NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
संसद का मानसून सत्रः बिखरा हुआ विपक्ष कैसे घेर पाएगा सरकार को?
विपक्ष ने दावा किया है कि वह कोरोना महामारी से हुई तबाही, आसमान छूती महंगाई, बेरोज़गारी, विवादित कृषि कानून, अंधाधुंध निजीकरण व रफ़ाल घोटाला जैसे के मुद्दे को जोरशोर से उठाएगा।
अफ़ज़ल इमाम
19 Jul 2021
संसद
Image courtesy : NDTV

संसद के मानसून सत्र की शुरूआत ऐसे समय में हो रही है, जब देश में महंगाई और बेरोजगारी से त्राहिमाम मचा हुआ है। किसान, युवा व कर्मचारी सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं। हमेशा की तरह इस बार भी सरकार ने कहा है कि वह हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार है जबकि विपक्ष ने दावा किया है कि वह कोरोना महामारी से हुई तबाही, आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी, विवादित कृषि कानून, अंधाधुंध निजीकरण व रफ़ाल घोटाला जैसे के मुद्दे को जोरशोर से उठाएगा।

सत्र शुरू होने से ठीक पहले इज़रायली कंपनी एनएसओ के साफ्टवेयर से जासूसी के मामले का खुलासा हुआ है, लिहाजा इस पर भी हंगामा होना तय है।

19 जुलाई से 13 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में कुल 19 बैठकें होनी हैं, जिसमें सरकार को करीब 29 विधेयक पारित कराने हैं। इनमें आधा दर्जन अध्यादेश भी शामिल हैं, जिन्हें कानूनी रूप दिया जाना है।

ध्यान रहे कि पिछले बजट सत्र में भी विपक्ष के पास भरपूर मौका था, लेकिन आपसी एकजुटता की कमी के चलते वह न तो कोरोना प्रबंधन व बेरोजगारी पर सरकार को घेर पाया और न ही कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए मजबूर कर सका। वर्तमान में भी गैर एनडीए पार्टियों के बीच व्य़ापक समन्वय होना तो दूर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस जबरदस्त वैचारिक संकट और अंतर्कलह से जूझ रही है। दो दिनों पहले खुद राहुल ने अपने वक्तव्य में कहा है कि उनकी पार्टी में जो डरपोक लोग हैं, वे आरएसएस में चले जाएं। इसकी एक बानगी पिछले सत्र में भी दिखाई पड़ी थी, जिसमें एक तरफ लोकसभा में राहुल गांधी कृषि कानूनों को लेकर सरकार पर तीखे प्रहार कर रहे थे तो दूसरी तरफ राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद प्रधानमंत्री मोदी का मार्मिक भाषण सुन कर 'इमोशनल' हो रहे थे। इसी माह जब प्रियंका गांधी यूपी में किसान पंचायतें कर रहीं थीं तो कांग्रेस के ‘ जी 23’ के नेता अपने शीर्ष नेतृत्व पर सार्वजनिक रूप के उंगली उठा रहे थे। इन सब के बावजूद इस बार फिर पार्टी की कोशश है कि वह सरकार को विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने और रफ़ाल घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन करने को मजबूर कर दे।

उपरोक्त मुद्दों से निपटने के लिए सरकार के पास अपने जवाब भी हैं और हथकंडे भी। फिलहाल विपक्ष जासूसी व फोन टेपिंग के मामले में उलझता नजर रहा है, जबकि यह कोई नई बात नहीं है। सभी को पता है कि इस तरह की चीजें पहले भी होती रही हैं। यही कारण है कि तमाम नेताओं व अऩ्य महत्वपूर्ण लोगों ने फोन पर खुल कर बात करना ही बंद कर दिया है। दूसरे जनसंख्या नीति या इस तरह के कुछ अन्य मसालेदार मुद्दे उछाल कर जनता के मूल सवालों से ध्यान भटकाने की कोशिशें हो सकती है।

विपक्ष के कई नेता भी इस बात को समझ रहे हैं। उनका कहना है कि समूचे विपक्ष को किसानों, बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर ही ताकत लगानी होगी। सरकार से यह पूछना होगा कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान अस्पताल, ऑक्सीजन और जरूरी दवाओं के चलते हुई, मौतों को जिम्मेदार कौन है? ढाई-तीन सौ रुपये का इंजेक्शन 30 से 40 हजार रुपये में क्यों ब्लैक हुआ? जुलाई आ गया, लेकिन वैक्सीन की कमी अब भी बनी हुई है? दो तीन माह पहले देश ने जो भयावह तस्वीर देखी है, उसका आभास पिछले संसद सत्र के समय से ही होने लगा था। कांग्रेस नेता शक्ति सिंह गोहिल समेत  कुछ सांसदों ने तो इसे सदन में उठाया भी था, लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। बाद में गोदी मीडिया के जरिए यह बताया गया कि दूसरी लहर की तीव्रता का अंदाजा किसी को नहीं था। साथ ही सारा ठीकरा आम जनता सिर फोड़ा गया कि लोग खुद ही कोरोना नियमों का पालन नहीं करते हैं। अब तीसरी लहर की खबरें तेजी से आ रही हैं, लेकिन उसकी रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? किसी को पता नहीं है। यह उस समय हो रहा है जब तमाम लोगों को रोटी के लाले पड़ रहे हैं। यदि तीसरी लहर आ गई तो वे इलाज कहां से कराएंगे?

