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नई वाहन परिमार्जन नीति : उपभोक्ताओं पर भार, वाहन उद्योग को खुली छूट
वाहन परिमार्जन नीति द्वारा प्रदूषण को कम करने के जिन लक्ष्यों की बात की गई है, उन्हें पाने के लिए इस नीति का गठन ठीक से नहीं किया गया। वाहन परिमार्जन नीति वाहन उद्योग के पक्ष में बहुत हद तक झुकी हुई है।
डी रघुनंदन
03 Apr 2021
नई वाहन परिमार्जन नीति : उपभोक्ताओं पर भार, वाहन उद्योग को खुली छूट
Image Source: The Indian Express

1 फरवरी, 2021 को पेश किए गए केंद्रीय बजट में बहुप्रतीक्षित "वाहन परिमार्जन नीति (व्हीकल स्क्रेपेज पॉलिसी)" की घोषणा की गई। इसके बाद सड़क परिवहन मंत्री ने नीति के संबंध में कुछ अतिरिक्त जानकारियां दीं। लेकिन जैसा मंत्री ने वायदा किया था, उसके उलट 15 फरवरी तक अंतिम नीतिगत दस्तावेज़ को सार्वजनिक तौर पर पेश नहीं किया गया है। इसके बावजूद भी सार्वजनिक तौर पर इतनी जानकारी मौजूद हो चुकी है, जिससे प्राथमिक तौर पर इस नीति का विश्लेषण किया जा सकता है। 

बड़ी संख्या में दुनियाभर के देशों में वाहन परिमार्जन नीति मौजूद है। इनमें उत्तरी अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं। इनमें से कई देशों की परिमार्जन नीति में  वाहनों के लिए 10 साल से ज़्यादा की सीमा मौजूद है। ऐसी नीतियां दो उद्देश्य बताती हैं: पहला, पुरानी और ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियों को हटाना, ताकि वायुप्रदूषण और उत्सर्जन कम किया जा सके। दूसरा, वाहन उद्योग को बढ़ावा दिए जाने का उद्देश्य बताना।

2008 की मंदी के बाद इन नीतियों पर गंभीर ध्यान दिया जाने लगा, जिसमें वाहन उद्योग को बढ़ावा देने का उद्देश्य केंद्र में था। इस दौरान पुरानी गाड़ियों को नई गाड़ियों से बदलने के लिए प्रोत्साहन और रियायतें भी दी गईं। कुछ देशों ने गाड़ियां बदलने के दौरान कम प्रदूषण या ज़्यादा ईंधन-कुशलता वाली गाड़ियों पर जोर दिया। 

भारत में पिछले तीन वर्षों में वाहन उद्योग में बहुत गिरावट आई है। कोरोना महामारी के चलते स्थिति और भी ज़्यादा विकट हो गई। 2020 के खात्मे तक वाहन उद्योग में 24 फ़ीसदी की गिरावट आ चुकी थी। इसलिए वाहन उद्योग क्षेत्र सरकार पर नई परिमार्जन नीति लाने का दबाव बना रहा है। भारी और व्यावसायिक वाहन (HCV) क्षेत्र 50 फ़ीसदी नीचे जा चुका है, नई परिमार्जन नीति से इस क्षेत्र को बहुत फायदा होगा। लेकिन HCV उपयोगकर्ता/वाहन स्वामी इसका बहुत विरोध करेंगे। 

भारत में पिछले एक दशक से सरकारी गलियारों में वाहन परिमार्जन नीति पर चर्चा होती रही है। लेकिन वाहन उद्योग, व्यक्तिगत वाहनों और ट्रक मालिकों के साथ-साथ सरकारी विभागों के अलग-अलग हित, मत और आपस में विरोधाभास बने रहे हैं। जिससे सरकारी गलियारों में हुई चर्चा किसी अंतिम नतीज़े तक नहीं पहुंच सकी। नई नीति के साथ भी इन अलग-अलग पक्षों के अपने हित बरकरार हैं।

