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आंदोलन
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भारत
राजनीति
देश में एक साथ उठ खड़े हुए 500 से ज़्यादा महिला, LGBTQIA, छात्र-शिक्षक, किसान-मज़दूर संगठन
#IfWeDoNotRise #हमअगरउट्ठेनहींतो के तहत एक तरफ जहाँ लगभग 500 महिला संगठनों और LGBTQIA समुदाय और मानव अधिकार संगठन ने मोदी सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन किया। वहीं किसान-मज़दूर, स्कीम वर्कर, शिक्षक और छात्र-नौजवानों ने भी अपना विरोध जताया।
मुकुंद झा
05 Sep 2020
 किसान-मज़दूर संगठन

आज से ठीक 3 साल पहले 5 सितंबर, 2017 में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई थी। आज उनकी तीसरी बरसी पर देश में किसान-मज़दूर, छात्र-नौजवान, शिक्षक से लेकर महिला, LGBTQIA और समाज के पिछड़े तबके के लोग अलग-अलग तरीके से अपना विरोध ज़ाहिर कर रहे हैं। ये सभी लोग लोकतांत्रिक अधिकारों और संविधान पर हो रहे हमले के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।

एक तरफ जहाँ लगभग 500 महिला संगठनों और LGBTQIA समुदाय और मानव अधिकार संगठन ने मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन किया। वहीं दूसरी तरफ़ किसान मज़दूर और स्कीम वर्कर भी अपनी मांगो को लेकर सड़कों पर रहे। इसके साथ ही नौजवान कई दिनों से रोजगार की मांग को लेकर अपना विरोध जाता रहे हैं। छात्र भी ऑनलाइन एग्जाम और माहमारी में जेईई और नीट के एग्जाम के खिलाफ है। आज शिक्षक दिवस भी है, देश में सभी लोग शिक्षकों को बधाई दे रहे है,जबकि सच्चाई यह है की शिक्षक भी अपने वेतन सहित अन्य मांग को लेकर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। इन सभी आंदोलनों में लोग सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे है। साथ ही सरकार पर तानाशाही रवैये से काम करने और पूंजीपति के हित में काम करने का आरोप लगा रहे है। आइए देखते हैं इन आंदोलनों की झलकी

हम अगर उट्ठे नहीं तो

5 सिंतबर को देशभर में एडवा, ऐपवा, अनहद, NAPM सहित 400 से ज्यादा महिला संगठन, LGBTQIA समुदाय और मानव अधिकार संगठनों ने ‘हम अगर उट्ठे नहीं तो... (If we do not rise…)’ आंदोलन का आह्वान किया था। इसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।

500 से ज़्यादा संगठनों का एक साथ आना अपने आप में ऐतिहसिक है। संगठनों ने अपने आंदोलन में महिला और LGBTQIA समुदाय के अधिकारों के साथ ही धारा 370 हटाए जाने, सीएए और एनआरसी जैसे प्रबंधनों को लेकर भी आवाज़ बुलंद की और सरकार पर सांप्रदायिक क़ानून बनाने के आरोप लगाए।

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लोगों ने छोटे समूहों में प्रदर्शन किए। कई जगह लोगों ने अपने पारंपरिक नृत्यों और गानों के माध्यम से अपना विरोध किया। सभी संगठन के लोगों ने सोशल मीडिया पर ‘हम अगर उट्ठे नहीं तो... (If we do not rise…)’ के नारे के साथ वीडियो डाल कर अपना विरोध जताया।

सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर ने अपने वीडियो संदेश में महिलाओं को संपत्ति और ज़मीन में अधिकार और महिला अत्यचारों को लेकर भी सवाल किया और कहा कि आज भी महिलाओं को ज़मीन में मालिकान हक़ नहीं मिलता है जबकि उनकी भागीदारी भी होती है, इसके साथ ही उन्होंने कहा निर्भया केस के बाद सरकार ने वर्मा कमेटी बनाई थी परन्तु उसके बाद भी आजतक सभी कार्यलय में विशाखा कमेटी की गाइडलाइंस का पालन नहीं होता है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि आज महिलाए सिर्फ अपने अधिकार के लिए नहीं बल्कि जनतंत्र के लिए लड़ रही हैं।

