NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
उनके तालिबान तालिबान, हमारे वाले संत?
"उनके तालिबान तालिबान हमारे तालिबान संत" का दोहरापन कही नहीं ले जाएगा। भेड़िये सिर्फ भेड़िये होते हैं और लाखों वर्ष का विवरण और हजारों वर्ष की सभ्यता गवाह है कि भेड़ियों ने कभी गांव नहीं बसाये।
बादल सरोज
02 Sep 2021
उनके तालिबान तालिबान, हमारे वाले संत?

अपने 20 साल के नाजायज और सर्वनाशी कब्जे के दौरान अफ़ग़ानिस्तान से लोकतान्त्रिक संगठनों, आंदोलनों और समझदार व्यक्तियों का पूरी तरह सफाया करने के बाद अमेरिकी उसे तालिबानों के लिए हमवार बनाकर, उन्हें इस खुले जेलखाने की चाबी थमाकर चले गए हैं। जाते जाते इन्हे सिर्फ अपना असला बारूद, अरबों डॉलर और हवाई बेड़ा ही सौंप कर नहीं गए "अच्छा तालिबानी" होने का प्रमाणपत्र भी देकर गए हैं। इस पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अपने लगुओं-भगुओं से भी अंगूठा लगवा कर गए हैं। यह ठेठ अमरीकी अंदाज़ है "जहँ पाँव पड़े दुष्टन के तहँ तहँ बंटाढार" इन "अच्छे तालिबानों" ने अपनी अच्छाई का प्रदर्शन करने के लिए भले जोरदार प्रचार अभियान छेड़ा हो. भले ही बाइडेन और उसके नाटो गिरोह के ब्रिटेन जैसे देश उनकी विज्ञप्तियों को छाप-दिखाकर अपनी आपराधिक लिप्तता छुपाने में लगे हों, मगर असलियत बयानों में नहीं कारगुजारियों में नुमायां होती है जो एक के बाद एक लगातार हो रही हैं।

पिछले महीने भर में इन तालिबानियों ने अफ़ग़ानिस्तान की तीन बड़ी साहित्यिक, सांस्कृतिक शख्सियतों की क्रूर हत्या करके अपनी "अच्छाई" के दावे के खोखलेपन को उजागर कर दिया है। सबसे पहले वे 28-29 जुलाई में खाशा जवान नाम से लोकप्रिय व्यंगकार कॉमेडियन फज़ल मोहम्मद के लिए आये। उन्हें उनके घर से उठाकर ले गए और मार डाला।  उसके बाद वे 4 अगस्त को कवि और इतिहासकार अब्दुल्ला अतेफी के लिए आये और उन्हें मार डाला। महीना पूरा होने से पहले ही 29-30 अगस्त को उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के लोकप्रिय लोकगायक और संगीतकार फवाद अन्दराबी को उनके घर में घुस कर गोलियों से भून डाला।

अभी कल न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ एक इंटरव्यू में तालिबानी सरकार के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने अन्दराबी के कत्ल को जायज ठहराते हुए दावा किया है कि "इस्लाम में संगीत की मनाही है।"

"द काइट रनर" और "थाउजेंड स्प्लेंडिड संस" जैसे बेस्ट सेलर उपन्यासों के अफ़ग़ानी मूल के लेखक खालेद होसैनी ने इसे शुद्ध बर्बरता करार दिया है और अमेरिका को इसका जिम्मेदार ठहराया है। सभ्यताओं के विनाश और सांस्कृतिक धरोहरों के सत्यानाश के अमेरिकी रिकॉर्ड उनकी पैदाइश से उसके साथ है। कोई 529 साल पहले जब लुटेरे कोलम्बस ने अमरीका "खोज निकाला" था तब पर्याप्त विकसित सभ्यताओं वाले अनेक कबीले इस महाद्वीप पर रहते थे। उन सबका नरसंहार करके जो अमरीका बना तबसे लेकर 2003 में बग़दाद में दुनिया की सबसे पुरानी लाइब्रेरी और म्यूजियम के साथ जो किया वह सबने देखा। यही उसने बीस बरस तक अफ़ग़ानिस्तान में किया इसकी सचमुच की खासियत यह है कि जो भी उसके साथ गया या जिसके भी वो पास गया वह कहीं का नहीं रहा। न तंत्र बचा न लोकतंत्र, न अमन बचा, न चमन। बचा तो सिर्फ और सिर्फ बिखराव, कोहराम और अराजकता, कट्टरता और बर्बरता।   

बहरहाल यहां प्रसंग तालिबानी प्रवक्ता का यह दावा है कि इस्लाम में संगीत निषिद्ध है, हराम है। क्या सचमुच? 