यहां ट्रक मालिक खासे नाराज़ हैं। उन्हें आने वाले भविष्य में बड़ा नुकसान और अपनी क्षमता के बाहर संभावित निवेश दिखाई दे रहा है।

चूंकि पुराने वाहनों को नए वाहन स्थानांतरित कर रहे हैं, इसलिए साधारण तौर पर वायु प्रदूषण और पर्यावरण पर प्रभाव को मान लिया जाता है। लेकिन यहां कितना पर्यावरणीय फायदा हो रहा है और इस कम प्रदूषण के लिए नीतिगत प्रावधान किस हद तक दबाव डालते हैं? चूंकि आम जनता, खासकर निम्न आय वाले समूह प्रदूषित हवा के ज़्यादा शिकार हैं, तो क्या इस नीतिगत फ़ैसले में उन्हें दावेदार नहीं माना जाना चाहिए?

यहां वाहन निर्माता निश्चित तौर पर खुश हैं। उन्हें बाज़ार में मांग बढ़ने की संभावना दिखाई दे रही है। वाहन परिमार्जन नीति को आमतौर पर जीत माना जाता है। लेकिन इस लेख में सवाल पूछा जा रहा है कि क्या कुछ दावेदारों को दूसरे दावेदारों से ऐसी नीतियों से ज़्यादा फायदा होता है।

क्या है यह नीति

नई नीति के अंतर्गत 20 साल से पुराने निजी वाहन और 15 साल से पुराने व्यावसायिक वाहनों को अनिवार्य तौर पर जांच से गुजरना होगा। यहां वाहन को उत्सर्जन, सुरक्षा, ब्रेक, मोटर-बॉडी के अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर जांचा जाएगा। इसके लिए यूरोप और जापान में पालन किए जाने वाले पैमानों को लागू किया जा रहा है। जो भी वाहन इस फिटनेस टेस्ट में सफल होंगे, उन्हें दोबारा पंजीकरण की अनुमति मिलेगी। लेकिन ऐसा बहुत हद तक संभव है कि पंजीकरण को खर्चीला बना दिया जाएगा, ताकि वाहन मालिक परिमार्जन से मिलने वाले प्रोत्साहन का लाभ उठाकर नया वाहन खरीदने के लिए मजबूर हों। जो वाहन इस परीक्षण में सफल नहीं होंगे, उन्हें नष्ट करना होगा।

विस्तृत नीतिगत दस्तावेज़ के ज़रिए आगे और स्पष्टता की जरूरत है। यूरोप और दुनिया की बाकी जगहों पर पहले दौर की परिमार्जन नीति में पुराने वाहनों को एकसाथ नष्ट किए जाने की बात थी। भारत में यह प्रक्रिया सतत ढंग से करवाए जाने की संभावना है। मतलब हर साल वाहनों के एक समूह को नष्ट किया जाएगा, ऐसा तब तक होगा, जब तक तय की गई समय सीमा के बाहर के वाहन नष्ट नहीं कर दिए जाते या उनका पंजीकरण नहीं हो जाता।

भारत में परिमार्जन नीति के 1 अप्रैल 2022 से लागू होने की संभावना है। इसके तहत सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र ईकाईयों के 15 सालों से पुराने वाहनों को नष्ट किया जाएगा। 2023 में एक साल बाद सभी तरह के भारी व्यावसायिक वाहनों को अनिवार्य तौर पर फिटनेस टेस्ट से गुजरना होगा। वहीं निजी और दूसरे समूहों के वाहनों के लिए जून, 2024 से यह नीति लागू होगी।

यह नीति लोगों को दोबारा पंजीकरण कराने के बजाए गाड़ी को नष्ट कराने के लिए कई तरह के प्रोत्साहन देती है। परिमार्जन के बाद खरीदे जाने वाले नए व्यवसायिक वाहन पर 28 फ़ीसदी के बजाए, 5 फ़ीसदी GST या पूरी तरह GST माफ़ करने का प्रस्ताव है। यह ऐसे व्यवसायिक वाहनों के लिए प्रस्तावित है, जिनमें 10 से ज़्यादा लोग सफर कर सकते हैं।

