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भारत
विशेष: अशफ़ाक़उल्ला को याद करना उनके विचारों को भी याद करना है
आज शहीद क्रांतिकारी अशफ़ाक़ का 121 जन्मदिन है। आइये, इस मौके पर हम उनकी वैचारिकी की थोड़ी चर्चा करते हैं। 
हर्षवर्धन
22 Oct 2021
Ashfaqulla Khan

पहचान की राजनीति के इस दौर में शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ान को आम तौर पर सिर्फ़ एक 'मुसलमान’ क्रांतिकारी के तौर पर याद किया जाता है। एक तरफ़ देश की प्रगतिशील धारा उनको भारत के स्वतंत्रता संग्राम की धर्मनिरपेक्ष भावना और सांप्रदायिक सद्भाव के उत्कृष्ट प्रतिनिधि के रूप में  याद करती हैं तो वही दूसरी ओर दक्षिणपंथी धारा उनको एक ऐसे 'अच्छे मुसलमान' की तरह जिसने भारत माता के लिए जान दे दी। और ऐसा करते हुए दक्षिणपंथी धारा अपने को तथाकथित 'सच्ची धर्मनिरपेक्षता' की तरह पेश करती है। आम तौर पर दोनों ही धाराओं में अशफ़ाक़ के सिर्फ़ और सिर्फ़ एक 'मुसलमान' होने पर जोर दिया जाता है। इस वजह से उनसे संबंधित कई पहलू और विचार पीछे छूट जाते हैं।

आज अशफ़ाक़ का 121 जन्मदिन है। आइये, इस मौके पर हम उनकी  वैचारिकी की थोड़ी चर्चा करते हैं। 

अशफ़ाक़ का जन्म 22 अक्टूबर सन् 1900 में शाहजहांपुर के एक संपन्न जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम शफ़ीक़ुल्ला खान और माता जी का नाम मज़हरुनीसा था। अशफ़ाक़ जब सातवीं कक्षा में थे तभी उनके स्कूल में अंग्रेज़  पुलिस ने `मैनपुरी षडयंत्र केस’ (1918) के सिलसिले में राजाराम भारतीय को पकड़ने के लिए छापा मारा था। यूं तो अशफ़ाक़ बंगाल के क्रांतिकारी खुदीराम बोस और कन्हाई लाल दत्त की शहादत से प्रभावित थे लेकिन उनकी आँखों के सामने हुई इस घटना ने उनके ऊपर काफी असर डाला और वे क्रांतिकारी पार्टी, `हिप्रस’ यानी हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ (जो बाद `हिसप्रस’ यानी `हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ बना) से संपर्क करने की कोशिश करने लगे। बहुत जद्दोजहद के बाद उनकी मुलाकात `मैनपुरी षडयंत्र’ में ही फरार रामप्रसाद बिस्मिल से हुई और वे क्रांतिकारी पार्टी में शामिल हुए।  

हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ (हिप्रस) के सदस्य रहते हुए अशफ़ाक़ ने संगठन की तरफ से कई  `एक्शन’ में हिस्सा लिया।  जब क्रान्तिकारियों ने काकोरी में ट्रेन में मौजूद सरकारी खजाने को लूटने का निर्णय किया तब अशफ़ाक़ उस 'एक्शन' के खिलाफ थे क्योंकि उनका मानना था कि सरकारी खजाने को लूट कर क्रांतिकारी दल सीधा अंग्रेज़ सरकार पर हमला कर रहे हैं जिसके परिणाम संगठन के लिए विनाशकारी साबित हो सकते हैं। चूंकि दल अभी भी छोटा था इसलिए ये आशंका जायज भी थी। लेकिन जब दल ने ऐसा करने का फैसला किया तो एक अच्छे सिपाही की तरह वह उस कार्यवाही को अंजाम देने में अग्रिम पंक्ति में रहे।

