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कोविड-19
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पढ़ाई कर रहे डॉक्टरों की निजी ज़िंदगी: कोविड से किस तरह प्रभावित हुए हैं जूनियर डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य
पर्यटक स्थलों पर भीड़ लगाने वाले और कोविड मानदंडों का उल्लंघन करने वाले नागरिकों को इस बात को ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि दूसरी लहर ने किस तरह क़हर बरपाया था, जिससे मौत, तबाही और बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य की समस्यायें पैदा हुईं।
कृतिका नौटियाल
13 Jul 2021
पढ़ाई कर रहे डॉक्टरों की निजी ज़िंदगी: कोविड से किस तरह प्रभावित हुए हैं जूनियर डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य
फ़ोटो साभार: रेज़िडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन, एम्स ट्विटर

"जहां चिकित्सा कला के प्रति स्नेह की भावना होती है, वहीं मानवता के प्रति प्यार होता है।" - हिप्पोक्रेटिस

डॉक्टर और स्वास्थ्य कार्यकर्ता कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई में बहादुर योद्धाओं के रूप में सामने आये हैं, और उन्होंने इस महामारी के प्रकोप का भी सामना किया है, इनमें से कई लोगों ने अपनी जान तक गंवायी है और शारीरिक और मानसिक,दोनों ही तौर पर लम्बे समय तक चलने वाली जटिलताओं से जूझ रहे  हैं।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के मुताबिक़, महामारी की दूसरी लहर के दौरान कोविड वार्ड में काम कर रहे 798 डॉक्टरों ने अपनी जान गंवा दी। इनमें से सिर्फ़ दिल्ली में ही 128 मौतें दर्ज की गयीं। हालांकि, मामलों की संख्या में कमी आयी है, लेकिन लॉकडाउन हटने के बाद बतौर पर्यटक और आम लोगों के व्यवहार में बरती जा रही लापरवाही सामने आ रही है,ऐसे में सिर उठा रही तीसरी लहर के मामले और भी ख़राब हो सकते हैं।

डॉक्टर बार-बार लोगों से घर के अंदर रहने और सोशल डिस्टेंसिंग प्रोटोकॉल का पालन करने का आग्रह कर रहे हैं, लेकिन भारतीय नागरिक अपने व्यवहार में लापरवाही बरत रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म कई पहाड़ी इलाक़ों, ख़ासकर हिमाचल प्रदेश के मनाली में पर्यटकों की भीड़ के विज़ुअल और मीम से अटे-पड़े हैं। डॉ देवेंद्र ट्विटर पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं, " मनाली तीसरी लहर के लिहाज़ से भारत का वुहान हो सकता है।"

इस तरह के लापरवाह नागरिकों को उस बात का एहसास तक नहीं होता,जिसे लेकर मीडिया में भी ज़्यादा चर्चा नहीं होती, और वह बात है- महामारी के दौरान पेशेवर, शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार लोगों की बड़ी संख्या।इसके शिकार वे डॉक्टर, विशेष रूप से जूनियर डॉक्टर हुए है, जो लगभग रात-दिन काम करते रहे।

दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के कई जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें अपनी पढ़ाई के नुकसान का सामना तो करना ही पड़ा है, वे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से भी जूझ रहे हैं। सभी जूनियर डॉक्टर डेढ़ साल से लगातार काम कर रहे हैं। दिल्ली स्थित एम्स के कुछ जूनियर रेज़िडेंट का कहना है कि उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर भी अपनी समस्याओं को सामने रखा था, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया ने उनकी अनदेखी की।

डॉ. टंडन ने ट्विटर पर नागरिकों से आग्रह करते हुए लिखा, “मैं सचुमच फिर से पीपीई (व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण) नहीं पहनना चाहता, अपनी ज़िंदगी के लिए जूझ रहे सैकड़ों रोगियों की देखभाल करते हुए मानसिक थकावट से नहीं गुज़रना चाहता। ऐसा संभाव हो,इसके लिए प्लीज़ आपको जो कुछ करना है,वह बहुत ही आसान है। आप बस इतना कीजिये कि मास्क पहन लीजिए, वैक्सीन ले लीजिए और दूरी बनकार खड़े होइये। इसे हल्के में मत लीजिए।"

