NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
चुनाव 2022
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
यूपी चुनाव को लेकर बड़े कॉरपोरेट और गोदी मीडिया में ज़बरदस्त बेचैनी
यदि यूपी जैसे बड़े राज्य में गैर भाजपा सरकार बन जाती है तो जनता के बुनियादी सवाल और आर्थिक मुद्दे देश की राजनीति के केंद्र बिंदु बन जाएंगे।
अफ़ज़ल इमाम
24 Jan 2022
up elections

दिग्गज कारपोरेट घरानों द्वारा संचालित गोदी मीडिया आम जनता के असली मुद्दों और आर्थिक सवालों को चुनावी बहस से बाहर करने के लिए पूरे जोर शोर से जुट गया है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए ज़हरीला प्रचार पूरे समय किया जा रहा है। गोदी एंकरों की भाषा  और अंदाज़ से कई बार यह समझना मुश्किल हो जाता है कि भाजपा की चुनावी लड़ाई असल में सपा व अन्य विपक्षी दलों से है या सिर्फ मुसलमानों से ? 

इसकी कई वजहें है, जिनमें से एक तो यह है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव व अन्य विपक्षी पार्टियों के नेता प्रचंड बेरोज़गारी, गरीबी, महंगाई, किसानों व युवाओं की समस्याओं के साथ-साथ कोरोना काल में सरकार की नाकामी आदि जैसे मुद्दों को पूरी शिद्दत से उठा रहे हैं। गोदी मीडिया की लाख कोशिशों के बाद भी विपक्षी नेता सांप्रदायिक और भावनात्मक मुद्दों के जाल में नहीं फंस रहे हैं।

दूसरे पिछड़े, दलित समुदायों में सामंती व पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति गुस्सा फूट पड़ा है। उन्हें एहसास हो गया है कि जिस तरह से देश में सरकारी उपक्रमों व संपत्तियों का निजीकरण किया जा रहा है उससे न सिर्फ रोजगार घटेगें बल्कि उन्हें जो आरक्षण की सुविधा मिली हुई थी, वह भी खत्म हो जाएगी। ऐसे में उनकी नई पीढ़ी का भविष्य क्या होगा ? 

पिछले दिनों यूपी में टीचर भर्ती में एससी व ओबीसी कोटे की सीटों के साथ जो कुछ किया गया, वह भी सबसे सामने है। लोग यह भी देख रहे हैं कि पिछले कुछ अर्से से चंद पूंजीपतियों की संपत्तियों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है, जबकि देश की आम जनता  निरंतर गरीब होती जा रही है। समाज का एक तबका है, जो दो वक्त की रोटी भी नहीं कमा पा रहा है। देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई दिनों-दिन बढ़ती जा रही है।

लोगों में इस चेतना को जगाने का काम काफी हद तक किसान आंदोलन ने भी किया है, क्योंकि घोर पूंजीवाद और निजीकरण के नाम पर सार्वजनिक संपत्तियों की लूट के खिलाफ आवाज़ उसी मंच से बुलंद हुई थी। अब इसका असर यूपी समेत 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में दिख रहा है।

जानकारों का तो यहां तक कहना है कि यूपी के पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्मराज सैनी समेत पिछड़े वर्ग के तमाम नेताओं ने अपने समर्थकों के मिज़ाज को भांपने के बाद ही भाजपा से अलग होने का फैसला लिया है। उन्हें अंदाज़ा हो गया था कि यदि कुर्सी से चिपके रहे तो, नीचे जमीन खिसक जाएगी। भाजपा से बगावत के बाद इन नेताओं ने जिस तरह से 85 व 15 का नारा दिया उससे कुछ लोग इसे परंपरागत मंडल की राजनीति से जोड़ कर देख रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई अब आर्थिक न्याय की तरफ बढ़ती नजर आ रही है।

पढ़े-लिखे दलित व पिछड़े वर्ग के युवा सत्ता और संसाधनों में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं। सत्ताधारी पार्टियों को यह समझना होगा कि अब बड़े से रंगीन थैले में चंद किलो अनाज, शौचालय और गैस सिलेंडर जैसी सांकेतिक चीज़ों या शगूफे बाजी से काम नहीं चलने वाला है।

गोदी मीडिया का यह प्रचार बिल्कुल हजम नहीं होता है कि पिछड़े वर्ग के नेता सिर्फ अपने कुछ करीबियों को टिकट नहीं मिलने से नाराज थे। स्वामी प्रसाद मौर्य का ही उदाहरण लिया जाए तो, उनका टिकट तो पहले से ही पक्का था, जबकि बेटी संघमित्रा मौर्य वर्तमान में सांसद हैं। सिर्फ बेटे को टिकट नहीं मिलने के कारण वे भाजपा से पंगा क्यों लेंगे? इसी तरह चौहान और सैनी का भी टिकट नहीं कटने वाला था।

यूपी व पंजाब समेत अन्य चुनावी राज्यों में जमीनी स्तर पर जिस तरह का माहौल बन रहा है उससे बड़े कॉरपोरेट और उसके तहत काम करने वाले गोदी मीडिया में जबरदस्त बेचैनी है। उन्हें यह डर सता रहा है कि यदि यूपी जैसे बड़े राज्य में गैर भाजपा सरकार बन जाती है तो जनता के बुनियादी सवाल और आर्थिक मुद्दे देश की राजनीति के केंद्र बिंदु बन जाएंगे।

जातीय जनगणना की मांग तो तेज हो ही चुकी है। संभव है कि आने वाले दिनों में निजी क्षेत्र में आरक्षण का मुद्दा भी गरमा जाए। यदि ऐसा होता है तो इसका असर अगले साल होने वाले विधानसभा और उसके बाद वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों पर भी पड़ेगा। यही कारण है कि गोदी मीडिया ने पूरी आक्रामकता और बेशर्मी के साथ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए माहौल तैयार करना शुरू कर दिया है।