इस्लाम और मौसिकी 

2007 में बनी एक पाकिस्तानी फिल्म "खुदा के लिये" में इस बेहूदी धारणा के सांड़ को बहुत ही दिलचस्प अंदाज में सीधे सींग से पकड़ा गया है। फिल्म में इस्लामिक स्कॉलर मौलाना वली बने नसीरुद्दीन शाह ने खुद इस्लाम के उदाहरणों के साथ इस धारणा को गैर इस्लामिक बताया है। वे कहते हैं कि दुनिया भर में अब तक हुए कुल जमा 1 लाख 24 हजार पैगम्बरों से सिर्फ 4 पर किताबें नाज़िल हुईं। इनमे से एक थे हजरत दाऊद जिन्हे अल्ला ने मौसिकी संगीत बख्शा। वे पूछते हैं कि "मौसिकी अगर हराम है तो महज 4 ख़ास पैगम्बरों में से एक को ख़ास इसी काम के लिए क्यों भेजा गया?" 

10 मिनट की इस जिरह को उन्हें जरूर सुनना चाहिए जो तालिबानी बर्बरों को इस्लाम का अनुयायी या पैरोकार मानते हैं। 

इसी जिरह में मौलाना वली (नसीरुद्दीन शाह) दाढ़ी और पहनावे की कट्टरता पर कहते हैं कि "दीन में दाढ़ी है, दाढ़ी में दीन नहीं है ......  दाढ़ी तो अबू जहल के भी थी और लिबास भी वही था जो रसूलल्लाह जेबेतन फरमाते थे। "2007 की यह फिल्म एक सुन्नी शोयेब मंसूर ने पाकिस्तान में बैठकर बनाई है, जो बाकी सबके साथ इस बात का भी उदाहरण है कि धर्म के नाम पर फैलाई जाने वाली कट्टरता के खिलाफ जद्दोजहद उसी धर्म को मानने वालों के बीच जारी है, सही तरीका है भी यही। 

कट्टरतायें चाहें जिस रंग रूप की हों, जो भी झण्डा उठाकर, नेजा या त्रिशूल लहराती आएं सार में एक सी होती हैं। कट्टरताओं की फिसलन हमेशा जहालत और बर्बरता की ओर ले जाती है। 

जब इन्हे याद करें तब उन्हें भी न भूलें 

अफ़ग़ानिस्तान के फज़ल मोहम्मद, अब्दुल्ला अतेफी और फवाद अंदराबी की मौत पर हम सब स्तब्ध और दुःखी हैं, सारी मनुष्यता को शोक मनाना चाहिए, मगर इसके साथ इन तीनों से कहीं पहले हिन्दुस्तान में 20 अगस्त 2013 को पुणे में गोलियों से भून दिए गए नरेंद्र दाभोलकर, 20 फरवरी 2015 को मुम्बई में मार डाले गए गोविन्द पानसारे और 30 अगस्त को धारवाड़ में क़त्ल कर दिए गए एम.एम. कुलबुर्गी की शहादतें और उनके हत्यारों का खुलेआम छुट्टा घूमना भी याद कर लेना चाहिए। पुणे और मुम्बई की लाइब्ररियों, अहमदाबाद की पेंटिंग्स के संग्रहालय का ध्वंस और फिल्मों-गीतों-संगीतों पर नित नए हमले भी संज्ञान में लेने चाहिए। तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन द्वारा जनवरी 2015 में अपने लेखक की मौत का ऐलान और उसकी वजह स्मरण में रखनी चाहिए। 

