NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
नज़रिया: तेजस्वी इसलिए हारे क्योंकि वे अपनी यूएसपी भूल गए थे...!
बिहार के मतदाताओं ने हिन्दुत्व की सैलरी के साथ मिल रहे रोज़गार के बोनस पर ज्यादा भरोसा किया....क्यों?
शशि शेखर
16 Nov 2020
तेजस्वी

जहां जीत के 10 कारण, वहीं हार के 100 कारण होते हैं। फिर भी, जीत तो जीत ही है और हार तो हार ही है। इसलिए, जीत के साथ ही हार की हर दृष्टि से विवेचना आवश्यक है, ताकि भविष्य की जीत सुनिश्चित हो। कहा जाता है कि कंफ्यूजन हो तो मूल की तरफ लौटे। ये जीवन का ही नहीं, कई बार राजनीति का भी मूलमंत्र बनता दिखा है। पिछले 7 सालों में इसी मूलमंत्र पर काम करते हुए भाजपा सत्ता में आती रही है (हिन्दुत्व के मुद्दे पर केन्द्र से ले कर राज्यों तक में)। लेकिन समस्या विपक्ष के साथ है। विपक्ष इतने दबाव में है या कहे भ्रम में है कि “विकास” नाम का रिटेल स्टोर खोल कर बैठ जाती है और कमोबेश हर बार “विकास” नाम के होलसेलर (भाजपा) से हार जाती है। तो क्या बिहार में भी यही हुआ? 

तेजस्वी की यूएसपी क्या थी? 

राजद की यूएसपी सोशल जस्टिस रही है। सोशल जस्टिस से आगे निकल कर (पिता की छाया से निकलने की छटपटाहट) इकोनॉमिकल जस्टिस की तरफ जाने की ललक क्या हार की वजह बनी?

क्योंकि भाजपा पहले से ही “विकास” का थोक दुकान चला रही है। तो भला कोई खुदरा दुकान से “विकास” क्यों खरीदेगा?

क्या तेजस्वी ये भूल गए या भूलने के लिए मजबूर कर दिए गए कि 2015 के चुनाव का रूख उनके पिता लालू प्रसाद यादव ने सिर्फ एक मुद्दे पर मोड़ दिया था। वो मुद्दा था, आरक्षण। लालू प्रसाद यादव ने संघ प्रमुख भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान को इस तरह लोगों के सामने रखा कि बाकी के सारे मुद्दे (विकास) गौण हो गए। 2015 में उनकी पार्टी सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बन गई और वे सत्ता में आ गए थे। लेकिन, जाने किस मजबूरी में या कहे किसी की सलाह पर, उन्होंने आर्थिक न्याय के मौसौदे पर चुनाव लडने का निर्णय ले लिया। 10 लाख नौकरी देने का वादा किया, जिस पर भाजपा ने 19 लाख रोजगार का दांव चल दिया। और शायद लोगों ने हिन्दुत्व की सैलरी के साथ मिल रहे रोजगार के बोनस पर ज्यादा भरोसा कर लिया।

ए टू जेड बनाम सबका साथ-सबका विकास

तेजस्वी ए टू जेड की बात करते रहे, जिसमें उन्होंने सभी वर्गों को के कल्याण की बात की। लेकिन, सबका साथ, सबका विकास का झंडा सामने हो तब भला कोई ए टू जेड पर कितना भरोसा करेगा? एमवाई को मजदूर-युवा में बदलने की उनकी कोशिश एक ईमानदार कोशिश थी। लेकिन बिहार की राजनीति में जाति वो सच्चाई है, जो कभी जाती नहीं। परिणाम ये हुआ कि 15% ब्राह्मण, 19% भूमिहार, 9% राजपूत और 16% अन्य अपर कास्ट ने महागठबन्धन को अपना वोट दिया, और बाकी के सारे वोट एनडीए के पक्ष में चले गए (इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक)। इतना ही नहीं, इसी खबर के मुताबिक, यादव, कुर्मी आदि को छोड कर अन्य ओबीसी/ईबीसी वोट का महज 18% वोट ही महागठबन्धन को मिला, जबकि मुसहर और अन्य दलितों का वोट भी महज 24-24% ही मिल सका। हां, एमवाई समीकरण अभी भी तेजस्वी के साथ मजबूती से डटा रहा। 83% यादव और 76% मुस्लिम मतदाताओं ने तेजस्वी पर भरोसा किया।

