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राख बन चुके समाजवाद के उठ खड़े होने से अमेरिका भयभीत है
नेवादा में बर्नी सैंडर्स की जीत अपने आप में एक नाटकीय विडंबना कही जा सकती है। कहाँ तो अमेरिका यह मानकर चल रहा था कि उसने शीत युद्ध को जीतकर कर समाजवाद को दफन कर दिया है, वहीँ आज उसे समाजवाद से वापस थपेड़े मिल रहे हैं, और उसके राजनीतिक और आर्थिक नींव पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहे हैं।
एम. के. भद्रकुमार
26 Feb 2020
बर्नी सैंडर
बर्नी सैंडर

आगामी नवंबर माह में होने जा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से मनोनीत होने की रेस में शनिवार को हुए चुनाव में नेवादा के प्राथमिक परिणाम में बर्नी सैंडर्स को मिली भारी जीत ने माहौल को पूरी तरह से गर्मा दिया है। अब इस रेस ने एक बेहद अहम मील का पत्थर पार कर लिया है। इन प्राथमिक चुनावों ने हमें अमेरिका के दो क्षेत्रों- अमेरिकी हृदयक्षेत्र (आयोवा) और उत्तर-पूर्व (न्यू हैम्पशायर) की ओर से अब तक जो रुझान दर्शाए हैं, उससे पता चलता है कि डेमोक्रेटिक दावेदारों की भीड़ में सैंडर्स सबसे ऊपर बने हुए हैं।

पश्चिमी अमेरिकी राज्य (नेवादा) जो नस्लीय विविधता लिए हुए है, ने अब इस बात की पुष्टि कर दी है कि सैंडर्स का चुनावी अभियान अब न केवल अच्छी-खासी गति प्राप्त कर चुका है, बल्कि वे अपनी इस बढ़त को और अधिक मजबूत करने जा रहे हैं।किसी भी महिला या पुरुष उम्मीदवार को यदि नेवादा जीतना है तो ऐसे विविध जनसांख्यिकी वाले राज्य में उसे या तो यहाँ के गोरे लोगों, लैटिन अमरीकियों और अफ्रीकी अमेरिकियों (राज्य में सबसे बड़ा जनसांख्यिकी वाला) से सम्मानजनक समर्थन हासिल करना ही होगा। अन्यथा उसे सभी श्वेत मतदाताओं का, वो चाहे किसी भी उम्र, लिंग, शैक्षणिक योग्यता या इनकम ग्रुप से आते हों, का शतप्रतिशत समर्थन हासिल होना ही चाहिए।

सैंडर्स के लिए यह जीत कहीं अधिक सम्मानजनक रही - उन्हें भारी संख्या में लैटिन मूल के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफलता प्राप्त हुई है, जिनमें यूनियन के लोग, युवा और अश्वेत मतदाता शामिल हैं।आज इस 78 वर्षीय स्व-घोषित "लोकतांत्रिक समाजवादी" बूढ़े के पक्ष में आधार का खिसकना लगातार जारी है। डेमोक्रेटिक दल का नामांकन हासिल करने के रूप में सैंडर्स पहले से ही पहली पसन्द रहे हैं, वहीँ अगले दस दिनों के भीतर और 3 मार्च को होने वाले सुपर मंगलवार तक, जिसमें कैलिफोर्निया और टेक्सास सहित 14 राज्यों में प्राइमरी चुनाव सम्पन्न हो चुके होंगे, को देखते हुए लगता है कि वे शायद अजेय सिद्ध हों।

जहाँ तक सैंडर्स के राजनीतिक जीवन का प्रश्न है तो इस मामले में उनका रिकॉर्ड उल्लेखनीय रूप से सुसंगतता का रहा है। वे मात्र अमेरिकी व्यवस्था में थोड़ी-बहुत छेड़छाड़ करने भर से संतुष्ट हो जाने वाले लोगों में से नहीं हैं। नीतियों में आमूलचूल बदलाव से कम में सैंडर्स संतुष्ट नहीं होने जा रहे- जिसमें सभी के लिए मुफ्त चिकित्सा सेवा, मुफ्त कॉलेज शिक्षा, सबसे अमीर अमेरिकियों के ऊपर कराधान का प्रावधान, जीवाश्म ईंधन पर टिके उद्योग का खात्मा, एक नया ग्रीन डील, एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो वॉल स्ट्रीट की ओर न झुकी हो और एक ऐसी व्यवस्था जो महत्वपूर्ण रूप से शक्ति और संपदा के पुनर्वितरण के काम को सुनिश्चित करती हो।

