NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
जनसंख्या नियंत्रण– एक ख़तरनाक प्रस्ताव
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर जनसंख्या नियंत्रण का मुद्दा छेड़ा है। क्या है उनकी मंशा और क्या भारत में जनसंख्या में विस्फोट जैसी कोई समस्या वास्तव में बची है? मुकेश असीम का विश्लेषण
मुकेश असीम
20 Jan 2020
indian population
Image courtesy: Social Media

संघ-बीजेपी के राजनीतिक प्रचार के कुछ प्रिय मुद्दों में से एक जनसंख्या में तेज वृद्धि रहा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर जनसंख्या नियंत्रण का विषय छेड़ते हुये दो बच्चों से अधिक पर रोक लगाने की माँग से इसे गरम करने की कोशिश की है। हालाँकि आधिकारिक तौर पर संघ-बीजेपी द्वारा इस मुद्दे को सीमित संसाधनों की तुलना में बढ़ती जनसंख्या की समस्या पर नियंत्रण के रूप में रखा जाता है पर ज़मीनी स्तर के प्रचार में उसकी मशीनरी इस मुद्दे को मुसलमानों द्वारा अधिक बच्चे पैदा कर आबादी बढ़ाने और हिंदुओं के अल्पसंख्यक बन जाने के जवाब के तौर पर प्रस्तुत करती है। पर क्या भारत में जनसंख्या में विस्फोट जैसी कोई समस्या वास्तव में बची है?

जनसंख्या वृद्धि की दो मूल वजह हैं – एक, जन्म दर का अधिक होना, और दूसरे, मृत्यु दर का कम होना। जहाँ तक जन्म दर का सवाल है प्रति स्त्री 2.1 बच्चों को प्रतिस्थापन दर अर्थात जनसंख्या के स्थिर बने रहने की दर माना जाता है क्योंकि यह दर जन्म और मृत्यु की दर को समान कर देती है। जन्म दर इससे अधिक होने से जनसंख्या बढ़ती है और कम होने से घटने लगती है। अधिकांश विकसित देशों में इसके 2.1 से नीचे होने से ही जनसंख्या के गिरने और आबादी में वृद्धों का अनुपात बढ़ते जाने की समस्या पैदा हुई है।

जहाँ तक मृत्यु दर का सवाल है वह बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में निरंतर घटती रही है क्योंकि आर्थिक विकास तथा बेहतर वैज्ञानिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से औसत जीवन आयु बढ़ रही थी। लेकिन पिछले वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से अधिकांश पूंजीवादी देशों ने नवउदारवादी नीतियों और बुजुर्गों के लिये स्वास्थ्य सेवाओं और पेंशन जैसे सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों पर खर्च में कटौती की जो नीति अपनाई है उसकी वजह से यह स्थिति बदल ही नहीं गई है, बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कुछ देशों में हाल में औसत जीवन आयु घटने से मृत्यु दर फिर से बढ़ने लगी है। यही वजह है कि कई देशों में जनसंख्या वृद्धि नहीं बल्कि उसमें कमी की समस्या उठ खड़ी हुई है।

इसे भी पढ़ें : जनसंख्या विस्फोट पर नरेंद्र मोदी की चिंता और संघ का एजेंडा

जहाँ तक भारत का सवाल है उसमें 1970 के दशक में एक और उच्च जन्म दर, दूसरी और साथ ही औसत जीवन आयु के बढ़ने से जनसंख्या वृद्धि की गति में भारी विस्फोट हुआ था। किंतु इसके बाद जन्म दर में कमी होनी शुरू हो गई क्योंकि मृत्य दर कम होकर औसत जीवन आयु बढ़ने और शिक्षा के प्रसार से अधिक बच्चों को जन्म देने की प्रवृत्ति कम हो जाती है। 1971 में जहाँ जन्म दर 5.5 थी, 2016 में वह 2.4 से भी कम हो गई और जिस तेजी से यह गिर रही है उससे अनुमान है कि एक-दो साल में ही यह पूरे देश के औसत में 2.1 पर या उससे नीचे आ जायेगी। अब यह सिर्फ उत्तर भारत के कुछ राज्यों में ही 2.1 से ऊपर रह गई (बिहार में सबसे अधिक 3.41) लेकिन वहाँ भी अब यह तेजी से गिर रही है। अन्य कई क्षेत्रों में यह पहले ही 2 से भी कम के स्तर पर आ चुकी है। अतः जन्म दर का उच्च होना अब भारत में जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण नहीं है।

