NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
भारत
राजनीति
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी के चारों सदस्य कृषि कानूनों के समर्थक हैं
अशोक गुलाटी, भूपिन्द्र सिंह मान, अनिल घनावत और डॉ. प्रमोद कुमार जोशी इन चारों का लगभग यही मानना है कि कृषि कानून सही दिशा में बढ़ा हुआ कदम हैं और किसान और विपक्ष भ्रम की स्थिति में है।

राज कुमार
13 Jan 2021
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी के चारों सदस्य कृषि कानूनों के समर्थक हैं
image courtesy :jansatta

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने विवादित कृषि कानूनों पर रोक लगाते हुए एक कमेटी बनाई है जो समाधान के लिये संवाद को आगे बढ़ायेगी। अशोक गुलाटी, भूपिन्द्र सिंह मान, अनिल घनावत और डॉ. प्रमोद कुमार जोशी इस कमेटी के सदस्य होंगे। आइये जानते हैं कि ये कौन हैं और कृषि कानूनों पर इनकी क्या राय रही है।

अशोक गुलाटी

अशोक गुलाटी एक कृषि अर्थशास्त्री हैं। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के चेयरमैन रहे हैं। अशोक गुलाटी को पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा जा चुका हैं। अब कृषि कानूनों के बारे में इनकी राय भी जान लेते हैं:-

1 अक्टूबर 2020 को द इंडियन एक्सप्रेस में अशोक गुलाटी ने एक लेख लिखा। जिसमें उन्होंने समझाया है कि कृषि कानून सही दिशा में आगे बढ़ा हुआ एक कदम हैं और विपक्ष भटकाव की स्थिति में है। उन्होंने अपने लेख में एमएसपी की गारंटी बारे में लिखा है-

 

“विपक्ष एमएसपी को कानून बनाने के लिये कह रहा है जिसका अर्थ है कि एमएसपी से नीचे खरीदने वाले निजी व्यापारियों को जेल हो सकती है। इससे तो बाज़ार में तबाही आ जाएगी। प्राइवेट प्लेयर्स खरीद करने से कतराएंगे।”

अनिल घनावत

अनिल घनावत शेतकारी संगठन महाराष्ट्र के अध्यक्ष हैं। अनिल घनावत खुलकर कृषि कानूनों का समर्थन करते हैं और सरकार से गुज़ारिश कर चुके हैं कि ये कानून वापस नहीं लिये जाने चाहिये। कांट्रेक्ट फार्मिंग, प्राइवेट मंडी और रिलायंस जैसे बड़े घराने की कृषि के क्षेत्र में आवक को सही मानते हैं। इस वीडियो में कृषि कानूनों बारे आप उनके विचार सुन सकते हैं। ये वीडियो इंडो एसियन कमोडिटीज़ के यूट्यूब चैनल पर 1 दिसंबर 2020 को पब्लिश हुआ है। आर्काइव लिंक।

द हिंदुस्तान बिज़नेस लाइन की 21 दिसंबर 2020 की एक रिपोर्ट के अनुसार शेतकारी संगठन ने कहा था कि अगर केंद्र सरकार ने पंजाब के किसानों के दबाव में ये कानून वापस ले लिये तो आगे कोई भी सरकार कृषि सुधार करने का साहस नहीं कर पाएगी। अनिल घनावत का कहना है कि संशोधन हो, कानून वापस नहीं होने चाहिये।

भूपिन्द्र सिंह मान

भूपिन्द्र सिंह मान राज्यसभा के सांसद रहे हैं। अखिल भारतीय किसान संयोजन समिति के अध्यक्ष हैं। ये वही अखिल भारतीय किसान संयोजन समिति है जिसने कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मिलकर कानूनों का समर्थन किया था। कहा था कि कुछ संशोधन करने चाहिये कानूनों को वापस नहीं लेना चाहिये। द हिंदू में 14 दिसंबर 2020 को छपी एक रिपोर्ट के अनुसार भूपिन्द्र सिंह का कहना है-

“कृषि को प्रतियोगी बनाने के लिये सुधार करना जरूरी है। लेकिन किसानों के हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिये और कानूनों की विसंगतियो को दूर किया जाना चाहिये।”

डॉ. प्रमोद कुमार जोशी

डॉ. प्रमोद कुमार जोशी साउथ एशिया अंतर्राष्ट्रीय फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक हैं। कृषि विज्ञान एवं तकनीक और विकास बारे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन हेतु वर्ल्ड बैंक द्वारा बनाये गये पैनल का हिस्सा रहे हैं। इसके अलावा भी अनेक अंतर्राष्ट्रीय पैनल और कमेटियों के हिस्से रहे हैं। डॉ. प्रमोद कुमार जोशी का विस्तृत परिचय आप इस लिंक पर देख सकते हैं।

