NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
10 साल पुराने 'अंतरिम' आदेश से हो रहा सूचना आयोग का प्रबंधन, RTI एक्ट ख़तरे में
सूचना के अधिकार को ख़तरा सिर्फ़ सरकार से नहीं, बल्कि ख़ुद केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के भीतर से भी है।
निपुण अरोरा, अनन्या मेहन
17 Jul 2020
सूचना के अधिकार

सुप्रीम कोर्ट के एक दस साल पुराने आदेश जिससे केंद्रीय सूचना आयोग की प्रक्रियाओं का प्रबंधन होता है, उस आदेश पर टिप्पणी करते हुए लेखक हर वक़्त में कानून के राज को बनाए रखने की अहमियत बता रहे हैं। भले ही आपकी मंशा कितनी भी अच्छी हो, पर कानून द्वारा दी गई ताकतों के परे जाना एक ख़तरनाक रपटीला मोड़ है।

                                                                                      ———

पूर्व सूचना आयु्क्तों समेत कुछ कार्यकर्ताओं और विद्वानों ने सरकार द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) को कमजोर करने पर चिंता जताई है। हालांकि सूचना के अधिकार को खतरा सिर्फ़ सरकार से नहीं, बल्कि केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के भीतर से भी है। 

''सूचना का अधिकार कानून, 2005'' के अंतर्गत CIC को एक अपीलीय संस्था के तौर पर सीधे जानकारी देने का अधिकार मिला है। आयोग उन अधिकारियों के खिलाफ़ सीधे कार्रवाई कर सकता है, जो जानबूझकर सूचना को छिपाते हैं। इस तरह एक अहम लोकतांत्रिक अधिकार के सुचारू क्रियानव्यन में CIC एक अहम भूमिका अदा करता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2009 में केंद्रीय सूचना आयोग के क्रियान्वयन को अवैधानिक घोषित कर दिया था। लेकिन इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया। यह अपने आपमें बेहद अजीब है कि एक ऐसा संस्थान जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए इतना अहम है, वह दस साल पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक अस्थायी रोक के आदेश पर चल रहा है और इस ऑर्डर पर तबसे कोई अंतिम सुनवाई नहीं हुई है। 

दस साल एक लंबा वक़्त होता है।

DDA(दिल्ली विकास प्राधिकरण) और CIC का विवाद

केंद्रीय सूचना आयुक्त द्वारा दिल्ली विकास प्राधिकरण के वाइस चेयरमैन को समन भेजे जाने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश आया था। CIC ने यह आदेश RTI कानून के तहत दिया था, जिसके अंतर्गत CIC किसी सार्वजनिक अधिकारी को पेश होने के लिए कह सकता है। समन जारी होने के बावजूद जब संबंधित IAS अधिकारी CIC के सामने हाज़िर नहीं हुआ, तो CIC ने DDA के मामलों में जांच के आदेश दे दिए।

DDA ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने DDA का पक्ष सही माना और अपने परीक्षण में कहा कि आयोग, RTI कानून के मुताबिक़ काम नहीं कर रहा है।

अपने आदेश में टिप्पणी कते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्रीय सूचना आयोग पीठ-व्यवस्था (बेंच सिस्टम) का पालन कर रहा है, जहां आयोग का हर सदस्य अलग-अलग बैठता और फ़ैसला देता है। यह वैसा ही है, जैसा हाईकोर्ट में होता है। लेकिन RTI कानून, सूचना आयोग के सदस्यों को एक साथ बैठकर मामले पर फ़ैसला देने के लिए बाध्य करता है।

CIC ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की और हाईकोर्ट के आदेश पर एक अंतिरम रोक ले ली। इसके बाद हुई सुनवाईयों में सरकार ने कहा कि वे नियमों में फेरबदल कर रहे हैं, ताकि RTI कानून से इसका एका हो सके। इस हिसाब से जरूरी बदलाव करने के लिए सरकार को 8 हफ़्ते का वक़्त दिया गया।

लेकिन यह कई साल पहले की बात है। तबसे न तो कानून में कोई संशोधन हुए और न ही यह मामला सुनवाई के लिए आया।

पारदर्शिता और नियमित्ता हो रही हैं प्रभावित

कोर्ट के आदेश का केंद्रीय सूचना आयोग में पारदर्शिता और नियमित्ता पर सीधा असर पड़ा। जैसे सुप्रीम कोर्ट पर अकसर आरोप लगते रहे हैं, केंद्रीय सूचना आयोग में भी मनमुताबिक़़ पीठ से संबंधित आरोप लगाए गए। सूचना आयुक्तों का रोस्टर प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री से संबंधित आदेश के बाद बदल दिया गया। उस आदेश में दिल्ली विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री से संबंधित जानकारियों को सार्वजनिक करने को कहा गया था।