अब सबसे बड़ा सवाल अब यह उठता है कि क्या वास्तव में अमेरिकी कोई क्रांति चाहते हैं, जबकि राष्ट्रपति ट्रम्प को लगता है कि अर्थव्यवस्था बहुत बढ़िया चल रही है, शेयर बाजार उछालें मार रहा है और रोजगार के अवसर भी अपनी बुलंदियों पर हैं।सैंडर्स एक परिवर्तनकामी उम्मीदवार के रूप में नजर आते हैं, जिनकी दिली इच्छा है कि अमेरिका में वृहद संरचनात्मक परिवर्तन हो।

अपने राजनीतिक अभियान के लिए वे किसी बीच के मैदान की धुरी की तलाश करना पसन्द नहीं करने जा रहे, जैसा कि बराक ओबामा के साथ था। समानता को लेकर उनके अंदर जो उत्साह देखने को मिलता है, वह उनके डीएनए में है, जिसे बचपन में न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन के उनके मजदूर वर्ग के बीच बड़े होने में देखा जा सकता है।

सैंडर्स के राजनीतिक व्यक्तित्व के विकास में ढेर सारी चीजों ने मदद की है। जैसा कि उनकी यहूदी पृष्ठभूमि या जब वे यहूदी शरणार्थियों के बीच बड़े हो रहे थे, तो यहूदी-विरोधी भावनाओं के बारे में उनकी गहन जागरूकता के चलते, जिनके हाथों में उस समय भी नाजी नरसंहार के समय के सीरियल नंबर अंकित थे, ने गहरी छाप छोड़ी है।

इसके साथ ही चाहे नागरिक अधिकार आँदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी का प्रश्न हो या शिकागो विश्वविद्यालय में “बौद्धिक उफान” को अनुभव करने का मौका मिला हो, इन सबने नस्लवाद से लेकर अमेरिकी सैन्यवाद तक में उनकी विश्वदृष्टि को आकार देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके साथ ही इसने उन्हें एक ऐसी व्यवस्था जिसमें विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को सुरक्षा मुहैय्या होती है और बाकियों को जो उसकी सत्ता (जिसमें वे खुद शामिल हैं) को चुनौती देते हों, का दमन किया जाता हो, जैसी गैरवाजिब व्यवस्था के खिलाफ अनवरत संघर्ष के लिए प्रेरित किया।

सीजीटीएन में एक चीनी विश्लेषक ने इसके सार-तत्व को बेहद खूबसूरती से रखा है: “एक बैरागी हृदय के साथ सैंडर्स ने पिछले चार राष्ट्रपतियों के बीच फँसे रहने के बावजूद अपने प्रगतिशील दृष्टिकोण को बरक़रार रखा और बैंकिंग, स्वास्थ्य और आव्रजन जैसे मुद्दों पर उदारवादी सुधारों की एक पूरी श्रृंखला को लगातार आगे बढाने का काम किया है।

हालाँकि इनमे से कई सुधारों की परिणति वाशिंगटन के विशाल राजनीतिक भंवर में डूब जाने वाली ही होने जा रही है। नियमित असफलताओं और खुद के खारिज कर दिए जाने के बावजूद सैंडर्स काफी कुछ आधुनिक अमेरिकी संस्करण सिसफस से मिलते जुलते, अपने लक्ष्य से डिगे नहीं हैं। जैसा कि देखने को मिलता है कि एक राष्ट्र की राजनीति को बदलने से संबंधित असंभव कार्यों के बारे में कई लोग अपने नित्यकर्म से संतुष्ट रहते हैं। इसके बजाय उन्होंने अपनी बारी का धैर्यपूर्वक इन्तजार किया है।”

उनकी राह में अब यह महान अवसर आ सकता है। सब कुछ संभावित रूप से बदल रहा है। और यहीं पर नेवादा में मिली जीत का महत्व छिपा है। सैंडर्स ने दिखा दिया है कि वे अपने समर्थकों के इस व्यापक आधार को जो ढेर सारे असम्बद्ध राजनीतिक रस्सियों वाले इन्द्रधनुषीय गठबंधन से बुना हुआ है, को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे हैं। और इन सबसे ऊपर वे एक ऐसी अर्थव्यवस्था के प्रति उभर रहे लोकप्रिय विक्षोभ को उभारने में सफल प्रतीत हो रहे हैं, जो अल्ट्रा-रिच के लिए तो काफी फायदेमंद है, लेकिन बहुसंख्यक अमेरिकियों के खिलाफ है।

