NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
नज़रिया
भारत
राजनीति
मी लॉर्ड!, सवाल शाहीन बाग़ के रास्ते का नहीं, देश के रास्ते का है कि देश किस तरफ़ जाएगा?
मध्यस्थ के पास हमेशा बीच का रास्ता होता है। बात मानने की एवज में कुछ देने का विकल्प या अधिकार होता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इन वार्ताकारों या मध्यस्थों के पास आदेश रूपी सुझाव के अलावा कुछ भी नहीं!
मुकुल सरल
22 Feb 2020
shaheen bagh

सुप्रीम कोर्ट की ओर से तैनात दो वरिष्ठ वकीलों को वास्तव में क्या कहा जाए?, वार्ताकार? मध्यस्थ? क्या ये लोग वाकई समस्या सुलझाने आए हैं? लेकिन कैसे, ये दोनों सरकार या सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से क्या आश्वासन लेकर आए हैं? इनके पास क्या प्रपोजल/ऑफर या अधिकार है? मध्यस्थ के पास हमेशा बीच का रास्ता होता है। बात मानने की एवज में कुछ देने का विकल्प होता है कि अगर आप ये करेंगे तो हम ये करेंगे। मसलन अगर आप शाहीन बाग़ से धरना उठा लेते हैं तो सुप्रीम कोर्ट तीन या छह महीने में सीएए की सुनवाई पूरी करके फ़ैसला दे देगा, या कोर्ट, सरकार को ये निर्देश देगा कि वह तत्काल अपने नुमाइंदे आंदोलनकारियों के बीच भेजे और उनकी बात सुनकर उसका हल निकाले।

हालांकि सुनने-सुनाने को कुछ बचा नहीं है क्योंकि आंदोलनकारियों की एक ही मांग है कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) वापस लिया जाए और एनआरसी का विचार छोड़ दिया जाए, और ये बात या मांग सरकार समेत सबको पता है। सरकार को तो इस क़दर पता है कि उसके नुमाइंदे यानी उसकी पार्टी दिल्ली का पूरा चुनाव इसके ईर्द-गिर्द बुनती और लड़ती है और शाहीन बाग़ को देेशद्रोहियों का अड्डा तक बता देती है। उसके मंत्री-नेता करंट लगाने से लेकर 'गोली मारो...’ तक का आह्वान करते हैं।

shaheen bagh 1.png

इसे भूल भी जाएं तो सीएए-एनआरसी की क्रोनोलॉजी समझाने वाले और 'एक इंच भी पीछे न हटेंगे' कहने वाले गृहमंत्री जब दिल्ली चुनाव में बुरी हार के बाद एक टेलीविज़न चैनल पर ये बयान देते हैं, "जो कोई भी सीएए से जुड़े मुद्दों पर मुझसे चर्चा करना चाहता है मेरे कार्यालय से समय ले सकता है। हम तीन दिनों के अंदर समय देंगे।" और जब उनसे बातचीत के लिए आंदोलनकारी उनके दफ़्तर की तरफ़ पैदल मार्च करते हैं तो उन्हें रोक दिया जाता है।

इसी समय प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सार्वजनिक सभा में कहते हैं कि तमाम दबाव के बावजूद उनकी सरकार फ़ैसले पर अडिग है। वे कहते हैं, ‘चाहे अनुच्छेद 370 पर फ़ैसला हो या फिर नागरिकता संशोधन कानून पर फ़ैसला हो, यह देश हित में ज़रूरी था। दबाव के बावजूद हम अपने फ़ैसले के साथ खड़े हैं और इसके साथ बने रहेंगे।' तो अब जब पुनर्विचार की ही गुंजाइश नहीं छोड़ी जा रही तो क्या बातचीत, किससे बातचीत, कैसी बातचीत? किससे उम्मीद की जाए!

सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त वार्ताकार तो सिर्फ़ रास्ते पर अड़े हैं कि कैसे रास्ता खुलवाया जाए, लेकिन वे यह नहीं बता रहे कि देश के रास्ते का क्या?, कई आंदोलनकारियों ने सीएए-एनआरसी के संदर्भ में वार्ताकारों से सवाल भी पूछना चाहा, लेकिन उनके पास केवल एक ही जवाब है कि ये विषय उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं। वे सिर्फ़ रास्ता खुलवाने पर बात करने आए हैं। उनके पास कोई दिलासा नहीं, कोई आश्वासन नहीं, उनके पास एक सुझाव है कि धरना-आंदोलन कहीं और शिफ्ट कर लिया जाए और एक भावुक जुमला कि 'सबसे बड़ा रास्ता दिल का रास्ता है, उसे खोलिए। आप शुरुआत कीजिए, देखिए कितने दिल के रास्ते खुलेंगे।'

20200222_114602.jpg

लेकिन हक़ीक़त इसके उलट है और ये सुप्रीम कोर्ट और उसके वार्ताकार भी जानते हैं कि दिल के रास्ते किसने बंद कर रखे हैं! इसके अलावा यह धरना आंदोलन सरकार की आंखों में गड़ ही इस वजह से रहा है कि ये रास्ते पर है और इसकी वजह से देशभर में प्रतिरोध के कई और 'शाहीन बाग़' खड़े हो गए हैं। सरकार की नज़र में इससे एक बड़ी आबादी की आवाजाही प्रभावित हो रही है। हालांकि इसमें भी पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में है।

लेकिन अगर इसे मान भी लिया जाए और इस धरना-आंदोलन को किसी कोने या पार्क में शिफ्ट कर दिया जाए (सही सरकारी शब्दों में कहें कि 'फेंक' दिया जाए) तो क्या आपको फ़र्क पड़ेगा! नहीं, बिल्कुल नहीं, किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। आप देते रहिए सालों-साल धरना। करते रहिए आंदोलन। जंतर-मंतर तक पर ऐसे ही कई आंदोलनकारियों की उम्र गुज़र गई। बाल सफेद हो गए, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं जब जनता के शांतिपूर्ण आंदोलनों को अनदेखा कर दिया गया या बेरहमी से कुचल दिया गया। मणिपुर की इरोम शर्मिला तो अपनी जान पर ही खेल गईं। करती रहीं 'अफस्पा' के ख़िलाफ़ सालों साल अकेली आमरण अनशन, लेकिन किसी को कोई फ़र्क़ पड़ा क्या?

ख़ैर, शाहीन बाग़ का रास्ता तो आज नहीं कल खुल जाएगा, लेकिन देश के आगे सीएए-एनपीआर-एनआरसी का जो अवरोध लगा दिया गया है, वो कैसे हटेगा, देश का रास्ता कैसे खुलेगा। जिस देश को सत्ताधारी ही हिन्दू-मुसलमान में बांटने की कोशिश कर रहे हैं, जहां धर्म ही नागरिकता का आधार बनाया जा रहा है, वह देश किस रास्ते पर और कैसे आगे बढ़ेगा। सवाल देश और देश के भविष्य का है और भविष्य निश्चित तौर पर देश की 130 करोड़ जनता है, जिसमें दिल्ली का शाहीन बाग़ भी शामिल है तो लखनऊ का घंटाघर और उजरियांव भी। इलाहाबाद का रौशन बाग़ भी शामिल है तो कोलकाता का सर्कस मैदान भी। महाराष्ट्र भी शामिल है तो कर्नाटक भी और तमिलनाडु, केरल भी।

20200222_115342_0.jpg

पहली नज़र में सुप्रीम कोर्ट की पहलक़दमी का स्वागत किया जा सकता है। ऐसे मुश्किल समय में इतना भी बहुत लगता है, लेकिन यही सुप्रीम कोर्ट सीएए को लेकर इस कदर उदासीन है कि इस मुद्दे को सुनने के लिए भी प्राथमिकता के आधार पर तुरंत समय नहीं निकाल पा रहा है। कभी सर्दियों की छुट्टियों के बाद, कभी होली की छुट्टियों के बाद सुनवाई की बात की जा रही है।

आज हम खुश हो सकते हैं सुप्रीम कोर्ट ने दो वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन आंदोलनकारियों के बीच वार्ता के लिए भेजे, और वे काफी संवेदनशीलता से बात भी करते और समझते दीख रहे हैं। उनके पास धरना-आंदोलन कहीं और ले जाने के कई सुझाव हैं। लेकिन अगर बात नहीं बनी तो सुप्रीम कोर्ट की यही पहलक़दमी उसकी सख़्ती का बहाना भी बन सकती है और उस समय शायद आप भी या तो ताली बजाएं, सहमति जताएं या ख़ामोश हो जाएं, मन में ये धारणा लिए कि "देखिए कोर्ट ने तो बहुत कोशिश की लेकिन 'यही लोग' नहीं माने, इसलिए अब क्या विकल्प था, सख़्त कार्रवाई के सिवा।"

इसे भी पढ़े : शाहीन बाग़ आंदोलन : क्या वार्ताकार खत्म कर पाएंगें गतिरोध?