अगर दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दी गई व्याख्या को मान लिया जाए, तो इस तरह के विवाद के लिए कोई जगह ही नहीं बचेगी। बल्कि इससे और ज़्यादा पारदर्शिता आएगी और आयोग के भीतर एक लोकतांत्रिक ढांचा खड़ा होगा। सभी सूचना आयुक्त अपना मत रख सकेंगे और एक-दूसरे से बिना डर के असहमतियां भी जता सकेंगे।

यह स्थिति वैसी ही होगी, जैसी RTI कानून में अपेक्षा की गई है, जिसमें एक ऐसे संगठन की आकांक्षा है, जो हर क्षेत्र के विशेषज्ञों का लाभ ले सके। कानून की धारा 12 कहती है, ''आयुक्तों को सार्वजनिक क्षेत्र का एक अहम व्यक्ति होना चाहिए, जिसके पास बड़े स्तर पर कानून, विज्ञान, तकनीक, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, मास मीडिया या प्रशासन और शासन का ज्ञान और अनुभव हो।'' बल्कि जब हर क्षेत्र से जुड़े बौद्धिक लोग सामूहिक तौर पर किसी सूचना के सार्वजनिक किए जाने के बारे में फैसला करेंगे, तो फ़ैसले में बेहतर गुणवत्ता आएगी।

इस तरह की सामूहिक बैठक से सूचना आयोग में विरोधाभासी और विवादित आदेशों की समस्या भी हल हो जाएगी। इस तरह एक सूचना आयुक्त किसी जानकारी को सार्वजनिक करने का आदेश दे सकेगा, वहीं दूसरा उसे खारिज़ कर सकेगा। सूचना आयोग की सामूहिक बैठक से किसी मामले में फ़ैसला कानून के मूल्यों पर आधारित होगा, ना कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि किसकी टेबल पर कौन सी फाइल पहुंचती है।

लोकतांत्रिक ताने-बाने की पवित्रता दांव पर 

एक अंतरिम आदेश पर दशक भर से जारी आयोग का प्रबंधन और उसके बाद सुनवाईयों का न होना, हमारे देश की हालत और यहां जारी 'कानून के राज' की पतली हालत को बयां करता है। कानून के राज की बुनियाद इस बात में है कि सभी संस्थानों कानून का पालन करें और अपने अधिकारों के पार जाकर किसी भी तरह का काम न करें। यह तब और भी अहम हो जाता है, जब मामला एक ऐसे संस्थान से जुड़ा हो, जो लोकतांत्रिक ताने-बाने को बरकरार रखने के लिए ज़िम्मेदार है।

कानून द्वारा दिए गए न्यायक्षेत्र के परे जाकर काम करने की प्रवृत्ति सीधे लोकतंत्र को ही खतरा पैदा करती है, यह मायने नहीं रखता कि संबंधित अधिकारी की मंशा कितनी अच्छी थी। अगर संस्थान द्वारा पालन की जाने वाली प्रक्रिया में कोई भटकाव आता है, तो उसकी वैधता के लिए विधायिका का आधार मिलना जरूरी है।

लेकिन 'कानून के राज' वाले नज़रिए से भी स्थिति में पेचीदगी बन सकती है। बिलकुल वैसे, जैसे अभी बनी हुई है। दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश एक वजनदार तर्क पर आधारित था, इसकी व्याख्या विस्तार से की गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक लाइन में अंतरिम रोक का आदेश दे दिया। तबसे आयोग का क्रियान्वयन कानून की ताकत से नहीं, न ही तार्किक पूर्व उदाहरणों से चल रहा है। बल्कि इसका प्रबंधन एक अंतरिम आदेश से हो रहा है, जो एक दशक पहले दिया गया था।

अगर आयोग या सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि RTI का सही से पालन करने के लिए पीठ-व्यवस्था ही सही है, तो भी कानून के राज की बुनियाद के लिए इसका तर्क जानना ज़रूरी है। यह तभी होगा, जब सुप्रीम कोर्ट इस पर कोई अंतिम आदेश देगा।