मुख्यधारा में यह बहस तेज है कि यदि डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के रूप में डोनाल्ड ट्रम्प के मुकाबले में सैंडर्स सामने होंगे, तो उनका ट्रम्प द्वारा पैरों तले मसल दिया जाना तय है। लेकिन राजनीति अपनेआप में एक असम्पूर्ण कीमियागिरी के साथ इतने अप्रत्याशित रूप से सम्बद्ध है कि उसके बारे में इतने यकीन से कहना निरी मूर्खता है। अमेरिका में अब तक के प्रमुख मतदान केंद्रों में से चार के निष्कर्षों का जो औसत निकलकर आया है, वह यह है कि वर्तमान में सैंडर्स को ट्रम्प पर 5% से अधिक की बढ़त हासिल है, और वह भी ऐसे समय में है जब अपने पद पर बने रहने के कारण पोतुस को व्यापक पैमाने पर मीडिया कवरेज का लाभ प्राप्त है।

यह सैंडर्स के लिए बेहद मजबूत बढ़त प्रदान करने वाला साबित होने जा रहा है, और ट्रम्प के लिए एक बार फिर से चुनावी जीत को अपनी मुट्ठी में जकड़ लेने की संभावना काफी धूमिल नजर आ रही है।सैंडर्स के लिए मुख्य बाधा के तौर पर उनके ऊपर "सोशलिज्म" का टैग चिपके होने को माना जा रहा है। लेकिन यह भी तथ्य हैं कि दशकों से वे सादगी के साथ, आत्म-घोषित समाजवादी होने के बावजूद, उन्होंने एक के बाद एक चुनावी जीत हासिल की है। लेकिन यह भी सच है कि आस्तीन पर समाजवादी लेबल लगे होने के बावजूद भी वर्तमान में देश के निर्वाचित पद संभालने वालों में वे सबसे लोकप्रिय राजनेता भी हैं।

राजनीति के केन्द्रीय रंगमंच पर धुमकेतू की तरह सैंडर्स का पदार्पण अचानक से 2015 में दिखाई देता है, और ऐसे में जब उन्होंने करीब-करीब डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए अपना नामांकन हासिल कर लिया था, लेकिन धांधली के चलते वे इस रेस में पीछे रह गये। यहां तक कि धांधली के बावजूद सैंडर्स ने प्रतिनिधित्व का 46% जीत लिया था, और वह भी तब जब हिलेरी क्लिंटन शायद उस समय अमेरिका में सबसे लोकप्रिय और शक्तिशाली राजनीतिक व्यक्तित्व थीं।

इसलिये यकीन मानिए कि वर्मोंट का यह 78 वर्षीय यहूदी समाजवादी, जो प्रगतिशील मूल्यों का नायक बनकर उभरा है, जिसने सभी प्रगतिवादी और मॉडरेट व्यक्तित्वों के ऊपर अपनी बढ़त बन रखी है, को डेमोक्रेटिक दल के फ्रंट-रनर के रूप में जबर्दस्त बढ़त हासिल होने जा रही है, और नवंबर में होने जा रहे चुनावों में वे सबसे मजबूत उम्मीदवार साबित होने वाले हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि बेहद कड़ा चुनावी मुकाबला होने जा रहा है।

यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो सैंडर्स की भूमिका अमेरिका में प्रगतिशील मूल्यों की राजनीति की राजनीतिक विरासत को पेश करने के रूप में परिभाषित की जा सकती है। कितनी अजीब विडंबना है कि कहाँ तो अमेरिका ने ये सोचा था कि उसने शीत युद्ध को जीतकर समाजवाद को दफन कर डाला है, जबकि आज उसे उसी समाजवाद से थपेड़े खाने को मिल रहे हैं, और आज उसकी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की नीवं पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं!

जिस प्रकार से फ़ीनिक्स पक्षी के राख से उठ खड़े होने की किंवदंतियों से हम परिचित हैं, ठीक उसी तरह आज समाजवाद भी अमेरिका के सत्तारूढ़ कुलीनतंत्र को- वो चाहे डेमोक्रेट हों या रिपब्लिकन, दोनों ही को समान रूप से भयभीत कर रहा है। यहां तक कि रूसियों के लिए भी, जो ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल पर दाँव लगाए बैठे हैं, उन्हें भी समाजवाद के ककहरे की ओर लौटने को मजबूर होना पड़ सकता है।

सौजन्य: इण्डियन पंचलाइन  

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