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अमेरिका
हिरोशिमा और अस्सी साल बाद परमाणु विध्वंस के ख़तरे को याद करते हुए
‘जब अमेरिका परमाणु परीक्षण को लेकर दूसरों को डराता-धमकाता हो, तो ऐसे में यह विश्वास कर पाना मुश्किल है कि परमाणु शक्ति के अपने ख़ुद के अधिकार के औचित्य को लेकर उसका पागलपन भरा नज़रिया उसके ज़्यादातर लोगों के श्वेत-वर्चस्व में विश्वास के साथ नहीं जुड़ा हो।’
प्रबीर पुरकायस्थ
07 Aug 2020
हिरोशिमा
हिरोशिमा परमाणु बम विस्फोट के 2-5 मिनट बाद का बादल। | फ़ोटो,साभार: विकिपीडिया

मानवता के एक वर्ग के ख़िलाफ़ परमाणु बम के पहले इस्तेमाल के 75 साल बाद यह 6 अगस्त की तारीख़ हमें परमाणु हथियारों की अमानवीयता और संपूर्ण मानव जीवन पर इसके ख़तरे की याद दिलाती है। लेकिन, इस वर्ष हमें दो नये सवालों का हल निकालना है। क्या राष्ट्रपति ट्रम्प के शासनकाल में अमेरिकी रणनीतिक प्रतिष्ठान के प्रमुख वर्ग का ऐसा मानना है कि परमाणु हथियार इस्तेमाल करने योग्य होते हैं और क्या कोई परमाणु युद्ध जीता जा सकता है? क्या यही वजह तो नहीं कि वे तमाम परमाणु हथियारों की संधियों से हट जाना चाहते हैं? श्वेत वर्चस्व परमाणु हथियार रखने के अपने अधिकार और इसके संभावित इस्तेमाल को लेकर अमेरिकी विश्वास को कितना अनुप्राणित करता है?

हममें से हर किसी ने अफ़्रीकी-अमेरिकी जॉर्ज फ़्लॉयड के गले पर एक सशस्त्र श्वेत पुलिस अफ़सर के घुटने के साथ उसके दम घोटते हुए वीडियो देखा है। यह श्वेत वर्चस्व की नग्न अभिव्यक्ति थी, जिसके ख़िलाफ़ होने वाले प्रदर्शन ने अमेरिका को अपने आगोश में ले लिया और दुनिया भर में इस विरोध के समर्थन में एकजुटता प्रदर्शित की गयी। सवाल है कि नागासाकी और तीन दिन बाद हिरोशिमा पर परमाणु बम के गिराये जाने में इस नस्लवाद का कितना योगदान रहा होगा?

परमाणु हथियार नियंत्रण संधि का ख़ात्मा

राष्ट्रपति ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका सभी परमाणु हथियार नियंत्रण संधियों को समाप्त करते हुए और जीत सकने वाले परमाणु युद्धों के सैन्य सिद्धांत को अपनाते हुए किसी परमाणु महायुद्ध की ज़िम्मेदारी का नेतृत्व कर रहा है। आख़िरी परमाणु निरोध संधि, जो अभी भी क़ायम है, वह START (Strategic Arms Reduction Treaty) है, यह संधि अमेरिका और रूस के सक्रिय विस्फ़ोट हथियारों की संख्या को 6,000 तक सीमित कर देती है। लेकिन, अतिरिक्त पांच वर्षों के लिए इस संधि का नवीनीकरण अगर नहीं होता है, तो अपनी पांच सालों की अवधि पूरी करने के बाद यह संधि फ़रवरी 2021 में समाप्त हो जायेगी।

इस संधि के नवीकरण पर होने वाली वार्ता ट्रम्प के शासनकाल में बहुत देर से शुरू हुई है, जिसमें मार्शल बिलिंग्सल की अगुवाई में अमेरिका की ओर से मांग की गयी है कि इस संधि को चीन के शामिल होने पर ही नवीनीकृत किया जाना चाहिए, और यह भी कि “इस संधि में मज़बूत सत्यापित किये जाने वाले उपाय हों, ताकि इसके अंतर्गत सभी परमाणु हथियार शामिल हों”।

अमेरिका और रूस में से प्रत्येक के पास 6,000 परमाणु हथियार हैं, इसके मुक़ाबले चीन के पास तक़रीबन 300 परमाणु हथियार हैं। अमेरिका ने अभी तक यह साफ़ नहीं किया है कि चीन को शामिल क्यों किया जाना चाहिए, लेकिन 300 परमाणु हथियार वाले फ़्रांस या 250 परमाणु हथियार वाले यूके को क्यों नहीं नहीं शामिल किया जाना चाहिए। न तो यह साफ़ करने की कोई जहमत उठायी गयी है कि आख़िर मूल SALT (Strategic Arms Limitation Talks) में क्या दिक़्क़त थी, और बाद में START के विज़न के साथ क्या समस्या है कि अन्य परमाणु हथियार वाले देशों को शामिल करने से पहले अमेरिका और सोवियत संघ के बहुत बड़े परमाणु हथियारों के ज़ख़ीरे को पहले हल किये जाने की ज़रूरत नहीं है।

