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भारत
राजनीति
1000 मर्दों पर 1020 औरतों से जुड़ी ख़ुशी की ख़बरें सच की पूंछ पकड़कर झूठ का प्रसार करने जैसी हैं!
औरतों की संख्या मर्दों से ज़्यादा है - यह बात NFHS से नहीं बल्कि जनगणना से पता चलेगी।
अजय कुमार
26 Nov 2021
sex ratio
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

आंकड़ें अपने पूरे संदर्भ में जितनी बात कहते हैं, अगर उतनी ही बात पढ़ी जाए तो आंकड़े अपनी सार्थक भूमिका निभाते हैं। लेकिन जब बात को तोड़ मरोड़ दिया जाता है, आंकड़ों से वह कहलवाने की कोशिश की जाती है जो आंकड़े कह नहीं रहे तो आंकड़े अर्थहीन हो जाते हैं।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की पांचवी रिपोर्ट ने भारत के बच्चों, औरतों, पोषण, सेहत और आबादी की वस्तुस्थिति से जुड़ी कई पैमाने पर ढेर सारे आंकड़े प्रस्तुत किए। इन आंकड़ों के सहारे भारत की नब्ज टटोली जा सकती है। सरकार जन कल्याण के कायदे - कानून , नियम - विनियम से जुड़े जरूरी कदम  उठा सकती है। इन आंकड़ों को आधार बनाकर लोगों के बीच की जाने वाली ठीक-ठाक बहस भारतीय लोक विमर्श को मजबूत बना सकती है। लेकिन यह सब तभी मुमकिन है, जब आंकड़ों से वही का कहलवाया जाए , जो यह कहने की कोशिश कर रहे हैं।

एनएफएचएस की पांचवी रिपोर्ट ने बताया कि प्रति 1000 मर्द पर भारत में 1020 औरतें हो गई हैं। लिंगानुपात यानी सेक्स रेशियो से जुड़े इस जानकारी को मुख्यधारा की मीडिया और सरकार के समर्थक लोगों के जरिए जिस तरह से प्रचारित किया जा रहा है, वह सच की नुमाइंदगी करता हुआ कम झूठ की नुमाइंदगी करता हुआ ज्यादा दिखता है। मौजूदा दौर की राजनीति  सच की पूंछ पकड़कर चलने वाले इस तरह के झूठ को ज्यादा से ज्यादा फैलाने की कोशिश करती है। 

हिंदी के तकरीबन कई मीडिया संस्थानों ने एनएफएचएस से मिली इस जानकारी को हेडिंग की तरह इस्तेमाल किया। कई मीडिया संस्थानों ने तो यह भी नहीं बताया कि NFHS क्या है? जिससे पता चले कि 1000 हजार मर्दो पर 1020 औरतों से जुड़े लिंगानुपात का पूरा सच क्या है? वह राजनीतिक प्रोपेगेंडा की तरह ना लगे।

साल 1992-93 से नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े प्रकाशित होते आ रहे हैं। अब तक इसकी चार रिपोर्ट प्रकाशित हो चुकी हैं। यह सर्वे बहुत बड़े पैमाने पर होता है। इस बार के सर्वे में एनएफएचएस की टीम ने देशभर के 707 जिलों से  6.1 लाख परिवारों से बातचीत की। सवाल-जवाब का सिलसिला तकरीबन 7 लाख औरतों और 1 लाख मर्दों के साथ चला। इनसे मिले जवाबों के आधार पर NFHS की पांचवी रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है।

जैसा कि जाहिर है कि सवाल-जवाब का सिलसिला भारत की पूरी आबादी के साथ नहीं किया गया, भारत की 135 करोड़ की आबादी में कुछ लाख लोगों के साथ किया गया, इसलिए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे एक तरह का सैंपल सर्वे है। भारत की जमीनी सच्चाई से जुड़ी उतनी अधिक निश्चित जानकारी मुहैया नहीं करवाती है, जितना अधिक सुनिश्चित जानकारी सेंसस के जरिए मिलती है। आप खुद सोच कर देखिए कि सबसे अधिक सुनिश्चित जानकारी किस से मिलेगी? वैसे सवाल-जवाब उसे जो पूरे भारत की आबादी के साथ हो या वैसे सवाल-जवाब से जो 135 करोड़ की आबादी में महज 7 लाख परिवारों के बातचीत पर आधारित हो? इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं.

