NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
भारत में बेरोज़गारी मापने के पैमानों के साथ क्या समस्या है? 
भारत में लंबे अरसे से सरकारी आंकड़ों में, बेरोजगारी के लिए अनेक अलग-अलग मापों का उपयोग किया जाता रहा है। यहां हम इन मापों के साथ बुनियादी समस्या पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
प्रभात पटनायक
28 Oct 2021
Translated by राजेंद्र शर्मा
unemployment

हमारे देश में श्रम शक्ति के बहुत छोटे से हिस्से को ही पूर्णकालिक आधार पर काम मिला हुआ है। श्रम शक्ति का ज्यादातर हिस्सा या तो किसानों या छोटे-छोटे दूकानदारों जैसे स्वरोजगार के कामों में लगा हुआ है, जिनमें काम की किसी खास मात्रा में साझेदारी करने वाले परिवार के सदस्यों की संख्या आसानी से बढ़-घट सकती है या फिर कामगारों में बड़ी संख्या ऐसे कैजुअल मजदूरों की है, जिन्हें किस दिन काम मिलता है और किस दिन नहीं मिलता है, यह कोई तय नहीं है। दूसरे शब्दों में कामगारों की उसी संख्या पर काम की मात्रा घट या बढ़ सकती है। ऐसे में कामगारों की उतनी ही संख्या के हिस्से का काम बढ़ जाए तो उसे बेरोजगारी का घटना माना जा सकता है और उनके हिस्से में काम की मात्रा घट जाए तो उसे, बेरोजगारी का बढऩा कहा जाएगा। यही नहीं, काम की मात्रा और काम पर लगे लोगों की संख्या में कोई घनिष्ठ संबंध भी नहीं है। इसलिए, यह सवाल उठता है कि ऐसे हालात में बेरोजगारी के रुझान का माप कैसे किया जा सकता है?

इसी समस्या के चलते, भारत में लंबे अरसे से सरकारी आंकड़ों में, बेरोजगारी के लिए अनेक अलग-अलग मापों का उपयोग किया जाता रहा है। यहां हम इन सभी मापों पर चर्चा नहीं करेंगे। बहरहाल, इनमें से किसी एक माप को उठाकर हम, इन सभी मापों की समस्या को समझ सकते हैं। मिसाल के तौर पर हम ‘‘करेंट वीकली स्टेटस’’ रोजगारी की अवधारणा को ले सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति को, उससे जब जानकारी इकट्ठी की जा रही हो, उससे पहले के एक सप्ताह में, काम की तलाश करने के बावजूद, एक घंटे का भी कोई उपादेय काम नहीं मिला हो, तो उस व्यक्ति को ‘‘करेंट वीकली स्टेटस’’ के पैमाने पर बेरोजगार माना जाएगा, वर्ना उसका ‘‘करेंट वीकली स्टेटस’’ बारोजगार या रोजगारशुदा का होगा। अब मान लीजिए कि किसी खास साल के सर्वे के समय किसी व्यक्ति को, पिछले हफ्ते में चार घंटे का काम मिला हो, लेकिन इसके कुछ साल बाद के सर्वे के समय, उसी व्यक्ति को पिछले हफ्ते में सिर्फ दो घंटे का ही काम मिला हो, तो जाहिर है कि इन दो कालखंडों के बीच उसकी बेरोजगारी पहले से बढ़ गयी होगी। और अगर उस व्यक्ति की स्थिति, अकेले एक व्यक्ति स्थिति न होकर, उसके जैसे लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली स्थिति हो, तो जाहिर है कि यह उक्त दो कालखंडों के बीच बेरोजगारी की स्थिति बिगड़ जाने को ही दिखा रहा होगा। लेकिन, ‘‘करेंट वीकली स्टेटस’’ का सरकारी पैमाना, बेरोजगारी जहां की तहां ही दिखा रहा होगा।

मजदूरों की प्रतिव्यक्ति आय का एवजी पैमाना 

चूंकि यही स्थिति बेरोजगारी के करीब-करीब हरेक सरकारी माप के साथ है, इसलिए उनमें से कोई भी माप बेरोजगारी के रुझानों को पकड़ने के लिए खास काम का नहीं है। तब बेरोजगारी के रुझानों को कैसे पकड़ा जा सकता है? जब श्रम शक्ति के लिए प्रतिव्यक्ति काम की मात्रा घट रही हो यानी जब बेरोजगारी वास्तव में बढ़ रही हो, तो यह मानना पूरी तरह से तार्किक होगा कि एक औसत मजदूर की हर एक घंटे के काम पर आय में, बढ़ोतरी तो नहीं ही हो रही होगी। लेकिन, चूंकि इसी अवधि में प्रति मजदूर काम के घंटों में कमी हो रही होगी, इसका अर्थ यह हुआ कि इन दोनों के गुणनफल यानी श्रम शक्ति की प्रतिव्यक्ति वास्तविक आय में, कमी हो रही होगी। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर बाकी सब कुछ समान रहता है तो, श्रम शक्ति की प्रतिव्यक्ति वास्तविक आय का घटना, बेरोजगारी के बढ़ने का संकेतक होगा।

