NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
धर्म, क़ानून और स्वामीः क्रूर होते समाज में न्याय और करुणा के स्वर
यह भारतीय समाज की प्रवृत्ति रही है कि वह एक ओर सैद्धांतिक तौर पर उदार और सहिष्णु दिखाने की कोशिश करता है लेकिन हक़ीक़त में वहां भेदभाव और क्रूरता है।
अरुण कुमार त्रिपाठी
07 Jul 2021
धर्म, कानून और स्वामीः क्रूर होते समाज में  न्याय और करुणा के स्वर

एक साढ़े पांच दशक पुराने कठोर कानून की हिरासत में पांच दशक पुराने सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी की मौत हमारे लोकतंत्र की जो क्रूर तस्वीर पेश करती है वह उन तस्वीरों से भिन्न है जो हाल में आए प्यू के सर्वेक्षण और भारत के मुख्य न्यायाधीश एन.वी रमना के कानून के राज पर व्याख्यान के माध्यम से दिखाई पड़ती है। इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मुसलमानों की लिंचिंग करने वालों पर कार्रवाई करने की मांग करके हिंदुत्व की उदारता के माध्यम से धुंध की एक दीवार खड़ी कर दी है। इसलिए यह सवाल उठता है कि आखिर हमारे समाज में लोकतांत्रिक संस्कृति किस हद तक फैली है और हमारी संस्थाएं कितनी मजबूत हैं लोकतंत्र की रक्षा के लिए?

निश्चित तौर पर फादर स्टेन स्वामी की हिरासत में मौत ने दुनिया भर में भारत की मानवाधिकार की छवि को बट्टा लगाया है। यही वजह है कि विदेश मंत्रालय ने एक संवेदनहीन स्पष्टीकरण पेश करके विश्व जनमत को समझाने का प्रयास किया है। मंत्रालय ने कहा है कि भारत में अफसर कानून के उल्लंघन पर कार्रवाई करते हैं न कि अधिकारों के वैधानिक इस्तेमाल पर। स्टेन स्वामी की गिरफ्तारी और हिरासत कानून की उचित प्रक्रिया के तहत की गई। भारत में स्वतंत्र न्यायपालिका है, राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर मानवाधिकार आयोग है जो नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करते हैं। लेकिन विश्व जनमत और विशेषकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन इस मृत्यु से बहुत विचलित हैं। फादर स्टेन स्वामी की मौत के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार एजेंसी ने कहा है कि वह बहुत दुखी है इसलिए भारत और तमाम देशों से अपील करती है कि जो लोग बिना पर्याप्त कानूनी आधार के गिरफ्तार किए गए हैं उन्हें तत्काल छोड़ दिया जाए। इस तरह की अपील जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयुक्त और यूरोपीय संघ के मानवाधिकार प्रतिनिधि ने भी की है। उन्होंने कोविड जैसे संकट को देखते हुए इन देशों से विचाराधीन कैदियों को छोड़ने की अपील की है।

लेकिन भारत में न्यायपालिका कितनी स्वतंत्र है और कानून की उचित प्रक्रिया और कानून के राज का कितना पालन किया जा रहा है इसकी असलियत तब उजागर हो जाती है जब हम भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना के 30 जून के न्यायमूर्ति पीडी देसाई व्याख्यान पर गौर करते हैं। वे कहते हैं कि कानून के राज और कानून द्वारा राज में फर्क है। कानून के राज में न्याय की गुंजाइश रहती है लेकिन कानून द्वारा राज में न्याय की गारंटी नहीं रहती। कानून द्वारा राज तो अपने नागरिकों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। वे यह भी कहते हैं कि न्यायपालिका को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विधायिका और कार्यपालिका किसी से भी संचालित नहीं होना चाहिए। उसे सोशल मीडिया के भावुक संदेशों से भी प्रभावित नहीं होना चाहिए। अगर वह प्रभावित नहीं हो रही है तो न्यायपालिका स्वतंत्र है वरना उसकी स्वतंत्रता झूठी है।

उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्र का मतलब महज भूभाग या जमीन का टुकड़ा नहीं होता बल्कि उसमें रहने वाले लोग और उनकी तरक्की होती है। जब उनकी तरक्की होती है तभी देश की तरक्की होती है।

इस व्याख्यान के दौरान उनका यह कथन और भी महत्वपूर्ण है कि एक निश्चित अवधि के बाद होने वाले चुनाव इस बात की गारंटी नहीं है कि तानाशाही नहीं आएगी।

न्यायमूर्ति रमना का न्यायिक आदर्शों को परिभाषित करने वाला व्याख्यान और प्यू के सर्वेक्षण में भारत को एक धार्मिक सहिष्णुता वाला समाज बताने वाला निष्कर्ष ऐसा आभास देते हैं जैसे भारत तो अल्पसंख्यकों और विभिन्न सामाजिक वर्गों के लिए एक प्रकार का स्वर्ग है। यहां असहमत होने वाले लोगों के अधिकारों की हिफाजत की जाती है और एक प्रकार का संविधानवाद है जो अच्छी तरह से चल रहा है। लेकिन इन सर्वेक्षणों और व्याख्यानों के भीतर झांकने से वह खतरे और चेतावनी दिखाई पड़ते हैं जिसकी अक्सर अनदेखी की जाती रही है और जिसके नाते समाज और उसकी संस्थाओं में क्रूरता पनप रही है।

शायद यह भारतीय समाज की प्रवृत्ति रही है कि वह एक ओर सैद्धांतिक तौर पर उदार और सहिष्णु दिखाने की कोशिश करता है लेकिन हकीकत में वहां भेदभाव और क्रूरता है। प्राचीन भारत की इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि शंकराचार्य के अद्वैतवाद का ध्वज फहराने वाला समाज अपने भीतर घनघोर जातिवाद और छुआछूत की बुराई के साथ जी रहा है। अपने इसी पाखंड का सामना स्वयं शंकराचार्य वाराणसी में नहीं कर पाए थे जब एक डोम उनके सामने आया था और उन्होंने उसे हटाने की कोशिश की थी। पाखंड की उसी बीमारी ने आधुनिक भारतीय समाज को उस समय घेर लिया है जब उसने व्यक्ति की स्वतंत्रताओं पर आधारित और संविधानवाद के माध्यम से एक आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने का फैसला किया।

वह पाखंड प्यू के उस सर्वेक्षण में भी दिखता है जिसे कथित राष्ट्रवादी चैनलों ने अच्छे दिन और श्रेष्ठ भारत के प्रमाण पत्र के तौर पर प्रचारित किया। अगर भारत में 60 प्रतिशत लोग धार्मिक रूप से सहिष्णु हैं तो वे 40 प्रतिशत लोग कौन हैं जो धार्मिक रूप से असहिष्णु हैं? क्या 40 प्रतिशत लोग अपने सोच और सक्रियता से कहीं की शांति भंग करने और बिगाड़ने के लिए पर्याप्त नहीं हैं?  वास्तव में हमें प्यू के सर्वेक्षण और मुख्य न्यायाधीश के व्याख्यान के भीतर झांकने की जरूरत है। अगर भारत में 64 प्रतिशत हिंदू मानते हैं कि सच्चा भारतीय होने के लिए हिंदू पहचान जरूरी है, हिंदी बोलना जरूरी है और वे अधिनायकवाद को पसंद करते हैं तो यह संतोष करने की बात है या चिंता करने की? अगर सिर्फ 0.3 प्रतिशत धर्म परिवर्तन पर इतना हल्ला मच रहा है तो कहीं लोग और ज्यादा कर रहे होते तो क्या होता ? अगर बड़े पैमाने पर लोग अपनी जाति और धर्म में विवाह करते हैं तो लव जेहाद का हल्ला क्यों मच रहा है? क्या यह धार्मिक असहिष्णुता नहीं है।

