाने की सुविधा हो सके। और तेंदूपत्ता और बीड़ी उद्योग संबंधी नयी योजनाओं को प्रारंभ करे।

रानगिर जंगल से घर निकलने के तैयार खड़े कुछ मजदूर

विचारणीय है कि इस भीषण गर्मी के दिनोें में तेंदूपत्ता मजदूर तेंदूपत्ता के रोजगार के लिए अपना दिन-रात न्यौछावर कर काफी चुनौतियां झेल रहें है, ताकि अपनी रोजी-रोटी चला सकें। लेकिन सरकार ने तेंदूपत्ता रोजगार संबंधी सरकारी सुविधाओं से इन तेंदूपत्ता मजदूरों को वंचित कर दिया है। ऐसे में यह तेंदूपत्ता मजदूर काफी श्रम करने के बाद भी उतना ही कमा पाते है जितने में सुबह-शाम पेट की भूख मिटाई जा सकती है। सरकार सबसे कमजोर इस मजदूर वर्ग को क्यों नजर अंदाज करके चलती है? क्यों इस मजदूर वर्ग के तेंदूपत्ता जैसे रोजगार के लिए संरक्षण प्रदान नहीं करती? जबकि सरकार की यह गरीब मजदूर वर्ग प्राथमिकता होनी चाहिए। जिसके लिए सरकार का कर्तव्य है। रोजगार देना, योजनाओं का लाभ देना, इसके संरक्षण के लिए तत्पर रहना। लेकिन धरातलीय हकीकत में ऐसा रत्ती-भर भी नजर नहीं आता।

(सतीश भारतीय एक स्वतंत्र पत्रकार है)

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