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गुटनिरपेक्ष आंदोलन और भारत के एशियाई-अफ़्रीकी रिश्तों को बढ़ावा देने के प्रयास: III
एशियाई और अफ़्रकी देशों के भीतर सैन्य-समर्थक गुटों के अड़ंगे को आख़िरकार मज़बूती मिल गयी, जिसने स्थायी एकता और सहयोग के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया।
एन.डी.जयप्रकाश
23 Nov 2021
NAM

27 जुलाई, 1953 को कोरिया के बीच युद्धविराम समझौता लागू होने के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने सात साल से ज़्यादा के उसके औपनिवेशिक युद्ध में फ़्रांस की हार को रोकने के लिए अपना ध्यान हिंद-चीन पर स्थानांतरित कर दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन डलेस ने 18 मई, 1953 को पहले ही इसकी चेतावनी दे दी थी। उन्होंने कहा था, "...पूरा दक्षिण पूर्व एशिया आज बड़े संकट में है, और अगर हिंद-चीन हाथ से निकल जाता है, तो पूरे सुदूर पूर्व (और दक्षिण एशिया) में प्रतिक्रिया की एक श्रृंखला चलेगी।"

एक ओर जब संयुक्त राज्य अमेरिका, फ़्रांस को सहारा देने के लिए सब कुछ कर रहा था और इसके लिए उसने हिंद-चीन युद्ध को छेड़ने के लिए फ़्रांस की ओर से किये गये खर्च का 76% से ज़्यादा ख़र्च का भार उठाया, तब दूसरी ओर 22 फ़रवरी, 1954 को संसद में एक बहस के दौरान नेहरू ने तत्काल युद्धविराम की अपील की थी। 24 अप्रैल, 1954 को कोरियाई और हिंद-चीन मुद्दों के शांतिपूर्ण समाधान पर चर्चा करने के लिए सभी इच्छुक पक्षों को लेकर हो रहे जिनेवा सम्मेलन की शुरुआत के दो दिन पहले नेहरू ने हिंद-चीन के बीच शांति स्थापित करने के लिए संसद में छह सूत्री कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा।

इस प्रस्ताव में तत्काल युद्धविराम की मांग के अलावा फ़्रांस से हिंद-चीन के देशों को स्वतंत्रता देने और बड़ी शक्तियों से उनके मामलों में हस्तक्षेप न करने का वचन देने का आग्रह किया। उनके प्रस्तावों ने पांच देशों-बर्मा (अब म्यांमार), सीलोन (अब श्रीलंका), भारत, इंडोनेशिया और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के उस सम्मेलन की विज्ञप्ति को आधार बनाया, जिसे कोलंबो में 29 अप्रैल से लेकर 2 मई 1954 को आयोजित किया गया था। यह विज्ञप्ति जिनेवा सम्मेलन के सदस्यों के ध्यान में लायी गयी। (ऐट द कोलंबो कॉन्फ़्रेंस इंडोनेशिया प्रोपोज़्ड अ अफ़्रीकन-एशियन कॉन्फ़्रेंस इन 1955; यूरी नसेंको (1977), पृष्ठ संख्या-174)।  

भारत जिनेवा सम्मेलन में आधिकारिक भागीदार तो नहीं था, लेकिन वीके कृष्ण मेनन को भारतीय प्रतिनिधि के रूप में भेजा गया था। उन्होंने मौजूद आधिकारिक प्रतिनिधिमंडलों के उन प्रमुखों के साथ अनौपचारिक बैठकें की, जिन्होंने वार्ता की सफलता में अहम योगदान दिया। इसके अलावा, 7 मई 1954 को दीन बिएन फ़ू की लड़ाई में वियतनाम की सेना के हाथों फ़्रांसीसी सेना की अपमानजनक हार ने हिंद-चीन को लेकर हुए जिनेवा समझौते पर 21 जुलाई, 1954 को तेज़ी से हस्ताक्षर किये जाने को भी सुनिश्चित कर दिया। इस समझौते की शर्तों को पूरा करने की निगरानी के लिए भारत की अध्यक्षता में कनाडा, पोलैंड और भारत को मिलाकर उस अंतर्राष्ट्रीय आयोग को नियुक्त किया गया, जो एक ईमानदार मध्यस्थ के रूप में भारत के क़द की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता का एक संकेत था। 

