NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मोदी सरकार में जारी है दलितों और आदिवासियों की उपेक्षा
इस वर्ग के लिए स्पष्ट मानदंडों के बावजूद पिछले पांच वर्षों के बजट आवंटन में भारी कटौती की गई है।
सुबोध वर्मा
22 Feb 2020
Modi

पिछले पांच वर्षों में क्रमिक बजट आवंटन में कमी के कारण दलित समुदायों को 272 हजार करोड़ रुपये और आदिवासी समुदायों को 114 करोड़ रुपये का चौंका देने वाला नुकसान हुआ है। यह नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट (एनसीडीएचआर) और दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन (डीएएए) द्वारा किए गए बजटीय आवंटन के विश्लेषण से सामने आया है।

यहां बताया गया है कि इन नुकसान का हिसाब किताब कैसे किया जाता है: 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 201 मिलियन (20 करोड़ 10 लाख) दलित और 104 मिलियन (10 करोड़ 40 लाख) आदिवासी हैं। यह क्रमशः कुल जनसंख्या का 16% और 8% है। केंद्र सरकार के केंद्रीय बजट के कार्यक्रमों और योजनाओं में दलितों और आदिवासियों के लिए धन का समान अनुपात आवंटित करना सरकार की नीति थी, हालांकि पहले आवंटन भी इस मानक से कम होते थे।

फिर, जब से 2017-18 में मोदी सरकार ने योजना और गैर-योजना भेदभाव को समाप्त कर दिया, तब से उथल पुथल हो गई और दो वर्षों में इस तरह के विशिष्ट आवंटन वार्षिक दिशानिर्देशों द्वारा किए गए थे। अंत में, 2016 के वित्त मंत्रालय के सर्कुलेशन के आधार पर एक व्यवस्था तैयार की गई जिसके तहत सभी केंद्रीय योजनाओं और केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए कुल आवंटन जनसंख्या अनुपात (दलितों के लिए 16% और आदिवासियों के लिए 8%) में बंटवारा किया गया था।

तो, निश्चित राशि से वंचित करने का अर्थ है निश्चित मात्रा के अनुसार वास्तविक आवंटन (बजट दस्तावेजों में वक्तव्य में अलग से दिया गया)।

नीचे दिया गया चार्ट पिछले पांच वर्षों में दलितों के लिए वार्षिक देय आवंटन और वास्तविक आवंटन को दर्शाता है। ध्यान दें कि यह कभी भी देय राशि को हासिल नहीं करता है। इन पांच वर्षों के लिए 8.27% के औसत के साथ अनुपात के रूप में यह 7% और 9.3% के बीच है। यह देय राशि का आधा है।

graph 1.png

ऐसी ही स्थिति आदिवासियों के लिए आवंटन के मामले में भी है जो नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है। यह आवंटन इन पांच वर्षों में औसतन लगभग 5.4% के साथ 4.6% और 5.9% के बीच रही है।

graph 2.png

इससे यह स्पष्ट होता है कि सभी बड़ी-बड़ी बातों और नाटकीय तरीके से दलित परिवारों के पैर धोने या घरों में रात बिताने के फोटो खिंचवाने के बावजूद मोदी सरकार को वास्तव में दलित और आदिवासी समुदायों के उत्थान के लिए पैसा खर्च करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। ऐसा ही आदिवासियों के साथ है।

आवंटन का दुरुपयोग

हालांकि, ये दुखद कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। यहां तक कि सीमित आवंटित राशि का एक हिस्सा सामान्य योजनाओं और कार्यक्रमों पर खर्च किया जाता है, हालांकि यह इन समुदायों पर खर्च की गई पुस्तकों में दिखाया गया है। उदाहरण के लिए, इस वर्ष के बजट में यह खुलासा हुआ कि "टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर भारतनेट के सृजन और संवर्द्धन के लिए सेवा प्रदाताओं के लिए मुआवजा’’ पर 756 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। सिवाय इसके कि यह राशि दलित / आदिवासियों के लिए विशिष्ट आवंटन के तहत दर्शाई गई थी!

