NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
वरवर राव : जो जैसा है, वैसा कह दो, ताकि वह दिल को छू ले
प्रसिद्ध कवि वरवर राव बीमार हैं। भीमा-कोरेगांव मामले में आरोपी हैं। विचाराधीन कैदी हैं। ज़मानत नहीं मिली है। कोरोना से संक्रमित होने पर उन्हें मुंबई के सरकारी जेजे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, अब ख़बर है कि तंत्रिका संबंधी (न्यूरोलॉजिकल) और मूत्र संबंधी समस्या होने पर उन्हें नानावती अस्पताल में शिफ़्ट किया गया है।

देश भर में कवि, लेखक, बुद्धिजीवी सभी उनके स्वास्थ्य की चिंता और जल्द स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं। साथ ही रिहाई की मांग भी। आज ‘इतवार की कविता’ में पढ़ते हैं 80 साल के इसी जुझारू और क्रांतिकारी तेलुगू कवि की कुछ कविताओं का हिन्दी अनुवाद।
न्यूज़क्लिक डेस्क
19 Jul 2020
वरवर राव

चिन्ता

 

मैंने बम नहीं बाँटा था

न ही विचार

तुमने ही रौंदा था

चींटियों के बिल को

नाल जड़े जूतों से ।

 

रौंदी गई धरती से

तब फूटी थी प्रतिहिंसा की धारा

 

मधुमक्खियों के छत्तों पर

तुमने मारी थी लाठी

अब अपना पीछा करती मधुमक्खियों की गूँज से

काँप रहा है तुम्हारा दिल !

 

आँखों के आगे अंधेरा है

उग आए हैं तुम्हारे चेहरे पर भय के चकत्ते ।

 

जनता के दिलों में बजते हुए

विजय नगाड़ों को

तुमने समझा था मात्र एक ललकार और

तान दीं उस तरफ़ अपनी बन्दूकें...

अब दसों दिशाओं से आ रही है

क्रान्ति की पुकार ।

 

मूल्य

 

हमारी आकांक्षाएँ ही नहीं

कभी-कभार हमारे भय भी वक़्त होते हैं ।

द्वेष अंधेरा नहीं है

तारों भरी रात

इच्छित स्थान पर

वह प्रेम भाव से पिघल कर

फिर से जम कर

हमारा पाठ हमें ही बता सकते हैं ।

 

कर सकते हैं आकाश को विभाजित ।

 

विजय के लिए यज्ञ करने से

मानव-मूल्यों के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई

ही कसौटी है मनुष्य के लिए ।

 

युद्ध जय-पराजय में समाप्त हो जाता है

जब तक हृदय स्पंदित रहता है

लड़ाइयाँ तब तक जारी रहती हैं ।

 

आपसी विरोध के संघर्ष में

मूल्यों का क्षय होता है ।

 

पुन: पैदा होते हैं नए मूल्य...

पत्थरों से घिरे हुए प्रदेश में

नदियों के समान होते हैं मूल्य ।

 

आन्दोलन के जलप्रपात की भांति

काया प्रवेश नहीं करते

विद्युत के तेज़ की तरह

अंधेरों में तुम्हारी दृष्टि से

उद्भासित होकर

चेतना के तेल में सुलगने वाले

रास्तों की तरह होते हैं मूल्य ।

 

बातों की ओट में

छिपे होते हैं मन की तरह

कार्य में परिणित होने वाले

सृजन जैसे मूल्य ।

 

प्रभाव मात्र कसौटी के पत्थरों के अलावा

विजय के उत्साह में आयोजित

जश्न में नहीं होता ।

निरन्तर संघर्ष के सिवा

मूल्य संघर्ष के सिवा

मूल्य समाप्ति में नहीं होता है

जीवन-सत्य ।

 

वसन्त कभी अलग होकर नहीं आता

 

वसन्त कभी अलग होकर नहीं आता

वसन्त कभी अलग होकर नहीं आता

ग्रीष्म से मिलकर आता है ।

झरे हुए फूलों की याद

शेष रही कोंपलों के पास

नई कोंपलें फूटती हैं

आज के पत्तों की ओट में

अदृश्य भविष्य की तरह ।

 

कोयल सुनाती है बीते हुए दुख का माधुर्य

प्रतीक्षा के क्षणों की अवधि बढ़कर स्वप्न-समय घटता है ।

 

सारा दिन गर्भ आकाश में

माखन के कौर-सा पिघलता रहता है चांद ।

यह मुझे कैसे पता चलता

यादें, चांदनी कभी अलग होकर नहीं आती

रात के साथ आती है ।

 

सपना कभी अकेला नहीं आता

व्यथाओं को सो जाना होता है ।

 

