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बर्ड फ्लू और कोरोना के बीच जैव-विविधता के खतरे से आगाह करता है पॉलीनेटर पार्क
धरती के दक्षिणी गोलार्ध से फूलों वाले पौधों की 45 फीसदी आबादी खत्म होने की कगार पर आ पहुंची है। चिड़ियों की 14 प्रतिशत प्रजातियां धरती पर बने रहने के लिए अंतिम संघर्ष कर रही हैं। डॉल्फ़िन कहीं किताबों का हिस्सा बनकर ही न रह जाए। कोरोना के खतरे से जूझता ये समय यह भी समझाता है कि हमें प्रकृति को हर हाल में बचाना होगा। क्योंकि अंत में प्रकृति ही हमें बचाएगी।
वर्षा सिंह
07 Jan 2021
pollinator park

कोविड-19 के संकट से जूझते हुए पूरी दुनिया इस समय कोरोना वैक्सीन का इंतज़ार कर रही है। देश में पंछियों की तकरीबन 25 हज़ार आबादी बर्ड फ्लू की एक अलग किस्म के आगे कुछ ही समय में ढेर हो चुकी है। वर्ष 2020 के आखिरी महीने मे जारी की गई आईयूसीएन की रिपोर्ट कहती है कि 2020 में हमने 31 प्रजातियों को खो दिया है। एक तिहाई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है। हमारी आधुनिक दुनिया इस समय जैव-विविधता के भीषण खतरे से जूझ रही है।

हम या हमारे आसपास के लोग जैव-विविधता को हो रहे नुकसान के खतरे से कितना परीचित हैं। क्या हम जानते हैं कि हमारे बीच से कभी कोई ख़ास प्रजाति का पौधा बिना किसी फ़ुसफ़ुसाहट किए चुपचाप धरती से विदाई ले लेता है। धरती के दक्षिणी गोलार्ध से फूलों वाले पौधों की 45 फीसदी आबादी खत्म होने की कगार पर आ पहुंची है। चिड़ियों की 14 प्रतिशत प्रजातियां धरती पर बने रहने के लिए अंतिम संघर्ष कर रही हैं। डॉल्फ़िन कहीं किताबों का हिस्सा बनकर ही न रह जाए। कोरोना के खतरे से जूझता ये समय यह भी समझाता है कि हमें प्रकृति को हर हाल में बचाना होगा। क्योंकि अंत में प्रकृति ही हमें बचाएगी।

पॉलीनेटर पार्क में सहेजी गईं 40 से अधिक प्रजातियां

हमें पॉलीनेटर पार्क क्यों चाहिए

हल्द्वानी में पॉलीनेटर पार्क तैयार करने का ख्याल भी कोरोना के समय में ही आया। उत्तराखंड वन अनुसंधान वृत्त में मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी बताते हैं “कोरोना के समय जब लॉकडाउन की शुरुआत हुई, हमारे आसपास चिड़ियों की चहचहाहट गूंजने लगी। लोगों का निकलना थमा, शोर थमा, गाड़ियां थमीं तो तितलियां-मधुमक्खियां दिखाई देने लगी। तभी हमने परागण करने वाली प्रजातियों के बारे में अध्ययन किया। बटरफ्लाई पार्क तो देश में बहुत से बने हैं लेकिन हमारा विचार पॉलीनेटर पार्क बनाने का था। इस पार्क को तैयार करने का मकसद ये था कि लोग अपने आसपास प्रकृति को नज़रअंदाज़ न करें और इसकी अहमियत समझें। हमारा भोजन चक्र बहुत कुछ परागण करने वाली प्रजातियों यानी पॉलीनेटर्स पर निर्भर करता है”।