साथ ही बड़ी चालाकी के साथ परोक्ष रूप से बीच-बीच में यह भी बताने की कोशिश की जा रही है कि भाजपा के भीतर जो भी जो भी उठापटक चल रही है और पिछड़े व दलित वर्ग के नेताओं में जो नाराजगी पैदा हुई है, उसका कारण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार की एंटी इनकंबेंसी है। इसमें मोदी सरकार कहीं से भी जिम्मेदार नहीं है, क्योंकि वह तो सिर्फ विकास कर करती है। इस बात को साबित करने के लिए कुछ टीवी चैनल तरह-तरह के सर्वे भी जारी कर रहे हैं, जिसमें यह बताया जा रहा है कि मोदी की लोकप्रियता बहुत ज्यादा है और उनकी सरकार के कामकाज से लोग काफी खुश हैं।

एक चैनल ने तो यूपी के बारे में दावा किया है कि वहां 75 फीसदी लोग  पीएम मोदी के काम से संतुष्ट हैं। वहीं चैनल यह भी बताता है कि यूपी में 49 फीसदी लोग योगी के कामकाज से संतुष्ट हैं। इसी तरह के सर्वे कुछ और टीवी चैनलों ने भी जारी किए हैं।

सवाल उठता है कि यूपी चुनाव से ठीक पहले इस तरह का सर्वे दिखाने की जरूरत क्यों पड़ रही है ? और ‘डबल इंजन’ की बात करने वाले लोग एक इंजन को दूसरे इंजन से 26 फीसदी नीचे दिखाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? किसके बचाव के लिए कवच तैयार किया जा रहा है और किसके सिर ठीकरा फोड़ने की तैयारी की जा रही है? 

बहरहाल, इस सर्द मौसम में यूपी का सियासी पारा लगातार चढ़ता जा रहा है। अंतिम चरण की वोटिंग 7 मार्च को है। इसी बीच क्या-क्या होता है, सभी की निगाहें लगी हुई हैं।    

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Uttar pradesh
UP Assembly Elections 2022
corporate
Godi Media
BJP
Yogi Adityanath
AKHILESH YADAV
unemployment
poverty
Inflation

Related Stories

यूपी : आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा की साख़ बचेगी या बीजेपी सेंध मारेगी?

त्रिपुरा: सीपीआई(एम) उपचुनाव की तैयारियों में लगी, भाजपा को विश्वास सीएम बदलने से नहीं होगा नुकसान

उपचुनाव:  6 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में 23 जून को मतदान

सियासत: अखिलेश ने क्यों तय किया सांसद की जगह विधायक रहना!

विधानसभा चुनाव परिणाम: लोकतंत्र को गूंगा-बहरा बनाने की प्रक्रिया

पक्ष-प्रतिपक्ष: चुनाव नतीजे निराशाजनक ज़रूर हैं, पर निराशावाद का कोई कारण नहीं है

यूपी चुनाव नतीजे: कई सीटों पर 500 वोटों से भी कम रहा जीत-हार का अंतर

यूपीः किसान आंदोलन और गठबंधन के गढ़ में भी भाजपा को महज़ 18 सीटों का हुआ नुक़सान

BJP से हार के बाद बढ़ी Akhilesh और Priyanka की चुनौती !

जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता


बाकी खबरें

  • liquor
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: शराब भली चीज है, जी भर के पीजिए!
    30 Jan 2022
    शराब जब वोट डालने से एक दो दिन पहले पिलाई जाये तो वह वोटर पटाने के लिए होती है पर जब उसका बंदोबस्त पूरे पांच साल के लिए किया जाये तो वह शराब और शराबियों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए ही होता है।
  • pegasus
    अजय कुमार
    क्या पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर के लिए भारत की संप्रभुता को गिरवी रख दिया गया है?
    30 Jan 2022
    न्यूयॉर्क टाइम्स का खुलासा कि मोदी सरकार ने पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर इजराइल से खरीदा है। यह खुलासा मोदी सरकार के इस इंकार को झूठा साबित करता है कि पेगासस से मोदी सरकार का कोई लेना-देना नहीं।
  • Sabina Martin
    राज कुमार
    सबिना मार्टिन से ख़ास बातचीत: गोवा चुनाव और महिलाओं का एजेंडा
    30 Jan 2022
    लोगों के जो वास्तविक मुद्दे हैं वो चुनाव चर्चा में अपनी जगह बनाने की जद्दो-जहद कर रहे हैं। ऐसा ही एक अहम मुद्दा है जेंडर का। महिलाओं के अधिकार, सुरक्षा, न्याय और गोवा में महिलाओं से जुड़े अन्य…
  • Mahatma Gandhi
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    शहीद दिवस: मारकर भी गांधी से क्यों डरते हैं हत्यारे
    30 Jan 2022
    गांधी की शहादत के दिन क्यों उनकी हत्या और हत्यारों के समर्थक सक्रिय हो जाते हैं और विभिन्न मंचों पर अपनी विचारधारा और कृत्य का प्रदर्शन करते हैं?
  • HafteKiBaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    पेगासस का पेंच, रेलवे नौकरी के परीक्षार्थियों की पीड़ा और चुनावी ख़बरें
    29 Jan 2022
    हफ्ते की बात के नये एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश चर्चा कर रहे हैं चार बड़ी खबरों पर. ये हैं: पेगासस जासूसी कांड में न्यूयॉर्क टाइम्स का रहस्योद्घाटन, RRB-NTPC नौकरी के परीक्षार्थियों पर भयानक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License