इसी तरह इनके फेसबुक पेज हम अगर उट्ठे नहीं तो... (If we do not rise…) पर सैकड़ो की संख्या में महिलाओं, मानव अधिकार संगठनों और समाज के बुद्धजीवियों ने वीडियो संदेश जारी किये।

मज़दूरों-किसानो का एक्शन डे

मज़दूर संगठन सीटू, अखिल भारतीय किसान सभा और ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ़ आंगनवाड़ी वर्कर्स एंड हेल्पर्स के आह्वान पर केंद्र व राज्य सरकारों की मजदूर व किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ देशभर हज़ारों मजदूरों व किसानों ने अपने कार्यस्थलों, ब्लॉक व जिला मुख्यालयों पर केंद्र सरकार की मजदूर व किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन किए।

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देश भर में हुए प्रदर्शनों में श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी परिवर्तन की प्रक्रिया पर रोक लगाने, मजदूरों का वेतन 21 हज़ार रुपये घोषित करने,सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बेचने पर रोक लगाने, किसान विरोधी अध्यादेशों को वापस लेने,मजदूरों को कोरोना काल के पांच महीनों का वेतन देने,उनकी छंटनी पर रोक लगाने,किसानों की फसलों का उचित दाम देने,कर्ज़ा मुक्ति, मनरेगा के तहत दो सौ दिन का रोज़गार,कॉरपोरेट खेती पर रोक लगाने,आंगनबाड़ी,मिड डे मील व आशा वर्करज़ को नियमित कर्मचारी घोषित करने,फिक्स टर्म रोज़गार पर रोक लगाने,हर व्यक्ति को महीने का दस किलो मुफ्त राशन देने व 7500 रुपये देने की मांग की गई।

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मज़दूर नेताओं ने सरकारों को चेताया है कि वह मजदूर व किसान विरोधी कदमों से हाथ पीछे खींचें अन्यथा मजदूर व किसान आंदोलन तेज होगा। उन्होंने कहा है कि कोरोना महामारी के इस संकट काल को भी शासक वर्ग व सरकारें मजदूरों व किसानों का खून चूसने व उनके शोषण को तेज करने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान में श्रम कानूनों में बदलाव इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। केंद्र सरकार द्वारा 3 जून 2020 को कृषि उपज,वाणिज्य एवम व्यापार (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश 2020,मूल्य आश्वासन (बन्दोबस्ती और सुरक्षा) समझौता कृषि सेवा अध्यादेश 2020 व आवश्यक वस्तु अधिनियम (संशोधन) 2020 आदि तीन किसान विरोधी अध्यादेश जारी करके किसानों का गला घोंटने का कार्य किया गया है।

इसके साथ ही श्रम कानूनों में बदलाव करके मज़दूरों के अधिकारों पर भी हमला कर रही है। जिससे जहां एक ओर अपनी मांगों को लेकर की जाने वाली मजदूरों की हड़ताल पर अंकुश लगेगा वहीं दूसरी ओर मजदूरों की छंटनी की प्रक्रिया आसान हो जाएगी व उन्हें छंटनी भत्ता से भी वंचित होना पड़ेगा। तालाबंदी,छंटनी व ले ऑफ की प्रक्रिया भी मालिकों के पक्ष में हो जाएगी। मॉडल स्टेंडिंग ऑर्डरज़ में तब्दीली करके फिक्स टर्म रोज़गार को लागू करने व मेंटेनेंस ऑफ रिकोर्डज़ को कमज़ोर करने से श्रमिकों की पूरी सामाजिक सुरक्षा खत्म हो जाएगी। उन्होंने मजदूर व किसान विरोधी कदमों व श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी बदलावों पर रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने सरकार को चेताया है कि अगर पूंजीपतियों, औद्योगिक घरानों व उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाकर मजदूरों-किसानों के शोषण को रोका न गया तो मजदूर-किसान सड़कों पर उतरकर सरकार का प्रतिरोध करेंगे।

