NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
गौरी लंकेश : सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ मुखर आवाज़ बनने की कहानी
मुझे उनकी प्रतिबद्धता को लेकर अब भी कुछ संदेह था। लेकिन चिकमंगलुरू की तीसरी वार्षिक बैठक तक न सिर्फ वह पूरी तरह इस आंदोलन में शामिल हो चुकी थीं, बल्कि उन्होंने मुझे पूरी धमक के साथ ‘अपनी’ बैठक में शामिल होने का न्योता भी दिया था।  
राजेंद्र चेन्नी
05 Sep 2020
cartoon click

वह इतनी दुबली-पतली और कमजोर काया वाली थीं कि हम सब उन्हें “गुब्बाची” कहा करते थे। कन्नड़ में इसका मतलब छोटी गौरैया होता है। मतलब गौरैयों में भी सबसे छोटी गौरैया। लेकिन यह अनुवाद भी कन्नड़ में ‘गुब्बाची’ शब्द से प्रेम, स्नेह, सरपरस्ती और लाड़-प्यार जाहिर होने वाले एहसास को दिखाने में नाकाम है। 

जब गोलियों से छलनी उनकी कमजोर काया खून में सराबोर जमीन पर पड़ी थी, तब भी वह एक ‘गुब्बाची’ की तरह ही दिख रही थी। सदमे और दुख से भरे हममें से किसी को भी यह समझ नहीं आ रहा था कि इस छोटी और कमजोर देह को इस तरह गोलियों से कौन छलनी कर सकता है? इस छोटी ‘गौरैया’ के जादू को देख चुके हम जैसे बुजुर्गों के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था। हमने देखा था कि किस तरह वह नफरत की राजनीति से घिरी हैं। हमारे लिए यह विश्वास करना मुश्किल था कि ‘अति-पौरुषता’ से लबरेज राष्ट्रवादी ताकतें उनसे इस कदर चिंतित थीं कि उन्होंने उस छोटी से दुबली-पतली महिला को रास्ते से ही हटाने का फैसला कर लिया।

दुनिया जिन्हें गौरी लंकेश के नाम से जानती थीं, उनसे मैं केएस विमला के साथ मिला था। बेंगलुरू की गणेश देवी और दूसरी महिला कार्यकर्ताओं की तरह वह भी एक जुझारू और प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं। उस दिन, महिला आंदोलनकारियों का जो दल सीएम हाउस से निकल रहा था उसमें मैं भी शामिल था। हम सब एक शिष्टमंडल के साथ मुख्यमंत्री से मिलने गए थे। 30 अगस्त 2015 को कर्नाटक के धारवाड़ में प्रोफेसर एमएम कलबुर्गी की हत्या कर दी गई थी और हम मुख्यमंत्री से चाहते थे कि इस जघन्य हत्याकांड की जांच में तेजी लाई जाए। गौरी और विमला को भी इस दल के साथ जाना था। हालांकि मुख्यमंत्री अपने दो दफ्तरों (कृष्णा और कावेरी) में से किस में बैठे हैं, यह उन्हें पता नहीं था। लिहाजा जैसे ही हम बाहर निकले, दोनों हमारी और दौड़ीं। हमने दोनों से कहा कि वे सीएम से दोबारा मिलें और इसे मामले को आगे बढ़ाने को कहें।

जब मैंने लंकेश से पूछा कि क्या बाबा बुड़नगिरी विवाद पर कुछ हो सका तो उन्होंने अपनी चप्पलों की ओर इशारा करते हुए कहा कि देखिये ये पूरी तरह घिस चुकी हैं। हम सब वहां से चल दिए। इस मुलाकात के ठीक एक सप्ताह बाद गौरी लंकेश की गोली मार कर हत्या कर दी गई।