कई स्वास्थ्य कर्मियों का कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती पीपीई किट में छह या सात घंटे काम करना है। दिल्ली स्थित एम्स में जूनियर रेजिडेंट, डॉ उमर अफ़रोज़ का कहना है, "यह बहुत मुश्किल और थकाऊ है।"

ऐसे भी कई उदाहरण सामने आये हैं, जब लोगों को बचाने का अथक प्रयास करने के बावजूद फ़्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को डराया-धमकाया गया या पीटा गया, या उन पर पथराव किया गया। कई मकान मालिकों ने कोविड-19 के डर से डॉक्टरों और नर्सों को घर से बाहर तक कर दिया है।

अतिरिक्त घंटे काम करते हुए जूनियर डॉक्टर न सिर्फ़ मानसिक और शारीरिक रूप से थके हुए हैं, बल्कि दोस्तों और परिवार से दूर होने के कारण उन्हें ऐसे मुश्किल हालात में भावनात्मक सहयोग की भी ज़रूर है।

ज़्यादा काम करने वाले डॉक्टर

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सिफ़ारिश के मुताबिक़ डॉक्टर-रोगी अनुपात 1:1000 होना चाहिए,लेकिन भारत में यह अनुपात 1:1456 है।

डॉ सुरवंकर दत्ता

दिल्ली स्थित एम्स में जूनियर रेजिडेंट, डॉ. सुरवंकर दत्ता कहते हैं, “हम डब्ल्यूएचओ के इस अपेक्षित आंकड़े के आस-पास भी नहीं हैं। भारत में हमें और डॉक्टरों की ज़रूरत है। जूनियर डॉक्टर 24 घंटे काम कर रहे हैं और उनमें से कई तो 36 घंटे तक भी काम कर रहे हैं, वे सिर्फ़ खाने के लिए ही ब्रेक ले पाते हैं। ”

एक अन्य डॉक्टर ने बताया कि वह तक़रीबन आठ घंटे पीपीई किट में ही बिताते हैं, जिसका नतीजा यह होता है कि उन्हें बेहद पसीना आता है और शरीर में पानी की ज़बरदस्त कमी हो जाती है। वह बताते हैं, "हम दिन के ख़त्म होते-होते इतना थक जाते हैं कि हम कुछ और करने के बजाय आराम करना पसंद करते हैं। इसलिए,कोविड  ड्यूटी के साथ ही खाना, सोना, और ऐसा ही करते रहना हमारा जीवन चक्र बन गया है।”

डॉ कालीचरण दास

एम्स में जूनियर रेज़िडेंट, डॉ. कालीचरण दास कहते हैं, “हम अब थक चुके हैं, और चाहते हैं कि बस यह (महामारी) ख़त्म हो जाये। जब हम पहली बार कोविड आईसीयू में दाखिल हुए थे, तो हम जोश से भरे हुए थे। हमने इसे एक ऐसे बड़े अवसर के रूप में देखा था, जिसे देश अहमियत देगा और स्वीकार करेगा। लेकिन, दूसरी लहर के शुरू होने और उसमें उतार आने के साथ हम इतनी ही कामना करते हैं कि बस अब यह ख़त्म हो जाये।”

मानसिक स्वास्थ्य

महामारी के बीच सभी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी असर पड़ा है, लेकिन डॉ. दत्ता के मुताबिक़, अपने काम में जुटे डॉक्टर गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं और पढ़ाई के नुक़सान के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का भी वे सामना कर रहे हैं।  डॉ अफ़रोज़ कहते हैं, "हम अपनी लंबी शिफ़्ट के बाद सोते भर हैं, क्योंकि हमारे पास कुछ और करने की क़ुव्वत रह नहीं जाती है।"

डॉ. दत्ता क कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं के बढ़ने का एक कारण तो यह है कि रेडियोलॉजी या बायो-केम जैसे विभागों के रेज़िडेंट डॉक्टर इतनी बड़ी संख्या में लोगों को मरते देखने के आदी नहीं हैं।