बिल्लिंग्स्लिया ने अधिकृत तौर पर यह भी कहा है कि राष्ट्रपति ट्रम्प और उनका, दोनों का मानना है कि परमाणु दौड़ जीती जा सकती है। हडसन इंस्टीट्यूट में अपने सवाल-जवाब सत्र में उन्होंने कहा, "राष्ट्रपति ने साफ़ कर दिया है कि हमारे यहां एक आज़मायी हुई और भरोसेमंद कार्यप्रणाली  है ... हम जानते हैं कि इन (हथियारों) दौड़ को कैसे जीतना है। और हम यह भी जानते हैं कि प्रतिद्वंद्वी को गुमनाम तरीक़े से किस तरह ख़त्म कर देना है।”

वार्ता का पहला चरण 22 जून को ब्रुसेल्स में हुआ, जिसमें इस वार्ता में 'चीन की ग़ैर-मौजूदगी पर ध्यान खींचने का अमेरिकी बचकाना रवैया दिखा। ग़ौरतलब है कि चीन इस नयी START संधि या उसके पूर्ववर्ती, START और SALT संधि का कोई पक्षकार देश नहीं है। 24 जून को प्रेस को जानकारी देते हुए बिल्लिंग्स्लिया ने कहा कि अमेरिकी पक्ष ने न सिर्फ़ इन वार्ताओं में चीन को शामिल किये जाने, बल्कि नये सत्यापन उपायों की एक सीमा का मुद्दा भी उठाया है, और सामरिक और रणनीतिक (या युद्धक्षेत्र),दोनों ही परमाणु हथियार को शामिल किये जाने के मुद्दा भी उठाये हैं। यह बात अजीब इसलिए है, क्योंकि यह अमेरिका ही है,जो मध्यम दूरी परमाणु शक्ति (INF) संधि से बाहर निकल गया है। क्योंकि वह अधिक महत्वाकांक्षी उपायों पर आगे की चर्चा जारी रखना चाहता है, इसलिए अमेरिका के पास जो कुछ भी है,उसके आधार पर पांच साल के लिए इस नयी START संधि के स्वत: विस्तार से कुछ भी नहीं रोकता है।'

एक ज़्यादा महत्वाकांक्षी परमाणु हथियार नियंत्रण संधि निश्चित रूप से ट्रम्प प्रशासन का मक़सद नहीं है। इसके बजाय, अमेरिका इन संधियों से बाहर निकलने के बहाने के तौर पर विवाद पैदा करता रहता है। पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता और ईरान परमाणु समझौता ट्रम्प प्रशासन द्वारा लंबी और कठिन बातचीत के ज़रिये तैयार की गयी संधियों से बाहर निकल जाने के कृत्यों के उदाहरण हैं।

श्वेत सर्वोच्चता और अमेरिकी परमाणु वर्चस्व सिद्धांत

सवाल है कि हिरोशिमा और नागासाकी में की गयी बमबारी को मैं श्वेत वर्चस्ववाद से क्यों जोड़ता हूं? विश्व इतिहास हमारे लिए तबतक समझना मुश्किल है जब तक कि हम अर्थव्यवस्था, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसी अन्य श्रेणियों में इस नस्लवाद को भी नहीं जोड़ते। पश्चिमी के लोगों के लिए उनका आत्मज्ञान और पश्चिम सभ्यता उनका मिशन है। पश्चिम से मेरा मतलब पश्चिम का वैचारिक निर्माण से है, जैसा कि वह किसी ग्लोब पर दिखायी देता है; जहां आप इस वक्त हैं,वहां से एक भौगोलिक पश्चिम या भौगोलिक पूर्व विशुद्ध रूप से सापेक्ष भौगोलिक क्षेत्र है।

एक संरचना के तौर पर पश्चिम, पश्चिमी यूरोपीय उपनिवेशवादियों द्वारा अपनायी गयी क्रूरता, दासता और नरसंहार के इतिहास को छुपा लेता है, जिन्हें "श्वेतों के बोझ" और उसके सभ्यता मिशन के साथ जोड़ दिया गया है। आज ज़्यादातर लोगों का मानना है कि वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति के कारण ही पश्चिमी यूरोप में औद्योगिक क्रांति सबसे पहले आयी और इससे दुनिया के बाक़ी हिस्सों में उनके भीतर उपनिवेश स्थापित करने की क्षमता पैदा हुई। उन्हें यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि यह दरअस्ल उपनिवेशों और दास व्यापार की लूट थी, या मार्क्स के शब्दों में पूंजी का वह आदिम संचय था, जिसने औद्योगिक क्रांति के लिए पूंजी मुहैया करायी थी।