वर्तमान में आम जनता के समक्ष सबसे बड़ा सवाल आजीविका का है। करोड़ो लोगों के हाथों से रोजगार छिन गया है। सीएमआईई के आंकड़ों को लें तो पता चलता है कि कोरोना काल के दौरान देश में 97 फीसदी लोगों की आमदनी घटी है। यानी भारी संख्या में लोग गरीब हुए हैं, जबकि 3 फीसदी लोग पहले की अपेक्षा और अमीर गए हैं। ऐसा महज कोरोना के कारण नहीं हुआ है। य़ह सिलसिला तो महामारी आने के काफी पहले ही शुरू हो गया था। प्रचंड बेरोजगारी और महंगाई को लेकर छात्र व युवा सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं। यह बात अलग है कि गोदी मीडिया में उनके आंदोलनों की खबरें दबाई जा रही हैं। इसी तरह किसानों के आंदोलन को भी तरह-तरह से बदनाम किया जा रहा है और उसे कमजोर करने की कोशिश हो रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि तमाम विपक्षी नेताओं ने अलग-अलग बयान दे कर उन्हें अपना समर्थन दिया है, लेकिन वे एकजुट हो कर सामूहिक रूप से उनके साथ खड़े नहीं हुए। अब यह देखना होगा कि सड़कों पर न सही, लेकिन संसद में विपक्षी पार्टियां किसानों के मुद्दे पर एकजुट होती हैं या नहीं?  

एलआईसी, बैंक व अन्य क्षेत्र के कर्मचारियों के सवालों पर भी विपक्षी पार्टियां मुखर नहीं हैं। पिछले सत्र में 16 मार्च को राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे ने इनके निजीकरण का मुद्दा जरूर उठाया था, लेकिन उसके बाद से इस पर कोई चर्चा नहीं हुई।

इसबीच रफ़ाल विमान घोटाले का मुद्दा एक बाऱ फिर गर्म हुआ है, क्योंकि फ्रांस में इसकी जांच शुरू हो गई है। रफ़ाल के सवाल को अब तक राहुल गांधी, सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी व कुछ अन्य वामपंथी नेता ही उठाते रहे हैं, जबकि अन्य विपक्षी पार्टियां इस पर खामोश रही हैं।

मोदी-1 सरकार के समय कम से कम इतना था कि विपक्षी पार्टियां तमाम आपसी मतभेदों के बावजूद जनता और देश के ज्वलंत मुद्दों पर एकजुट हो जाती थीं, जिसका कुछ असर दिखाई पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। वैसे इन दिनों एक बार फिर कुछ नेताओं द्वारा विपक्ष के बीच एक समन्वय बनाने की कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी? अभी कह पाना मुश्किल है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Parliament
monsoon session
lok sabha
opposition parties
Pegasus
Farmer protests
COVID-19
Monsoon Session of Parliament

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन


बाकी खबरें

  • spain
    डीडब्ल्यू
    स्पेन : 'कंप्यूटर एरर' की वजह से पास हुआ श्रम सुधार बिल
    08 Feb 2022
    स्पेन की संसद ने सरकार के श्रम सुधार बिल को सिर्फ़ 1 वोट के फ़ासले से पारित कर दिया- विपक्ष ने कहा कि यह एक वोट उनके सदस्य ने ग़लती से दे दिया था।
  • Uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव 2022 : बदहाल अस्पताल, इलाज के लिए भटकते मरीज़!
    08 Feb 2022
    भारतीय रिजर्व बैंक की स्टेट फाइनेंस एंड स्टडी ऑफ़ बजट 2020-21 रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड सरकार के द्वारा जन स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च किया गया है।
  • uttarakhand
    न्यूज़क्लिक टीम
    चमोली जिले का थराली विधानसभा: आखिर क्या चाहती है जनता?
    07 Feb 2022
    उत्तराखंड चुनाव से पहले न्यूज़क्लिक की टीम ने चमोली जिले के थराली विधानसभा का दौरा किया और लोगों से बातचीत करके समझने का प्रयास किया की क्या है उनके मुद्दे ? देखिए हमारी ग्राउंड रिपोर्ट
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    धर्म का कार्ड नाजी दौर में ढकेलेगा देश को, बस आंदोलन देते हैं राहत : इरफ़ान हबीब
    07 Feb 2022
    Exclusive इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने देश के Living Legend, विश्व विख्यात इतिहासकार इरफ़ान हबीब से उनके घर अलीगढ़ में बातचीत की और जानना चाहा कि चुनावी समर में वह कैसे देख रहे हैं…
  • Punjab
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाबः बदहाल विश्वविद्यालयों पर क्यों नहीं बात करती राजनैतिक पार्टियाँ !
    07 Feb 2022
    पंजाब में सभी राजनैतिक पार्टियाँ राज्य पर 3 लाख करोड़ के कर्ज़े की दुहाई दे रही है. इस वित्तीय संकट का एक असर इसके विश्वविद्यालयों पर भी पड़ रहा है. अच्छे रीसर्च के बावजूद विश्वविद्यालय पैसे की भारी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License