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राजनीति
शाहीन बाग़ आंदोलन को प्रायोजित बताना देश की महिलाओं का अपमान
आम आदमी पार्टी देश की आम महिलाओँ के उस ऐतिहासिक संघर्ष को कलंकित करने का दुस्साहस कर रही है, जिसकी तारीफ़ पूरी दुनिया में हुई है। ख़ासतौर पर मुस्लिम महिलाएं पहली बार बंदिशों तो तोड़ कर अपने अधिकार और पहचान के लिए सड़कों पर उतरीं। कड़ाके की ठंड और पुलिस की लाठियों की परवाह किए बिना उन्होंने अपने संघर्ष को जारी रखा। यदि यह आंदोलन प्रायोजित था तो फिर अन्ना आंदोलन क्या था?
अफ़ज़ल इमाम
23 Aug 2020
शाहीन बाग़

आम आदमी पार्टी (आप) ने एनआरसी और सीएए के मुद्दों को लेकर दिल्ली के शाहीन बाग़ में हुए आंदोलन को भाजपा प्रायोजित बता कर लाखों लोगों और विशेषरूप से महिलाओं का अपमान किया है। शाहीन बाग तो सिर्फ़ महिलाओं का धरना था, लेकिन इसकी चिंगारी देशभर में फैली और लाखों जनता सड़कों पर उतर पड़ी और इस तरह के धरने कई शहरों में शुरू हो गए। हैरत की बात है कि जो पार्टी ख़ुद अपने को अन्ना आंदोलन की पैदावार बताती है, वह संविधान की रक्षा के लिए हुए देशव्यापी आंदोलन और जनता के सामूहिक विवेक पर सवाल खड़े कर रही है। कुछ लोगों को लगता है कि यह अपरिपक्व बयान था, लेकिन आम आदमी पार्टी की अब तक की राजनीति और उसके इतिहास को देखा जाए तो यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगता है, क्योंकि पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज से लेकर संजय सिंह की भाषा एक ही है। पिछले 6 वर्षों के दौरान देश के बदले हुए मिज़ाज को देखते हुए यह पार्टी किसी भी तरह से अल्पसंख्यकों के साथ खड़े दिखने का जोखिम नहीं उठाना चाहती है। उसकी चिंता सिर्फ़ हिन्दू वोटरों को साधने की है। उसे लगता है कि मुस्लिम व अन्य अल्पसंख्यक तो मजबूरी में उसे वोट देंगे ही। वैसे यह सोच आम आदमी पार्टी के अलावा कुछ अन्य दलों में भी दिखाई पड़ती है, हालांकि लिंचिंग व मुसलमानों से जुड़े अन्य मुद्दों पर उनकी ओर से बयान व ट्वीट आ जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि पिछले 18 अगस्त को शाहीन बाग़ के कुछ लोग भाजपा में शामिल हो गए। बताया गया कि इनमें से दो-तीन लोगों ने एनआरसी आंदोलन में हिस्सा लिया था। यदि इस बात को सच भी मान ली जाए तो, यह धरना किसी पार्टी या संगठन का तो था नहीं और इसका कोई नेता भी नहीं था। इसमें विभिन्न राजनीतिक पार्टियों व सामाजिक संगठनों के लोग का आना-जाना लगा रहता था। धरने में तो कुछ ऐसे लोग भी पकड़ गए थे जो ‘स्टिंग आपरेशन’ करने और व्यवधान की फिराक में थे। बाद में उनकी असलियत पता चली कि वे किसी संगठन से संबंधित थे? इन सारी बातों को जानने के बावजूद आम आदमी पार्टी ने न सिर्फ यह कहा कि आंदोलन की पटकथा भाजपा ने लिखी थी, बल्कि यह आरोप भी लगाया कि धरनें में देश विरोधी नारे लगे। दरअसल उसने दिल्ली चुनाव के पहले से ही अपनी लाईन तय कर ली थी। यही कारण है कि जब उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने शाहीन बाग़ के पक्ष में बयान दिया था, तो पार्टी ने उससे अपनी कन्नी काट ली थी। इसके बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने को बजरंगबली के भक्त के रूप में पेश किया और चुनाव खत्म होने के बाद भी सौरभ भारद्वाज ने राजधानी में हर माह के पहले मंगलवार को सुंदरकांड का पाठ कराने की घोषणा कर दी।

