NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
माना कि राष्ट्रवाद की सब्ज़ी भी चाहिए/ लेकिन हुज़ूर पेट में रोटी भी चाहिए
‘इतवार की कविता’ में आज पढ़ते हैं संजीव गौतम के नए ग़ज़ल संग्रह ‘बुतों की भीड़ में’ से कुछ चुनिंदा ग़ज़लें जो हालात-ए-हाज़रा का आईना हैं।
न्यूज़क्लिक डेस्क
17 Jan 2021
माना कि राष्ट्रवाद की सब्ज़ी भी चाहिए/ लेकिन हुज़ूर पेट में रोटी भी चाहिए

मथुरा में सहकारिता विभाग में अपर जिला सहकारी अधिकारी और आगरा निवासी संजीव गौतम एक शानदार शायर भी हैं। अभी अयन प्रकाशन से आपका पहला ग़ज़ल संग्रह ‘बुतों की भीड़ में’ प्रकाशित हुआ है। इसके अलावा भी तमाम पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। आप ‘सम्यक्’ आगरा अंक तथा ‘अनुभूति’ का सम्पादन भी करते हैं। आज ‘इतवार की कविता’ में आपकी चुनिंदा पांच ग़ज़लें :-

ग़ज़ल

1-

माना कि राष्ट्रवाद की सब्ज़ी भी चाहिए.

लेकिन हुज़ूर पेट में रोटी भी चाहिए.

 

हमको तो सिर्फ़ रोटियां दे दीजिए हुज़ूर,

हाकिम हैं आप आपको व्हिस्की भी चाहिए.

 

पूरा का पूरा चाहिए अपना वतन हमें,

पटना भी चाहिए हमें, दिल्ली भी चाहिए.

 

इंसानियत का ख़ून बहाकर हज़ार बार,

क़ातिल को अब सुना है ख़ुदाई भी चाहिए.

 

रक्खे हैं तुमने कैद में अम्नो-अमां के जो,

उन सब कबूतरों को रिहाई भी चाहिए.

 

बेशक ज़रूरतों के भंवर में फंसे हैं हम,

लेकिन हमें सुकून की कश्ती भी चाहिए.

 

दिन तो मिले हैं धूप में जलते हुए हमें,

अब रात  कोई एक सुहानी भी चाहिए.

 

जिनको खड़ा किया था जिन्होंने क़तार में,

उनको उन्हीं के वोट से कुर्सी भी चाहिए.

 

तुमको हमारी बात से पहुंचा हो दुख अगर,

ऐसी अगर है बात तो कहनी भी चाहिए.

 

2-

हमारे साथ ने जिसको करिश्माई बना डाला.

उसी ने हमको आख़िर में तमाशाई बना डाला.

 

ये सच है मज़हबी हथियार ने सत्ता दिला तो दी,

मगर इसने नयी पीढ़ी को दंगाई बना डाला.

 

जहां से हम चले थे फिर वहीं आख़िर में जा पहुंचे,

हमारी सोच ने हमको क़बीलाई बना डाला.

 

चले हो जीतने दुनिया को लेकिन ध्यान में रखना,

समय ने अच्छे अच्छों को इलाक़ाई बना डाला.

 

दुखी होकर तुम्हारे पास आये थे मगर तुमने,

हमारी ज़िन्दगी को और दुखदाई बना डाला.

 

हमें भी डाक्टर, इंजीनियर बनने की चाहत थी,

सियासी मर्कज़ों ने हमको हलवाई बना डाला.

 

अभी भी और कितने ख़्वाब यूं दिन में दिखाओगे,

ये तुमने ज़िन्दगी को भी सिनेमाई बना डाला.

 

3-

हवा मुफ़ीद हुई तो बदल गए मंज़र.

ख़ुदा हुए हैं वो, सजदे में झुक गए हैं सर.

 

ज़रा सी आंख लगी शाम को चराग़ों की,

नक़ाबपोश अंधेरों के आ गए लश्कर.

 

छिड़क दिया है लहू आसमान पर किसने,

चमक रहे हैं हवा में ये कौन से ख़ंजर.

 

डरा के ख़ूब चराग़ों को आंधियां ख़ुश हैं,

मगर है रोशनी पहले से और भी बेहतर.

 

ये कैसा दौर है, ये कौन सी मुहब्बत है,

निकल रहे हैं किताबों में तितलियों के पर.

 

ज़रूर हमसे हुई है ख़ता नहीं तो फिर,

बहार आनी थी कैसे ये आ गया पतझर.

 

ख़ुदा का नूर हमेशा बरसता था जिससे,

बरस रहे हैं उसी आसमान से पत्थर.

 

4-

सागर को जब मथा था तो असुरों के साथ थे.

बिल्कुल ग़लत हैं आप कि देवों के साथ थे.

 

जो आज कह रहे हैं कि हम सबके साथ हैं,

मालूम कल चलेगा कि चोरों के साथ थे.

 

यूं तो हमारी बेटियां बेटों से कम न थीं,

हम ही थे बदनसीब कि बेटों के साथ थे.

 

दावा तो उनका था कि वो कश्ती के साथ हैं,

तूफ़ान जब उठा तो वो लहरों के साथ थे.

 

उनको भी अब ख़िताब मिलेगा सितारे-हिन्द,

जिनका पता है साफ़ कि गोरों के साथ थे.