वह कहते हैं, "हम इसके लिए तैयार नहीं थे, जब हम मरीज़ों को बचाने के लिए कुछ कर नहीं पाते हैं,तो इससे हमें बहुत मानसिक तनाव होता है।" दत्ता आगे कहते हैं, "पिछले महीने हमारे एक रेज़िडेंट डॉक्टर ने आत्महत्या करके अपनी जान ले ली,ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वह अपने आईसीयू में मरने वालों की संख्या को बर्दाश्त नहीं कर सका। सभी स्वास्थ्य कर्मियों पर मानसिक दबाव बहुत ज़्यादा है। हमारे सभी सहयोगियों को मानसिक स्वास्थ्य की जांच कराने और उनका सहयोग किये जाने की ज़रूरत है।"

डॉक्टर ख़ुद ही मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से पीड़ित होते हैं,इसके बावजूद उन्हें मरीज़ों और उनके रिश्तेदारों को सांत्वना और सहयोग देना होता है। एम्स में जूनियर रेज़िडेंट, डॉ. मोहिनी सिंह कहती हैं, "हममें ज़बरदस्त  इच्छाशक्ति की ज़रूरत है, क्योंकि यहां एक नहीं, सैकड़ों मरीज़ हैं।"

डॉ मोहिनी सिंह

नींद की कमी भी डॉक्टरों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। डॉ.सिंह कहती हैं, "हमें शारीरिक और मानसिक रूप से थका दिया है। हम अपने मरीज़ों के बारे में सोचकर कई बार सो नहीं पाते। रात की ड्यूटी के दौरान तो हम सुबह तीन बजे ही वापस आ पाते हैं। उस समय हम किसी से बात भी नहीं कर सकते। कभी-कभी तो मैं कुछ रोगियों के बारे में सोचते हुए ही लेट जाता हूं और उन्हें अपने माता-पिता के साथ जोड़कर देखता हूं, क्योंकि वे भी हमारे माता-पिता की ही उम्र के हैं, और फिर सोचता हूं कि अगर हमारे पिता-पिता साथ भी ऐसा कुछ होता है, तो क्या होगा,यह चिंता हमारे मानसिक तनाव को बढ़ा देती है।”

दूसरी लहर के दौरान आईसीयू बेड और ऑक्सीज़न सिलेंडर की इतनी भीषण कमी थी कि कभी-कभी तो एक बेड पर तीन-तीन मरीज़ों का इलाज चल रहा था। डॉ अंसार कहते हैं कि अस्पताल के कुछ रेज़िडेंट डॉक्टरों के लिए भी बेड उपलब्ध नहीं थे, "दूसरी लहर के दौरान स्थिति गंभीर थी और मैंने तो बस यह दुआ करते हुए अपनी सांसें थामें रखी कि मेरा परिवार संक्रमित न हो।"

दूसरी लहर के दौरान बताया जाता है कि कई डॉक्टरों ने एक-एक दिन में सैकड़ों मौतों को बेचैन नज़रों से देखा,इसके बाद उन्हें बेहद एंग्ज़ाइटी और तनाव की समस्याओं का सामना करना पड़ा। डॉ. दास ने बताया कि उन्हें तनाव और एंग्ज़ाइटी को कम करने के लिए कोविड ड्यूटी से पहले एंग्ज़ाइटी की दवा ली लेनी पड़ती थी। भले ही उनकी ड्यूटी आईसीयू में थी, लेकिन मृत्यु दर अपने चरम पर थी। नौजवान मर रहे थे और डॉक्टरों के लिए अपने  सामने एक के बाद एक होती मौत को देखना हताशा करने वाली स्थिति थी। डॉक्टर ही नहीं मरीज़ भी इस बात को लेकर बेचैन थे कि उनके शव उनके परिजनों को सौंपे जायेंगे नहीं। महामारी ने सभी के लिए एक भयानक माहौल पैदा कर दिया था।

कुछ अध्ययनों के मुताबिक़, डॉक्टरों और नर्सों में महामारी के दौरान मानसिक समस्याओं में वृद्धि होती देखी गयी है।इन समस्याओं में एंग्ज़ाइटी, नींद नहीं आने की शिकायत और डिप्रेशन जैसी समस्यायें हैं। कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में डिप्रेशन के बढ़ते मामलों के संकेत मिले हैं। दिल्ली स्थित एम्स ने स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य चिंताओं पर प्रकाश डालते हुए एक लेख प्रकाशित किया है। 

