NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
सोशल मीडिया
भारत
राजनीति
सोशल मीडिया : “कोई अबला और विक्टिम नहीं, बस यह एक खेल है, देखते रहिए”
“कंगना एकाधिकारवादी निरंकुश हिंसक भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं। यह भाषा एक स्त्री, एक अभिनेत्री की अनुपस्थिति को दर्ज करा रही है। रानी लक्ष्मीबाई की छवि का अपहरण करके उनके ही विरुद्ध उसका इस्तेमाल किया जा रहा है।”
न्यूज़क्लिक डेस्क
10 Sep 2020
Kangana Ranaut

कथित मुख्यधारा मीडिया के साथ सोशल मीडिया पर भी रिया-सुशांत के बाद अब कंगना रनौत को लेकर तीखी बहस जारी है। इस संदर्भ में कई तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। क्या इस मामले में कंगना को एक स्त्री होने के नाते अतिरिक्त लाभ देना चाहिए, उनका बचाव करना चाहिए या नहीं, क्योंकि वे सत्ता के एक मोहरे के तौर पर स्वयं इस्तेमाल हो रही हैं। इस पर हमने दो बेहद संजीदा महिला लेखिकाओं की प्रतिक्रियाएं पढ़ीं जिसे हम आपके साथ साझा कर रहे हैं।  

कंगना रनौत के सन्दर्भ में महिला होने की दुहाई हास्यास्पद : शुभा

वरिष्ठ कवि शुभा अपनी फेसबुक वॉल पर लिखती हैं : कंगना रनौत के सन्दर्भ में महिला होने की दुहाई हास्यास्पद है। वे निरंकुश मर्दानगी का वीभत्स रूप प्रस्तुत कर रही हैं। बम्बई को पाक अधिकृत कश्मीर कहना अपने दफ्तर को राममन्दिर और उस पर बाबर के हमले जैसे रूपक पेश करना न केवल अति हिंसक भाषा है बल्कि इसमें दक्षिपंथी राजनीति द्वारा घृणा और हिंसा फैलाने के लिये उपयोग में लाए जा रहे गढ़े हुए बिम्ब हैं। मैं उनसे बहुत निराश हुई हूं

एक संघर्ष शील अभिनेत्री की प्रामाणिक भाषा वे नहीं बोल रही हैं।

वे एकाधिकारवादी निरंकुश हिंसक भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं। यह भाषा एक स्त्री ,एक अभिनेत्री की अनुपस्थिति को दर्ज करा रही है।

उन्होंने इस समय अपने को पितृसत्ता के सबसे घिनौने रूप हिंसक अधिनायकवाद की परम भक्त के रूप मे पेश किया है। करणी सेना अकारण ही उनके समर्थन में नहीं आई है। करणी सेना पद्ममावत फिल्म के सन्दर्भ मे अपना स्त्री द्रोह, जौहर और सती जैसे मध्ययुगीन कर्मकांड के हिंसक समर्थन और अन्य अनेक तरह की हिंसा से लगातार प्रमाणित करती रही है।

रानी लक्ष्मीबाई की छवि का अपहरण करके उनके ही विरुद्ध उसका इस्तेमाल किया जा रहा है। लक्ष्मीबाई न तो सती हुई थीं न ही उन्होंने जौहर किया था। न उन्होने हमलावर सत्ता से कोई समझौता किया। उन्होने अंग्रेजों की तानाशाही और एकाधिकारवाद का विरोध करते हुए शहादत पाई। वे सत्ता के लिये नहीं अपने वतन के लिये लड़ीं।

कंगना रनौत की सुरक्षाकर्मियों के सुरक्षा-चक्र के बीच चलते हुए जो छवि सामने आ रही उसमें उनकी बाडी लैंग्वेज एक माफिया सरगना जैसी दिखाई पड़ रही है।

हम सब जानते हैं फिल्म जगत की बहुत सी समस्याएं हैं जैसे हर क्षेत्र की अपनी समस्याएं होती हैं। उन पर चढ़कर केन्द्र सरकार का वरद हस्त प्राप्त करना सत्ता की दलाली का बड़ा संकेत है।

बहुत लोगों के घर गिराए जा रहे हैं बहुत लोगों को धमकियां मिल रही हैं

उन्हें सुरक्षा का कोई झूठा आश्वासन भी नहीं मिल रहा।जो सत्ता उन्हें उजाड़ रही है उसी सत्ता के हाथ में कंगना जी खेल रही हैं।