इसी की पुष्टि दूसरी तरह जनसंख्या में 14 वर्ष की उम्र तक के बच्चों के अनुपात से भी होती है। 1975 में कुल जनसंख्या में इनका अनुपात 40% से अधिक था किंतु 2015 में यह 30% के नीचे आ गया अर्थात भारत की आबादी की औसत जीवन आयु बढ़ रही है और उसमें बच्चों का अनुपात घटने लगा है। अभी भारत में युवा और बुजुर्ग आबादी का प्रतिशत बढ़ रहा है। जैसे जैसे समय गुजरता जायेगा, बुजुर्गों का प्रतिशत अधिक होता जायेगा।

इसे भी पढ़ें : जटिल है जनसंख्या नियंत्रण का प्रश्न

भारत में अब जनसंख्या के बढ़ने का मुख्य कारण औसत जीवन आयु दर में वृद्धि है जो 1971 में 50 वर्ष थी और तब से बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और भोजन की बेहतर उपलब्धता की वजह से बढ़कर अब 68 वर्ष तक पहुँच चुकी है। इससे मृत्यु दर में हुई गिरावट के कारण अभी तक भारत में जनसंख्या वृद्धि दर अपेक्षाकृत रूप से ऊँची रही है। किंतु यहाँ भी अगर हम विकसित देशों का उदाहरण लें तो भविष्य में औसत जीवन आयु में वृद्धि की संभावना बहुत सीमित हो गई है क्योंकि एक और तो आर्थिक विकास की गति मंद पड़ी है, दूसरी ओर भारत में भी नवउदारवादी नीतियों के अपनाए जाने से एक तो हाल के वर्षों में प्रति व्यक्ति भोजन उपलब्धता और उपभोग घटने लगा है।

दूसरी और स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण बहुत तेजी से हो रहा है और ये बहुत महँगी होकर अधिकांश जनता की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं। अतः अगर औसत जीवन आयु में गिरावट भी न हो तो अब इसमें वृद्धि की भी अधिक गुंजाइश नहीं बची है। अतः अब मृत्यु दर में और कमी होने की संभावना बहुत न्यून हो चुकी है और यह कमोबेश स्थिर हो जायेगी। अतः जनसंख्या वृद्धि दर अधिक होने का यह कारण भी समाप्त हो जायेगा।

ये दोनों कारक बताते हैं कि भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर जल्द ही गिरकर शून्य पर पहुँच जाने वाली है जिससे जनसंख्या पहले स्थिर होगी और उसके बाद भी अगर जन्म दर घटती रही तो इसमें गिरावट भी आरंभ हो सकती है। यह तो निश्चित है कि कुल आबादी में बच्चों और युवाओं का अनुपात गिरकर बुजुर्गों का अनुपात बढ़ने लगेगा। यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिये नकारात्मक स्थिति होगी क्योंकि इससे सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं की कम आवश्यकता वाली उत्पादक आयु की आबादी कम होगी और सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं की अधिक जरूरत वाली बुजुर्ग आबादी बढ़ जायेगी।

भारत जैसे देश में जहाँ अधिकांश आबादी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है या स्वयं रोजगार से जुड़ी है और उनके पास रिटायरमेंट पश्चात पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा का नितांत अभाव होने से अपने बच्चों पर काफी निर्भरता होती है, वहाँ युवाओं की तुलना में बुजुर्गों की अधिक आबादी भविष्य में एक भयंकर समस्या का जन्म दे सकती है।