क्योंकि, "उनके तालिबान तालिबान हमारे तालिबान संत" का दोहरापन कही नहीं ले जाएगा। भेड़िये सिर्फ भेड़िये होते हैं और लाखों वर्ष का विवरण और हजारों वर्ष की सभ्यता गवाह है कि भेड़ियों ने कभी गाँव नहीं बसाये। और यह भी कि भेड़िये रौशनी और जगार से डरते हैं। वे मशाल जलाना नहीं जानते। 

लेखक लोकजतन के संपादक हैं। साथ ही अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव भी हैं। उपरोक्त विचार व्यक्तिगत हैं। 

TALIBAN
Afghanistan
Religion Politics

Related Stories

विचार: बिना नतीजे आए ही बहुत कुछ बता गया है उत्तर प्रदेश का चुनाव

तालिबान सरकार को मान्यता देने में अनिच्छुक क्यों है पाकिस्तान?

अफ़ग़ानिस्तान की घटनाओं पर विचार

हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व का फ़र्क़

भारत और अफ़ग़ानिस्तान:  सामान्य ज्ञान के रूप में अंतरराष्ट्रीय राजनीति

जै श्रीराम: अभिवादन को युद्धघोष बनाने के पीछे क्या है?

अमेरिका-चीन संबंध निर्णायक मोड़ पर

रसोई गैस के दाम फिर बढ़े, महंगाई की जबरदस्त मार

तालिबान के साथ अमेरिका के बदलते रिश्ते और पैकेज डील!

अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े पर भारत के ‘ग़ैर-बुद्धिजीवी’ मुस्लिम का रुख


बाकी खबरें

  • Hafte Ki Baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    कृषि क़ानून वापसी के बाद यूपी और पंजाब में संघ-सरकार की मंशा क्या?
    20 Nov 2021
    इस बार #HafteKiBaat में सिर्फ दो बातों की चर्चा: मोदी सरकार ने तीन कृषि कानूनों को क्यों और कैसे वापस लेने का फैसला किया? दूसरी बात कि आगे क्या होगा? यूपी और पंजाब के चुनावों में अब मोदी सरकार और संघ…
  • bitcoin
    सोनिया यादव
    कर्नाटक: बिटकॉइन घोटाला ने सियासत में हलचल क्यों मचा दी है?
    20 Nov 2021
    इस स्कैम ने राज्य की राजननीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। एक ओर सीएम बोम्मई पार्टी के भीतर की चुनौती से परेशान हैं तो वहीं दूसरी ओर सुस्त जांच को लेकर विपक्ष सरकार पर जमकर निशाना साध रहा है।
  • Modi
    राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष : भक्तों के बीच “थैंक्यू मोदी जी!” का नया शिड्यूल घोषित
    20 Nov 2021
    देख लीजिए, कोविड-19 की तरह, किसान आंदोलन की आपदा में से भी मोदी जी ने अवसर निकाल ही लिया। राजधानी में थैंक्यू मोदी जी सभाओं का शिड्यूल आ गया है। बाकी राज्यों में भी आज-कल में यह सिलसिला शुरू हो जाएगा…
  • Punjab
    तृप्ता नारंग
    पंजाब: अपने लिए राजनीतिक ज़मीन का दावा करतीं महिला किसान
    20 Nov 2021
    पुरुषों और महिलाओं द्वारा पारंपरिक तौर पर जो भूमिका निभाई जाती रही है, उसमें आमूलचूल बदलाव देखने को मिला है, क्योंकि किसान आंदोलन में महिलाओं ने जमकर भागीदारी की है। हालांकि नेतृत्वकारी भूमिका में…
  • The stakes of talks between the President of America and China and the period of peace on the pretext of Afghanistan
    न्यूज़क्लिक टीम
    अमेरिका और चीन के राष्ट्रपति के बीच वार्ता का दांव और अफ़ग़ानिस्तान के बहाने शांति का दौर
    20 Nov 2021
    “पड़ताल दुनिया भर की’ में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने बातचीत की न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ से। मुद्दा रहा अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच हुई…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License