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राजनीति
पाकिस्तान
पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता के पीछे क्या कारण हैं?
पाकिस्तान के गठन के 75 साल के बाद भी आख़िरकार पाकिस्तान में कोई भी सरकार क्यों नहीं पूरा कर पाती है अपना कार्यकाल?
शारिब अहमद खान
04 Apr 2022
imran khan

पाकिस्तान की राजनीति में जिस बात की आशंका व्यक्त की जा रही थी आख़िरकार वही हुआ। इमरान खान अपनी राजनीतिक पारी की पांच साला इनिंग पूरी करने में नाकामयाब साबित हुए और उन्हें अपनी सरकार गँवानी पड़ी। आपको बता दें कि विपक्ष ने पिछले महीने इमरान सरकार के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। जिसकी रविवार यानी कि 3 अप्रैल को वोटिंग होनी थी जिसमें विपक्ष के पास बहुमत साफ़ नज़र आ रहा था, लेकिन वोट होने से पहले ही संसद को भंग कर दिया गया।

पाकिस्तानी नेशनल असेंबली के डिप्टी स्पीकर कासिम खान सूरी ने विदेशी साजिश का आरोप लगाकर विपक्ष द्वारा प्रस्तावित अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर दिया। विपक्ष ने डिप्टी स्पीकर के इस फैसले को संविधान का उल्लंघन बता कर सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है।

अविश्वास प्रस्ताव ख़ारिज होने के बाद प्रधानमंत्री इमरान खान ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति आरिफ अल्वी से संसद भंग करने की गुज़ारिश की जिसे हाथों-हाथ राष्ट्रपति द्वारा मंजूर कर लिया गया। इमरान खान ने जनता को सम्बोधित करते हुए बताया कि आने वाले 90 दिनों के अंदर देश में दुबारा वोट डाले जायेंगे। इसी तरह इमरान खान भी अपना कार्यकाल पूरा करने में नाकामयाब रहे।

इसी तरह पाकिस्तान में एक बार फिर से राजनीतिक अस्थिरता के साथ-साथ संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया है। हालाँकि गौरतलब हो की पिछले महीने से ही पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता चरम पर थी। इस राजनीतिक अस्थिरता की वजह विपक्ष का एकजुट होकर इमरान खान सरकार के खिलाफ लामबंद होना था। साथ ही राजनीतिक विश्लेषक इस अस्थिरता की वजह इमरान खान की विदेश नीति और आर्थिक नीति का फेल होना भी बता रहे थे।

पाकिस्तान गणराज्य के रूप में 1947 में स्थापित हुआ था लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि स्थापना होने के इतने सालों बाद भी एक भी सिविलियन सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है। कार्यकाल पूर्ण न कर पाने और राजनीतिक अस्थिरता के कई सारे कारण बताये जाते हैं जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण कारण मिलिट्री का हस्तक्षेप और जनता का सरकारी संस्थानों पर विश्वास न होना है। इसके अलावा वर्तमान समय में वहां पैदा हो रही राजनीतिक अस्थिरता की कई सारी वजहें हैं जैसे- बेरोजगारी, मुद्रास्फीति, और घटते विदेशी मुद्रा भंडार। हालांकि गौरतलब हो कि इस सरकार के प्रति तमाम राजनीतिक पंडित आश्वस्त थे कि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी, लेकिन अंततः इन पंडितों की बात सही नहीं हो पाई।

आखिरकार पाकिस्तान में क्यों समय-समय पर उत्पन्न होती रहती है राजनीतिक अस्थिरता?

पाकिस्तान का गठन हुए 75 साल हो चुके हैं और इन 75 सालों में केवल 37 वर्ष ही सिविलियन सरकार रही है जिसने 22 प्रधानमंत्री देखे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि इन 22 प्रधानमंत्रियों में से कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नही कर पाया है। पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद से 32 वर्ष तो सेना ने सीधे तौर पर पर शासन किया है और तक़रीबन 8 वर्षों तक यहाँ की अवाम ने राष्ट्रपति शासन देखा है।

अब तक केवल तीन ही ऐसे प्रधानमंत्री हुए हैं जो कि चार साल से ज़्यादा वक़्त तक प्रधानमंत्री पद पर रह पाए हैं। नवाज़ शरीफ जो तीन बार प्रधानमंत्री बने, वो 9 सालों तक सत्ता में रहे थे जो कि सर्वाधिक है। नवाज़ शरीफ के अलावा लियाक़त अली खान और युसूफ रज़ा गिलानी ही एक बार में चार वर्षों से अधिक प्रधानमंत्री पद पर रहे हैं।

अस्थिरता के कारणों की बात करें तो पहला कारण वहां की मिलिट्री, उसमें भी मुख्यतः सेना का हस्तक्षेप, सिविलियन सरकार में माना जाता है। तीन बार तो वहां सेना ने सीधे तौर पर हस्तक्षेप कर सैन्य शासन लगा दिया था और अप्रत्यक्ष रूप से देखा जाये तो सेना का हस्तक्षेप तो हर एक सरकार के अंदर रहता आया है। वर्तमान सरकार भी “हाइब्रिड सरकार”थी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान सरकार, जिसमें प्रधानमंत्री तो इमरान खान थे लेकिन उन्हें चला सेना ही रही थी, हालांकि सेना ने खुले मंच से इसका कई बार खंडन किया है।