कृषि कानूनों के बारे में डॉ. प्रमोद कुमार जोशी और डॉ. अरबिंद ने 15 दिसंबर 2020 को फाइनेंशियल एक्सप्रेस में एक लंबा लेख लिखा है। जिसे आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं। लेख में उन्होंने लिखा है कि-

“किसानों का ये दावा कि कृषि कानून किसानों और उनके संगठनों से विमर्श के बिना बनाये गये है, बिल्कुल गलत है। कृषि बाज़ार को नियंत्रण मुक्त करने के बारे में दो दशकों से चर्चा चल रही है। किसान बार-बार अपनी मांगें बदल रहे हैं। ”

 

लेख में वे आगे लिखते हैं-

 “किसान संगठन कानूनों को वापस लेने की बात कर रहे हैं जबकि किसानों को बाज़ार के अधिक विकल्प दिये जा रहे हैं। इसे किसानों के द्वारा अस्वीकार करना बहुत ही अजीब है। ”

 ऊपर मात्र कुछ उदाहरण दिये गये हैं। आप पूरा लेख इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।

 (लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते रहते हैं।)

 

SC Panel
Farmer unions
Sanyukt Kisan Morcha
farmer talks
Farm Laws
Farmer protests

Related Stories

बंगाल: बीरभूम के किसानों की ज़मीन हड़पने के ख़िलाफ़ साथ आया SKM, कहा- आजीविका छोड़ने के लिए मजबूर न किया जाए

ख़बर भी-नज़र भी: किसानों ने कहा- गो बैक मोदी!

किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे

कृषि क़ानूनों के निरस्त हो जाने के बाद किसानों को क्या रास्ता अख़्तियार करना चाहिए

किसान आंदोलन ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ रहा है

किसान आंदोलन: केंद्र ने किसानों को भेजा प्रस्ताव, मोर्चे ने मांगा स्पष्टीकरण, सिंघु बॉर्डर पर अहम बैठक

वे तो शहीद हुए हैं, मरा तो कुछ और है!

साम्राज्यवाद पर किसानों की जीत

यह जीत भविष्य के संघर्षों के लिए विश्वास जगाती है

किसान मोदी को लोकतंत्र का सबक़ सिखाएगा और कॉरपोरेट की लूट रोकेगा: उगराहां


बाकी खबरें

  • Nisha Yadav
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    चंदौली: निशा यादव हत्या मामले में सड़क पर उतरे किसान-मज़दूर, आरोपियों की गिरफ़्तारी की माँग उठी
    14 May 2022
    प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने कहा- निशा यादव का कत्ल करने के आरोपियों के खिलाफ दफ़ा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया जाए।
  • Delimitation
    रश्मि सहगल
    कैसे जम्मू-कश्मीर का परिसीमन जम्मू क्षेत्र के लिए फ़ायदे का सौदा है
    14 May 2022
    दोबारा तैयार किये गये राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्रों ने विवाद के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं, जो इस बात का संकेत देते हैं कि विधानसभा चुनाव इस पूर्ववर्ती राज्य में अपेक्षित समय से देर में हो सकते हैं।
  • mnrega workers
    सरोजिनी बिष्ट
    मनरेगा मज़दूरों के मेहनताने पर आख़िर कौन डाल रहा है डाका?
    14 May 2022
    "किसी मज़दूर ने 40 दिन, तो किसी ने 35, तो किसी ने 45 दिन काम किया। इसमें से बस सब के खाते में 6 दिन का पैसा आया और बाकी भुगतान का फ़र्ज़ीवाड़ा कर दिया गया। स्थानीय प्रशासन द्वारा जो सूची उन्हें दी गई है…
  • 5 वर्ष से कम उम्र के एनीमिया से ग्रसित बच्चों की संख्या में वृद्धि, 67 फीसदी बच्चे प्रभावित: एनएफएचएस-5
    एम.ओबैद
    5 वर्ष से कम उम्र के एनीमिया से ग्रसित बच्चों की संख्या में वृद्धि, 67 फीसदी बच्चे प्रभावित: एनएफएचएस-5
    14 May 2022
    सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, 2015-16 में किए गए सर्वेक्षण में 5 वर्ष से कम उम्र (6-59 महीने) के 58.6 प्रतिशत बच्चे इससे ग्रसित थे जबकि एनएफएचएस-5 के 2019-21 के सर्वे में इस बीमारी से ग्रसित बच्चों की…
  • masjid
    विजय विनीत
    ज्ञानवापी मस्जिद: कड़ी सुरक्षा के बीच चार तहखानों की वीडियोग्राफी, 50 फीसदी सर्वे पूरा
    14 May 2022
    शनिवार को सर्वे का काम दोपहर 12 बजे तक चला। इस दौरान ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के करीब आधे हिस्से का सर्वे हुआ। सबसे पहले उन तहखानों की वीडियोग्राफी कराई गई, जहां हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं की…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License