पंचशील समझौता

कृष्णा मेनन की पहल पर जून,1954 के अंत में जिनेवा कॉन्फ़्रेंस के बीच मिले ख़ाली समय के दौरान चीनी प्रधान मंत्री झोउ एनलाई को भारत आने का न्योता दिया गया। झोउ एनलाई और नेहरू के बीच की वह वार्ता 28 जून, 1954 को एक संयुक्त बयान के साथ समाप्त हो गयी थी, जिसमें उन सिद्धांतों को रेखांकित किया गया था, जो भारत और चीन के बीच के रिश्तों को निर्धारित कर सके। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के ये पांच सिद्धांत सबसे पहले तिब्बती क्षेत्रों और भारत के बीच व्यापार और संचार पर चीन-भारत संधि की प्रस्तावना में निर्धारित किये गये। इस पर 29 अप्रैल,1954 को चीन के पेकिंग (बीजिंग) में भारतीय राजदूत एन.राघवन और चीनी उप विदेश मंत्री चांग हान-फ़ू के बीच हस्ताक्षर किये गये। इस संधि को पंचशील सिद्धांतों के रूप में भी जाना जाता है, ये पांच सिद्धांत थे:

  1. एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के प्रति सम्मान।
  2. एक दूसरे पर हमला नहीं करना।
  3. एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना।
  4. समानता और पारस्परिक लाभ।
  5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।

28 जून 1954 को हस्ताक्षरित उस समझौते के संयुक्त वक्तव्य में कहा गया, "प्रधानमंत्रियों ने इन सिद्धांतों की पुष्टि कर दी है और महसूस किया है कि इन सिद्धांतो को एशिया के अन्य देशों के साथ-साथ दुनिया के दूसरे हिस्सों में अपने रिश्तों के लिए लागू किया जाना चाहिए। अगर इन सिद्धांतों को न सिर्फ़ विभिन्न देशों के बीच, बल्कि आम तौर पर अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों में भी लागू किया जाता है, तो वे शांति और सुरक्षा के लिए एक ठोस आधार तैयार करेंगे और जो डर और आशंकाएं इस समय मौजूद हैं, उनकी जगह आत्मविश्वास की भावना होगी…हर एक देश की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता और हमला नहीं करने के आश्वासन के साथ सम्बन्धित देशों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और दोस्ताना रिश्ते होंगे। इससे आज की दुनिया में मौजूद तनाव कम होगा और इससे शांति का माहौल बनाने में भी मदद मिलेगी।"

ज़ाहिर है कि संयुक्त राज्य के प्रशासन का इरादा ऐसे सिद्धांतों को क़ायम रखने का नहीं था।

 सैन्य गुटों का ख़तरा

दक्षिण एशिया में अपने पैर जमाने की एक हताशा भरी कोशिश में संयुक्त राज्य अमेरिका ने पहले सैन्य सहायता देकर पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को मज़बूत करने की कोशिश की। 24 फ़रवरी,1954 को संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति ड्वाइट आइज़नहावर की एक चिट्ठी के ज़रिये भारत को इस फ़ैसले के बारे में सूचित किया गया था। उस चिट्ठी में कहा गया था कि क्या भारत सरकार को ऐसी ही सैन्य सहायता का अनुरोध नहीं करना चाहिए; इस पर "सबसे सहानुभूतिपूर्वक विचार" किया जायेगा। नेहरू ने 1 मार्च,1954 को भारतीय संसद के सामने अपने सम्बोधन के दौरान संयुक्त राज्य की उस सैन्य सहायता की पेशकश को साफ़ तौर पर नामंज़ूर कर दिया। (यूरी नसेंको, पृष्ठ संख्या-166)। जिस दिन हिंद-चीन पर हुए जिनेवा समझौते पर हस्ताक्षर किये गये, उसी दिन नेहरू की उस प्रतिकूल प्रतिक्रिया से प्रभावित होकर आइजनहावर ने संयुक्त राज्य अमेरिका के आक्रामक इरादों को साफ़ कर देने को लेकर एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस की, जिसमें कहा गया, "संयुक्त राज्य अमेरिका सक्रिय रूप से अन्य मुक्त राष्ट्रों के साथ चर्चा कर रहा है, ताकि उस सामान्य क्षेत्र में हो रहे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कम्युनिस्ट हमले को रोकने के लिए दक्षिणपूर्व एशिया में सामूहिक रक्षा के लिए संगठन बनाने की ख़ातिर तेजी से विचार किया जा सके।"