सपनों की आँत तोड़ कर

उखड़ कर गिरे सूर्य बिम्ब की तरह

जागना नहीं होता ।

 

आनन्द कभी अलग नहीं आता

पलकों की खाली जगहों में

वह कुछ भीगा-सा वज़न लिए

इधर-उधर मचलता रहता है ।

 

सीधी बात

 

लक़ीर खींच कर जब खड़े हों

मिट्टी से बचना सम्भव नहीं ।

 

नक्सलबाड़ी का तीर खींच कर जब खड़े हों

मर्यादा में रहकर बोलना सम्भव नहीं

 

आक्रोश भरे गीतों की धुन

वेदना के स्वर में सम्भव नहीं ।

 

ख़ून से रंगे हाथों की बातें

ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़ कर छाती पीटकर

कही जाती हैं ।

 

अजीब कविताओं के साथ में छपी

अपनी तस्वीर के अलावा

कविता का अर्थ कुछ नहीं होता ।

 

जैसे आसमान में चील

जंगल में भालू

या रखवाला कुत्ता

आसानी से पहचाने जाते हैं

 

जिसे पहचानना है

वैसे ही छिपाए कह दो वह बात

जिससे धड़के सब का दिल

सुगन्धों से भी जब ख़ून टपक रहा हो

छिपाया नहीं जा सकता उसे शब्दों की ओट में ।

 

ज़ख़्मों को धोने वाले हाथों पर

भीग-भीग कर छाले पड़ गए

और तीर से निशाना साधने वाले हाथ

कमान तानने वाले हाथ

जुलूस के लहराते हुए झण्डे बन गए ।

 

जीवन का बुत बनाना

काम नहीं है शिल्पकार का

उसका काम है पत्थर को जीवन देना ।

 

मत हिचको, ओ, शब्दों के जादूगर !

जो जैसा है, वैसा कह दो

ताकि वह दिल को छू ले ।

 

औरत

 

ऐ औरत !

वह तुम्हारा ही रक्त है

जो तुम्हारे स्वप्न और पुरुष की उत्कट आकांक्षाओं को

शिशु के रूप में परिवर्तित करता है ।

 

ऎ औरत !

वह भी तुम्हारा ही रक्त है

जो भूख और यातना से संतप्त शिशु में

दूध बन कर जीवन का संचार करता है ।

और

वह भी तुम्हारा ही रक्त है

जो रसोईघर में स्वेद

और खेत-खलिहानों के दानों में

मोती की तरह दमकता है ।

 

फिर भी

इस व्यवस्था में तुम मात्र एक गुलाम

एक दासी हो

जिसके चलते मनुष्य की उद्दंडता की प्राचीर के पीछे

धीरे-धीरे पसरती कालिमा

तुम्हारे व्यक्तित्व को

प्रसूति गृह में ढकेल कर

तुम्हें लुप्त करती रहती है ।

इस दुनिया में हर तरह की ख़ुशियाँ बिकाऊ हैं

लेकिन तुम तो सहज अमोल आनन्दानुभूति देती हो,

वही अन्त्तत: तुम्हें दबोच लेती है ।

वह जो तुम को

चमेली के फूल अथवा

एक सुन्दर साड़ी देकर बहलाता है,

वही शुभचिन्तक एक दिन उसके बदले में

तुम्हारा पति अर्थात मलिक बन बैठता है ।

 

वह जो एक प्यार भरी मुस्कान

अथवा मीठे बोल द्वारा

तुम पर जादू चलाता है ।

कहने को तो वह तुम्हारा प्रेमी कहलाता है

किन्तु जीवन में जो हानि होती है

वह तुम्हारी ही होती है

और जो लाभ होता है

मर्द का होता है ।

और इस तरह जीवन के रंगमंच पर

हमेशा तुम्हारे हिस्से में विषाद ही आता है ।

 

ऐ औरत !

इस व्यवस्था में इससे अधिक तुम

कुछ और नहीं हो सकतीं ।

तुम्हें क्रोध की प्रचंड नीलिम में

इस व्यवस्था को जलाना ही होगा ।

तुम्हें विद्युत-झंझा बन

अपने अधिकार के प्रचंड वेग से

कौंधना ही होगा ।

 

क्रान्ति के मार्ग पर क़दम से क़दम मिलाकर आगे बढ़ो

इस व्यवस्था की आनन्दानुभूति की मरीचिका से

मुक्त होकर

एक नई क्रान्तिकारी व्यवस्था के निर्माण के लिए

जो तुम्हारे शक्तिशाली व्यक्तित्व को ढाल सके ।

 

जब तक तुम्हारे हृदय में क्रान्ति के

रक्ताभ सूर्य का उदय नहीं होता

सत्य के दर्शन करना असम्भव है ।

 

कवि

 

(बैंजामिन मालेस की याद में)

 

जब प्रतिगामी युग धर्म

घोंटता है वक़्त के उमड़ते बादलों का गला

तब न ख़ून बहता है

न आँसू ।

 

वज्र बन कर गिरती है बिजली

उठता है वर्षा की बूंदों से तूफ़ान...

