NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
भविष्य में वही होगा जिसकी बुनियाद हम आज डालेंगे
दुनिया में जितने पैसे कर चुरा कर रखे गए हैं और हथियार बनाने पर खर्च किए जाते हैं, उतने पैसे से दुनिया की स्वास्थ्य, शिक्षा और भूख की परेशानी दूर की जा सकती है।
ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
31 Dec 2020
भविष्य में वही होगा जिसकी बुनियाद हम आज डालेंगे
बोलीविया के लोगों द्वारा किए जा रहे प्रतिरोध के सम्मान में एक तस्वीर, टिंग्स चाक (चीन)। 

नवंबर के अंत में, संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने संयुक्त राष्ट्रसंघ (यूएन) की 75वीं वर्षगाँठ मनाते हुए जर्मन बुंडेस्टैग (संसद) को संबोधित किया। संयुक्त राष्ट्र संघ की आत्मा उसका अधिकारपत्र (चार्टर) है, जो कि वास्तव में दुनिया के देशों को एक वैश्विक परियोजना में बाँधने वाली एक संधि है, जिसे अब संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी 193 सदस्य देशों ने स्वीकार कर लिया है। यह ज़रूरी है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकारपत्र के चार मुख्य लक्ष्यों को दोहराया जाए, क्योंकि इनमें से अधिकांश अब सामाजिक चेतना से दूर हो गए हैं:

1. 'युद्ध के संकट' को रोकना।

2. मनुष्य की गरिमा व उसके जीवन के मूल्य में और मौलिक मानवाधिकारों के प्रति विश्वास को फिर से सुदृढ़ करना।’

3. अंतर्राष्ट्रीय क़ानून की अखंडता बनाए रखना।

4. स्वतंत्रता के अनुभव को बढ़ाने के साधन के रूप में 'सामाजिक प्रगति और जीवन के बेहतर मापदंडों को बढ़ावा देना।'

गुटेरेस ने बताया कि चार्टर के उद्देश्यों को प्राप्त करने के रास्ते न केवल नवफ़ासीवादी ताक़तों, जिन्हें वे 'लोकप्रिय तरीक़े' कहते हैं, द्वारा बंद किए जा रहे हैं, बल्कि सबसे क्रूर प्रकार का साम्राज्यवाद -जिसका एक स्वरूप हम संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की अगुवाई में चल रहे 'वैक्सीन नेशनलिज़म' के रूप में देख रहे हैं- भी इन उद्देश्यों के आड़े आ रहा है। गुटेरेस ने कहा, ‘यह स्पष्ट है कि दुनिया को खुलेपन से स्वीकार करके भविष्य को जीता जा सकता है' न कि ‘दिमाग़ बंद रख कर’।

कोरोनाशॉक: वायरस और दुनिया, विकास ठाकुर (भारत) द्वारा बनाया गया आवरण चित्र। 

संयुक्त राष्ट्र संघ का अधिकारपत्र, ट्राइकांटिनेंटल: सामाजिक अनुसंधान संस्थान, में हमारे काम का प्रेरणास्रोत है। इस अधिकारपत्र के लक्ष्यों को आगे बढ़ाना मानवता के निर्माण की दिशा में एक आवश्यक क़दम है, यह एक मानवीय आकांक्षा है न कि अवधारणात्मक तथ्य; हम अभी मानव नहीं बने हैं, परंतु हम मानव बनने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ देर के लिए सोचिए कि यदि हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे होते जहाँ युद्ध नहीं होते और जहाँ अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का सम्मान हो रहा होता, या हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे होते जहाँ सभी मनुष्यों के मौलिक मानवाधिकारों का सम्मान हो रहा होता और जहाँ व्यापक सामाजिक प्रगति को बढ़ावा देने का काम हो रहा होता, तो क्या होता? ऐसी दुनिया में, उत्पादित संसाधनों का इस्तेमाल सेना के हथियार बनाने में नहीं हो रहा होता, उनका उपयोग इसके विपरीत भुखमरी का अंत करने, निरक्षरता का अंत करने, ग़रीबी का अंत करने, बेघरों को घर दिलाने जैसे कामों में होता। स्पष्ट शब्दों में कहें तो, ऐसी दुनिया में उत्पादित संसाधनों का इस्तेमाल मनुष्य का तिरस्कार करने वाले संरचनात्मक ढाँचों का अंत करने के लिए किया जाता।