तो सवाल है कि क्या ओबीसी/ईबीसी मतदाताओं ने तेजस्वी यादव के ए टू जेड और 10 लाख सरकारी नौकरी के वादे पर भरोसा नहीं किया? इसका जवाब आसान है। या तो मतदाताओं को टॉल प्रॉमिस पर भरोसा नहीं हुआ या फिर हिन्दुत्व की राजनीति के साथ विकास की होलसेल दुकान चलाने वाली भाजपा ने विकास के रिटेल दुकान को अविश्वसनीय बना दिया। यहीं पर अगर लालू प्रसाद यादव होते तो शायद खुलेआम ये कहते कि पिछडों/दलितों के खाली कोटे को प्राथमिकता दिखाते हुए भरा जाएगा। वे यह भी मांग कर देते कि भाजपा जिस 19 लाख रोजगार की बात कर रही है, उसमें वंचितों के लिए कितना रोजगार आरक्षित होगा? भले ये रोजगार प्राइवेट सेक्टर के होते, फिर भी लालू प्रसाद यादव प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण की मांग खुलेआम उठाते। इसकी मांग करते। लेकिन ये हिम्मत लालू प्रसाद यादव के अतिरिक्त बिहार में कोई नेता नहीं दिखा सकता। खुद तेजस्वी यादव भी नहीं। शायद यही कारण रहा कि सहृदयता से सबका साथ ले कर चलने की उनकी कवायद सफलता के मुहाने पर जा कर थम गई।

100 में 60 बनाम 100 में 20

ये इस बिहार चुनाव का सबसे दिलचस्प आकड़ा है। जिसकी संख्या 100 में 20 से भी कम है, उसके 64 विधायक चुनाव जीत कर आए हैं। वहीं 26% अति पिछडा आबादी से महज 5 विधायक महागठबन्धन के खाते में आए, जबकि राजद ने 25 और कांग्रेस ने 5 टिकट ईबीसी को दी थी। लेकिन, एक और आकड़ा है, ये आकड़ा है भाकपा (माले) का। माले के 12 विधायक चुनाव जीत कर आए है। इनमें से सारे पिछडे, दलित और मुस्लिम समुदाय के हैं। यानी, माले ने अपना फोकस नहीं खोया और न ही ए टू जेड के चक्कर में पड़ी। उसे पता था कि उसका वोटर कहां है, उसे पता था कि किस मुद्दे को हवा देनी है और किस चीज से उसे फायदा होगा। माले ने जिस बुद्धिमता से बिहार चुनाव लडते हुए सफलता पाई है, उससे निश्चित ही सीखने की जरूरत है। और शायद सबसे बड़ी सीख यही है कि 20 के चक्कर में 60 से हाथ धोना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है।