इस मक़सद से संयुक्त राज्य अमेरिका ने पहली बार 19 मई, 1954 को पाकिस्तान के साथ एक पारस्परिक रक्षा सहायता समझौता किया। उसके बाद, उसने "कोलंबो पॉवर्स" को उस प्रस्तावित दक्षिण पूर्व एशियाई सैन्य गठबंधन में शामिल करने की कोशिश की, जिसे 6 सितंबर, 1954 से फ़िलीपींस में निर्धारित एक सम्मेलन के बाद गठित किया जाना था। नेहरू ने न सिर्फ़ उस अमेरिकी दावत को ख़ारिज कर दिया, बल्कि उन्होंने संसद को बताया कि यह प्रस्तावित सम्मेलन दरअस्ल "जिनेवा सम्मेलन की बनायी गयी शांति की ओर ले जाने वाली पूरी प्रक्रिया को ही बदल देने की कोशिश है..."

बर्मा, सीलोन और इंडोनेशिया ने भी उस दावत को अस्वीकार कर दिया। सिर्फ़ तीन एशियाई देश- पाकिस्तान, फ़िलीपींस और थाईलैंड ही 8 सितंबर, 1954 को मनीला में गठित दक्षिण-पूर्व एशिया संधि संगठन (SEATO) बनाने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ़्रांस, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के साथ शामिल हो गये। संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी 1 अक्टूबर, 1953 को दक्षिण कोरिया के साथ और 2 दिसंबर, 1954 को चियांग काई-शेक सरकार के साथ पारस्परिक रक्षा संधियों पर हस्ताक्षर किये।

इसके बावजूद एक और सैन्य गठबंधन, जिसे शुरू में बगदाद संधि के रूप में जाना जाता था और बाद में केंद्रीय संधि संगठन (CENTO) के रूप में जाना गया, इसका गठन 24 फ़रवरी, 1955 को इराक़ और तुर्की ने किया । उसी साल के 5 अप्रैल को यूनाइटेड किंगडम, 23 सितंबर को पाकिस्तान और 3 नवंबर को ईरान उस बग़दाद समझौते में शामिल हो गये।

साथ ही साथ गुप्त गतिविधियां भी हमेशा की तरह चलती रहीं। जब बांडुंग सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी चल रही थी, सीआईए एजेंटों ने कथित तौर पर एनलाई की हत्या की साज़िश के साथ उस सम्मेलन में बाधा पहुंचाने का प्रयास किया, जबकि वह उस दरम्यान इंडोनेशिया के रास्ते में थे। एयर इंडिया का विमान "कश्मीर प्रिंसेस" को चीन ने बांडुंग में प्रतिनिधियों (कथित तौर पर एनलाई सहित) को ले जाने के लिए किराये पर लिया था। विमान ने हांगकांग से उड़ान भरी और 11 अप्रैल 1955 को इंडोनेशिया के पास समुद्र के ऊपर हवा में उड़ा दिया गया,जिसमें 19 यात्रियों और चालक दल में से तीन को छोड़कर बाक़ी सभी की मौत हो गयी।

एनलाई चमत्कारिक रूप से नियमित सुरक्षा सावधानियों के चलते आख़िरी समय में नेहरू और बर्मी राष्ट्राध्यक्ष यू नु के साथ रंगून से बांडुंग के लिए एक दूसरे उड़ान में चले गये थे,जिस कारण वह बाल-बाल बच निकले। (2001 में प्रकाशित कर्नल एके मित्रा की किताब-"डिजास्टर इन द एयर: द क्रैश ऑफ़ द कश्मीर प्रिंसेस, 1955")

बांडुंग सम्मेलन

गुटनिर्पेक्ष आंदोलन(NAM) के सिद्धांतों को पहली बार इंडोनेशिया के बांडुंग में हुए एशियाई-अफ़्रीकी सम्मेलन में पूरी तरह प्रतिपादित किया गया था, जो 18 से 24 अप्रैल, 1955 तक आयोजित हुआ था। उस सम्मेलन में कुल मिलाकर 29 देशों के तक़रीबन 340 प्रतिनिधी 1440 मिलियन से ज़्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जो दुनिया की आबादी का लगभग दो-तिहाई हिस्सा था। उस सम्मेलन को कवर करने के लिए कथित तौर पर दुनिया भर से लगभग 655 संवाददाता बांडुंग पहुंचे थे।