निपुण अरोरा दिल्ली में प्रैक्टिस करने वाली वकील हैं। अन्नया मेहन दिल्ली हाईकोर्ट में रिसर्चर हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस आलेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Right to Information Act Under Threat as Ten-Year Old ‘Interim’ Order Holds CIC Together

right to information
attack on RTI
dilution of RTI
Central Information Commission
Transparency

Related Stories

आरटीआई अधिनियम का 16वां साल: निष्क्रिय आयोग, नहीं निपटाया जा रहा बकाया काम

गुजरात: जातिगत अत्याचारों के ज्यादातर आरोपी खुले में घूम रहे, आसानी से मिल जाती है जमानत

आरटीआई से खुलासा: संकट में भी काम नहीं आ रही प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना

जम्मू-कश्मीर में आरटीआई क़ानून : एक मौक़ा जिसे गँवा दिया गया

मोदी राज में सूचना-पारदर्शिता पर तीखा हमला ः अंजलि भारद्वाज

सूचना का अधिकार क़ानून के 15 साल

सरकारी बैंकों में अप्रैल-दिसंबर,19 के बीच 1.17 लाख करोड़ रुपये की धोखाधड़ी: आरटीआई

सूचना के अधिकार को कमज़ोर करना चाहती है मोदी सरकार

कॉर्पोरेट फंडिंग पर लगाम न लगी तो देश में चुनाव आईपीएल में तब्दील हो जाएंगे!

बीजेपी ने पिछले पांच वर्षों में 'पारदर्शिता' को कुचल दिया!


बाकी खबरें

  • प्रत्यक्ष कक्षाओं की बहाली को लेकर छात्र संगठनों का रोष प्रदर्शन, जेएनयू, डीयू और जामिया करेंगे  बैठक में जल्द निर्णय
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    प्रत्यक्ष कक्षाओं की बहाली को लेकर छात्र संगठनों का रोष प्रदर्शन, जेएनयू, डीयू और जामिया करेंगे  बैठक में जल्द निर्णय
    28 Aug 2021
    इस महीने की शुरुआत में दिल्ली विश्वविद्यालय ने एक आधिकारिक अधिसूचना जारी कर कोरोना वायरस के मामलों में कमी का हवाला देते हुए विज्ञान विषय के छात्रों के लिए प्रत्यक्ष कक्षाएं दोबारा शुरू करने की घोषणा…
  • मोदी
    अनिल सिन्हा
    अफ़ग़ानिस्तानः क्या मोदी और भाजपा अपनी ही विदेश नीति के ख़िलाफ़ हैं?
    28 Aug 2021
    हमारी विफलता का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, लेकिन अफ़ग़ान संकट पर हो रहे अंतरराष्टीय स्तर के सलाह-मशविरों में हमारे लिए कोई जगह नहीं है। अंतरराष्ट्रीय…
  • उत्तरी दिल्ली नगर निगम सदन में नोवेल्टी सिनेमा ज़मीन की बिक्री को लेकर हंगामा, आप ने लगाए गंभीर आरोप
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    उत्तरी दिल्ली नगर निगम सदन में नोवेल्टी सिनेमा ज़मीन की बिक्री को लेकर हंगामा, आप ने लगाए गंभीर आरोप
    28 Aug 2021
    आम आदमी पार्टी बीजेपी पर 200 करोड़ के नॉवेल्टी सिनेमा की ज़मीन  को 34 करोड़ में बेचने का आरोप लगा रही है।  इसको लेकर वो सड़क से सदन तक अपन विरोध जता रही है।  
  • खोरी गांव की मजदूर आवास संघर्ष समिति ने सुप्रीम कोर्ट में पेश की रिपोर्ट, कोर्ट ने हरियाणा सरकार से मांगा जवाब
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    खोरी गांव की मजदूर आवास संघर्ष समिति ने सुप्रीम कोर्ट में पेश की रिपोर्ट, कोर्ट ने हरियाणा सरकार से मांगा जवाब
    28 Aug 2021
    मजदूर आवाज संघर्ष समिति खोरी गांव की तरफ से तैयार की गई रिपोर्ट के प्रस्तुत किए जाने के बाद अदालत ने हरियाणा सरकार को इस रिपोर्ट पर अपना जवाब प्रस्तुत करने हेतु आदेश दे दिया है।
  • कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में क़रीब 47 हज़ार नए मामले, 509 मरीज़ों की मौत
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में क़रीब 47 हज़ार नए मामले, 509 मरीज़ों की मौत
    28 Aug 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 1.10 फ़ीसदी यानी 3 लाख 59 हज़ार 775 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License