मेरा विनम्र निवेदन है कि मौजूदा स्त्री-शरीरधारी सत्ताविक्षिप्त इस नए चरित्र की पुख़्ता शिनाख़्त करें। हम इसे साध्वियों, राष्ट्रसेविकाओं आदि के नये-नये अवतारों में रोज भुगत रहे हैं। इसका ताजा संस्करण एक अभिनेत्री के रूप में प्रकट हुआ है ।

मैं उनके साथ नहीं जो स्वयं हिंसक और साम्प्रदायिक हो : सुदीप्ति

शिक्षिका सुदीप्ति लिखती हैं :  हम कहने आते हैं कि कंगना के घर/ऑफिस को अवैध निर्माण के बिना पर तोड़ कर गलत किया महाराष्ट्र सरकार ने। उसके बाद कंगना का वीडियो आता है जिसमें उन्होंने अपने घर/ऑफिस के टूटने को कश्मीरी पंडितों के उजड़ने जैसा बता दिया।

हद है!

ऐसा तो कश्मीरी पंडितों के दुश्मनों ने भी नहीं किया होगा। उजड़ने की एक पूरी त्रासदी की तुलना एक अवैध निर्माण को तोड़ने से?

कश्मीर और कश्मीरी पंडितों को भक्त किस तरह से इस्तेमाल करते हैं उसी का एक नमूना यह है।

न उनका ऑफिस राम मंदिर है न कश्मीरी पंडितों का घर।

बोलते वक़्त ज़ुबान ही नहीं दिमाग का इस्तेमाल भी जरूरी है। लेकिन कंगना को यह कौन समझाए। मुंबई पाकिस्तान हो गया, उनका घर मंदिर और दफ्तर कश्मीर। प्रतीकों की लड़ाई में किस प्रोपेगैंडा तक जाएँगे? जब कोई रिया चक्रवर्ती को हुक्का/गांजा पीने-पिलाने में गिरफ्तार कर सकता है तो इन मैडम को भी तमाम ऐसे कानूनों में कर सकता है जो तभी काम लिए जाते हैं जब किसी को 'समझाया' जाना हो या बदला लेना हो।

वैसे धीरज रखिए।

शत्रुघ्न सिन्हा ने जब केंद्र की सरकार की आलोचना की तब उस वक़्त की राज्य भाजपा सरकार ने उनके बंगले के अवैध निर्माण को तोड़ा था। तो जब मनोनुकूल सरकार होगी ये लोग अवैध निर्माण करेंगे और जब न होगी तब उसे तोड़ा जाएगा। आप और हम तमाशा देखेंगे क्योंकि हमारे हक़ की बातों की जगह तमाशे ही चलने वाले हैं।

कंगना ऐसी भी बेचारी नहीं हैं कि हम जैसों के समर्थन की जरूरत है। उनको केंद्र सरकार की वाई श्रेणी की सुरक्षा और वरदहस्त है वरना किस हीरो या हेरोईन में यह दम है कि मुंबई को पाकिस्तान कहे और उद्धव ठाकरे को तू-तकार में पुकारे? अर्णव गोस्वामी के बाद इस लहज़े में एक पूरी सरकार को ललकारते कंगना ही दिखीं। यह हिम्मत बिना दूसरी बड़ी राजनीतिक मदद के नहीं होती। जब यह पूरा खेल ही राज्य की सत्ता को हथियाने का है तो कोई अबला और विक्टिम नहीं। बस यह एक खेल है। देखते रहिए।

एक अन्य पोस्ट में वे लिखती हैं- मीडिया केंद्र सत्ता के साथ है इस बात पर आज तक यकीन नहीं हुआ तो उसका बर्ताव दो औरतों के साथ देखिए। रिया चक्रवर्ती को नोच नोच के खाने वाले चीख चीख कर कंगना की तरफ से बोल रहे हैं।

जो भी यह कहेगा कि आप जैसे लोग नहीं बोल रहे, यह दोहरापन है और स्त्री के साथ पक्षधरता नहीं तो हमारे जैसे लोगों को कहना चाहिए कि हम कमज़ोर लोग हैं, कमज़ोर के लिए हैं। जिनके साथ केंद्र और मीडिया की सत्ता हो उसके लिए हम जैसे नगण्य लोगों की क्या बिसात।