जानिए हल्द्वानी के पॉलिनेटर पार्क के बारे में

हल्द्वानी में रामपुर रोड पर तकरीबन 4 एकड़ क्षेत्र में परागण करने वाली करीब 40 प्रजातियों को संरक्षित किया गया है। इनमें मधुमक्खियां, ततैया, चिड़िया, तितलियां, कीट-पतंगे, झींगुर, चमगादड़ समेत छोटे स्तनधारी जीव शामिल हैं। यहां उनका प्राकृतिक आवास तैयार किया गया है। उनकी पसंद के फूल, पेड़-पौधे लगाए गए हैं। देश में ये अपने किस्म का ये पहला पार्क है।

कीटनाशकों, रासायनिक खाद का इस्तेमाल, बढ़ता प्रदूषण, प्राकृतिक आवास सीमित होने, जंगल के बिखरने, हमारे आसपास फूल-पौधों के कम होने की वजह से मधुमक्खियों, तितलियों जैसे पॉलीनेटर्स की आबादी तेज़ी से कम हो रही है। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक खासतौर पर मधुमक्खियों और तितलियों की 40 प्रतिशत प्रजातियां पूरी दुनिया में विलुप्त होने के संकट का सामना कर रही हैं।

परागण करने वाले प्रजातियों के बारे में जानना है जरूरी

जो चिड़ियों-तितलियों की है पसंद

पॉलीनेटर पार्क में ऐसे पेड़-पौधों को संरक्षित किया गया है जो चिड़ियों, मधुमक्खियों और तितलियों का प्राकृतिक आवास हैं। इन्हें पसंद रसदार फूलों वाले पौधे लगाए गए हैं। ऐसे पौधे लगाए गए हैं जिनमें ये अंडे देते हैं और लार्वा बनते हैं। जैसे मीठी नीम, जामुन, सेमल, साइट्रस प्रजाति के पौधे, गेंदे, गुलाब, जैसमीन। तितलियों को लैंटाना जैसी जंगली घास बहुत पसंद है। कीचड़ के आसपास रहने वाली तितलियों के लिए मड-पैडलिंग स्पॉट बनाए गए हैं। चिड़ियों के घोसले बनाए गए हैं। प्यास बुझाने के लिए छोटे तालाब बनाए गए हैं।

पेड़ से झरने वाली सूखी पत्तियां बहुत सारे परागण करने वाले कीटों, गिलहरियों, चिड़ियों के लिए जरूरी होती हैं। इसलिए प्रृकति को यहां उसकी ही तरह रहने दिया गया है। पार्क और उसके आसपास किसी भी तरह का रसायन या कीटनाशक इस्तेमाल नहीं किया गया है।

संजीव चतुर्वेदी कहते हैं कि पॉलीनेटर्स के बारे में अध्ययन के दौरान पता चला कि अलग-अलग फूल-पौधों के अलग-अलग पॉलीनेटर होते हैं। रात में खिलने वाले फूलों का परागण अलग प्रजाती करती है। गहराई वाले फूलों के पॉलीनेटर की नोक निकली हुई होती है। धरती पर मौजूद तकरीबन 75-95 प्रतिशत तक फूलों वाले पौधे को परागण की जरूरत होती है। इसके साथ ही पॉलीनेटर विश्व की तकरीबन 35 प्रतिशत कृषि को प्रभावित करते हैं और 87 अग्रणी फसल उत्पादन में सहायता करते हैं। यहां आने वाले लोगों को वॉल पेन्टिंग्स के ज़रिये ऐसी रोचक जानकारियां मिलेंगी। रविंद्रनाथ टैगोर और विलियम वर्ड्सवर्थ जैसे प्रकृति प्रेमी कवियों की कविताएं पढ़ने को मिलेंगी।

बमुश्किल मिलीं स्थानीय मधुमक्खियां

जब हुई स्थानीय मधुमक्खियों की तलाश

हैरानी की बात सामने आई जब इस पॉलीनेटर पार्क के लिए उत्तराखंड में पायी जाने वाली मधुमक्खियों की तलाश की गई। ताकि उन्हें यहां लाकर बसाया जाए। उनके बी-हाइव बनाए जाएं। संजीव बताते हैं कि हमें स्थानीय मधुमक्खियां कहीं मिली ही नहीं। राज्य में ज्यादातर मधुमक्खी पालन यूरोपियन मधुमक्खियों का हो रहा है। शहर के मधुमक्खी पालकों से स्थानीय मधुमक्खियां मांग की गईं तो किसी के पास इनका पता नहीं था।