इसी प्रकार, जब बेरोजगारी घट रही होगी तो, श्रम शक्ति की प्रतिव्यक्ति आय में बढ़ोतरी होनी चाहिए। इसलिए, बेरोजगारी की दर के रुझान का एक तार्किक संकेतक यह होगा कि बाकी सब जस का तस रहने की स्थिति में, श्रम शक्ति की प्रतिव्यक्ति आय में बढ़ोतरी हो रही है या गिरावट हो रही है। लेकिन, समस्या यह है कि बाकी चीजें जस की तस नहीं रहती हैं। खासतौर पर यह कि जब मजदूरों की प्रतिव्यक्ति आय घट रही होती है और कुल उत्पाद में आर्थिक सरप्लस का हिस्सा बढ़ रहा होता है, इस सरप्लस पर ही पलने वाले पूंजीपति वर्ग के लग्गे-भग्गों, जैसे वकीलों, बिजनेस एक्जिक्यूटिवों, विज्ञापन एजेंसियों आदि के वर्ग का आकार भी बढ़ रहा होता है और आम तौर पर उन्हें भी ‘‘श्रम शक्ति’’ के हिस्से के तौर पर ही गिन लिया जाता है। दूसरे शब्दों में श्रम शक्ति की गिनती में सिर्फ मजदूरों, किसानों, खेत मजदूरों, दस्तकारों, करीगरों, मछुआरों आदि को ही नहीं जोड़ा जाता है, उनमें वकीलों, एक्जिक्यूटिवों आदि को भी गिन लिया जाता है। इसलिए, जहां सिर्फ मेहनतकशों की प्रतिव्यक्ति आय के उतार-चढ़ाव को, बेरोजगारी के रुझान का समुचित संकेतक माना जा सकता है, वहीं ‘‘श्रम शक्ति’’ गिने जाने वाले सभी तबकों को मिलाकर प्रतिव्यक्ति आय की गणना, ऐसे संकेतक के रूप में भ्रमित करने वाली साबित हो सकती है।

वास्तविक आय के संकेतक के रूप में प्रतिव्यक्ति खपत

बहरहाल, इस समस्या से निपटने का भी एक रास्ता है। यह मानना तार्किक होगा कि जब ‘‘श्रम शक्ति’’ के संपन्नतर वर्ग के हिस्से की, जो वास्तव में अतिरिक्त मूल्य में से हिस्सा पाने वालों का तबका होता है, प्रतिव्यक्ति वास्तविक आय बढ़ रही हो या जहां की तहां बनी रहे, तो इस तबके की खाद्यान्न की प्रतिव्यक्ति खपत, घट तो नहीं ही रही होगी। इसलिए, जब खाद्यान्न की प्रतिव्यक्ति खपत में गिरावट देखने को मिले, उससे हम निश्चित रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि श्रम शक्ति में आने वाले वास्तविक मेहनतकशों की प्रतिव्यक्ति आय, पहले से घट गयी होगी।

इसका अर्थ यह हुआ कि खाद्यान्न की प्रतिव्यक्ति खपत या उपलब्धता में उतार-चढ़ाव को, ऐसी किसी स्थिति में जहां खाद्यान्नों की आपूर्ति में कोई दूसरी कोई सीधी बाधा नहीं हो, बेरोजगारी की दर के रुझानों का उपयुक्त संकेतक माना जा सकता है। इस पर इस आधार पर आपत्ति की जा सकती है कि इस तरह तो हम बेरोजगारी को, भूख के रुझान का करीब-करीब समानार्थी ही बना देंगे। लेकिन, अगर खाद्यान्न की आपूर्ति में स्वतंत्र रूप से पैदा हुई किसी तंगी की वजह से भूख में बढ़ोतरी नहीं हो रही हो तो, यह मेहनतकश जनता के हाथों में क्रय शक्ति में बढ़ती तंगी को ही प्रतिबिंबित कर रहा होगा, जो बेरोजगारी के बढऩे का ही लक्षण होगा। और नवउदारवादी नीतियों के करीब-करीब पूरे दौर में ही, भारतीय खाद्य निगम के हाथों में, इस काम के लिए जितने भंडार जरूरी माने जाते हैं, उससे ज्यादा भंडार जमा रहे हैं, इसलिए खाद्यान्नों की आपूर्ति में स्वतंत्र रूप से किसी कमी के पैदा होने का कोई सवाल नहीं उठता है। इसे देखते हुए, बेरोजगारी के रुझानों का हमारा प्रस्तावित संकेतक, काफी वैध संकेतक हो जाता है।