भदेस नेता-भदेस राजनीति

इस वक्त तेजस्वी यादव के सलाहकार डीयू और जेएनयू के ऐसे स्कॉलर-प्रोफेसर हैं, जिनका भरोसा ए टू जेड में था। उनकी सलाह ने राजद को सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई। लेकिन बिहार की भदेस राजनीति को लालू प्रसाद यादव जैसा भदेस नेता ही बेहतर तरीके से चला सकता है। 2015 के चुनाव में भी नई पीढी ने इसे देखा-समझा है। पूरे चुनाव प्रक्रिया के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज के प्रोफेसर रतन लाल, जो कभी राजद से जुड़े रहे हैं, सोशल मीडिया पर लिखते रहे कि राजद को अपना कोर एजेंडा नहीं छोडना चाहिए, कोर वोटर की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। लेकिन, हुआ क्या? राजद आज भी लालू प्रसाद यादव का पर्यायवाची है। और अपने ही नेता की एक भी तस्वीर पूरे चुनाव प्रचार में इस्तेमाल न करने की सलाह कितनी कामयाब रही, इसका आकलन भी किया जाना चाहिए। 2015 में भी लालू प्रसाद यादव जमानत पर थे, लेकिन चुनाव प्रचार में अकेले आरक्षण के मुद्दे पर उन्होंने जो कमाल कर दिखाया, वह 10 लाख रोजगार का मुद्दा शायद ही कभी दिखा पाए।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं)

Bihar Elections 2020
NDA Government
Nitish Kumar
Hindutva
Ram Mandir
Tejashwi Yadav
RJD
mahagathbandhan

Related Stories

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

मुस्लिम जेनोसाइड का ख़तरा और रामनवमी

नफ़रत की क्रोनोलॉजी: वो धीरे-धीरे हमारी सांसों को बैन कर देंगे

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!

उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!

विचार: राजनीतिक हिंदुत्व के दौर में सच्चे साधुओं की चुप्पी हिंदू धर्म को पहुंचा रही है नुक़सान

रवांडा नरसंहार की तर्ज़ पर भारत में मिलते-जुलते सांप्रदायिक हिंसा के मामले


बाकी खबरें

  • worker
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एमपीः रीवा में मज़दूरी मांगने गए दलित मज़दूर का मालिक ने काटा हाथ, आईसीयू में भर्ती
    25 Nov 2021
    पीड़ित अशोक की पत्नी ने कहा गणेश मिश्रा पर लगभग 15,000 रुपये बकाया थे, लेकिन कई महीनों से वे भुगतान नहीं कर रहे थे। हम ग़रीब लोग हैं, अपना पेट पालने के लिए मज़दूरी पर निर्भर हैं।
  • Farmers
    रवि कौशल
    आंशिक जीत के बाद एमएसपी और आपराधिक मुकदमों को ख़ारिज करवाने के लिए किसान कर रहे लंबे संघर्ष की तैयारी
    25 Nov 2021
    कृषि क़ानूनों की वापसी की घोषणा के बावजूद, किसान, अपने संघर्ष की दूसरी मांगों पर अडिग हैं, जिनमें एमएसपी पर गारंटी, प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज केस रद्द किए जाने, केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी की…
  • workers
    विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: देश की सबसे बड़ी कोयला मंडी में छोटी होती जा रही मज़दूरों की ज़िंदगी
    25 Nov 2021
    यूपी के चंदौली जिले में चंधासी, देश की सबसे बड़ी कोयला मंडी है। यह इलाका उस संसदीय क्षेत्र के साथ लगा है, जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना है। ..."जिस सड़क से पांच मिनट गुजरने में दम निकलता हो…
  • Gandhi ji
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    ख़तो-किताबत: आंदोलनजीवी बापू की चिट्ठी आई है
    25 Nov 2021
    पेशे से चिकित्सक, व्यंग्यकार डॉ. द्रोण कुमार शर्मा ने दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर उनके नाम एक चिट्ठी लिखकर उन्हें देश के हालात से अवगत कराया था। अब उन्होंने इसका जवाब लिखा है। यानी लेखक…
  • farmers
    अजय गुदावर्ती
    कृषि क़ानूनों को निरस्त करने के बाद भाजपा-आरएसएस क्या सीख ले सकते हैं
    25 Nov 2021
    सत्ताधारी पार्टी संकट आने पर हर बार हिंदू-मुस्लिम का बटन नहीं दबा सकती और कामयाब भी नहीं हो सकती। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License