Shaheen Bagh
CAA
NRC
NPR
Supreme Court
Protest against CAA
Protest against NRC
Sanjay Hegde
Sadhana Ramachandran
Shaheen Bagh Road

Related Stories

शाहीन बाग से खरगोन : मुस्लिम महिलाओं का शांतिपूर्ण संघर्ष !

CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा

लंबे संघर्ष के बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व सहायक को मिला ग्रेच्युटी का हक़, यूनियन ने बताया ऐतिहासिक निर्णय

देश बड़े छात्र-युवा उभार और राष्ट्रीय आंदोलन की ओर बढ़ रहा है

जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?

सुप्रीम कोर्ट को दिखाने के लिए बैरिकेड हटा रही है सरकार: संयुक्त किसान मोर्चा

बाहरी साज़िशों और अंदरूनी चुनौतियों से जूझता किसान आंदोलन अपनी शोकांतिका (obituary) लिखने वालों को फिर निराश करेगा

लखीमपुर खीरी : किसान-आंदोलन की यात्रा का अहम मोड़

अगर मामला कोर्ट में है, तब क्या उसके विरोध का अधिकार खत्म हो जाता है? 

कार्टून क्लिक: किसानों का गला किसने घोंटा!


बाकी खबरें

  • मालिनी सुब्रमण्यम
    छत्तीसगढ़ : युद्धग्रस्त यूक्रेन से लौटे मेडिकल छात्रों ने अपने दु:खद अनुभव को याद किया
    09 Mar 2022
    कई दिनों की शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलने के बाद, अंततः छात्र अपने घर लौटने कामयाब रहे।
  • EVM
    श्याम मीरा सिंह
    मतगणना से पहले अखिलेश यादव का बड़ा आरोप- 'बनारस में ट्रक में पकड़ीं गईं EVM, मुख्य सचिव जिलाधिकारियों को कर रहे फोन'
    08 Mar 2022
    पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनाव परिणामों में गड़बड़ी की आशंकाओं के बीच अपनी पार्टी और गठबंधन के कार्यकर्ताओं को चेताया है कि वे एक-एक विधानसभा पर नज़र रखें..
  • bharat ek mauj
    न्यूज़क्लिक टीम
    मालिक महान है बस चमचों से परेशान है
    08 Mar 2022
    भारत एक मौज के इस एपिसोड में संजय राजौरा आज बात कर रहे हैं Ukraine और Russia के बीच चल रहे युद्ध के बारे में, के जहाँ एक तरफ स्टूडेंट्स यूक्रेन में अपनी जान बचा रहे हैं तो दूसरी तरफ सरकार से सवाल…
  •  DBC
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: डीबीसी कर्मचारियों की हड़ताल 16वें दिन भी जारी, कहा- आश्वासन नहीं, निर्णय चाहिए
    08 Mar 2022
    DBC के कर्मचारी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं।  ये कर्मचारी 21 फरवरी से लगातार हड़ताल पर हैं। इस दौरान निगम के मेयर और आला अधिकारियो ने इनकी मांग पूरी करने का आश्वासन भी दिया। परन्तु…
  • Italy
    पीपल्स डिस्पैच
    इटली : डॉक्टरों ने स्वास्थ्य व्यवस्था के निजीकरण के ख़िलाफ़ हड़ताल की
    08 Mar 2022
    इटली के प्रमुख डॉक्टरों ने 1-2 मार्च को 48 घंटे की हड़ताल की थी, जिसमें उन्होंने अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग की और स्वास्थ्य व्यवस्था के निजीकरण के ख़िलाफ़ चेतवनी भी दी।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License