दूसरा कारण पाकिस्तान में विविधता होने की वजह से किसी भी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल पाना बहुत मुश्किल होता है। जिस कारण यहां सरकार हमेशा गठबंधन में ही बनती है, लेकिन सत्ता के लालच के कारण सरकार का कार्यकाल पूर्ण होने से पहले ही राजनीतिक पार्टियों के बीच आपस मे कलह हो जाती है और इसी कारण सत्ता पांच साल तक चल नही पाती है।

तीसरा कारण जनता का सरकारी संस्थानों से मोह भंग होना है। दरअसल पाकिस्तान की स्थापना के कई वर्षों बाद तक वहां कोई स्थाई सरकार नहीं बन पाई थी। 1956 में एक आम सहमति बनाई गई और पाकिस्तान के पहले संविधान की घोषणा की गई और उसके दो सालों के अंदर ही सेना प्रमुख जनरल अयूब खान ने सैन्य तख्ता पलट कर दिया। पाकिस्तान में आज तक कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है जिस कारण भी वहां के नागरिक वहां की संस्थानों में विश्वास नहीं कर पाते हैं।

राजनीतिक जानकार, चौथा कारण पाकिस्तान की अस्थिरता का उनका आइडेंटिटी क्राइसिस बताते हैं। दरअसल गाहे-बगाहे पाकिस्तान की गली-मुहल्लों में आपको उनके पड़ोसी मुल्क यानी कि हिंदुस्तान से खतरे जैसी बातें सुनने को मिल जाएँगी। पाकिस्तानी राजनेताओँ को लगता है कि इंडिया हम पर कभी भी हमला कर हमें पृथ्वी के नक़्शे से मिटा देगा। इसी आइडेंटिटी क्राइसिस के कारण वहां की सेना का सिविलियन सरकार के ऊपर हमेशा से दबदबा रहता है और जिस कारण भी वहां कई बार अस्थिरता उत्पन्न हो जाती है।

वर्तमान हालात को देखा जाए तो पांचवा कारण हालिया समय में पैदा हुआ आर्थिक संकट है। पाकिस्तानी नागरिकों और विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि इमरान खान सरकार की नीतियों के कारण ही पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति इस हद तक चरमराई है। दरअसल पाकिस्तान में महंगाई पिछले कुछ समय से रिकार्ड स्तर पर है और जब विपक्ष ने इमरान खान सरकार पर आरोप लगाया तो उन्होंने इस मसले पर गंभीरता दिखाने के बजाये पलटवार करते हुए कहा कि “मैं आलू और टमाटर के दाम जानने राजनीति में नहीं आया।’’

आखिरकार इमरान खान सरकार को क्यों करना पड़ा अस्थिरता का सामना?

पहली वजह जिस कारण इमरान खान की सरकार को अस्थिरता का सामना करना पड़ा है वह है उनका आर्थिक मोर्चे पर विफल होना। वर्तमान में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय स्थिति से गुज़र रही है। पाकिस्तान में मुद्रास्फीति दक्षिण एशिया के किसी भी देश की तुलना में सबसे अधिक है, और आवश्यक वस्तुओं की कीमत अभूतपूर्व ऊंचाई तक पहुँचने के कारण नागरिक अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन पर शिवम् शेखावत लिखते हैं कि  ‘कई दशकों के बाद उनके कार्यकाल में देश की आय में भारी गिरावट देखी गई। अर्थव्यवस्था में मंदी के साथ, देश में पहली बार साल 2019 में विकास की नकारात्मक दर दर्ज की गई’।

वहीँ बीबीसी को साक्षात्कार देते हुए वाशिंगटन स्थित अटलांटिक कॉउन्सिल थिंक टैंक के पाकिस्तान इनिशिएटिव के निदेशक उज़ैर यूनुस कहते हैं कि ‘पाकिस्तान की खाद्य मुद्रास्फीति दर महीने दर महीने बढ़ती जा रही है। पिछले महीने यानी कि मार्च 2022 में यह दर तक़रीबन 23 फीसदी रही जो की इंडिया के मुकाबले 15 फीसदी से भी अधिक थी’।

दूसरी वजह इमरान खान की विदेश नीति रही है। विपक्ष ने इमरान खान सरकार की विदेश नीति की चहुंओर आलोचना की है। चीन और रुस के साथ पाकिस्तान की नीति और दूसरी ओर अमेरिका को लेकर इमरान खान के रवैये पर भी विपक्षी पार्टियों ने सवाल उठाये हैं।