इस मामले पर जानकारों की राय भी जान लीजिए। जिनका काम ही आबादी से जुड़े आंकड़ों पर रिसर्च करना है - उनका कहना है कि "नहीं, अभी तक औरतों ने मर्दों की संख्या को पार नहीं किया है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे कुछ विशिष्ट तरह की आबादी के साथ बातचीत कर किया जाता है। इसकी संरचना में ही पक्षधरता अंतर्निहित है। इसलिए अभी खुशी मनाने की जरूरत नहीं है। इससे भारत के सेक्स रेशियों की पूरी तरह से साफ तस्वीर नहीं मिल सकती है".।

इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ पापुलेशन साइंस भी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे  से जुड़ी एक सहयोगी संस्था थी। इसके रिसर्च फेलो नंदलाल मिश्रा बताते हैं कि पिछले 30 सालों में लिंगानुपात में सुधार तो हुआ है। लेकिन यह इतना बड़ा सुधार नहीं है जितना बड़ा करके नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में निकल कर आ रहा है। 17 एजेंसियों ने दो चरण में सर्वे किया था। दूसरा चरण जनवरी 2021 से लेकर अप्रैल 2021 के बीच में हुआ था। इस दौरान उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे देश के बड़े-बड़े राज्यों में सर्वे हुआ। इसी दौरान कोरोना की मार पर सबसे अधिक पड़ रही थी। प्रवासियों के इधर उधर जाने का सर्वे पर जरूर असर पड़ा होगा। इसीलिए शायद  ग्रामीण भारत में सेक्स रेश्यो 1037 औरतों पर 1000 हजार का दिख रहा है तो शहरी भारत में सेक्स रेशियो 985 मर्दों पर 1000 मर्दों का दिख रहा है। यह आंकड़े बेहतरी का इशारा जरूर है। लेकिन औरतों की संख्या को मर्दों से ज्यादा बताना गलतफहमी को बढ़ावा देना होगा।

लिंगानुपात विशेषज्ञ जाशोधरा दासगुप्ता की माने तो सेंसस के जरिए ही वस्तु स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। भारत में 10 करोड़ से अधिक आबादी वाले राज्य हैं। वहां के लिंगानुपात की जानकारी महज मुश्किल से 1,2 लाख  परिवार से बातचीत कर के सामने नहीं आ सकती।

ऑक्सफैम इंडिया के रिसर्च फैलो श्री रमन कहते हैं कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के सेक्स रेश्यो से जुड़ा आंकड़ा बता कर बड़े-बड़े बढ़िया संस्थान यह लिख रहे हैं कि भारत में

"मिसिंग गर्ल" के हालात खत्म हो चुके हैं। ( मिसिंग गर्ल शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले अमर्त्य सेन ने भारत में औरतों और मर्दों की संख्या के बीच मौजूद बढ़े गैप को दर्शाने के लिए किया था)। जबकि ऐसा नहीं है। साल 2005 - 06 के दौरान प्रस्तुत हुआ नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के तीसरे रिपोर्ट से पता चला था कि भारत में औरतों और मर्दों की संख्या 1000 के बदले 1000 पर पहुंच गई है। फिर 2015-16 के एनएफएचएस की चौथी रिपोर्ट ने बताया कि औरतों की संख्या मर्दों के मुकाबले घट गई है। 1000 मर्दो पर भारत में 991 औरतें हैं।

NFHS की पांचवी सर्वे के आधार पर भारत में औरतों की संख्या का मर्दों से ज्यादा बताया जाना एक तरह की विश्लेषणात्मक त्रुटि है। यह नहीं किया जाना चाहिए। अगर हम सेक्स रेश्यो एट बर्थ यानी जन्म के समय लिंगानुपात के आंकड़े देखें तो अब भी भारत की स्थिति बहुत बुरी है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की पांचवी रिपोर्ट बताती है कि जन्म के समय का लिंगानुपात 1000 मर्दो पर 929 औरतों का है। चौथी रिपोर्ट में 1000 मर्दों पर 919 औरतों का था। इसमें थोड़ा बहुत सुधार हुआ है। लेकिन यह आंकड़े बताते हैं कि अब भी भारत में बेटियों के जगह बेटों को चाहने वालों की संख्या ज्यादा है। भ्रूण हत्याएं भी होती होंगी। बच्चियों की शिशु हत्याएं भी होती होंगी। जन्म के समय लिंगानुपात से इसका पता चलता है कि लिंगानुपात की तस्वीर अब भी इतनी नहीं सुधरी है जितना लिंगानुपात के आंकड़ों से पता चल रहा है।

पापुलेशन फाउंडेशन इंडिया की संघमित्रा सिंह कहते हैं कि भारत में औरतों की जीवन प्रत्याशा दर मर्दों से ज्यादा है। औरतों की जीवन प्रत्याशा दर 70 साल है और मर्दों की जीवन प्रत्याशा दर तकरीबन 68 साल है। सर्वे में लिंगानुपात का सुधरा हुआ रूप दिखने के पीछे की एक यह भी कारण हो सकता है।

इन सारे स्पष्टीकरण के बाद भी यह बात सबसे महत्वपूर्ण है कि  नीति निर्माण और लोक विमर्श की दुनिया में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे से मिले आंकड़ों का बहुत अधिक महत्व है। बशर्ते इसे लोगों तक बात यह प्रचारित करते हुए ना पहुंचाई जाए कि " भारत में पहली बार मर्दों से अधिक हुई औरतों की आबादी, शहरों के मुकाबले गांव में बेटियों को ज्यादा बढ़ा मान"।( हिंदी के एक प्रतिष्ठित अखबार की हेडिंग)

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