NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
तमिलनाडु चुनाव: जन मुद्दों की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश में वामपंथी दल!
न जाने कितने ही अनगिनत सवाल और संदर्भ तमिलनाडु के लोग– समाज में बिखरे पड़ें हैं जिन्हें सत्ता सियासत के दलों-नेताओं को हर हाल में संज्ञान लेना था, जो इस बार भी नहीं हो सका।
अनिल अंशुमन
05 Apr 2021
तमिलनाडु चुनाव: जन मुद्दों की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश में वामपंथी दल!

दक्षिण भारत के सर्वाधिक चर्चित और विकसित प्रदेश तमिलनाडु की 234 सीटों वाली विधानसभा के लिए मंगलवार, 6 अप्रैल को मतदान हो रहा है।

एक से चार अप्रैल तक प्रदेश की राजधानी चेन्नई और इससे सटे चेंगलपट्ट और वेल्लूर विधानसभा क्षेत्रों के चुनावी भ्रमण के दौरान मिले अनुभवों में कई ऐसे पहलुओं के संकेत सूत्र सामने आए हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। प्रायः हर जगह यही देखने को मिला कि इस बार भी विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी सफलता नहीं मिलने जा रही। बिलकुल नाटकीय संयोग जैसा ही कहा जा सकता है कि एक ओर जहां बंगाल व असम राज्यों के विधानसभा चुनाव के सभी क्षेत्रों में देश के प्रधानमंत्री-गृहमंत्री की भव्य तस्वीरों से हर इलाका पटा हुआ दिखा, वहीं, तमिलनाडु ही एकमात्र ऐसा प्रदेश है जहां के चुनाव क्षेत्रों में भाजपा के शीर्ष नेताओं तो क्या खुद प्रधानमंत्री– गृहमंत्री तक की एक भी तस्वीर शायद ही कहीं नज़र आ जाए। यहाँ तक कि भाजपा के गठबंधन साझीदार एआईडीएम की प्रचार गाड़ियों में भाजपा का चुनावी झण्डा तो दिखा लेकिन किसी भी बैनर– पोस्टर में मोदी– शाह जी की तस्वीर नहीं देखने को मिली।

वेल्लूर स्थित एलआईसी क्षेत्रीय मुख्यालय में कार्यरत एससी–ओबीसी कर्मचारी संगठन के नेताओं ने एक स्वर से बताया कि इस बार भी भाजपा का खाता तो नहीं ही खुलेगा, इनके गठबंधन साथी एआईडीएमके की सरकार का भी जाना तय है। कारण पूछने पर उन्होंने दो टूक लहजे में यही बताया कि भाजपा–एआईडीएमके की ‘ उग्र हिंदुत्ववादी’ मार्का राजनीति को इस राज्य के लोग नहीं पसंद करते हैं। इसलिए डीएमके गठबंधन की ही सरकार बनना लगभग तय है। उधर गोदी मीडिया के तमाम अगर–मगर से परे अधिकांश तमिल मीडिया भी प्रदेश में डीएमके गठबंधन के जीतने की अधिक संभावना जता रही है।