गौरी ने पिता की विरासत को पूरी मजबूती से आगे बढ़ाया

1980 में मैं शिवमोगा आया था लेकिन उस वक्त शायद ही मैंने गौरी का नाम सुना था। इसके कुछ साल बाद ही गौरी के पिता और कन्नड़ के दिग्गज लेखकों में से एक पी. लंकेश ने ‘लंकेश पत्रिका’ शुरू की थी। बाद में चलकर, यह टेबलॉयड बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में कर्नाटक के समाज की सबसे अहम परिघटनाओं में से एक साबित हुआ। मुझे याद है, लंकेश पत्रिका की लोकप्रियता के चरम दौर में पी. लंकेश शिवमोगा आए थे। और हम जैसे प्रशंसकों की भीड़ उन्हें छात्राओं से बात कराने के लिए एक गर्ल्स जूनियर कॉलेज में ले गई थी। लंकेश ने छात्राओं को देखा और उनके मुंह से निकल पड़ा ‘अरे! ये छोटी लड़कियां तो बिल्कु हमारी बेबी और गौरू जैसी हैं। बेबी का मतलब कविता लंकेश और गौरू मतलब गौरी लंकेश। आज चालीस साल बाद पी. लंकेश की आवाज और शब्द मुझे याद दिला रहे हैं कि वह अपनी बेटियों से किस कदर प्यार करते थे। और हां, तमाम बच्चों की तरह गौरी ने भी अपने पिता की विरासत को समझने में वक्त लगाया। लेकिन एक बार जब इसे समझ लिया तो पूरे दमखम के साथ इसे आगे भी ले गईं।

लंबे अंतराल के बाद हम फिर मिले। देर शाम शिवमोगा के एक कॉलेज के छोटे से अंधेरे से कमरे में। यह कमरा दलित नेता प्रोफेसर रचप्पा का था। हमने वहां ‘कोमु सौहार्द वेदिके’ (सांप्रदायिक सौहार्द फोरम) की स्थापना की। इस संगठन ने बाद में चिकमंगलुरू के बाबा बुड़नगिरी स्मारक को संरक्षित करने के आंदोलन की अगुआई की थी। बरसों से यह स्मारक हिंदू-मुस्लिम, खास कर दोनों समुदायों के गरीबों की साझा आस्था का केंद्र बना हुआ था। बीजेपी ने ऐलान किया था वह इस मुद्दे पर एक और गुजरात और बाबरी मस्जिद मामले को अंजाम दे देगी। लेकिन हममें से किसी ने यह नहीं सोचा था कि हमारी यह छोटी से मुलाकात सांप्रदायिकता के खिलाफ एक मजबूत आंदोलन का नेतृत्व संभाल लेगी। यह सिर्फ हमारी कोशिश की बदौलत नहीं हुआ था। यह आंदोलन पूरे राज्य का था जो कर्नाटक के बहुलतावादी परंपरा को बचाने के लिए पूरी मजबूती से खड़ा हो गया था। उस वक्त गौरी अपने ‘अंग्रेजी पत्रकार’ के दौर को पूरी तरह नहीं छोड़ पाई थीं। गौरी ने इस संगठन की कुछ शुरुआती बैठकों में हिस्सा लिया था। लेकिन मुझे उनकी प्रतिबद्धता को लेकर अब भी कुछ संदेह था। चिकमंगलुरू की तीसरी वार्षिक बैठक तक न सिर्फ वह पूरी तरह इस आंदोलन में शामिल हो चुकी थीं, बल्कि उन्होंने मुझे पूरी धमक के साथ ‘अपनी’ बैठक में शामिल होने का न्योता भी दिया था। 

सताए हुए लोगों की ‘अक्का’ बन गई थीं गौरी 

गौरी में काम के प्रति गजब का समर्पण था और इस वजह से हम उन्हें चाहने लगे थे। वह जो भी काम हाथ में लेती थीं, पूरी तरह उसमें डूब जाती थीं। इसके बाद सांप्रदायिकता की मुखालफत को उन्होंने अपना मिशन बना लिया था। बाद के दिनों में वह राज्य में हिंदुत्ववादी ताकतों के खिलाफ सबसे मजबूत आवाज बन कर उभरीं। ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ सांप्रदायिक सौहार्द का सबसे मजबूत मंच बन गई। गौरी ने धुर वामपंथ का समर्थन किया और उन्हें ‘नक्सलवादी पत्रकार’ कहा जाने लगा।

लेकिन इस बीच, गौरी में जो बदलाव हुआ, वह आश्चर्यचकित करने वाला था। हालांकि अब भी वह किसी अटल आइडीअलॉग (Ideologue) की तरह ही बातें करती थीं लेकिन वह एक तरह से सबकी ‘अक्का’ (दीदी) बन चुकी थीं। उन सभी गरीब, सैकड़ों मुकदमों के जरिये सताए और चौबीसों घंटों दक्षिणपंथियों के ट्रोल के शिकार लोगों की वह संरक्षिका बन गई थीं। लेकिन इस तमाम जद्दोजहद के बीच अपनी पत्रिका को चलाने के लिए उनके पास पैसा भी कम बचा था। लेकिन हमेशा की तरह उनका ई-बुलेटिन जरूर आता था। जोश और फुर्ती से पूरी तरह भरा हुआ। 