नीति के मुताबिक़, जो लोग अपने वाहन को नष्ट करवा रहे हैं, उन्हें इसकी कीमत स्क्रैपिंग सेंटर पर मिलेगी। यह कीमत शोरूम से खरीदे जाने वाले वाहन की 4-6 फ़ीसदी हो सकती है। यह नया वाहन अगर निजी वाहन होगा, तो सड़क कर में 25 फ़ीसदी की छूट और व्यावसायिक वाहन होने की स्थिति में सड़क कर पर 15 फ़ीसदी छूट मिलेगी। स्क्रैपिंग सर्टिफिकेट के आधार पर निर्माता से भी 5 फ़ीसदी छूट और पंजीकरण शुल्क माफ़ करने का प्रस्ताव दिया गया है।

लेकिन याद रखना होगा कि यह सभी प्रोत्साहन सिर्फ़ सुझाव हैं। अभी केंद्र के इन सुझावों को राज्य सरकारों द्वारा मान्यता देनी होगी या इनमें बदलाव करना होगा। क्योंकि यहां होने वाली कटौती राज्य सरकारों के लिए आय का एक अहम साधन है। इसके अलावा GST परिषद और वाहन निर्माताओं को भी इन सुझावों को मानना होगा, जबकि वाहन निर्माता शायद की छूट देने वाले सुझाव का पालन करने के लिए राजी हों। बेहतर होता कि इन लोगों से पहले बात की गई होती और कर रियायतों के साथ-साथ निर्माता की छूट पर मजबूत फ़ैसला लिया गया होता।

अभी प्रोत्साहन और रियायतों को लेकर बहुत अनिश्चित्ता है। इसलिए कितने वाहन मालिक परिमार्जन को अपनाते हैं और कितने पुराने प्रदूषण फैलाने वाले वाहन सड़कों से हटते हैं, इस पर कुछ भी कहना संभव नहीं है। यह अनिश्चित्ता, वाहन परिमार्जन नीति के प्रदूषण कम करने के लक्ष्य के लिए सही नहीं है।

वाहन निर्माताओं के ज़रिए खरीद छूट को दिए जाने का सुझाव दिया गया है, ना कि इसे अनिवार्य बनाया गया, लेकिन इससे इन निर्माताओं को ही फायदा मिलेगा। नई गाड़ियों की कीमत में छूट, चाहे वह सरकार या निर्माता या दोनों के ज़रिए मिले, वह यूरोप में वाहन परिमार्जन नीतियों के केंद्र में रही है। इस छूट ने वाहन मालिकों के लिए मुख्य प्रोत्साहन का काम किया है। वाहन निर्माता की तरफ़ से अनिवार्य छूट की भरपाई का प्रावधान केंद्रीय बजट में होना था। इसका ना होना नई नीति के लिए बड़ा नुकसान है। इस तरह की छूट की निश्चित्ता के बिना, वाहन मालिक कम प्रदूषण करने वाले नए वाहनों के बजाए, पुराने वाहनों के दोबारा पंजीकरण के लिए प्रोत्साहित होंगे।  

उदाहरण के लिए दिल्ली सरकार ने बैटरी से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देने के लिए ना केवल बैटरी की क्षमता के आधार पर नगद सब्सिडी का प्रबंध किया है, बल्कि इसमें पुराने वाहनों को नष्ट करने पर भी नगद प्रोत्साहन शामिल किया है।

फिलहाल केंद्र सरकार ने अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया है। वाहन निर्माताओं को खुली छूट दे दी गई है। नीति का पूरा भार उपभोक्ता पर डाल दिया गया है। यहां वायु प्रदूषण में कमी के लिए नागरिकों के हितों को दांव पर लगाया गया है।

प्रदूषण में कमी

पुराने और कम ईंधन कुशल वाहनों से होने वाला प्रदूषण ही वाहन परिमार्जन नीति का केंद्र है। लेकिन तब भी सरकार इस लक्ष्य को प्राथमिकता देने में नाकाम रही है।