रंगभेद और उपनिवेशवाद को ख़त्म किये जाने की मांगों के अलावा "विश्व शांति और सहयोग को बढ़ावा देने" पर अंतिम विज्ञप्ति के खंड- G ने बांडुंग सम्मेलन के केंद्रीय उद्देश्य को सटीक रूप से व्यक्त किया। यह इस तरह था: "सम्मेलन मानता है कि निरस्त्रीकरण और युद्ध के लिए परमाणु और थर्मोन्यूक्लियर हथियारों के निर्माण, परीक्षण और इस्तेमाल पर प्रतिबंध मानव जाति और सभ्यता को बड़े पैमाने पर होने वाली तबाही के डर और आशंका से बचाने के लिए अनिवार्य है। माना गया कि यहां इकट्ठे हुए एशियाई और अफ़्रीकी राष्ट्रों का मानवता और सभ्यता के प्रति यह कर्तव्य है कि वे निरस्त्रीकरण और इन हथियारों के निषेध में अपने समर्थन की घोषणा करें और मुख्य रूप से सम्बन्धित राष्ट्रों और वैश्विक राय से इस तरह के निरस्त्रीकरण और निषेध को सामने लाने की अपील करें…इस सम्मेलन ने सार्वभौमिक निरस्त्रीकरण को शांति के संरक्षण के लिए एक बेहद ज़रूरी क़दम बताया और संयुक्त राष्ट्र से अपने प्रयासों को जारी रखने का अनुरोध किया और सभी जुड़े हुए पक्षों से यह अपील की कि वे सभी सशस्त्र बलों और युद्ध सामग्रियों के विनियमन, हदबंदी, नियंत्रण और उसमें कमी किये जाने को लागू करें, जिसमें सामूहिक विनाश के सभी हथियारों के उत्पादन, परीक्षण और इस्तेमाल पर प्रतिबंध और इस उद्देश्य के लिए प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण स्थापित करना शामिल हो।"

अंतिम विज्ञप्ति में भाग लेने वाले राष्ट्रों से अविश्वास और भय से मुक्त रहने, सद्भावना दिखाने, सहिष्णुता का पालन करने, अच्छे पड़ोसियों के रूप में एक दूसरे के साथ शांति से रहने और दस सहमत सिद्धांतों के आधार पर मैत्रीपूर्ण सहयोग विकसित करने का आग्रह किया गया।

ऊपर बताये गये उद्देश्यों और सिद्धांतों के आधार पर एशियाई और अफ़्रीकी देशों के बीच की स्थायी एकता और सहयोग से सैन्यवादी गुटों के हितों को नुकसान पहुंचता। इसलिए, सैन्य गुटों के समर्थकों ने अफ़्रीकी-एशियाई राष्ट्रों के बीच ऐसी किसी भी एकता और सहयोग की संभावना को बाधित करने के लिए हर संभव प्रयास किया। बांडुंग सम्मेलन की स्थायी एशियाई-अफ्रीकी राष्ट्रों के संगठन को शुरू करने में विफलता इस बात का संकेत थी कि एशियाई और अफ़्रीकी देशों के भीतर सैन्य-समर्थक लॉबी का फ़रमान अंततः मज़बूत हो गयी थी।

लेखक दिल्ली साइंस फ़ोरम के संयुक्त सचिव और परमाणु निरस्त्रीकरण और शांति गठबंध की राष्ट्रीय समन्वय समिति के सदस्य हैं। इनके व्यक्त विचार निजी हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

NAM and India’s Attempts to Nurture Asian-African Ties: Part 3

(गुटनिरपेक्ष आंदोलन की श्रृंखला का यह दूसरा भाग है। इस श्रृंखला का अगला भाग जल्द ही प्रकाशित किया जायेगा। पहले भाग को पढ़ने के लिए लिंक पर और दूसरे भाग को पढ़ने के लिए लिंक क्लिक करें।)

Indochina war
Bandung Conference
Non-Aligned Movement
French Occupied Indochina
US military
SEATO
CENTO
Chiang Kai-Shek
Jawaharlal Nehru
NAM

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