साथ ही यह भी तथ्य है कि स्वाभाविक सामाजिक गति के बजाय कानूनी प्रावधानों से किए परिवर्तन अपने साथ कई दुष्परिणाम भी लेकर आते हैं। भारत में दो बच्चों से अधिक पर कानूनी रोक का एक खतरनाक पहलू यह होगा कि सांस्कृतिक कारणों से पहले ही बेटे की चाह में कन्या भ्रूण हत्या की उच्च दर से जूझ रहे समाज में बेटे की चाह और भी मजबूत होगी तथा कन्या भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति को बल मिलेगा जो भारतीय समाज में पुरुष-स्त्री अनुपात की पहले से ही नाजुक स्थिति को भयावह बना देगा। यह भारतीय समाज में मौजूद प्रतिक्रियावादी प्रवृत्तियों को और भी बल देगा और स्त्रियों के साथ होने वाले अपराधों को भी बढ़ा देगा। इसलिए जब जनसंख्या वृद्धि की संभावना स्वयं ही समाप्त होने की और है बच्चों के जन्म पर कानूनी नियंत्रण हमारे समाज के लिए कई जोखिम पैदा कर सकता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

indian population
Population control
population explosion
Population Politics
Mohan Bhagwat
RSS
BJP
Muslim population
birth rate
Death rate

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • indian student in ukraine
    मोहम्मद ताहिर
    यूक्रेन संकट : वतन वापसी की जद्दोजहद करते छात्र की आपबीती
    03 Mar 2022
    “हम 1 मार्च को सुबह 8:00 बजे उजहोड़ सिटी से बॉर्डर के लिए निकले थे। हमें लगभग 17 घंटे बॉर्डर क्रॉस करने में लगे। पैदल भी चलना पड़ा। जब हम मदद के लिए इंडियन एंबेसी में गए तो वहां कोई नहीं था और फोन…
  • MNREGA
    अजय कुमार
    बिहार मनरेगा: 393 करोड़ की वित्तीय अनियमितता, 11 करोड़ 79 लाख की चोरी और वसूली केवल 1593 रुपये
    03 Mar 2022
    बिहार सरकार के सामाजिक अंकेक्षण समिति ने बिहार के तकरीबन 30% ग्राम पंचायतों का अध्ययन कर बताया कि मनरेगा की योजना में 393 करोड रुपए की वित्तीय अनियमितता पाई गई और 11 करोड़ 90 लाख की चोरी हुई जबकि…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 6,561 नए मामले, 142 मरीज़ों की मौत
    03 Mar 2022
    देश में कोरोना से अब तक 5 लाख 14 हज़ार 388 लोगों अपनी जान गँवा चुके है।
  • Civil demonstration in Lucknow
    असद रिज़वी
    लखनऊ में नागरिक प्रदर्शन: रूस युद्ध रोके और नेटो-अमेरिका अपनी दख़लअंदाज़ी बंद करें
    03 Mar 2022
    युद्ध भले ही हज़ारों मील दूर यूक्रेन-रूस में चल रहा हो लेकिन शांति प्रिय लोग हर जगह इसका विरोध कर रहे हैं। लखनऊ के नागरिकों को भी यूक्रेन में फँसे भारतीय छात्रों के साथ युद्ध में मारे जा रहे लोगों के…
  • aaj ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव : पूर्वांचल में 'अपर-कास्ट हिन्दुत्व' की दरार, सिमटी BSP और पिछड़ों की बढ़ी एकता
    03 Mar 2022
    यूपी चुनाव के छठें चरण मे पूर्वांचल की 57 सीटों पर गुरुवार को मतदान होगे. पिछले चुनाव में यहां भाजपा ने प्रचंड बहुमत पाया था. लेकिन इस बार वह ज्यादा आश्वस्त नहीं नज़र आ रही है. भाजपा के साथ कमोबेश…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License