NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
कोविड-19
शिक्षा
भारत
राजनीति
दलितों को शिक्षा से वंचित करता ऑनलाइन एजुकेशन सिस्टम
“ऑनलाइन एजुकेशन सिस्टम कुछ इस तरह की भूमिका निभा रहा है जैसे प्राचीन काल में वेदों और मनुस्मृति के ज्ञाताओं ने शूद्रों को पढ़ाई-लिखाई से दूर रखने में भूमिका निभाई थी।”
राज वाल्मीकि
21 Sep 2020
दलितों को शिक्षा से वंचित करता ऑनलाइन एजुकेशन सिस्टम
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : Business Standard

कोरोना काल में स्कूल बंद होने के कारण बच्चों की पढ़ाई का नुकसान न हो इसके लिए ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की गईं। पर इसके लिए पूरी तैयारियां नहीं की गईं। मेरे एक नौकरीपेशा मित्र के चार बच्चे हैं और चारों स्कूल में अलग-अलग कक्षाओं में पढ़ते हैं। उनके पास दो स्मार्ट फोन हैं एक का इस्तेमाल वे खुद करते हैं इसलिए नौकरी पर जाते समय ले जाते हैं। एक घर पर रहता है। उससे किसी एक बच्चे की ही पढ़ाई हो पाती है। कक्षा अलग-अलग होने से सबको स्मार्ट फोन चाहिए। मित्र परेशान हैं कि मैं तीन-तीन स्मार्ट फोन कहाँ से अरेंज करूं। न करें तो बच्चे पढाई से वंचित रहेंगे। दिल्ली जैसे महानगर में रहने वाले अभिभावक परेशान हैं तो ग्रामीण अंचल के अभिभावकों की स्थिति की कल्पना की जा सकती है।

इस समय सफाई समुदाय के काफी बुरे हालात हैं। स्कूल बंद होने की वजह से सफाई कर्मचारियों के बच्चे मिड-डे-मील से भी वंचित हैं। इस कारण इनमें कुपोषण की समस्या भी देखने को मिलती है। सफाई समुदाय में तो शिक्षा का स्तर पहले से ही बहुत कम है। इस डिजिटल शिक्षा व्यवस्था ने और बंटाधार कर दिया है। उनमें इस समुदाय की बच्चियां पूरी तरह से शिक्षा से वंचित हैं। ऐसे में “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” पूरी तरह विफल साबित होता है।

इस सम्बन्ध में हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायलय ने निजी स्कूलों के साथ-साथ केन्द्रीय विद्यालयों को ऑनलाइन कक्षा में शामिल होने के लिए अपने कम आय वर्ग (ईडब्ल्यूएस) व वंचित समूह के छात्रों को गैजेट्स (लैपटॉप/स्मार्ट मोबाइल फोन) और हाई स्पीड इन्टरनेट पैकेज देने का आदेश दिया है। न्यायलय ने हजारों छात्रों के हित में फैसला देते हुए कहा है कि “ऐसा नहीं करना न सिर्फ भेदभाव होगा बल्कि यह डिजिटल रंगभेद होगा।”

जस्टिस मनमोहन और संजीव नरूला की पीठ ने कहा कि ईडब्ल्यूएस और वंचित समूह के छात्रों को ऑनलाइन कक्षा के लिए जरूरी उपकरण मुहैया नहीं करना, निजी स्कूल द्वारा छात्रों के सामने आर्थिक बैरियर खड़ा करने और महामारी के दौरान शिक्षा को पूरा करने से रोकने के समान है। उन्होंने कहा कि शिक्षा देने में वर्गीकृत करना संविधान के अनुच्छेद 14 और खासकर शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनयम 2009 के तहत कानूनों के समान संरक्षण से इंकार है।

हालाँकि आदेश गरीबों और वंचितों के पक्ष में है पर इसका कार्यान्वयन इतना आसान नहीं है। इस सम्बन्ध में दिल्ली सरकार के अधिवक्ता संतोष त्रिपाठी ने कहा है कि न्यायालय ने यह नहीं बताया कि गैजेट्स के लिए पैसे कहाँ से आएँगे। उन्होंने कहा कि वे इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करेंगे। इस तरह कानूनी दांव-पेच चलते रहेंगे। और गरीब तथा दलितों के बच्चे शिक्षा का लाभ लेने से वंचित रह जायेंगे।

इस बारे में मैंने कई गरीब और दलित माता-पिता से बात की। पता चला अनेक बच्चे ऑनलाइन कक्षा नहीं ले पा रहे हैं।

झुग्गी बस्ती में रहने वाली सावित्री कहती हैं कि मास्टरजी कहते हैं बच्चों को ऑनलाइन पढाई करने को कहो। पर हमारे बच्चे ऑनलाइन क्लास नहीं ले पा रहे हैं क्योंकि हमारे पास टच्च वाला मोबाइल नहीं है। उनके पापा दिहाड़ी-मजदूरी करते हैं। अब इतना मंहगा फोन कैसे खरीदें। पड़ोस की सीमा कहती हैं कि उनके पास स्मार्ट फोन एक है और पढ़ने वाले बच्चे तीन वो भी अगल-अलग कक्षाओं में पढ़ते हैं। ऐसे में सबकी पढ़ाई कैसे हो पाएगी। अलग-अलग फोन खरीदने को पैसे नहीं हैं।

