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वाक़ई, ओपेक+ डील में कई शानदार चीज़ें हैं!
इतिहास की सबसे बड़ी सहकारी उत्पादन पहल को लेकर दुनिया के तेल उत्पादक एक साथ हाथ मिला रहे हैं।
एम. के. भद्रकुमार
17 Apr 2020
ओपेक प्लस डील

आदर्श समझौता वही होता है, जिससे सभी पक्षों को कुछ न कुछ हासिल होता हो। अगर तेल की क़ीमत में फिर से उछाल आता है,तो सभी तेल उत्पादक देशों को फ़ायदा होगा। ख़ास तौर पर, सऊदी अरब और रूस के नेतृत्व वाले ओपेक प्लस समूह ने रविवार को एक तनावपूर्ण स्थिति में इस समझौते को अंतिम रूप दिया और विश्व बाज़ार में आपूर्ति और मांग के बीच के संतुलन को पटरी पर फिर से लाने और क़ीमत में थोड़ा उछाल लाने को लेकर उत्पादन में प्रति दिन संयुक्त रूप से 9.7 मिलियन बैरल तेल में तीव्र कटौती करने पर एक समझौता किया।

इसने कई दिनों तक चलने वाली उन यातनापूर्ण अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं का अंत कर दिया,जिसमें अमेरिका भी शामिल था। ओपेक समूह के बाहर के उत्पादकों  से तेल उत्पादन में अतिरिक्त कटौती की उम्मीद है। जानकारों का अनुमान है कि वर्ष की दूसरी छमाही तक तेल की क़ीमत 40 डॉलर प्रति बैरल के क़रीब होगी।

इतिहास में पहली बार दुनिया के तेल उत्पादक सबसे बड़ी सहकारी उत्पादन पहल को लेकर एक साथ हाथ मिला रहे हैं। तेल की भू-राजनीति में टेक्टोनिक प्लेटें अपनी जगह बदल रही हैं।

ऐतिहासिक रूप से, अमेरिका ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था के ख़तरे के रूप में तेल उत्पाद संघ की खिल्ली उड़ायी थी। लेकिन, वाशिंगटन न सिर्फ़ हालिया उत्पादन पहल में शामिल हुआ है, बल्कि इसकी कामयाबी वास्तव में अमेरिका पर ही टिका हुआ है, जहां एक ही दशक में तेल का उत्पादन दोगुना हो गया है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल के दिनों में रूस,सऊदी अरब और मैक्सिको के राष्ट्राध्यक्षों के साथ सीधी बातचीत की है। हालांकि, दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक, यूएस ने व्यावसायिक उत्पादन में कटौती की पेशकश नहीं की है, ट्रम्प और अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि बाज़ार की ताक़तें अमेरिका को कमज़ोर करेंगी।

कहने का मतलब यह है कि कटौतियां कॉर्पोरेट निर्णयों के माध्यम से सरकार की ओर से हो सकती हैं, क्योंकि कंपनियां या तो उत्पादन बंद कर देती हैं या दिवालिया होने की पेशकश करती हैं। अमेरिकी उत्पादन में प्रति वर्ष 2 मिलियन बैरल प्रति वर्ष और शायद इससे भी अधिक की गिरावट का अनुमान है। उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, रूस और सउदी दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण चिंता को दूर करने वाली अपने पारंपरिक बाज़ारों के अमेरिकी अधिग्रहण की आशंकाओं के बीच अमेरिका की उत्पादन में गिरावट है,जिसके कारण 2019 में निर्यात में 3 मिलियन बीपीडी की गिरावट आ सकती है,जो आने वाले महीनों में लगभग शून्य हो सकती है।

यह अपने बाज़ार हिस्सेदारी को बचाने, और अगर अमेरिका के शेल तेल उत्पादन की रफ़्तार कम नहीं होती है,तो उसकी संभावना को ख़त्म करने जैसे सऊदी अरब के घोषित जुड़वां उद्देश्यों को पूरा करता है। सउदी के लिए विकल्प यही है कि उसे  80 डॉलर के आस-पास की कम क़ीमतों को बनाये रखने के लिए पर्याप्त तेल का उत्पादन करके बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी हासिल करे और दो साल तक उसे बनाये रखना होगा।।

रूस के लिए, यह सौदे फ़ायदे का होगा, क्योंकि उसे प्रति दिन राजस्व के रूप में 70-80 मिलियन डॉलर का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा।

ट्रंप ने रविवार को ट्वीट किया, “ओपेक प्लस के साथ बड़ा तेल सौदा किया गया है। इससे संयुक्त राज्य अमेरिका में ऊर्जा क्षेत्र की लाखों नौकरियां बचेंगी। मैं रूस के राष्ट्रपति पुतिन और सऊदी अरब के राजा,सलमान को धन्यवाद और बधाई देना चाहूंगा। मैंने उनसे ओवल ऑफिस से बात की है। सभी के लिए यह बहुत बड़ा सौदा है !”