लेकिन लोकतान्त्रिक तकाजों के लिहाज से चुनाव में जन की राजनीति से अधिक धन की राजनीति (वोटरों को मुफ्त उपहार बांटने की लोकलुभावन घोषणों की होड़) के साथ साथ महज दल व नेता केन्द्रित राजनीति का बोलबाला कराया जाना, सही नहीं कहा जा सकता। क्योंकि राजधानी चेन्नई से जुड़े मुख्य मार्गों समेत सभी सिक्स व फोर लेन चौड़ी सड़कों के दोनों ओर कतार से खड़ी बड़ी बड़ी निजी कंपनी–रियल स्टेट कार्यालयों, आलीशान अपार्टमेंटों, भव्य इमारतों– होटलों और रेस्टोरेन्टों की चकचौंध में एक प्रकार का विकास तो दीखता है, लेकिन इस चकाचौंध भरे विकास के इलाकों से थोड़ी ही दूर पर अवस्थित निम्न आयवालों की कॉलोनियों–मुहल्लों व गांवों में पसरा रोज रोज जीने की जद्दोजहद और भविष्य की बढ़ती अनिश्चितता इसी विकास की दूसरी और स्याह तस्वीर बयां कर रही है। जिसे मैनेज करने के लिये ही सत्ता सियासत के सारे दल और नेता वोटरों को लुभाने के लिये मुफ्त उपहार और घोषणाओं की होड़ मचाए रहे। जिसके सुर में सुर मिलाते हुए प्रदेश की मुख्यधारा की मीडिया ने भी सियासी रहनुमाओं की अदाओं को ही तमाम चुनावी चर्चा – विश्लेषणों के केंद्र में बनाए रखा। प्रदेश की जनता की अवरुद्ध आर्थिक विकास, दिनों दिन विकराल हो रही बेरोजगारी समस्या, गुलामों जैसी स्थिति झेल रहे लाखों लाख ठेका मजदूर – कर्मचारियों के स्थायीकरण तथा गरीबों को ज़मीन के पट्टे देने जैसे सवाल चुनावी एजेंडा नहीं बन सके। लाखों गरीब और निम्न आय वाले लोग जो साल के बारहों महीने पीने का साफ पानी की उपलब्धता के अभाव में हर दिन बाज़ार से खरीदे गए पानी के बड़े बड़े जारों पर ही निर्भर जीने को अभिशप्त हैं, किसी ने सुध नहीं ली।

इसे पढ़ें :  तमिलनाडु चुनाव : क्यों उभर रहा है संदिग्ध किस्म का प्रतियोगी लोकप्रियतावाद?

बड़े आलीशान नर्सिंग होम और हाईटेक निजी अस्पतालों का जाल तो बिछ गया है लेकिन सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों की हालत जस की तस जर्जर ही बनी हुई है। आज भी दलित समुदाय के लोगों का जीवन स्तर बेहद चिंताजनक स्थितियों में ही पड़ा हुआ है। अनेकों को सरकारी राशन कार्ड व अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल सका है। रियल स्टेट कारोबार और कॉर्पोरेट कंपनियों की मनमानी पर राज्य का कोई अंकुश नहीं है ।

वंडलूर के कॉलेज शिक्षित दलित युवा प्रभाकरण से इस बार के चुनाव में दलित युवाओं की सक्रिय भागीदारी नहीं देखे जाने के संदर्भ में पूछे जाने पर बिफर जाते हैं। कहते हैं– “हमें बदनाम किया जाता है कि पैसों से हमारे लोगों के वोट खरीदा जाता है और सारे युवा चुनाव में पैसों के लिये काम करते हैं, इस स्थिति के लिये ज़िम्मेवार राजनीतिक दल और उसके नेताओं से क्यों नहीं पूछा जाता है। जो हर बार चुनावों में हमारा वोट झटक कर मतलब तो साध लेते हैं और उसके बाद कोई खबर नहीं लेते। यही वजह है कि हमारे लोगों और युवाओं में यह नकारात्मक भावना पूरी तरह से घर कर गयी है कि जब हमारे लिये कोई सोचता ही नहीं है तो हम क्यों ईमानदार रिश्ता रखें ”।

न जाने ऐसे कितने ही अनगिनत सवाल और संदर्भ तमिलनाडु के लोग– समाज में बिखरे पड़ें हैं जिन्हें सत्ता सियासत के दलों-नेताओं को हर हाल में संज्ञान लेना था, जो इस बार भी नहीं हो सका।

तमिलनाडु में विकास के तस्वीर के इन्हीं स्याह पहलुओं को इस बार की विधानसभा चुनावी राजनीति के केंद्र में लाने तथा आम जन के सवालों को सदन में पहुँचाने की जद्दोजहद में लगे रहे प्रदेश के वामपंथी दल। जिनमें सीपीएम एवं सीपीआई डीएमके गठबंधन के घटक के तौर पर 12 सीटों से चुनाव में खड़े हैं। वहीं सीपीआई एमएल ने 12 सीटों पर स्वतंत्र रूप से अपने प्रत्याशी खड़े कर शेष सीटों पर डीएमके गठबंधन के प्रत्याशी को समर्थन दिया है। कुछेक स्थानों पर फ्रेंडली कॉन्टेस्ट की स्थिति भी बनी हुई है।