नवउदारवादी दौर में खाद्यान्न उपभोग में गिरावट

बेशक, खाद्यान्नों की उपलब्धता में साल-दर-साल उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। लेकिन, हमारे लिए प्रासंगिक है, इनका रुझान। और इसके लिए हम दो त्रैवार्षिकियों के बीच औसत सालाना प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता की तुलना करते हैं, जिसमें एक त्रैवार्षिकी पहले की ली जाती है और दूसरी, अपने अध्ययन के अंतिम वर्षों की।

1989-91 की त्रिवार्षिकी में यानी भारत में आर्थिक उदारीकरण से ऐन पहले, खाद्यान्न की प्रतिव्यक्ति औसत सालाना शुद्घ उपलब्धता, 180.2 किलोग्राम थी। लेकिन, 2016-18 की त्रिवार्षिकी में, यानी महामारी से ठीक पहले के दौर में, जिसके लिए एक हद तक पुख्ता आंकड़े उपलब्ध हैं, यह उपलब्धता घटकर 178.7 किलोग्राम रह गयी है। इसलिए, हमारे तर्क के हिसाब से नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के दौर में, बेरोजगारी की दर बढ़ी है। लेकिन, इससे कोई यह न समझे कि यह गिरावट तो सिर्फ इसलिए दिखाई दे रही है कि हमने तुलना के लिए एक खास त्रैवार्षिकी को ही लिया है। इसलिए, हम यह स्पष्ट कर देना चाहेंगे कि नवउदारवाद के पूरे के पूरे दौर में ही, किसी भी त्रैवार्षिकी में खाद्यान्न की प्रतिव्यक्ति शुद्घ उलपब्धता, 1989-91 की त्रैवार्षिकी से ज्यादा नहीं रही है। 

ये भी देखें: घातक है बेरोज़गारी की महामारी

इसलिए, इस निष्कर्ष से कोई इंकार ही नहीं कर सकता है कि इस दौर में प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में गिरावट आयी है।
एक और भी तथ्य है जो इस निष्कर्ष की पुष्टि करता है। यूपीए-प्रथम की सरकार के दौरान महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के शुरू किए जाने के बाद से, इस योजना के अंतर्गत कुछ रोजगार मुहैया कराया जा रहा था, जो मेहनतकशों की आय में और इसलिए खाद्यान्न की उनकी मांग में भी, इजाफा करता था। अगर इसके बावजूद, नवउदारवादी दौर में प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में गिरावट हुई है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि अगर मगनरेगा नहीं चल रहा होता, तो प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता में और ज्यादा गिरावट हुई होती।

मनरेगा के बावजूद कैसे बढ़ी बेकारी?

इसी बात को दूसरी तरह से भी कहा जा सकता है। हम, नवउदारवादी पूंजीवादी व्यवस्था की अपनी गतिक्रिया से पैदा होने वाले रोजगार और रोजगार के पूरक स्रोत के रूप में मगनरेगा से पैदा होने वाले रोजगार में अंतर कर सकते हैं। मगनरेगा द्वारा मुहैया कराए गए रोजगार को जोडऩे के बावजूद, अगर नवउदारवादी दौर में बेरोजगारी में बढ़ोतरी हुई है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि रोजगार मुहैया कराने की नवउदारवादी व्यवस्था की सामथ्र्य, हमारे एवजी के पैमाने से जितनी नजर आती है, उससे भी सीमित रही है। और अगर रोजगार मुहैया कराने के लिए हम नवउदारवादी पूंजीवादी व्यवस्था के ही भरोसे बैठे रहे होते, तो बेरोजगारी में बढ़ोतरी जितनी दिखाई दे रही है, उससे भी ज्यादा रही होती।