वास्तव में भारतीय समाज एक प्रकार से धार्मिक समुदायों और जातिगत घेरों में बंटा हुआ है। आजादी के सत्तर सालों के बाद भी वह घेरे टूटे नहीं हैं। सारा हल्ला तब मचता है जब कुछ आधुनिक और खुले दिमाग के लोग उस घेरे को तोड़ते हैं। घेरे को तोड़ना वास्तव में सहिष्णुता कायम करने का प्रयास है और उस पर हल्ला मचाना असहिष्णुता। लेकिन घेरा तोड़ने वालों और मेल मिलाप कराने वालों को असहिष्णु और कानून का उल्लंघन करने वाला साबित करने का प्रयास चल रहा है। यही वह प्रयास है जिसे कई समाजशास्त्री लोकतंत्र और समाज को नए तरीके से परिभाषित करने वाले हिंदुत्व के प्रयास के तौर पर देख रहे हैं।

कई समाजशास्त्री जिस प्रक्रिया को संघ परिवार द्वारा लोकतंत्र को नए तरीके से परिभाषित करने का प्रयास कह रहे हैं वह दरअसल जातियों का राजनीतिकरण, धार्मिक समुदायों का राजनीतिकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं का राजनीतिकरण है। ऐसा नहीं है कि यह राजनीतिकरण पहले नहीं होता था। लेकिन तब वैसा करने वालों को लोकतंत्र के उच्च आदर्शों और संविधानवाद के मूल्यों का स्मरण रहता था। अगर वे उसे भूलते थे तो उसे टोकने वालों की बड़ी संख्या होती थी। आज टोकने वाले स्वर कभी भारत के मुख्य न्यायाधीश के भाषण में सुनाई पड़ते हैं तो कभी स्टेन स्वामी जैसों के संघर्षों में। लेकिन वे कमजोर हैं और विपक्षी दलों की राजनीति और समाज में सुधार करने वाले संगठनों की स्थिति खराब है। समाज में अच्छे बनने और सच्चे बनने की प्रेरणाएं लगातार समाप्त होती जा रही हैं। सत्ता का उद्देश्य समाज को बदलना और लोगों को अधिकार संपन्न करना नहीं है। उसका उद्देश्य विरोधी को कुचलना, कमजोर को दबाना है। इसी तरह धन का उद्देश्य है गरीब को और गरीब बनाना और लोगों को भिखारी की तरह लाइन में खड़े करना होता जा रहा है। ज्ञान का उद्देश्य लोगों को अज्ञान की ओर ले जाना है न कि चेतना और प्रकाश की ओर। धर्म का उद्देश्य मंदिरों, मस्जिदों और गिरजाघरों की भव्यता से ज्यादा संबंधित है न की उसके सत्य, अहिंसा, त्याग, बलिदान, सेवा और करुणा के आदर्शों से।

गुरचरण दास अपनी चर्चित पुस्तक `द डिफीकल्टी आफ बीइंग गुड’ में यह सवाल बड़ी शिद्दत से उठाते हैं कि आखिर अच्छा क्यों बना जाए? धर्म क्या है और उसे किसी को कैसे बरतना चाहिए? वे ऐसा पूंजीवाद के संकट को दूर करने के लिए करते हैं। लेकिन भारतीय पूंजीवाद ने व्यक्तिगत अधिकार और मानवाधिकार की अवधारणा को कमजोर करने की ठान रखी है। वह निरंतर समुदायवाद और संप्रदायवाद पर अपनी पूंजी और शक्ति लगाकर लोकतंत्र की अंतररात्मा को कमजोर कर रहा है। संभव है यह वैश्वीकरण और कथित उदारीकरण के बाद पनपे पूंजीवाद का चरित्र हो, जहां संपत्ति बनाने और प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की कोई सीमा निर्धारित नहीं है और न ही उसके लिए नागरिक अधिकारों को कुचलने से रोकने के लिए न्याय की कोई अवधारणा। हमारे संविधान ने राष्ट्र की एकता और अखंडता को महत्व दिया है लेकिन उससे पहले व्यक्ति की गरिमा का जिक्र किया है। मानवाधिकारों और मौलिक अधिकारों में व्यक्ति की गरिमा है और उसकी रक्षा के लिए सिर्फ कानूनी दांवपेच से काम नहीं चलेगा उसके लिए करुणा के स्वरों को भी तीव्र करना होगा। स्टेन स्वामी की मृत्यु में वे स्वर सुनाई देते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Stan Swamy
NIA
Bhima-Koregaon
Bail Denied
UAPA