सीवर वर्कर्स पर काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रेनू छाछर कहती हैं कि हालाँकि स्कूल जितनी अच्छी पढाई तो ऑनलाइन नहीं हो सकती। पर कोरोना काल में इसके अलावा और विकल्प भी क्या है। वह खुद ही बताती हैं कि जातिगत काम की वजह से समुदाय मुश्किलों में घिरा रहता है। वे जाति और गरीबी के साथ-साथ शराब की लत को भी दोषी ठहराती हैं। उनका कहना है कि झुग्गी बस्ती एरिया में तो लगभग 50 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई उनके माता-पिता के पास स्मार्ट फोन नहीं होने के कारण नहीं हो पाती। उनको पढाई से वंचित रहना पड़ता है। कहीं–कहीं नेटवर्क की समस्या भी आती है।

प्राइवेट नौकरी करने वाले अशोक सागर कहते हैं कि ऑनलाइन एजुकेशन सिस्टम कुछ इस तरह की भूमिका निभा रहा है जैसे प्राचीन काल में वेदों और मनुस्मृति के ज्ञाताओं ने शूद्रों को पढ़ाई-लिखाई से दूर रखने में भूमिका निभाई थी। उनका कहना है कि इसी तरह आधुनिक युग में ऑनलाइन पढाई के माध्यम से गरीबों-वंचितों को दूर रखने का षड्यंत्र है। 

कोरोना काल के इस दौर में जब लोगों के काम-धंधे खत्म हो रहे हैं। नौकरियां छूट रही हैं। बेरोजगारी बढ़ रही है। लोगों को अपने आजीविका अपना घर चलाना मुशकिल हो रहा है। ऐसे में स्मार्ट फोन कहाँ से खरीदें। इन्टरनेट कैसे अरेंज करें।

सरकार भले ही डिजिटल इंडिया का दम भरे पर वास्तविकता कुछ और ही है। भारत की जो तस्वीर सरकार समर्थित मीडिया दिखाता है उसमें और वास्तिक भारत में बहुत अंतर होता है।

शिक्षा हर भारतीय बच्चे का मौलिक अधिकार है। पर दुखद है कि देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चे बड़ी संख्या में ऑनलाइन शिक्षा से महरूम हो रहे हैं। शिक्षा का अधिकार कानून 2009 को बने हुए भी 10 साल हो गए। पर अभी तक सब बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का उनका हक प्राप्त नहीं हुआ। एक देश एक राशन कार्ड की तर्ज पर क्या सरकार एक देश एक शिक्षा लागू कर पायेगी। वर्षों से यह सपना सपना ही है कि – गरीब की हो या अमीर की संतान  हो सब को शिक्षा एक समान।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को जहाँ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भविष्य के लिए बेहतर बताते हैं वहीं जिस तरह से डिजिटल शिक्षा पर जोर दिया गया है वह दलित व वंचित समुदाय के लिए खतरनाक है। हाल ही में उन्होंने 21वीं सदी में स्कूली शिक्षा विषय पर बोलते हुए कहा था – नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति नए भारत को नई दिशा देगी। पर बिना बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर के क्या ये संभव हो पायेगा।

अभी ऑनलाइन शिक्षा के लिए बच्चों के पास जरूरी गैजेट तक नहीं हैं। ऑनलाइन शिक्षा के लिए स्मार्ट फोन और इन्टरनेट बुनियादी जरूरतें हैं। इन्हें उपलब्ध कराने के लिए क्या प्रधानमंत्री और शिक्षामंत्री प्राथमिकता देंगे जिससे कि देश भर के बच्चे,  चाहे शहरी हों या ग्रामीण, अपने पढ़ाई सुचारू रूप से कर सकें?

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Online Education
Online education system
Dalits
Dalit Education
Coronavirus
COVID-19
Corona Period
Delhi High court
EWS
Right to education

Related Stories

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

बागपत: भड़ल गांव में दलितों की चमड़ा इकाइयों पर चला बुलडोज़र, मुआवज़ा और कार्रवाई की मांग

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे

गुजरात: मेहसाणा कोर्ट ने विधायक जिग्नेश मेवानी और 11 अन्य लोगों को 2017 में ग़ैर-क़ानूनी सभा करने का दोषी ठहराया

मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों में सैलून वाले आज भी नहीं काटते दलितों के बाल!


बाकी खबरें

  • प्रियंका शंकर
    रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच, नॉर्वे में नाटो का सैन्य अभ्यास कितना महत्वपूर्ण?
    19 Mar 2022
    हालांकि यूक्रेन में युद्ध जारी है, और नाटो ने नॉर्वे में बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो अभ्यास ठंडे इलाके में नाटो सैनिकों के युद्ध कौशल और नॉर्वे के सैन्य सुदृढीकरण के प्रबंधन की जांच करने के…
  • हर्षवर्धन
    क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
    19 Mar 2022
    अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’
    19 Mar 2022
    तारा को महंगाई परेशान कर रही है तो बेरोजगारी का दर्द भी सता रहा है। वह कहती हैं, "सिर्फ मुफ्त में मिलने वाले सरकारी नमक का हक अदा करने के लिए हमने भाजपा को वोट दिया है। सरकार हमें मुफ्त में चावल-दाल…
  • इंदिरा जयसिंह
    नारीवादी वकालत: स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा पहलू
    19 Mar 2022
    हो सकता है कि भारत में वकालत का पेशा एक ऐसी पितृसत्तात्मक संस्कृति में डूबा हुआ हो, जिसमें महिलाओं को बाहर रखा जाता है, लेकिन संवैधानिक अदालतें एक ऐसी जगह होने की गुंज़ाइश बनाती हैं, जहां क़ानून को…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्यप्रदेश विधानसभा निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित, उठे सवाल!
    19 Mar 2022
    मध्यप्रदेश विधानसभा में बजट सत्र निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित कर दिया गया। माकपा ने इसके लिए शिवराज सरकार के साथ ही नेता प्रतिपक्ष को भी जिम्मेदार ठहराया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License