कहा जा रहा है कि ओपेक प्लस सौदा अपने मूल में ट्रम्प और पुतिन के बीच की समझ के सांचे से निकला हुआ सौदा है। सऊदी अरब को समझ में आ गया है कि उनके अपनाये गये तरीक़ों से बाहर रहने में ही बेहतरी थी। पुतिन ने सही ही कहा है कि ट्रम्प के लिए राजनीतिक रूप से यह बहुत ही अहम है कि नौकरियों को बचाये रखने के लिए शेल उद्योग को बनाये रखा जाय। यह उद्योग 10 मिलियन से अधिक अमेरिकियों को रोज़गार देता है और यूएस के सकल घरेलू उत्पाद का 7 प्रतिशत है।

मगर,बड़ा सवाल यही है कि इससे किसको क्या हासिल होगा ? हालांकि इस बात पर हमेशा से संदेह रहा है कि यह पुतिन की गेम प्लानिंग थी, क्योंकि इस तरह की एक कल्पित चाल के भीतर तेल की क़ीमत में गिरावट को दिखाने से रूसी अर्थव्यवस्था के लिए अरबों डॉलर की आय का नुकसान दिखता।

साफ़ है कि तेल की क़ीमत में इस लगातार हो रही गिरावट ने अमेरिका के इस चुनावी साल में अमेरिकी शेल उद्योग के लिए एक अस्तित्वगत संकट पैदा कर दिया है,ये हालात बहुत ही जल्द ट्रंम्प को बहस के केन्द्र में ला देता। इस समझौते का ताना-पाना पुतिन ने रचा था या नहीं,मगर हुआ ठीक वही, जैसा सोचा गया था।

ट्रम्प के लिए, रूस के साथ एक रचनात्मक जुड़ाव कुछ ऐसा ही है,जैसा वे चाहते हैं। "रूस की मिलीभगत" और इसी तरह की दूसरी बातों पर मुलर की जांच-पड़ताल के कारण तीन क़ीमती वर्ष बर्बाद हो चुके हैं। लेकिन,महाभियोग नाटक में अपने विरोधियों को कामयाबी के साथ मात देने के बाद ट्रम्प अब बंधे हुए नहीं रह गये हैं। इसे पुतिन भी समझते हैं।

इस विशेष मामले में, ट्रम्प बिग ऑयल के उन हितों को नुकसान होने से बचा कर रहे हैं, जो अपने राजनीतिक वर्ग, थिंक टैंक, मीडिया और वॉल स्ट्रीट और निश्चित रूप से एक "छद्म सरकार" के ज़बरदस्त दबाव समूह को साथ ले चलते हैं। सीधे शब्दों में कहें, तो इस समय यह बात समझ से बाहर दिखती है कि वॉशिंगटन बेल्टवे में कोई भी, जो रूस से घृणा करने वाला है, वह ट्रम्प के ख़िलाफ़ बिग ऑइल को उबारने को लेकर पुतिन के साथ एक के बाद एक होने वाली वार्ता का विरोध करने की हिम्मत भी कर पायेगा।

अमेरिकी अभिजात वर्ग के बीच इस बात को लेकर एक व्यापक सहमति है कि पुतिन के पास उस तेल संकट से उबारने की कुंजी है,जो पहले से ही गहरी मंदी की तरफ़ बढ़ रहा है,जिससे कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकता है।

दरअसल, 10 अप्रैल से ट्रंप और पुतिन के बीच एक-दूसरे से तीन बार बात हुई थी। ट्रम्प जानते हैं कि वह इतिहास के सही मोड़ पर हैं और वे अपने वार्ताकारों पर अपनी बात रखने को लेकर भरोसा कर सकते हैं। रविवार को ट्रम्प ने जो ट्वीट (ऊपर उद्धृत) किया है,उसस उनका विश्वास टपकता है। वह रूस के साथ अपने रिश्ते सुधारने की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे हैं।

दूसरी ओर, अमेरिकी चुनाव चक्र पर नज़र रखने वाले पुतिन की दिलचस्पी रूसी-अमेरिकी रिश्तों को लेकर ट्रम्प के साथ जल्द से जल्द एक बड़ी तस्वीर खींचने वाले समझौते करना चाहते हैं, क्योंकि नवंबर के चुनाव में बिडेन की संभावित जीत का मतलब होगा कि अमेरिका,रूस पर पहले से कहीं ज़्यादा न भारी पड़ जाये।