साल 2019 में, दुनिया के देशों ने कुल मिलाकर लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर हथियारों पर ख़र्च किए; और दूसरी तरफ़ दुनिया के अमीरों ने 36 ट्रिलियन डॉलर कर-मुक्त जगहों (टैक्स हैवनों) पर छिपा दिए। इस पैसे का मामूली-सा हिस्सा ख़र्च करके दुनिया से भुखमरी ख़त्म की जा सकती है; विभिन्न अनुमानों के अनुसार भुखमरी ख़त्म करने के लिए 7 बिलियन डॉलर से लेकर 265 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष के ख़र्च की ज़रूरत है। सार्वजनिक शिक्षा और सार्वभौमिक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को व्यापक बनाने के लिए भी लगभग इतने ही धन की ज़रूरत है। उत्पादित संसाधनों पर धनाढ्यों का क़ब्ज़ा है, जो पूर्ण रोज़गार की नीतियों को आगे बढ़ाने के बजाय अपने पैसे की ताक़त से यह सुनिश्चित करते हैं कि केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को कम रखें। यदि आप इसे क़रीब से देखें तो यह एक घोटाला है।

विश्व बैंक के दो नये अध्ययनों से पता चलता है कि महामारी के दौरान संसाधनों और नवोन्मेष की कमी के कारण, पहले की तुलना में 7.2 करोड़ अतिरिक्त बच्चे 'अधिगम की ग़रीबी' में धँस जाएँगे। किसी बच्चे के दस साल का होने के बाद भी यदि वो सरल पाठों को पढ़ने और समझने में असमर्थ हो तो यह उसकी 'अधिगम की ग़रीबी' यानी लर्निंग पावर्टी को दर्शाता है। यूनिसेफ़ के एक अध्ययन के अनुसार उप-सहारा अफ़्रीका में पहले के मुक़ाबले महामारी के दौरान 5 करोड़ और लोग अत्यधिक ग़रीब हुए हैं, इनमें से अधिकांश बच्चे हैं। उप-सहारा अफ़्रीका के 55 करोड़ बच्चों में से 28 करोड़ बच्चे खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं, जबकि 'कक्षा में कभी फिर से वापस लौटने की संभावना ख़त्म हो' जाने के साथ करोड़ों बच्चों की शिक्षा पूरी तरह बंद हो गई है।

जीवित रहने के लिए रोज़ संघर्ष करने वाले करोड़ों लोगों की दुर्दशा और मुट्ठी भर लोगों की फ़िज़ूलख़र्चियों के बीच का अंतर खाई के समान है। यूबीएस की नयी रिपोर्ट का शीर्षक अजीब है: 'राइडिंग द स्टॉर्म' (तूफ़ान की सवारी)। बाज़ार की अशांति से संपत्ति का ध्रुवीकरण बढ़ता है। दुनिया के 2,189 अरबपति इस तूफ़ान की सवारी करते हुए और भी मालामाल हुए हैं। जुलाई 2020 तक उनका कुल धन 10.2 ट्रिलियन डॉलर हो गया था (जो अप्रैल महीने में 8.0 ट्रिलियन डॉलर था)। उनका धन अब तक के सबसे उच्च स्तर पर पहुँच गया है। इस ग्रेट लॉकडाउन के दौरान अप्रैल से जुलाई के बीच उनकी संपत्ति में 27.5% की वृद्धि हुई। और ये तब हुआ जबकि पूँजीवादी दुनिया में करोड़ों लोगों की नौकरियाँ चली गईं, जीवन उथल-पुथल हो गया, और लोग सरकारों से मिलने वाली मामूली राहत के सहारे जीवित रहने के लिए मजबूर हो गए।

कोरोनाशॉक और पितृसत्ता, डेनिएला रग्गरी (अर्जेंटीना) के द्वारा बनाया गया आवरण चित्र। 