बेरोजगारी में बढ़ोतरी की इस परिघटना के दो-दो कारण हैं। पहला तो यह कि, कामगार आबादी में प्राकृतिक बढ़ोतरी के ऊपर से, शहरों में उजरती रोजगार की तलाश में उजड़े हुए किसानों की बड़ी संख्या भी पहुंच रही है। यह इसलिए हो रहा है क्योंकि नवउदारवादी व्यवस्था में, सरकार द्वारा कृषि लागतों के लिए मुहैया करायी जाने वाली सब्सीडियां खत्म किए जाने और नकदी फसलों के मामले में समर्थन मूल्य की व्यवस्था के खत्म किए जाने के जरिए, किसानी खेती का गला घोंटा जा रहा है। दूसरे, प्रौद्योगिकी-सह-ढांचागत बदलावों पर लगी सारी बंदिशें हटाए जाने और इसके साथ ही अर्थव्यवस्था के दरवाजे आयातित मालों से प्रतियोगिता के लिए खोले जाने द्वारा मिलकर, ठीक ऐसे बदलावों को थोपा जा रहा है, जो सामान्य रूप से श्रम प्रतिस्थापनकारी होते हैं और इसलिए, रोजगार में बहुत मामूली बढ़ोतरी ही पैदा करते हैं, जीडीपी में वृद्घि की दर चाहे जितनी ही ज्यादा क्यों न हो।

ये दोनों कारक मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि नवउदारवादी पूंजीवादी व्यवस्था में बेरोजगारी की दर बढ़ती ही रहे। लेकिन, बेरोजगारी में इस बढ़ोतरी को भारत में, परंपरागत सरकारी आंकड़े पकड़ ही नहीं पाते हैं। फिर भी, अगर हम बेरोजगारी के उस तरह के एवजी माप को देखें, जो हमने यहां सुझाया है, तो बेरोजगारी में इस बढ़ोतरी का कुछ अंदाजा तो लग ही जाता है।

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Why Capturing Unemployment Trends in India is a Tough Call

unemployment rate
Neo-Liberalism Policy
Unemployment Statistics
Measuring Unemployment

Related Stories

पिछले 5 साल में भारत में 2 करोड़ महिलाएं नौकरियों से हुईं अलग- रिपोर्ट

अमृत काल: बेरोज़गारी और कम भत्ते से परेशान जनता

यूपी: युवाओं को रोजगार मुहैय्या कराने के राज्य सरकार के दावे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते हैं!

मोदी जी, शहरों में नौकरियों का क्या?

अमीरों को दी गई छूट और 'अनलॉक' के बावजूद रोज़गार में नहीं हो रहा है सुधार

मोदी जी, क्या रोज़गार पैदा करने की कोई योजना है?

महाराष्ट्र : गांवों के शिक्षित युवाओं के लिए रोज़गार की तलाश कभी न ख़त्म होने वाली दौड़ है

देश में बेरोज़गारी लगभग 10 प्रतिशत, युवाओं में 28

चुनावों के बीच 'बेरोज़गारी संकट गहराया’


बाकी खबरें

  • Hijab controversy
    भाषा
    हिजाब विवाद: बेंगलुरु के कॉलेज ने सिख लड़की को पगड़ी हटाने को कहा
    24 Feb 2022
    सूत्रों के अनुसार, लड़की के परिवार का कहना है कि उनकी बेटी पगड़ी नहीं हटायेगी और वे कानूनी राय ले रहे हैं, क्योंकि उच्च न्यायालय और सरकार के आदेश में सिख पगड़ी का उल्लेख नहीं है।
  • up elections
    असद रिज़वी
    लखनऊ में रोज़गार, महंगाई, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन रहे मतदाताओं के लिए बड़े मुद्दे
    24 Feb 2022
    लखनऊ में मतदाओं ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर वोट डाले। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन की बहाली बड़ा मुद्दा था। वहीं कोविड-19 प्रबंधन, कोविड-19 मुफ्त टीका,  मुफ्त अनाज वितरण पर लोगों की अलग-अलग…
  • M.G. Devasahayam
    सतीश भारतीय
    लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों को उजाकर करती एम.जी देवसहायम की किताब ‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘
    24 Feb 2022
    ‘‘चुनावी लोकतंत्र?‘‘ किताब बताती है कि कैसे चुनावी प्रक्रियाओं की सत्यता को नष्ट करने के व्यवस्थित प्रयासों में तेजी आयी है और कैसे इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
  • Salempur
    विजय विनीत
    यूपी इलेक्शनः सलेमपुर में इस बार नहीं है मोदी लहर, मुकाबला मंडल-कमंडल के बीच होगा 
    24 Feb 2022
    देवरिया जिले की सलेमपुर सीट पर शहर और गावों के वोटर बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कोविड के दौर में योगी सरकार के दावे अपनी जगह है, लेकिन लोगों को याद है कि ऑक्सीजन की कमी और इलाज के अभाव में न जाने कितनों…
  • Inequality
    प्रभात पटनायक
    आर्थिक असमानता: पूंजीवाद बनाम समाजवाद
    24 Feb 2022
    पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के चलते पैदा हुई असमानता मानव इतिहास में अब तक पैदा हुई किसी भी असमानता के मुकाबले सबसे अधिक गहरी असमानता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License