अब उस पर कितना अमल हुआ यह अलग बात है! चुनावों के दौरान धर्म और धार्मिक नारों के इस्तेमाल का चलन बढ़ गया है, इसलिए अल्पसंख्यक वोटरों ने इसे कोई अहमियत नहीं दी और थोक के हिसाब से आम आदमी पार्टी को वोट दिया। लिहाजा इस चुनाव में भी उसे को जबरदस्त जीत हासिल हुई, लेकिन अब उसके व्यवहार में काफ़ी बदलाव नज़र आ रहा है। ऐसा लगता है कि केजरीवाल ‘डेवलपमेंट और गुडगवर्नेंस’ के नारे के साथ अन्य विपक्षी दलों से अलग दिखते हुए अपनी पार्टी को भाजपा के विकल्प के रूप में पेश करना चाहते हैं। 16 फ़रवरी को उनके शपथग्रहण समारोह में न सिर्फ लोगों से आह्वान किया गया कि वे ‘राष्ट्र निर्माण’ के लिए आम आदमी पार्टी से जुड़े, बल्कि उन्होंने यह भी कहा कि वे पीएम मोदी से आशीर्वाद चाहते हैं। इसके ठीक तीसरे दिन वे गृहमंत्री अमित शाह से मिलने पहुंचे और फिर बयान दिया कि बैठक फलदायी रही। फिर एक हफ़्ते बाद उनकी सरकार ने जेएन यू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी भी दे दी। सरकार बनने के बाद भी उन्होंने जेएनयू में गुडों के हमलों और जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में पुलिस बर्बरता के मुद्दे पर कुछ नहीं किया। इसबीच एनआरसी का आंदोलन चल ही रहा था कि जाफ़राबाद में समेत उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई क्षेत्रों में दंगे भड़क गए। इसमें आम आदमी पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए कपिल मिश्रा का नाम काफी सुर्खियों रहा, लेकिन पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। इस भीषण दंगे में करीब 52 लोगों की जाने गईं और 526 लोग घायल हुए। माली नुकसान भी बहुत हुआ। राजधानी में जारी हिंसा के बीच केजरीवाल अपने कुछ मंत्रियों के साथ महात्मा गांधी की समाधि पर पहुंचे और वहां शांति के लिए प्रार्थना की। अपने एक बयान में उन्होंने सेना बुलाने की बात जरूर कही थी, लेकिन इसकी सिफारिश नहीं की। यदि दंगा प्रभावित क्षेत्रों में सेना लगा दी गई होती तो शायद इतनी जाने न जाती।

ध्यान रहे कि केजरीवाल ने जब अपनी पार्टी बनाई थी तो दावा किया था कि वे व्यवस्था परिवर्तन के लिए राजनीति में आए हैं। सांप्रदायिक्ता व सामाजिक न्याय के मुद्दों पर तो वे पहले भी नहीं बोलते थे, लेकिन अब भ्रष्टाचार पर भी मौन हो गए हैं। पिछले 6 वर्षों में उन्हें कहीं पर भी कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई। सत्ता हासिल करने के लिए वे भी वही सारे फ़ंडे अपना रहे हैं, जो दूसरी पार्टियां अपनाती हैं। अब उनकी पार्टी देश की आम महिलाओँ के उस ऐतिहासिक संघर्ष को कलंकित करने का दुस्साहस कर रही है, जिसकी तारीफ़ पूरी दुनिया में हुई है। ख़ासतौर पर मुस्लिम महिलाएं पहली बार बंदिशों तो तोड़ कर अपने अधिकार और पहचान के लिए सड़कों पर उतरीं। कड़ाके की ठंड और पुलिस की लाठियों की परवाह किए बिना उन्होंने अपने संघर्ष को जारी रखा। यदि यह आंदोलन प्रायोजित था तो फिर अन्ना आंदोलन क्या था?

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