इस मद में पैसा खर्च करने की आवश्यकता हो सकती है लेकिन ऐसा कुछ नहीं है जो सीधे तौर पर दलितों और आदिवासियों को लाभ पहुंचाता है। ये अलग आवंटन ऐसी खास जरूरतों के लिए है। इसमें छात्रवृत्ति या व्यावसायिक प्रशिक्षण या अन्य योजनाएं शामिल हो सकती हैं जो सीधे तौर पर इन समुदायों के उत्थान में मदद करेंगी। सामान्य आवंटन को दलितों और आदिवासियों के लिए विशिष्ट मद के तहत नहीं दिखाया जाना चाहिए।

लेकिन यह एक सर्वव्यापी प्रचलित प्रथा है जो पहले से चली आ रही है और मोदी सरकार ने बिना देरी किए इसे आगे बढ़ाया है।

एनसीडीएचआर-डीएएए ने लेखा जोखा किया है कि इन पांच वर्षों में दलितों के लिए आवंटित 312 हजार करोड़ रुपये में से लक्षित योजनाओं पर सिर्फ 112 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए जबकि शेष 200 हजार करोड़ रुपये से अधिक ऊपर बताई गई योजना की तरह गैर-लक्षित योजनाओं पर खर्च किए गए। इसी तरह, आदिवासियों के लिए इन पांच वर्षों में लगभग 202 हजार करोड़ के आवंटन में लक्षित योजनाओं पर सिर्फ 85 हज़ार करोड़ रुपये खर्च हुए और गैर-लक्षित योजनाओं पर 117 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए।

इन सबके होते हुए दलितों और आदिवासियों की स्थितियां निरंतर वैसी ही बनी हुई है। इनमें बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा तक गरीबों की पहुंच, अल्प कौशल वाली नौकरियों में घिरे रहना, घटिया नागरिक सुविधाओं वाले बस्तियों में रहने के लिए मजबूर होना शामिल है और दूसरी श्रेणी का माना जाना शामिल है।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Modi Govt Continues Neglect of Dalits, Adivasis

Dalits
Adivasi
Modi Govt
Budget allocations
Central Schemes
union budget
SC/ST Schemes

Related Stories

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

सरकारी एजेंसियाँ सिर्फ विपक्ष पर हमलावर क्यों, मोदी जी?

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मोदी सरकार 'पंचतीर्थ' के बहाने अंबेडकर की विचारधारा पर हमला कर रही है


बाकी खबरें

  • sc
    भाषा
    वकीलों को वरिष्ठ का दर्जा देने संबंधी याचिकाओं को सूचीबद्ध करने पर विचार करेगा उच्चतम न्यायालय
    23 Aug 2021
    “वकीलों का दर्जा निर्दिष्ट समिति द्वारा दिए गए अंकों के आधार पर तय होना चाहिए और मतदान का सहारा केवल तब लिया जाना चाहिए जब कोई और रास्ता न हो। उच्च न्यायालय मतदान एक अपवाद के रूप में नहीं बल्कि एक…
  • सांप्रदायिक, राजनीतिक और पूंजीवादी विचारों के ख़िलाफ़ खड़े होने का समय: विजयन
    भाषा
    सांप्रदायिक, राजनीतिक और पूंजीवादी विचारों के ख़िलाफ़ खड़े होने का समय: विजयन
    23 Aug 2021
    समाज सुधारक एवं धार्मिक नेता श्री नारायण गुरू की 167वीं जयंती के अवसर पर फेसबुक पर एक पोस्ट में विजयन ने लिखा, ‘‘यह समय भाईचारा और समानता को कमजोर करने वाली सांप्रदायिक, राजनीतिक और पूंजीवादी…
  • तमिल फिल्म उद्योग की राजनीतिक चेतना, बॉलीवुड से अलग क्यों है?
    बी. सिवरामन
    तमिल फिल्म उद्योग की राजनीतिक चेतना, बॉलीवुड से अलग क्यों है?
    23 Aug 2021
    हाल ही में लाए गए सिनेमैटोग्राफ़ संशोधन विधेयक 2021 के विरोध में दो ध्रुवों पर खड़े कमल हासन और सूर्या एक साथ आ गए, इस घटना ने तमिल फिल्म जगत में चेतना की एक लहर दौड़ा दी है।
  • "वैज्ञानिक मनोवृत्ति" विकसित करने का कर्तव्य
    प्रशांत पद्मनाभन
    "वैज्ञानिक मनोवृत्ति" विकसित करने का कर्तव्य
    23 Aug 2021
    तर्कवादी सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की 8वीं पुण्यतिथि के बाद प्रशांत पद्मनाभन ने उनकी विरासत को याद करते हुए लिखा है कि "वैज्ञानिक मनोवृत्ति" क्या होती है और कैसे इसका विकास किया जा सकता है।
  • Kalyan Singh
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    पिछड़ों के सांप्रदायीकरण की योजना और दुविधा के प्रतीक थे कल्याण सिंह
    23 Aug 2021
    वास्तव में कल्याण सिंह पिछड़ा वर्ग की उस दुविधा के प्रतीक थे जिसके तहत कभी वह जाति के अपमान से छूटने और सत्ता पाने के लिए सांप्रदायिक होने को तैयार हो जाता है तो कभी हिंदुत्व की ब्राह्मणवादी योजना से…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License