हमारी ओर से जारी सबसे हालिया अध्ययन, 'कोरोनाशॉक एंड पैट्रिआर्की', अनिवार्य रूप से पढ़ा जाना चाहिए; इस अध्ययन में कोरोनाशॉक (कोविड-19 के कारण के कारण लगे लॉकडाउन, इस दौरान आई आर्थिक मंदी, व इसके प्रबंधन की ओर सरकारों के रवैये) के सामाजिक -और लैंगिक- प्रभाव का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। हमारी टीम समझना चाहती थी कि अत्यंत शोषण की स्थिति कैसे सामाजिक रिश्तों पर असर डालकर, जनता के कुछ हिस्सों को ख़ास तौर से उत्पीड़ित करती है। इस अध्ययन के अंत में अठारह माँगों की एक सूची है; ये माँगें हमारे आने वाले संघर्षों का मार्गदर्शन कर सकती हैं। ये रिपोर्ट पढ़कर आप समझ जाएँगे कि पूँजीवादी देशों पर धनाढ्यों का नियंत्रण है, और वो हमारे समय की बुनियादी समस्याओं जैसे कि बेरोज़गारी, भुखमरी, पितृसत्तात्मक हिंसा, अवमूल्यन, अनिश्चितता और देखभाल के कामों की अदृश्यता को हल करने में असमर्थ हैं।

इस साल हमने  -कोरोनावायरस पर रेड अलर्ट से लेकर कोरोनाशॉक पर अध्ययनों तक- जो भी लेख प्रकाशित किए, उनका उद्देश्य था मज़दूर आंदोलन, किसान आंदोलन और अन्य जन आंदोलनों के वैश्विक दृष्टिकोण की नज़र से इन घटनाक्रमों का तर्कसंगत आकलन करना। हमने विश्व स्वास्थ्य संगठन के उस दृष्टिकोण कि ‘ये एकजुटता का समय है, कलंकित करने का नहीं’, को गंभीरता से लेते हुए अपने सभी अध्ययन किए। वियतनाम और क्यूबा जैसे समाजवादी सरकारों वाले देशों में संक्रमण और मौत के आँकड़े बहुत कम थे, इसलिए हमने अध्ययन किया कि ये सरकारें महामारी का प्रबंधन करने में बेहतर क्यों रहीं। हमने पाया कि ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि इन सरकारों ने वायरस के प्रति वैज्ञानिक रवैया अपनाया, आवश्यक उपकरणों और दवाओं के उत्पादन के लिए उन्होंने  अपने देश के मज़बूत सार्वजनिक चिकित्सा क्षेत्र की मदद ली, वे अपनी जनता की सार्वजनिक कार्रवाई की आदत पर भरोसा कर सके, जिसके चलते लोग एक-दूसरे को राहत पहुँचाने के लिए संगठित हो गए और इन सरकारों ने नस्लवादी दृष्टिकोण के बजाय सूचना, वस्तुएँ -और चीन और क्यूबा ने तो चिकित्साकर्मी- साझा कर अंतर्राष्ट्रीयता का नमूना पेश किया। यही कारण है कि हम -और कई अन्य संगठन-  क्यूबा के डॉक्टरों को शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की माँग कर रहे हैं।

कोरोनाशॉक और उसके चलते बदल रही दुनिया के बारे में हमने कई उल्लेखनीय दस्तावेज़ एकत्रित किए हैं। इनमें कोविड के बाद की दुनिया के लिए दस-सूत्री एजेंडा शामिल है; ये एजेंडा सबसे पहले एक पेपर के रूप में महामारी के बाद की अर्थव्यवस्था पर बोलिवेरीयन अलायन्स फ़ॉर द पीपल्ज़ ऑफ़ आवर अमेरिका (एएलबीए) द्वारा आयोजित एक उच्च-स्तरीय सम्मेलन में पढ़ा गया था। 2021 के शुरुआती महीनों में, हम कोरोना के बाद की दुनिया पर एक पूरा लेख प्रकाशित करेंगे।

कोरोनाशॉक और समाजवाद। पीपुल्स मेडिकल पब्लिशिंग हाउस, चीन, 1977 के चित्र में परिवर्तन कर इंग्रिड नेवेस (ब्राज़ील) द्वारा तैयार किया गया कवर पेज। 

व्यक्तिगत तौर पर, मैं ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की पूरी टीम को धन्यवाद देना चाहता हूँ कि वे महामारी के दौरान इस मुश्किल समय में न केवल अपने काम के प्रति प्रतिबद्ध रहे बल्कि पहले के मुक़ाबले ज़्यादा गति से काम करते हुए एक-दूसरे को हिम्मत भी देते रहे।