Related Stories

मोदी जी, देश का नाम रोशन करने वाले इन भारतीयों की अनदेखी क्यों, पंजाबी गायक की हत्या उठाती बड़े सवाल

विशेष: कौन लौटाएगा अब्दुल सुब्हान के आठ साल, कौन लौटाएगा वो पहली सी ज़िंदगी

दिल्ली दंगा : अदालत ने ख़ालिद की ज़मानत पर सुनवाई टाली, इमाम की याचिका पर पुलिस का रुख़ पूछा

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

एनआईए स्टेन स्वामी की प्रतिष्ठा या लोगों के दिलों में उनकी जगह को धूमिल नहीं कर सकती

RTI क़ानून, हिंदू-राष्ट्र और मनरेगा पर क्या कहती हैं अरुणा रॉय? 

कश्मीर यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर को 2011 में लिखे लेख के लिए ग़िरफ़्तार किया गया

4 साल से जेल में बंद पत्रकार आसिफ़ सुल्तान पर ज़मानत के बाद लगाया गया पीएसए

गाँधी पर देशद्रोह का मामला चलने के सौ साल, क़ानून का ग़लत इस्तेमाल जारी

फादर स्टेन स्वामी की हिरासत में मौत 'हमेशा के लिए दाग': संयुक्त राष्ट्र समूह


बाकी खबरें

  • Ukraine
    स्टुअर्ट ब्राउन
    यूक्रेन: एक परमाणु संपन्न राज्य में युद्ध के खतरे
    03 Mar 2022
    यूक्रेन के ऊपर रूस के आक्रमण से परमाणु युद्ध का खतरा वास्तविक बन गया है। लेकिन क्या होगा यदि देश के 15 परमाणु उर्जा रिएक्टरों में से एक भी यदि गोलीबारी की चपेट में आ जाए?
  • banaras
    विजय विनीत
    यूपी का रणः मोदी के खिलाफ बगावत पर उतरे बनारस के अधिवक्ता, किसानों ने भी खोल दिया मोर्चा
    03 Mar 2022
    बनारस में ऐन चुनाव के वक्त पर मोदी के खिलाफ आंदोलन खड़ा होना भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं है। इसके तात्कालिक और दीर्घकालिक नतीजे देखने को मिल सकते हैं। तात्कालिक तो यह कि भाजपा के खिलाफ मतदान को बल…
  • Varanasi District
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनाव : बनारस की मशहूर और अनोखी पीतल पिचकारी का कारोबार पड़ रहा है फीका
    03 Mar 2022
    बढ़ती लागत और कारीगरों की घटती संख्या के कारण पिचकारी बनाने की पारंपरिक कला मर रही है, जिसके चलते यह छोटा उद्योग ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष रहा है।
  • migrants
    एपी
    एक सप्ताह में 10 लाख लोगों ने किया यूक्रेन से पलायन: संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी
    03 Mar 2022
    संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) के आंकड़ों के अनुसार, पलायन करने वाले लोगों की संख्या यूक्रेन की आबादी के दो प्रतिशत से अधिक है। विश्व बैंक के अनुसार 2020 के अंत में यूक्रेन की आबादी…
  • medical student
    एम.ओबैद
    सीटों की कमी और मोटी फीस के कारण मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं छात्र !
    03 Mar 2022
    विशेषज्ञों की मानें तो विदेशों में मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए जाने की दो मुख्य वजहें हैं। पहली वजह है यहां के सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में सीटों की संख्या में कमी और दूसरी वजह है प्राइवेट कॉलेजों…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License