NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
सर जोड़ के बैठो कोई तदबीर निकालो
“धर्म से आदम नहीं है, आदमी से धर्म है/ गुल का ख़ुशबू से नहीं, गुल से है ख़ुशबू का वजूद” ये शेर है ओम प्रकाश नदीम का, लेकिन इत्ती सी बात आज भी हमें समझ नहीं आ रही है। तभी वे कहते हैं कि सर जोड़ के बैठो कोई तदबीर निकालो/ हर बात पे ये मत कहो शमशीर निकालो”। आज इतवार की कविता में पढ़ते हैं उनकी दो ख़ास ग़ज़लें।
न्यूज़क्लिक डेस्क
17 Apr 2022
protest
दिल्ली और देश में बढ़ती मुस्लिम विरोधी हिंसा, नफ़रत और खाने-पहनने-जीने की आज़ादी पर बढ़ते हमलों के ख़िलाफ़ दिल्ली के जंतर मंतर पर 16 अप्रैल को आयोजित ‘नागिरक विजिल’। 

ग़ज़ल (1)

 

सर जोड़ के बैठो कोई तदबीर निकालो।

हर बात पे ये मत कहो शमशीर निकालो।

 

हालात पे रोने से फ़क़त कुछ नहीं होगा,

हालात बदल जाएँ वो तदबीर निकालो।

 

देखूँ ज़रा कैसा था मैं बेलौस था जब तक,

बचपन की मेरे कोई सी तस्वीर निकालो।

 

सय्याद को सरकार सज़ा बाद में देना,

पहले मेरे सीने में धँसा तीर निकालो।

 

दुनिया मुझे हैवान समझने लगी, अब तो,

गर्दन से मेरी धर्म की ज़ंजीर निकालो।

 

ग़ज़ल (2)

 

ये सब ग़रीबों के दायरे हैं, फ़लां की मिल्लत, फ़लां का मज़हब।

अमीर सारे हैं एक जैसे, कहां की मिल्लत, कहां का मज़हब।

 

नमाज़, पूजा तो ज़ाहिरी हैं, अयां करेंगे अयां का मज़हब

कभी मुख़ातिब ख़ुलूस हो तो, बयां करेगा निहां का मज़हब

 

वो रोशनी हो कि तीरगी हो, जमाल हो या जलाल उसका

ज़मी पे सबकुछ निसार कर दे, यही तो है आस्मां का मज़हब

 

किसी पे दाढ़ी उगा रहे हैं, किसी पे चोटी लगा रहे हैं

वो गढ़ रहे हैं तवारीख़ के हर इक पुराने निशां का मज़हब

 

जो इससे बोले ये उसकी मां सी, जो इसको बरते उसी की मां है

यही है उर्दू की पासदारी, यही है उर्दू ज़बां का मज़हब

 

कोई ये कैसे यक़ीन कर ले कि दीन दुनिया से मुख़्तलिफ़ है

नदीम सूरज ने आंख फेरी, बदल गया सायबां का मज़हब

-    ओमप्रकाश नदीम

(कवि-संस्कृतिकर्मी, लखनऊ)

इसे भी देखें- नफ़रत देश, संविधान सब ख़त्म कर देगी- बोला नागरिक समाज

Sunday Poem
Hindi poem
poem
minorities
religion
Communal Hate
Communal riots

Related Stories

वे डरते हैं...तमाम गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज और बुलडोज़र के बावजूद!

इतवार की कविता: भीमा कोरेगाँव

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

इतवार की कविता: वक़्त है फ़ैसलाकुन होने का 

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

...हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र: एक कवि का बयान

फ़ासीवादी व्यवस्था से टक्कर लेतीं  अजय सिंह की कविताएं

हिजाब बनाम परचम: मजाज़ साहब के नाम खुली चिट्ठी

लॉकडाउन-2020: यही तो दिन थे, जब राजा ने अचानक कह दिया था— स्टैचू!


बाकी खबरें

  • economic crisis
    अजय कुमार
    भारतीय अर्थव्यवस्था : हर सर्वे, हर आकंड़ा सुना रहा है बदहाली की कहानी
    01 Nov 2021
    NCRB के आत्महत्या के आंकड़े, आरबीआई के कंज्यूमर कॉन्फिडेंट सर्वे के आंकड़े और मनरेगा फंड के खात्मे के आंकड़े को मिलाकर पढ़िए तो अर्थव्यवस्था की बदहाली में बदलाव के आसार नहीं दिखते हैं।
  • Itihas ke panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    गाँधी के 1946 में नोआखाली जाने से क्या हुआ था?
    31 Oct 2021
    'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस अंग में वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन बात करते हैं वरिष्ठ इतिहासकार मृदुला मुख़र्जी से. वे 1946 में नोआखाली में हुए दंगों की चर्चा करते हैं और आज का समाज गाँधी जी के…
  • amit shah
    असद रिज़वी
    सियासत: गृह मंत्री के दावे और ज़मीनी हक़ीक़त का फ़र्क़
    31 Oct 2021
    अमित शाह ने प्रदेश की योगी सरकार की कानून-व्यवस्था की जमकर प्रशंसा की। हालाँकि उनकी मौजूदगी में ही शुक्रवार की रात राजधानी में हुई दो हत्याओं ने उनके दावे को धराशायी कर दिया।
  • panchayat
    अनिल अंशुमन
    बिहार पंचायत चुनाव : सत्ता विरोधी प्रत्याशियों पर चल रहा पुलिस प्रशासन का डंडा!
    31 Oct 2021
    बिहार में जारी पंचायत चुनाव में विपक्ष का आरोप है कि सत्ताधारी दल समर्थित उम्मीदवारों को जिताने में पुलिस प्रशासन लगा रहा एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहा है।
  • art
    डॉ. मंजु प्रसाद
    सार्थक चित्रण : सार्थक कला अभिव्यक्ति 
    31 Oct 2021
    आसान नहीं है मानव और समाज की सचाई को कला में निपुणता से उतार देना। कलाकार सृजित भी कर दे भद्र जनों को ग्राह्य नहीं है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License