कुल 24 सीटों पर वामपंथी दल पूरी सक्रियता के साथ चुनावी मुहिम में जन मुद्दों को चुनाव के केंद्र में लाने की जद्दोजहद में जुटे रहे। प्रदेश के मुख्यधारा मीडिया ने बड़े सी सुनियोजित अंदाज़ में वामपंथी दलों की चुनावी सक्रियता को कोई स्पेस देना तो दूर, उल्टे दक्षिण में वामपंथ के सिमट जाने को ही फोकस किया। वाम दलों के चुनावी घोषणा पत्रों की भी मीडिया चर्चा पूरी तरह से गायब रही।

असंगठित मजदूरों और वंडलूर स्थित प्रदेश के सबसे बड़े ज़ू के मजदूरों के सवालों पर निरंतर आंदोलनरत रहने वाले चेंगलपट्ट विधान सभा क्षेत्र से भाकपा माले प्रत्याशी इरणीयप्पन ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ बताया, “तमिलनाडु की राजनीतिक धरती में हमेशा से वामपंथी राजनीति को सम्मानजनक स्थान मिलता रहा है। इस बार के चुनाव में भाजपा व नरेंद्र मोदी के खिलाफ यदि आक्रामक राजनीतिक विरोध अभियान प्रभावी हुआ है तो उसमें वाम दलों की सक्रिय भूमिका को कम करके नहीं देखा जाना चाहिए”।

Tamil Nadu Elections 2021
AIDM
BJP
AIADMK
DMK
left parties

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • Neha Singh Rathore
    न्यूज़क्लिक टीम
    ‘यूपी में सब बा’ के जवाब में नेहा सिंह राठौर का ‘ यूपी में का बा’
    23 Jan 2022
    यूपी विधानसभा चुनाव में वोटरों को रिझाने के लिए सांसद और अभिनेता रवि किशन भाजपा की तारीफ़ में एक वीडियो लेकर आए, जिसके बोल हैं ‘ यूपी में सब बा’। भाजपा की उपलब्धियों का बखान वाला यह वीडियो घर-घर…
  • pm
    अजय कुमार
    दो टूक: मोदी जी, आप ग़लत हैं! अधिकारों की लड़ाई से देश कमज़ोर नहीं बल्कि मज़बूत बनता है
    23 Jan 2022
    75 वर्षों में हम सिर्फ़ अधिकारों की बात करते रहे हैं। अधिकारों के लिए झगड़ते रहे, जूझते रहे, समय भी खपाते रहे। सिर्फ़ अधिकारों की बात करने की वजह से समाज में बहुत बड़ी खाई पैदा हुई है: प्रधानमंत्री…
  • Ethiopia
    शिरीष खरे
    इथियोपिया : फिर सशस्त्र संघर्ष, फिर महिलाएं सबसे आसान शिकार
    23 Jan 2022
    इथियोपिया, अफ्रीका महाद्वीप का यह देश पिछले दो वर्षों से अधिक समय से सुखिर्यों में है, जहां नवंबर, 2020 से शुरू हुआ सशस्त्र संघर्ष अभी भी जारी है, जहां टिग्रे अलगाववादियों और उनके खिलाफ इथियोपियाई…
  • nehru and subhash
    एल एस हरदेनिया
    नेताजी की जयंती पर विशेष: क्या नेहरू ने सुभाष, पटेल एवं अंबेडकर का अपमान किया था?
    23 Jan 2022
    नरेंद्र मोदी का यह आरोप तथ्यहीन है कि नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस, डॉ. अंबेडकर और सरदार पटेल को अपेक्षित सम्मान नहीं दिया।
  • cartoon
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    …सब कुछ ठीक-ठाक है
    23 Jan 2022
    "क्यों, क्या सब ठीक-ठाक नहीं हैं? क्या सब ख़ैरियत से नहीं है? क्या हम हिंदू राष्ट्र नहीं बन रहे हैं? ठीक है भाई! बेरोज़गारी है, महंगाई है, शिक्षा बरबाद हो रही है और अस्पताल बदहाल। पर देश में क्या…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License