ऐसा अनुमान लगाया गया है कि भारत में 51 लाख हल्के वाहन 20 साल से पुराने हो चुके हैं, जिसमें से 34 लाख 15 साल से ज़्यादा पुराने हैं। परिमार्जन नीति के कुछ पुराने प्रकार, अतीत में दिल्ली और दूसरे बड़े शहरों में लागू किए जा चुके हैं। इनके ज़रिए 15 साल से पुरानी गाड़ियों को ख़त्म किया जा चुका है उन परिमार्जन नीतियों में दोबारा पंजीकरण का विकल्प मौजूद नहीं था। नतीज़ा यह हुआ कि उन वाहनों को दूसरे राज्यों के छोटे शहरों और कस्बों में बेच दिया गया। समयसीमा को 15 साल से आगे 20 बढ़ाना, ऊपर से वह सीमा भी नहीं बताई गई जिसके आगे दोबारा पंजीकरण की अनुमति भी नहीं होगी, यह प्रावधान खुद ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को चलाए जाने में सहायक बनेंगे।

कम इंजन कार्यकुशलता, ज़्यादा ईंधन ख़पत और खराब गुणवत्ता के ईंधन इस्तेमाल के चलते पुराने वाहन ज़्यादा वायु प्रदूषण करते हैं। क्योंकि कई सारे पुराने वाहन BS-1 और BS-2 ईंधन के साथ काम करने के लिए बने होते हैं। कुछ अनुमान बताते हैं कि अगर 20 साल पुराने सभी वाहनों को नए BS-6 पैमाने के वाहनों से विस्थापित कर दिया जाए, तो वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण को 25 से 30 फ़ीसदी तक कम किया जा सकता है। पुराने वाहनों की कुल वाहनों की संख्या में हिस्सेदारी कम है, लेकिन प्रदूषण में उनकी हिस्सेदारी तुलनात्मक तौर पर बहुत ज़्यादा है।

सड़क परिवहन मंत्रालय का अनुमान है कि व्यावसायिक वाहन कुल वाहनों का सिर्फ़ 5 फ़ीसदी हैं, लेकिन वाहनों से होने वाले प्रदूषण में इनका योगदान 65 से 70 फ़ीसदी है। वहीं 2020 से पहले निर्मित वाहनों की प्रदूषण में हिस्सेदारी 15 फ़ीसदी है। 2014 में IIT बॉम्बे के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया था कि 2005 से पहले निर्मित हुए वाहनों की, वाहनों से होने वाले कुल प्रदूषण में 70 फ़ीसदी की हिस्सेदारी थी। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि BS-1 पैमाने के लिए बनाए गए ट्रक BS-6 पैमाने के वाहनों से 36 गुना ज़्यादा प्रदूषण करते हैं।

लेकिन नई नीति सबसे ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाले हिस्से को लक्षित करने में असफल रही। साथ ही यह नीति परिमार्जन को "ज़्यादा बेहतर ईंधन कुशलता वाले आंतरिक दहन इंजन" या उससे भी बेहतर "इलेक्ट्रिक वाहन या हाईड्रोजन ईंधन आधारित वाहनों" से जोड़ने में नाकामयाब रही है। हाईड्रोजन ईंधन आधारित वाहन बड़े स्तर पर भविष्य में बाज़ार में प्रवेश करेंगे।

निजी वाहनों को प्रोत्साहन देकर भी प्रदूषण में कमी लाने का रास्ता पुख़्ता किया जा सकता था। उदाहरण के लिए, सरकार और निर्माताओं द्वारा दिए जाने वाले स्तरीकृत नगद प्रोत्साहन को नए वाहन की ईंधन कुशलता से जोड़ा जा सकता था। सबसे ज़्यादा प्रोत्साहन हाइब्रिड या इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने पर दिया जा सकता था। इस तरह की व्यवस्था से ना केवल प्रदूषण में बड़ी कमी आती, बल्कि इलेक्ट्रिक वाहनों को बाज़ार में उतरने में भी बहुत मदद मिलती।