पुतिन ने इसके लिए सितंबर की समयसीमा तय की है। पुतिन ने इस विचार का प्रस्ताव दिया है और ट्रम्प ने इस विचार का स्वागत किया है कि कोरोनोवायरस महामारी के मद्देनजर वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए सितंबर में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की एक शिखर बैठक "दुनिया में किसी भी जगह" आयोजित की जाय।

दिलचस्प बात यह है कि 10 अप्रैल को जब ओपेक पल्स डील को अंतिम रूप दिया जा रहा था, उसी दरम्यान पुतिन रूसी-अमेरिकी रिश्तों में गर्माहट लाने के लिए अंतरिक्ष यात्रियों (जो शुक्रवार को आने वाले रूसी टीम से अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का भर ले लेगा) के तीन सदस्यीय अमेरिकी चालक दल के साथ एक सत्र का इस्तेमाल कर रहे थे ।

पुतिन ने कहा कि अंतरिक्ष में सहयोग "संपूर्ण मानवता के लाभ के लिए हमारे देशों के बीच प्रभावी साझेदारी का एक ज्वलंत उदाहरण है।"

उन्होंने आगे कहा,“ अब हम मौजूदा समस्याओं पर काम करने की भी कोशिश कर रहे हैं। इस बारे में मेरा बोलना ठीक नहीं लगता,लेकिन मुझे यह करना है। मेरा मतलब महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ वैश्विक बाज़ारों के हालात से है। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति और मैंने कल ही इन मुद्दों पर चर्चा की थी, और हम उस विषय पर आगे और बात करेंगे। इसलिए, सौभाग्य से, सहयोग विकसित हो रहा है, और ऐसा न सिर्फ़ अंतरिक्ष में, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी हो रहा है।”

सबसे अहम बात है कि क्रेमलिन ने 12 अप्रैल को दो नेताओं के बीच की बातचीत के बाद 12 अप्रैल को कहा था कि “रणनीतिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाले मौजूदा मुद्दों पर भी चर्चा की गयी।” इस चर्चा का एजेंडा नाटकीय रूप से व्यापक और गहरा हुआ है।

इस बीच, चीन भी सितंबर में होने वाले शिखर सम्मेलन के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा है। होने वाले उस शिखर सम्मेलन में प्रस्ताव लाने से पहले,मास्को ने बीजिंग से सलाह-मशविरा किया। (पुतिन ने इस बात को स्वीकार किया कि मॉस्को ने हमारे कई सहयोगियों को शिखर सम्मेलन का प्रस्ताव दिया था और जहां तक मैं समझता हूं, सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी गयी।”) बीजिंग वैश्विक चुनौतियों को हल करने के लिए आयोजित होने वाले इस शिखर सम्मेलन को लेकर पुतिन के प्रस्ताव के समर्थन (चौबीस घंटे के भीतर) में तैयार है।

इसलिए, सभी को मिलजुलकर इस मसले की बारीक़ी को नज़र अंदाज़ नहीं करना चाहिए। यह ओपेक प्लस डील महज तेल को  लेकर ही नहीं है,बल्कि यह इससे कहीं ज़्यादा बहुत कुछ है। इसने अमेरिका, रूस और चीन को शामिल करते हुए महा-शक्ति सहयोग के एक सिलसिले को शुरू कर दिया है, जिसकी भूमिका महामारी के बाद की विश्व राजनीति में दूरगामी होने वाली है।

इस तरह से इन शक्तियों का आपस में मिल जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक महामारी और वैश्विक तेल संकट एक दूसरे से कैसे गहरे रूप से जुड़े हुए हैं, और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश भी इससे जुड़ी हुई है। जैसा कि अमेरिकी ऊर्जा सचिव डैन ब्रोइलेट कहते हैं कि वैश्विक तेल संकट, COVID-19 का एक विध्वंसकारी असर है और यह "किसी एक राष्ट्र के हित को आगे बढ़ाता है और ऐसे में हम सभी की तरफ़ से एक तेज़ और निर्णायक प्रतिक्रिया की ज़रूरत है।"

इस समय दुनिया एक पैमाने पर मानवीय त्रासदी के बीच पैदा हुई एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीयता की भावना का गवाह बन रही है, जिस भावना को शायद एक सदी से ज़्यादा से नहीं देखी गयी है। इस महामारी ने इस समय 1.6 मिलियन लोगों को संक्रमित किया है और लगभग 100,000 लोग इससे मारे गये हैं, और धरती के क़रीब-क़रीब हर कोने में यह महामारी पहुंच चुकी है।

अंग्रेज़ी में लिखे मूल आलेख को आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

Why the OPEC+ Deal is a Many-Splendoured Thing

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