लिखित और पढ़ाया जाने वाला दुनिया का इतिहास, ग्रीस, रोम, मध्ययुगीन यूरोप और फिर पश्चिमी यूरोप की दुनिया भर में "समुद्री खोज" के ज़रिये दुनिया की खोज का इतिहास है। यह वही इतिहास है,जहां बाक़ी दुनिया,विश्व इतिहास में प्रवेश करती है। केन्या के इतिहासकार,बेथवेल ओगोट लिखते हैं, "इसका नतीजा यह हुआ कि अफ़्रीका के इतिहास का ज़्यादतर हिस्सा अफ़्रीका में यूरोपीय लोगों के उस इतिहास के रूप में देखा जाने लगा, जो पश्चिमी यूरोप की ऐतिहासिक प्रगति और विकास का एक हिस्सा था और महानगर के राष्ट्रीय इतिहास का शेष हिस्सा बन गया।"

अमेरिका में स्पेन और पुर्तगाल जैसे पश्चिम देश सोने और चांदी की लूटपाट की और नरसंहार को अपना ज़रिया बनाते हुए वहां के मूल निवासियों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। वहां की मूल आबादी के इतिहास को मिटा दिया गया, स्पेनिश पुजारियों ने वहां की माया सभ्यता की पांडुलिपियों में दर्ज उनके भौतिक रूप से बहुमूल्य इतिहास, विज्ञान और गणित को जला दिये। इस लिहाज से एशियाई उपनिवेशों को तुलनात्मक रूप से कम नुकसान का सामना करना पड़ा: भारत ने तो ‘सिर्फ़’ अपने यहां अकालों की हाहाकार, उद्योगों का विध्वंस और अपने को लूटते होते हुए देखा; चीन को तीन अफ़ीम युद्धों के बाद उनके निर्मित उत्पादों के बदले अफ़ीम लेने के लिए मजबूर किया गया । लेकिन अफ़्रीका, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की तरह यहां गुलामी और नरसंहार नहीं थे।

क्या इसी श्रेष्ठ पश्चिमी सभ्यता और उसके लोगों की विचारधारा ने जापान को पहले और दूसरे परमाणु बम के इस्तेमाल वाली जगह के रूप में चुनने में भूमिका नहीं निभायी होगी ? थर्मोन्यूक्लियर मोनार्की: डेमोक्रेसी और डूम एंड द बॉडी इन पेन, द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ द वर्ल्ड, द बुलेटिन ऑफ एटॉमिक साइंटिस्ट्स की लेखिका, इलेन स्कैरी लिखती हैं, “नस्लवाद एक ऐसा विचार है,जो सिर्फ़ यह नहीं कहता कि एक ख़ास रंग की चमड़ी या नस्लीय मूल के लोग योग्य नहीं होते...बल्कि, एक शब्द में कहा जाये,तो वह यह भी बताता है कि ऐसे लोगों इस्तेमाल और नष्ट करने योग्य होते हैं।”

पश्चिम के लोगों ने हिरोशिमा पर बमबारी को लेकर ख़ुद को यह समझाते हुए जश्न मनाया था कि इससे जापान को आत्मसमर्पण करना पड़ा और अमेरिकी लोगों की ज़िंदगी तबाह होने से बच गयी। लेकिन, ऐसा बिल्कुल नहीं था। अमेरिकी कवि, सामाजिक कार्यकर्ता, उपन्यासकार, नाटककार,लैंगस्टन ह्यूजेस के उस विवरण की याद दिलाते हुए इलेन स्कैरी लिखती हैं, "इस अश्वेत कवि ने 1,00,000 लोगों को मौत की सज़ा देने की नैतिक दुराचार को शीघ्र पहचान लिया था और नस्लवाद को एक ऐसी परिघटना के तौर पर देख लिया था, जिसने दुराचार को लाइसेंस दे दिया था।"

भौतिक वैज्ञानिक,यांगयांग चेंग ने ‘बुलेटिन ऑफ़ एटॉमिक साइंटिस्ट्स’ में लिखा है: “अमेरिका के पूरे इतिहास में ग़ैर-श्वेतों के साथ लगातार अमानुषिक व्यवहार किया गया है, और उन्हें एक ऐसे मनुष्य के तौर देखा गया,जो इंसान की तुलना में कमतर है और जिसे दुश्मन क़रार देकर मारना या मारने पर विचार करना आसान है। अगर यह मान भी लिया जाये कि नस्लवाद ने जापान में बम के इस्तेमाल का फ़ैसला नहीं भी लिया हो, तो निश्चित रूप से इसके लिए इसे स्वीकार करना आसान हो गया।”