 

जब तुम नहीं थे साथ अकेले नहीं थे हम,

कोई नहीं था साथ किताबों के साथ थे.

 

उस वक़्त जब हमारी उमर नौजवान थी,

उस वक़्त भी विचार बुजुर्गों के साथ थे.

 

5-

भला अब फ़ायदा क्या है यूं रिश्तों की दुहाई से.

हदें पहले तो तुमने तोड़ डालीं बेहयाई से.

 

भरोसा मत करो बेशक मगर तुम भाई ही तो हो,

मुझे कैसे खुशी होगी तुम्हारी जगहंसाई से.

 

वो रूठा भी तो आखि़रकार मुझसे इस तरह रूठा,

कि जैसे रूठ जायें चूड़ियां ज़िन्दा कलाई से.

 

कभी तो इनकी गर्माहट मिलेगी मेरे अपनों को,

जो रिश्ते बुन रहा हूं मैं, मुहब्बत की सलाई से.

 

अगर तुम मांगते तो मैं मना कर ही नहीं पाता,

मगर तुम ही बताओ क्या मिला तुमको लड़ाई से.

 

हवस है तुमको दौलत की, मुबारक हो तुम्हें दौलत,

हमें क्या लेना-देना है, तुम्हारी उस कमाई से.

 

मई और जून हैं तो धूप के तेवर भी तीखे हैं,

मगर उम्मीद के बादल भी आयेंगे जुलाई से.

-    संजीव गौतम

            आगरा

इसे भी पढ़ें :  इतवार की कविता : तुम्हारी जाति क्या है कुमार अंबुज?

इसे भी पढ़ें :  सावित्रीबाई फुले : खेती ही ब्रह्म, धन-धान्य है देती/अन्न को ही कहते हैं परब्रह्म

इसे भी पढ़ें :  'तन्हा गए क्यों अब रहो तन्हा कोई दिन और' ग़ालिब 223वीं जयंती पर विशेष

इसे भी पढ़ें : …दिस नंबर डज़ नॉट एग्ज़िस्ट, यह नंबर मौजूद नहीं है

इसे भी पढ़ें : नशा और होश : विश्व नागरिक माराडोना को समर्पित कविता

Sunday Poem
Hindi poem
poem
ghazal
Sanjeev Gautam
कविता
हिन्दी कविता
इतवार की कविता

Related Stories

वे डरते हैं...तमाम गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज और बुलडोज़र के बावजूद!

इतवार की कविता: भीमा कोरेगाँव

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

इतवार की कविता: वक़्त है फ़ैसलाकुन होने का 

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

...हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र: एक कवि का बयान

फ़ासीवादी व्यवस्था से टक्कर लेतीं  अजय सिंह की कविताएं

सर जोड़ के बैठो कोई तदबीर निकालो

लॉकडाउन-2020: यही तो दिन थे, जब राजा ने अचानक कह दिया था— स्टैचू!


बाकी खबरें

  • अनिल अंशुमन
    झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 
    12 May 2022
    दो दिवसीय सम्मलेन के विभिन्न सत्रों में आयोजित हुए विमर्शों के माध्यम से कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध जन संस्कृति के हस्तक्षेप को कारगर व धारदार बनाने के साथ-साथ झारखंड की भाषा-संस्कृति व “अखड़ा-…
  • विजय विनीत
    अयोध्या के बाबरी मस्जिद विवाद की शक्ल अख़्तियार करेगा बनारस का ज्ञानवापी मस्जिद का मुद्दा?
    12 May 2022
    वाराणसी के ज्ञानवापी प्रकरण में सिविल जज (सीनियर डिविजन) ने लगातार दो दिनों की बहस के बाद कड़ी सुरक्षा के बीच गुरुवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि अधिवक्ता कमिश्नर नहीं बदले जाएंगे। उत्तर प्रदेश के…
  • राज वाल्मीकि
    #Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान
    12 May 2022
    सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन पिछले 35 सालों से मैला प्रथा उन्मूलन और सफ़ाई कर्मचारियों की सीवर-सेप्टिक टैंको में हो रही मौतों को रोकने और सफ़ाई कर्मचारियों की मुक्ति तथा पुनर्वास के मुहिम में लगा है। एक्शन-…
  • पीपल्स डिस्पैच
    अल-जज़ीरा की वरिष्ठ पत्रकार शिरीन अबु अकलेह की क़ब्ज़े वाले फ़िलिस्तीन में इज़रायली सुरक्षाबलों ने हत्या की
    12 May 2022
    अल जज़ीरा की वरिष्ठ पत्रकार शिरीन अबु अकलेह (51) की इज़रायली सुरक्षाबलों ने उस वक़्त हत्या कर दी, जब वे क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक स्थित जेनिन शरणार्थी कैंप में इज़रायली सेना द्वारा की जा रही छापेमारी की…
  • बी. सिवरामन
    श्रीलंकाई संकट के समय, क्या कूटनीतिक भूल कर रहा है भारत?
    12 May 2022
    श्रीलंका में सेना की तैनाती के बावजूद 10 मई को कोलंबो में विरोध प्रदर्शन जारी रहा। 11 मई की सुबह भी संसद के सामने विरोध प्रदर्शन हुआ है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License