जर्मनी में सबसे ज़्यादा कठोरता के साथ वाहन परिमार्जन नीति लागू की गई थी, वहां वाहन उद्योग को प्रोत्साहन देने के क्रम में परिमार्जन नीति को सरकारी प्रोत्साहन से जोड़ा गया था। जर्मनी का अनुभव बताता है कि "आंतरिक दहन पर आधारित इंजन (मौजूदा वाहनों का पारंपरिक इंजन)" को ऐसे ही दूसरे इंजन से बदलने में प्रदूषण में ज़्यादा अंतर नहीं आता। 

जर्मनी में ऐसा होने की वज़ह कुछ हद तक वहां के पहले से लागू कठोर नियम भी रहे, जिनके चलते पुराने और नए इंजन वाले वाहनों के प्रदूषण स्तर और ईंधन कुशलता में कुछ ख़ास अंतर नहीं था। लेकिन भारत में स्थिति बिल्कुल उल्टी है।

वहां कुछ फायदे भी हुए, क्योंकि बड़ी गाड़ियों के मालिकों ने वाहन बदलने के क्रम में वैसी ही बड़ी विलासितापूर्ण गाड़ियां ना खरीद कर छोटी और ज़्यादा ईंधन कुशलता वाली गाड़ियां खरीदीं। इसकी वज़ह पर्यावरण समर्थित संस्कृति रही।

वाहनों का परिमार्जन

अब अंत में वाहनों के परिमार्जन पर आते हैं। नीति के मुताबिक़, देश भर में PPP मॉडल पर अंतरराष्ट्रीय पैमानों का पालन करने वाले केंद्र बनाए जाएंगे। सरकार से प्रोत्साहन पाने वाले इन केंद्रों में से कुछ खासतौर पर बंदरगाहों के पास स्थित होंगे। इससे अंसगठित परिमार्जन से होने वाला प्रदूषण भी कम होगा और नष्ट किए गए वाहनों से मिलने वाली सामग्री, खासतौर पर स्टील, रबर और प्लास्टिक का पुनर्उपयोग भी सुनिश्चित हो सकेगा।

ऐसा लगता है कि सरकार इन केंद्रों का इस्तेमाल दूसरे देशों से भेजे जाने वाले नष्ट करने योग्य वाहनों को मिटाने के लिए भी करेगी। अलांग और दूसरे जहाजों को नष्ट करने वाले केंद्रों के अनुभव को देखते हुए इन जगहों पर होने वाली प्रक्रियाओं और पर्यावरणीय पैमानों की कड़ी निगरानी रखनी होगी।

सौभाग्य से AIS-129 नाम का वाहन उद्योग पैमाना भारत में 2015 से ही लागू है, जिसके ज़रिए वाहनों से मिलने वाली सामग्री और इस सामग्री का पुनर्उपयोग संचालित होता है। AIS-129 का गठन यूरोपीय संघ के पैमानों पर किया गया है। इसके मुताबिक़ वाहनों में 85 फ़ीसदी ऐसी सामग्री उपयोग होनी चाहिए, जिसका उपयोग वाहन की उम्र पूरी होने पर दोबारा किया जा सके या फिर उस सामग्री का नवीकरण हो सके। 

लेकिन सबसे अहम इस नीति को लागू किए जाने के दौरान सही निगरानी और संचालन होगा। यह हमेशा से भारत की नीति निर्माण का कमजोर पहलू रहा है। इस परिमार्जन नीति का पीड़ित पर्यावरण नहीं होना चाहिए। खासतौर पर मिट्टी और भूमिगत जल का संक्रमण नहीं फैलना चाहिए।

कुलमिलाकर, सिद्धांतों के स्तर पर वाहन परिमार्जन नीति को मान्यता दी जा सकती है। लेकिन नीति द्वारा प्रदूषण को कम करने के जिन लक्ष्यों की बात की गई है, उन्हें पाने के लिए इस नीति का गठन ठीक से नहीं किया गया। यह नीति वाहन उद्योग के पक्ष में बहुत हद तक झुकी हुई है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

New Vehicle Scrappage Policy: Burden on Consumers, Free Pass for Auto Industry

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