हम अपने उन आंदोलनों से प्रेरणा लेते हैं, जो आपदा को अवसर के रूप में इस्तेमाल करने वाली पूँजीवादी सरकारों का दृढ़ता से विरोध कर रहे हैं। उनकी दृढ़ता हमें हिम्मत देती है। पिछले हफ़्ते के न्यूज़लेटर में आपने केरल में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के युवा साथियों द्वारा मानवीय और न्यायपूर्ण समाज बनाने के लिए किए जा रहे धैर्यपूर्ण व समर्पित कामों के बारे में पढ़ा। ठीक इसी प्रकार के काम ब्राज़ील के भूमिहीन श्रमिक आंदोलन (एमएसटी) में देखे जा सकते हैं, और ज़ाम्बिया के कॉपर बेल्ट क्षेत्र में भी देखे जा सकते हैं, जहाँ सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए प्रचार कर रहे हैं, और दक्षिण अफ़्रीका में भी देखे जा सकते हैं, जहाँ नेशनल यूनियन ऑफ़ मेटल वर्कर्स (नुमसा) महामारी के दौरान छँटनी के ख़िलाफ़ व श्रमिकों के हक़ के लिए लड़ रहे हैं और जहाँ अबहलाली बासे मज़ोंडोलो झोंपड़पट्टियों में रहने वालों के बीच आत्मविश्वास और अपनी ताक़त बढ़ाने का काम कर रहा है। हमें इसी प्रकार की हिम्मत और प्रतिबद्धता वर्कर्स पार्टी ऑफ़ ट्यूनीशिया और डेमोक्रेटिक वे ऑफ़ मोरक्को के अपने साथियों में भी देखने को मिलती है, जो अरबी-भाषी क्षेत्रों में वामपंथ को पुनर्जीवित करने का काम कर रहे हैं। और ऐसा ही साहस हमें बोलीविया, क्यूबा, ​​और वेनेज़ुएला, चीन, लाओस, नेपाल और वियतनाम के लोगों की कोशिशों में दिखता है जो इन ग़रीब देशों में समाजवाद स्थापित करना चाहते हैं, जबकि इन्हें अपने समाजवादी तरीक़ों के ख़िलाफ़ लगातार हमलों का सामना करना पड़ रहा है। हमें अर्जेंटीना के अपने साथियों से भी ताक़त मिलती है, जो बहिष्कृत श्रमिकों की शक्ति को मज़बूत करने और पितृसत्ता से परे एक समाज का निर्माण करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हम एक आंदोलनों द्वारा संचालित शोध संस्थान हैं; हमारे द्वारा किए जाने वाले सभी काम आंदोलनों से प्रेरित होते हैं।



हमारे विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा किए गए कुछ ख़ास कार्यक्रम व प्रकाशन। 

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान में, हम मानते हैं कि एक बेहतर जीवन संभव है और उसके सपने भी देखते हैं। हम क्षितिज से ऊपर उठकर देखना चाहते हैं कि लोग आज किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं, और उससे पूँजीवाद के बाद के शत्रुता-रहित जीवन की संभावनाओं के बारे में क्या पता चलता है। यह नया क्षितिज हमारे लिए तैयार होकर भविष्य में हमें यूँ ही नहीं मिल जाएगा; मज़दूरों व किसानों के द्वारा अपने शोषण के विरुद्ध लड़े जा रहे संघर्षों और तिरस्कार तथा अभाव की मौजूदा ज़िंदगी से परे एक दुनिया बनाने के लिए हम वर्तमान में जो कुछ करेंगे उसी पर निर्भर होगा। क्योंकि हम इस बात में यक़ीन करते हैं कि भविष्य में वही होगा जिसकी बुनियाद हम आज डालेंगे।

USA
Tax Heaven
UNO
United Nations organization
Corona
Hunger
education
Health of world
Principals of UNO
Charter of UNO
Arsnel Industry

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

कर्नाटक पाठ्यपुस्तक संशोधन और कुवेम्पु के अपमान के विरोध में लेखकों का इस्तीफ़ा

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन में हो रहा क्रांतिकारी बदलाव

विशेष: क्यों प्रासंगिक हैं आज राजा राममोहन रॉय

अमेरिकी आधिपत्य का मुकाबला करने के लिए प्रगतिशील नज़रिया देता पीपल्स समिट फ़ॉर डेमोक्रेसी

अलविदा शहीद ए आज़म भगतसिंह! स्वागत डॉ हेडगेवार !

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

लोगों की बदहाली को दबाने का हथियार मंदिर-मस्जिद मुद्दा

कर्नाटक: स्कूली किताबों में जोड़ा गया हेडगेवार का भाषण, भाजपा पर लगा शिक्षा के भगवाकरण का आरोप


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License