हल्द्वानी के मधुमक्खी पालक तारादत्त जोशी को स्थानीय मधुमक्खियों की तलाश का ज़िम्मा मिला। वह बताते हैं कि काफी खोजबीन के बाद अल्मोड़ा में सोमेश्वर के नजदीक गरुड़ में एक व्यक्ति के पास हमें स्थानीय मधुमक्खियां मिलीं। जिन्हें पॉलीनेटर पार्क में लाया गया।

मधुमक्खी पालक तारादत्त जोशी बताते हैं स्थानीय मधुमक्खी एपिस सिराना इंडिका के मिज़ाज़ का अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है। वो बहुत डंक मारती है और उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है। जबकि यूरोपियन मधुमक्खी एपिस मेलिफेरा का मिज़ाज़ शांत होता है। वो कम काटती है। उत्पादन अच्छा मिलता है। इसलिए अब पश्चिमी देशों की मधुमक्खियां ही ज्यादा पाली जाती हैं।

65 वर्ष के तारादत्त बताते हैं “कक्षा चार में पढ़ने के दौरान से मैं मधुमक्खियां पकड़ता हूं। इनकी आबादी अब बहुत कम हुई है। क्योंकि फ्लोरा (फूलों की आबादी) की दिक्कत आई है। खाद, दवाइयां, कीटनाशक का इस्तेमाल बहुत कम हो गया है। पेड़-बगीचे कम होते जा रहे हैं। ये मधुमक्खियां फूलों की तलाश में पलायन करती हैं। मधुमक्खी पालक भी अपने बक्सों के साथ फूलों वाले मौसम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह की यात्रा कम करते हैं। हमारा ये पुश्तैनी काम है। हमने अपने सामने इनकी आबादी को गिरते देखा है”।

पॉलीनेटर प्रजातियों पर है बहुत सीमित अध्ययन-डाटा

पॉलीनेटर के बारे में बहुत कम जानते हैं हम

तितली प्रेमी और तितली विशेषज्ञ नैनीताल के भीमताल में रहने वाले पीटर स्मेटाचेक ने पॉलीनेटर पार्क तैयार करने में वन विभाग की मदद की है। वह कहते हैं कि जहां-जहां निर्माण कार्य हो रहे हैं, शहरी क्षेत्र हैं, खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल हो रहा है, वहां पॉलीनेटर्स की आबादी कम है। जंगलों में इनकी स्थिति ठीक है।

पीटर बताते हैं कि जब हम मच्छर भगाने के लिए छिड़काव करते हैं तो मच्छर के साथ अन्य कीट-पतंगों को भी खत्म कर देते हैं। अगर पौधों में कुछ कीड़े लग रहे हैं तो लगने दो। कोई कीड़ा पत्तियों को खा रहा है तो खाने दो।

तितली विशेषज्ञ के मुताबिक पॉलीनेटर्स के बारे में हमारी जानकारी बेहद सीमित है। हमारे पास बहुत ही सामान्य ज्ञान है। हम मानते हैं कि मधुमक्खियां गुलाब का परागण करती हैं लेकिन हमारे पास अध्ययन नहीं है। डाटा नहीं है कि कौन सी प्रजाति के कीट, किस प्रजाति के पौधे को पॉलीनेट करते हैं।

तितलियां, मधुमक्खियां, चिडियां धरती के नन्हे जीव हैं, जो बहुत कम जगह लेते हैं, बहुत कम समय में रहते हैं। हम, उनसे उनका घर, उनका समय छीन रहे हैं। पॉलीनेटर पार्क में रविंद्रनाथ टैगोर की एक कविता कहती है  “तितलियां महीनों में नहीं, कुछ पलों में जीती हैं, यह समय उनके लिए बहुत होता है”।

(वर्षा सिंह देहरादून से स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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