सामाजिक और निजी जीवन

कोविड-19 से सभी के निजी जीवन प्रभावित हुए हैं। स्वास्थ्यकर्मी अपने परिवार से दूर रह रहे हैं और उनके पास अपने दोस्तों और परिवार से फ़ोन पर बात करने का भी समय नहीं है। डॉ. दत्ता कहते हैं, "कभी-कभी तो हमें लगातार 24 घंटे तक काम करना पड़ता है और हम अपने फ़ोन भी चेक नहीं कर पाते। मेरी मां कोलकाता में रहती हैं और मैं उनसे हर दिन बात करने की कोशिश करता हूं, लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि हम दो-तीन दिनों तक बात ही नहीं कर पाते हैं।”

डॉ. सिंह बताती हैं कि पहले जब उन्हें ब्रेक मिलता था, तो वह परिवार और दोस्तों से मिलती थीं, जिससे मानसिक तनाव दूर हो जाता था। लेकिन, चूंकि हालात अब भी ठीक नहीं हुए हैं, ऐसे में वह ख़ुद अपने परिवार के सदस्यों में वायरस के फैलने को लेकर आशंकित रहती हैं।

पढ़ाई का नुक़सान

महामारी के चलते तक़रीबन सभी डॉक्टरों का व्यावहारिक ज्ञान प्रभावित हुआ है। डॉक्टरों को उनके स्पेशलाइज्ड वार्ड में नहीं,बल्कि कोविड ड्यूटी पर तैनात किया जा रहा है। ऐसे में उनकी स्पेशलाइज़ेशन ट्रेनिंग सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई है। मामले के घटने पर जूनियर डॉक्टरों को विभाग की ड्यूटी आवंटित की गयी थी, लेकिन दूसरी लहर के साथ ही वे वापस कोविड ड्यूटी पर लगा दिये गये हैं।

डॉ अंसार बताते हैं कि महामारी के एवज़ में पीएमओ की तरफ़ से हमारे नेशनल एक्ज़िट टेस्ट में भी देरी की गयी है, “मैं सर्जरी विभाग में हूं और मुझे अपनी सर्जरी की ट्रेनिंग नहीं मिल पा रही है। मैं नुक़सान में हूं और सचाई तो यही है कि सभी जूनियर डॉक्टर नुक़सान में हैं। मुझे अपने पीजी के बाद स्पेशलाइज़ेशन के लिए ज़्यादा वक़्त देना होगा। ”

डॉ दत्ता कहते हैं, "ऐसा नहीं कि हम संतुष्ट नहीं हैं। कोविड रोगियों के इलाज से हमें बहुत संतुष्टि मिलती है, लेकिन पिछले 1.5 वर्षों से हम सिर्फ़ कोविड रोगियों का ही इलाज कर रहे हैं। हमें इन मरीज़ों के इलाज के लिए और डॉक्टरों की ज़रूरत है।"

पढ़ाई और तमाम तरह के निजी नुक़सान के अलावे कई जूनियर डॉक्टरों ने तो अपनी जान तक गंवायी है। लोग शहीदों का सम्मान नहीं करते, ऊपर से राष्ट्रीय टेलीविज़न और मीडिया पर आकर उनपर दोष भी मढ़ दिया जाता हैं और उन्हें 'लुटेरा' कहा जाता है। डॉ.दत्ता कहते हैं, "यह सब देखना दिल दहलाने जैसा है।" डॉक्टरों को मानवता से लगाव है और इसलिए वे हमारे लिए चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं। यही समय है कि नागरिक उनके बलिदान को स्वीकार करें और कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करें और टीका लगवायें, ताकि कोरोनावायरस की तीसरी लहर को नाकाम किया जा सके।

लेखिका दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान से अंग्रेज़ी पत्रकारिता का कोर्स कर रही हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Personal Life to Academics: How COVID has Affected Mental Health of Junior Doctors

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