हमेशा से कइयों को यह एहसास ही नहीं था कि इतने दिनों में गौरी कैसे कन्नड़ छवि और स्मृति का अभिन्न हिस्सा बन गई थीं। कैसे वह हजारों लोगों के लिए संवेदना और समर्थन की प्रतीक बन गई थीं। बेंगलुरू में जब हम गौरी की हत्या के खिलाफ प्रदर्शन में उतरे तो हमारे बीच ‘मैं भी गौरी’ का ऐलान करते हुए युवाओं का सैलाब था। तब हमें समझ में आया कि कैसे ‘गुब्बाची’ का वह रूपक लोकतंत्र और तेजी से बढ़ी चली आ रही असहमति की आवाज बन गया था। हम बुजुर्ग लोग चीजों को कितनी देर में समझ पाते हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Remembering Gauri Lankesh: Adamant Ideologue to Some, Akka to the Underprivileged

gauri lankesh
Gauri Lankesh Patrike
Lankesh Patrike
MM Kalburgi
narendra dabholkar
karnataka
Bengaluru
Chikkamagluru

Related Stories

कर्नाटक पाठ्यपुस्तक संशोधन और कुवेम्पु के अपमान के विरोध में लेखकों का इस्तीफ़ा

अलविदा शहीद ए आज़म भगतसिंह! स्वागत डॉ हेडगेवार !

कर्नाटक: स्कूली किताबों में जोड़ा गया हेडगेवार का भाषण, भाजपा पर लगा शिक्षा के भगवाकरण का आरोप

नफ़रती Tool-Kit : ज्ञानवापी विवाद से लेकर कर्नाटक में बजरंगी हथियार ट्रेनिंग तक

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

कर्नाटक में बदनाम हुई भाजपा की बोम्मई सरकार, क्या दक्षिण भारत होगा- “भाजपा मुक्त”

आज़म खान-शिवपाल का साथ छोड़ना! क्या उबर पाएंगे अखिलेश यादव?

मंत्री पर 40 फीसदी कमीशन मांगने का आरोप लगाने वाला ठेकेदार होटल में मृत मिला

गुजरात दंगे और मोदी के कट्टर आलोचक होने के कारण देवगौड़ा की पत्नी को आयकर का नोटिस?

मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं, देश के ख़िलाफ़ है ये षडयंत्र


बाकी खबरें

  • CORONA
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 15 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 278 मरीज़ों की मौत
    23 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 15,102 नए मामले सामने आए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 28 लाख 67 हज़ार 31 हो गयी है।
  • cattle
    पीयूष शर्मा
    यूपी चुनाव: छुट्टा पशुओं की बड़ी समस्या, किसानों के साथ-साथ अब भाजपा भी हैरान-परेशान
    23 Feb 2022
    20वीं पशुगणना के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पूरे प्रदेश में 11.84 लाख छुट्टा गोवंश है, जो सड़कों पर खुला घूम रहा है और यह संख्या पिछली 19वीं पशुगणना से 17.3 प्रतिशत बढ़ी है ।
  • Awadh
    लाल बहादुर सिंह
    अवध: इस बार भाजपा के लिए अच्छे नहीं संकेत
    23 Feb 2022
    दरअसल चौथे-पांचवे चरण का कुरुक्षेत्र अवध अपने विशिष्ट इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना के कारण दक्षिणपंथी ताकतों के लिए सबसे उर्वर क्षेत्र रहा है। लेकिन इसकी सामाजिक-राजनीतिक संरचना और समीकरणों में…
  • रश्मि सहगल
    लखनऊ : कौन जीतेगा यूपी का दिल?
    23 Feb 2022
    यूपी चुनाव के चौथे चरण का मतदान जारी है। इस चरण पर सभी की निगाहें हैं क्योंकि इन क्षेत्रों में हर पार्टी की गहरी हिस्सेदारी है।
  • Aasha workers
    वर्षा सिंह
    आशा कार्यकर्ताओं की मानसिक सेहत का सीधा असर देश की सेहत पर!
    23 Feb 2022
    “....क्या इस सबका असर हमारी दिमागी हालत पर नहीं पड़ेगा? हमसे हमारे घरवाले भी ख़ुश नहीं रहते। हमारे बच्चे तक पूछते हैं कि तुमको मिलता क्या है जो तुम इतनी मेहनत करती हो? सर्दी हो या गर्मी, हमें एक दिन…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License