इसके लिए स्कैरी तीन सूचियां भी देती है, “उन क्षेत्रों की सूची, जहां अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने पहला प्रहार शुरू करने पर विचार किया था ; उन क्षेत्रों की सूची, जहां संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने बमों का परीक्षण किया है; और उन देशों की सूची,जिनकी आकांक्षा परमाणु हथियार हासिल करने की है और अमेरिका जिसकी निंदा करता है...ये सब मिलकर परमाणु वास्तुकला के नस्लीय आधारों को अचूक बना देते हैं।”

जिन भौगोलिक क्षेत्रों पर अमेरिका ने परमाणु बम के इस्तेमाल की धमकी दी है, वे हैं-उत्तर कोरिया, चीन, वियतनाम और इराक़,ये क्षेत्र क्रमश: ट्रूमैन, आइज़नहावर और निक्सन के चुने  हुए क्षेत्र हैं। आइज़नहावर ने ताइवान जलसंधि को लेकर चीन को धमकी दी थी और लिंडन जॉनसन ने परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए चीन के ख़िलाफ़ परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर विचार किया था। हम यह भी जानते हैं कि निक्सन ने उत्तरी वियतनाम के ख़िलाफ़ परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर विचार किया था। और जॉर्ज बुश को भला कैसे भुलाया जा  सकता है,जिन्होंने इराक़ युद्ध के दौरान इराक़ के ख़िलाफ़ परमाणु हमले की योजना बनायी थी।

डैन ज़क के हवाले से स्कैरी ने यह भी बताया है कि परमाणु हथियारों का परीक्षण कहां किया गया था। मार्शल द्वीपसमूह 1946 और 1958 के बीच 67 उच्च-क्षमता वाले परमाणु बमों के गवाह बने, अमेरिका ने "इन मार्शल द्वीपों पर बसे लोगों को फिर से कहीं और बसाया, इन द्वीपों पर रेडियोधर्मी पदार्थ इकट्ठे हुए और आने वाली पीढ़ियां निर्वासित होती रहीं और  पीढ़ी-दर-पीढ़ी बीमार होती रही।" 16 जुलाई, 1945 को न्यू मैक्सिको के ट्रिनिटी में किये गये परमाणु परीक्षण में हवा के साथ जो नुकसानदेह कण घुल गये,उनसे "बड़े पैमाने पर खेतिहर परिवार, जिनमें से ज़्यादतर हिस्पैनिक और मूल निवासी थे,प्रभावित हुए।" अपने मूल निवासी और हिस्पैनिक आबादी के लिए इस प्रत्याशित नतीजों के बावजूद इस न्यू मैक्सिको में 1950 और 1960 के दशक के दौरान लगातार परीक्षण होते रहे।

स्कैरी अपनी तीसरी सूची में उन सभी देशों के नेताओं और वैज्ञानिकों के बारे में बात करती हैं,जिन्हें अमेरिका ने परमाणु हथियार विकसित करने की उनकी आकांक्षा को लेकर धमकी दी है। वह लिखती हैं, “संयुक्त राज्य अमेरिका ने परमाणु हथियार को हासिल करने की आकांक्षा रखने वाले इन ग़ैर-श्वेतों-ईरानियों, इराक़ियों, लीबियाइयों, उत्तर कोरियाइयों से अलग-अलग तरीक़े से निपटा है,और अजीब बात है कि ऐसा करते हुए इन्हें अनैतिक माना गया गया है,जबकि हमारे अपने पास विशाल परमाणु संरचना है और 1995 में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में हमारे पास एक परमाणु शस्त्रागार होने की बात का क़ुबूलनामे, इसके इस्तेमाल की धमकी, इसका इस्तेमाल किये जाने, और इसका पहली बार इस्तेमाल करने हुए हमारा बयान दर्ज है और चकित करने वाली है कि ये सभी  ‘नरसंहार अपराध की रोकथाम और सज़ा पर कन्वेंशन जैसे संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का उल्लंघन नहीं करते।”

जब अमेरिका परमाणु परीक्षण को लेकर दूसरों को डराता-धमकाता हो,तो ऐसे में यह विश्वास कर पाना मुश्किल है कि परमाणु शक्ति के अपने ख़ुद के अधिकार के औचित्य को लेकर उसका पागलपन भरा नज़रिया उसके ज़्यादातर लोगों के श्वेत-वर्चस्व में विश्वास के साथ नहीं जुड़ा हो।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Remembering Hiroshima and the Threat of Nuclear Extinction, Eighty Years On

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