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किसानों ने मांग की है कि केंद्र सरकार कोरोना काल में सभी किसानों का रबी फसल का कर्ज माफ करे व खरीफ फसल के लिए केसीसी जारी करे। किसानों की पूर्ण कर्ज माफी की जाए। किसानों को फसल का सी-2 लागत से 50 फीसद अधिक दाम दिया जाए। किसानों के लिए "वन नेशन-वन मार्किट" नहीं बल्कि "वन नेशन-वन एमएसपी" की नीति लागू की जाए। किसानों व आदिवासियों की खेती की ज़मीन कम्पनियों को देने व कॉरपोरेट खेती पर रोक लगाई जाए।

जबकि आशा और आगनबाड़ी कर्मचारियों ने भी अपने स्थाई रोजगार और पूर्ण वेतन और सुरक्षा की मांग की।

शिक्षकों का प्रदर्शन

आज हमारे देश के कई राज्यों में नियोजित /गेस्ट / शिक्षा मित्र और एडहॉक शिक्षक हैं। वास्तव में ये सिर्फ शिक्षक हैं लेकिन सरकारों और व्यस्थाओं ने इन्हे ये अलग नाम दिये है। जिन्हे न समय पर वेतन मिलता है और न ही कोई अन्य सुविधा आज के समय केवल ये दिहाड़ी मज़दूर बनकर रह गए हैं। देश की राजधनी दिल्ली और देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में से एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) परन्तु आज शिक्षक दिवस के दिन वहां के शिक्षकों ने अपने वेतन की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। लेकिन जैसे ही प्रदर्शन शुरू हुआ पुलिस ने सभी प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया ।

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इस माहमारी में डीयू के 12 कालेजों के शिक्षकों को पिछले कई महीनो से वेतन नहीं मिला है। इसके खिलाफ शिक्षकों ने थाली के साथ आर्ट्स फैकल्टी पर प्रदर्शन किया। ये हाल है केंद्रीय विश्वविद्यालय का बाकी राज्यों के हाल का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। इसी तरह नगर निगम के शिक्षक भी लगातर प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्हें भी कई कई महीनो से वेतन नहीं मिला है।

छात्र-नौजवानों का प्रदर्शन

छात्र और नौजवान सरकार के ख़िलाफ़ गुस्से में है और इनके गुस्से का शिकार प्रधानमंत्री मोदी भी हो चुके है। पिछले कुछ दिनों से इन्होंने मोदी और भाजपा के खिलाफ यूट्यूब और बाकी सोशल मीडिया पर जंग छेड़ रखी है। प्रधानमंत्री मोदी का कोई भी वीडियो यूट्यूब पर उपलोड हो रहा है उसपर जाकर छत्र और नौजवान अपना गुस्सा दिख रहे हैं, उन्होंने प्रधानमंत्री के वीडियोज पर डिसलाइक करके उनके आईटी सेल के नाक में दम कर दिया है उन्हें भी समझ नहीं आ रहा इसका सामना कैसे किया जाए।

छात्र, नौजवानों के गुस्से का मुख्य कारण पिछले छह सालों में सरकारी भर्तियों का न होना है, जो कुछ मामूली भर्ती हुई है उनमें भी धांधली की शिकायते हैं। इसके साथ ही देश में लगातर बेरोजगारी नए रिकॉर्ड बना रही है। परन्तु मोदी ने इसपर चुप्पी साधी हुई है और वो अपने मन की बात में देशी नस्ल के कुत्ते पालने और खिलौने बनाने की सलाह दे रहे हैं। जो नौजवानो के गुस्से को और बढ़ा रही है। इसके साथ ही छात्र इस माहमारी में परीक्षा कराने का भी विरोध कर रहे है। इसी कड़ी में आज कई छात्र संगठनों ने सड़को पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया

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जबकि कई संगठनों ने पांच बजे थाली बजाकर अपना विरोध दर्ज कराया ,इसके साथ ही #5बजे5मिनिट हैशटैग भी आज टॉप ट्रेंड में रहा  । 

gauri lankesh
Gauri Lankesh murder
#5बजे5मिनिट
Women protest
Student Protests
teacher protest
LGBTQIA
#IfWeDoNotRise
AIDWA
AIPWA
NAPM
farmer-laborers organizations
CITU

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