पोंछती है माँ धरती अपने आँसू

जेल की सलाखों से बाहर आता है

कवि का सन्देश गीत बनकर ।

 

कब डरता है दुश्मन कवि से ?

जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हिं

वह कै़द कर लेता है कवि को ।

फाँसी पर चढ़ाता है

फाँसी के तख़्ते के एक ओर होती है सरकार

दूसरी ओर अमरता

कवि जीता है अपने गीतों में

और गीत जीता है जनता के हृदयों में ।

 

- वरवर राव

(सभी कविताएं कविता कोश से साभार)

इसे भी पढ़े : क्या हुआ छिन गई अगर रोज़ी, वोट डाला था इस बिना पर क्या!

इसे भी पढ़े : ‘इतवार की कविता’: मेरी चाहना के शब्द बीज...

इसे भी पढ़े : मुफ़्त में राहत नहीं देगी हवा चालाक है...

इसे भी पढ़े : तुम ज़िंदा हो पापा... : फ़ादर्स डे विशेष

इसे भी पढ़े : वचन देते हैं, हम विजयी होंगे या मौत का सामना करेंगे

Sunday Poem
poem
Hindi poem
Varvara Rao
hindi poetry
hindi poet

Related Stories

वे डरते हैं...तमाम गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज और बुलडोज़र के बावजूद!

इतवार की कविता: भीमा कोरेगाँव

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

इतवार की कविता: वक़्त है फ़ैसलाकुन होने का 

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

...हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

जुलूस, लाउडस्पीकर और बुलडोज़र: एक कवि का बयान

फ़ासीवादी व्यवस्था से टक्कर लेतीं  अजय सिंह की कविताएं

सर जोड़ के बैठो कोई तदबीर निकालो

देवी शंकर अवस्थी सम्मान समारोह: ‘लेखक, पाठक और प्रकाशक आज तीनों उपभोक्ता हो गए हैं’


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लंबे संघर्ष के बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व सहायक को मिला ग्रेच्युटी का हक़, यूनियन ने बताया ऐतिहासिक निर्णय
    26 Apr 2022
    न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की पीठ ने कहा कि आंगनवाड़ी केंद्र भी वैधानिक कर्तव्यों का पालन करते हैं तथा वे सरकार की विस्तारित इकाई बन गए हैं। पीठ ने कहा कि 1972 (ग्रेच्युटी का…
  • नाइश हसन
    हलाल बनाम झटका: आख़िर झटका गोश्त के इतने दीवाने कहां से आए?
    26 Apr 2022
    यह बहस किसी वैज्ञानिक प्रमाणिकता को लेकर कतई नहीं है। बहस का केन्द्र हिंदुओं की गोलबंदी करना है।
  • भाषा
    मस्क की बोली पर ट्विटर के सहमत होने के बाद अब आगे क्या होगा?
    26 Apr 2022
    अरबपति कारोबारी और टेस्ला के सीईओ एलन मस्क की लगभग 44 अरब डॉलर की अधिग्रहण बोली को ट्विटर के बोर्ड ने मंजूरी दे दी है। यह सौदा इस साल पूरा होने की उम्मीद है, लेकिन इसके लिए अभी शेयरधारकों और अमेरिकी…
  • भाषा
    कहिए कि ‘धर्म संसद’ में कोई अप्रिय बयान नहीं दिया जाएगा : न्यायालय ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव से कहा
    26 Apr 2022
    पीठ ने कहा, “हम उत्तराखंड के मुख्य सचिव को उपरोक्त आश्वासन सार्वजनिक रूप से कहने और सुधारात्मक उपायों से अवगत कराने का निर्देश देते हैं।
  • काशिफ काकवी
    मध्य प्रदेश : मुस्लिम साथी के घर और दुकानों को प्रशासन द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद अंतर्धार्मिक जोड़े को हाईकोर्ट ने उपलब्ध कराई सुरक्षा
    26 Apr 2022
    पिछले तीन महीनों में यह चौथा केस है, जहां कोर्ट ने अंतर्धार्मिक जोड़ों को सुरक्षा उपलब्ध कराई है, यह वह जोड़े हैं, जिन्होंने घर से भाग कर शादी की थी।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License