और रही बात मेरी तो मैं अनअपॉलोजेटिक होते हुए कह रही कि मैं उनके साथ नहीं। जो स्वयं हिंसक और साम्प्रदायिक हो, जो खुद गैरबराबरी के समाज और जातिवाद को बढ़ावा देता हो उसके साथ इसलिए नहीं हुआ जा सकता कि वह एक स्त्री है। एक स्त्री शरीर में जन्म लेने का जो लाभ उठाना था उसने उठाया और जो नुकसान उसे चुकाना है वह चुका रही है। स्त्री और पुरुष से परे इंसान के रूप में वह हद दर्जे की स्वकेन्द्रित है। अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए खुद लोकतांत्रिक मूल्यों की बलि चढ़ाने वाली आज लोकतांत्रिकता की दुहाई दे रही है।

Kangana Ranaut
Maharashtra
Uddhav Thackeray
Shiv sena
BMC
BJP
Amit Shah
Sushant Suicide case
Rhea Chakraborty

Related Stories

बीजेपी के चुनावी अभियान में नियमों को अनदेखा कर जमकर हुआ फेसबुक का इस्तेमाल

फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये

चुनाव के रंग: कहीं विधायक ने दी धमकी तो कहीं लगाई उठक-बैठक, कई जगह मतदान का बहिष्कार

पंजाब विधानसभा चुनाव: प्रचार का नया हथियार बना सोशल मीडिया, अख़बार हुए पीछे

मुख्यमंत्री पर टिप्पणी पड़ी शहीद ब्रिगेडियर की बेटी को भारी, भक्तों ने किया ट्रोल

सांप्रदायिक घटनाओं में हालिया उछाल के पीछे कौन?

हेट स्पीच और भ्रामक सूचनाओं पर फेसबुक कार्रवाई क्यों नहीं करता?

वे कौन लोग हैं जो गोडसे की ज़िंदाबाद करते हैं?

कांग्रेस, राहुल, अन्य नेताओं के ट्विटर अकाउंट बहाल, राहुल बोले “सत्यमेव जयते”

विश्लेषण : मोदी सरकार और सोशल मीडिया कॉरपोरेट्स के बीच ‘जंग’ के मायने


बाकी खबरें

  • पड़ताल: कोरोना को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के दावे भ्रामक
    राज कुमार
    पड़ताल: कोरोना को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के दावे भ्रामक
    15 Aug 2021
    प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ने अन्य देशों की तुलना में ज्यादा नागरिकों को बचाया है। ये काफी भ्रामक टिप्पणी है। क्योंकि प्रधानमंत्री कुछ स्पष्ट नहीं कर रहे कि वो किसे “बचाया हुआ” मान रहे हैं। क्या उन…
  • विक्रम और बेताल: सरकार जी और खेल में खेला
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    विक्रम और बेताल: सरकार जी और खेल में खेला
    15 Aug 2021
    सरकार जी खेलों की दुनिया को पैसे की दुनिया से अलग ही रखते थे। वे जानते थे कि खिलाड़ी अपनी नैसर्गिक प्रतिभा से ही आगे बढ़ता है न कि सरकारी सहायता से। इसीलिए उन्होंने खेल में सरकारी मदद को सिर्फ़ खेल…
  • अजय कुमार
    कभी रोज़गार और कमाई के बिंदु से भी आज़ादी के बारे में सोचिए?
    15 Aug 2021
    75 साल पहले ही गुलामी से आजादी मिल गई। लेकिन जिसे असली आजादी कहते हैं क्या उसका एहसास भारत के ज्यादातर लोगों ने किया है?
  • आज़ादी@75: आंदोलन के 74 बरस और नई उम्मीद और नया रास्ता दिखाता किसान आंदोलन
    लाल बहादुर सिंह
    आज़ादी@75: आंदोलन के 74 बरस और नई उम्मीद और नया रास्ता दिखाता किसान आंदोलन
    15 Aug 2021
    आज़ादी के अमृत महोत्सव वर्ष का सबसे पवित्र अमृत यह किसान आंदोलन ही है जो संघ-भाजपा के विषवमन का सबसे बड़ा एंटीडोट है।
  • 75वीं सालगिरह के मौके पर लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम। तस्वीर में अजय सिंह (दाएं) अपनी जीवन साथी शोभा सिंह (बाएं) के साथ।
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता: मर्द खेत है, औरत हल चला रही है
    15 Aug 2021
    आज आज़ादी की 74वीं सालगिरह है और हमारे कवि और पत्रकार अजय सिंह की 75वीं। 15 अगस्त, 1946 को बिहार के ज़िला बक्सर के चौगाईं गांव में अजय सिंह का जन्म हुआ। आज इतवार भी है, यानी मौका भी है और दस्तूर भी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License