तीसरी वजह इमरान खान सरकार की विदेशी आर्थिक नीति रही है जिस कारण विपक्षी पार्टियों ने उन्हें कठघरे में खड़ा किया है। इमरान खान ने सरकार में आने से पहले चुनावी भाषणों में यह वायदा किया था कि सत्ता में आने के बाद वह देश को कर्जमुक्त कराएँगे। सरकार में आने के बाद पाकिस्तान को कर्ज मुक्ति से तो दूर, उन्होंने देश को और कर्ज की ओर धकेल दिया।

स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान के अनुसार जुलाई 2021 से जनवरी 2022 के बीच पाकिस्तान का पब्लिक डेब्ट 9.5 फीसदी बढ़ा है। आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान अब तक के सर्वाधिक कर्ज में चला गया है। अभी पाकिस्तान के ऊपर 51.724 ट्रिलियन पाकिस्तानी रूपये का कर्ज है, जो कि अब तक का सर्वाधिक है।

चौथी वजह जनरल बाजवा और इमरान खान के रिश्तो में उत्पन्न खटास है। दरअसल इमरान खान सेना के चहेते थे और राजनीतिक समीक्षकों के अनुसार सेना की सहायता से ही उन्होंने अपनी सरकार बनाई थी। पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के नए महानिदेशक के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अहमद अंजुम की नियुक्ति को लेकर इन दोनों के बीच जो मतभेद शुरू हुए उसे सार्वजनिक रूप से देखा गया था। वहीँ दूसरी ओर जनरल बाजवा का कार्यकाल नवंबर 2022 में समाप्त हो रहा है जिसे बढ़ाने की बात जनरल बाजवा ने की थी लेकिन उसे भी इमरान खान ने नज़रअंदाज़ कर दिया था। 

शनिवार यानी कि 02 अप्रैल को पत्रकार सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने जिस तरह से इमरान सरकार को घेरा, खासकर उनकी विदेश नीति को लेकर उससे एक बार फिर से उनके और सेना के बीच के मतभेद को साफ़ तौर पर देखा जा सकता है।

इस अस्थिरता का इंडिया पर क्या पड़ेगा असर?

इमरान खान सरकार में आने के बाद भारत के साथ रिश्ते को लेकर वह आशावादी नजर आ रहे थे। लेकिन परिस्थितिवश कहिए या सेना का हस्तक्षेप कहिए वह इंडिया के साथ रिश्ते सुधारने में नाकामयाब साबित हुए। पुलवामा अटैक के बाद तो इंडिया और पाकिस्तान के रिश्ते और भी निचले स्तर पर चले गए। वर्तमान समय में देखा जाए तो इमरान खान सरकार के साथ “बैक चैनल” वार्ता के अलावा सीधे तौर पर दोनों देशों के राजनेताओं में आपस में किसी भी तरह से कोई बात नहीं हो पा रही है। लेकिन गौरतलब हो कि अगर किसी भी देश में अस्थिरता उत्पन्न होती है तो उसका असर इस वैश्विक दुनिया में तो हर जगह देखा जाता है, खासकर पड़ोसी मुल्क पर। 

पाकिस्तान में उत्पन्न हुई राजनीतिक अस्थिरता या सैन्य सरकार आने के बाद राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि वहां आपस में क्लेश बढ़ेगा और साथ ही सेना इंडिया के खिलाफ आक्रामक रुख ही रखेगी जिस कारण इंडिया-पाकिस्तान सीमा पर अस्थिरता बढ़ेगी। और वहीँ आतंकवादी संगठन इंडिया के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की भी सोचने लगेंगे।

निष्पक्ष और समय पर चुनाव ही पाकिस्तान में पैदा हुई अस्थिरता का हल

यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले 90 दिनों के अंदर पाकिस्तान चुनाव सफल करवाने में सफल हो पाता है या नहीं। वहां जब तक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं हो पाता है तब तक स्थिरता सुनिश्चित करवा पाना बेहद मुश्किल लक्ष्य है। स्थिरता हासिल करने का यही एकमात्र संभावित तरीका है। अगर समय पर चुनाव नहीं हो पाते हैं और अराजकता जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो आपसी हिंसा होने का खतरा बढ़ सकता है।

हालाँकि पाकिस्तान की वर्तमान आर्थिक स्थिति को देखकर कोई भी व्यक्ति यह कयास लगा सकता है कि पाकिस्तान के लिए अभी चुनाव में जाने का निश्चित ही स्वाभाविक समय नहीं है। आर्थिक स्थिति दिन-प्रतिदिन चरमराती जा रही है और ऐसे में चुनाव का बोझ झेल पाना पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए निश्चित ही परेशानी भरा होगा।

अगर पाकिस्तान सही समय पर चुनाव सम्पन्न करा पाता है और देश में अराजकता नहीं फैलती है, तब सवाल यह उत्पन्न होता है की क्या नई सरकार बनने से पाकिस्तान की स्थिति में कोई आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलेगा?

ये भी पढ़ें: पाकिस्तान: इमरान की कुर्सी बचाने की अंतिम कवायद, अमेरिका के प्रति अपनाया हमलावर रुख

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