अशफ़ाक़ के विचार

अशफ़ाक़ जब जेल में बंद थे तब उन्होंने अपनी एक छोटी ही आत्मकथा लिखी जिसमें उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन यात्रा पर प्रकाश डाला। अपने शुरुआती जीवन में वे 'सर्व इस्लामवाद' के पैरोकार थे। उनके ये विचार बाल्कन युद्ध और ओटोमन साम्राज्य के विघटन से प्रभावित थे। उनका राष्ट्रवाद की तरफ झुकाव स्कूल में पढ़ाई करते हुए हुआ, जिसमें उनके एक शिक्षक की बहुत अहम् भूमिका थी। इस शिक्षक ने उनको एक किताब दी थी जिसका नाम था 'दुनिया भर के मुहिब्बाने वतन'। अपने 'सर्व-इस्लामवाद' की अपने पूर्व विचारों पर सोचते हुए अशफ़ाक़ लिखते हैं, "गरज कि उस वक़्त का ख्याल आज मुझे बहुत ज़लील मालूम होता है...वह मेरी नासमझी का जमाना था।"

अशफ़ाक़ को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया था सर वॉटरस्कॉट की लिखी एक कविता जिसका शीर्षक था, 'लव ऑफ कंट्री'। ये कविता पुबिलियस होरटियस कोक्लिस (रोमन साम्राज्य का एक सैनिक, जिसने रोम को एट्रस्केन सेना के हमले से बचाया था) पर लिखी गई थी। इसको उन्होंने अपनी आत्मकथा और देशवासियो के नाम आखिरी चिट्टी में उद्धृत किया।  अंग्रेजी की इस कविता की कुछ पंक्तियां  इस प्रकार हैं…

To every man upon this earth

Death cometh soon or late,

And how can man die better

Than facing fearful odds,

For the ashes of his fathers,

And the temples of his Gods.

`हिप्रस’ से जुड़ने के बाद अशफ़ाक़ क्रांतिकारी साहित्य का अध्ययन किया और फिर साम्यवादी विचार की तरफ उन्मुख हुए। सन् 1917 की बोल्शेविक क्रांति का भारतीय क्रांन्तिकारियों पर गहरा प्रभाव पड़ा था। व्यक्तिगत तौर पर अशफ़ाक़ भी उससे काफी प्रभावित हुए। अपने क्रांतिकारी जीवन के शुरुआती समय में (सन् 1923  और 1924 के बीच) अपने मित्र बनवारी लाल- जो आगे चलकर काकोरी ट्रेन एक्शन में सरकारी गवाह बना- को एक पत्र लिखा था जिसमे उन्होंने बोल्शेविक क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन को पत्र लिखने की इच्छा व्यक्त की थी। उस ख़त में अशफ़ाक़ लिखते हैं, "मुझे लेनिन का पता आपके पत्र से मालूम हुआ। मैं आज ही उन्हें भी पत्र लिखने का विचार कर रहा हूँ"।

काकोरी कांड के बाद जो सिलसिलेवार गिरफ्तारियां हुई उससे बचते हुए अशफ़ाक़ नेपाल चले गए। कुछ दिनों तक वहां रहने के बाद वो कानपुर पहुंचे और गणेश शंकर विद्यार्थी की मदद से डालटनगंज (पलामू, झारखण्ड) में क्लर्क की नौकरी करने लगे। छह महीने बाद उनका नौकरी से जब मन उचट गया तो वे नेपाल के रास्ते पंजाब पहुंचे। वहां उन्होंने नवनिर्मित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (1925) के नेता मीर अब्दुल माजिद से संपर्क किया। माजिद उन चंद लोगों में से थे जिन्होंने सन् 1920 में एम.एन रॉय के साथ ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी। अशफ़ाक़ उनकी सहायता से तत्कालीन सोवियत संघ जाना चाहते थे और 'कम्युनिस्ट इंटरनेशनल' के लिए काम करना चाहते थे लेकिन उससे पहले ही वे गिरफ्तार कर लिए गए। उस समय उनके पास से 'मैनिफेस्टो ऑफ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया' बरामद हुआ था।

अशफ़ाक़ का साम्यवाद की तरफ झुकाव उनकी आत्मकथा के इस अंश से हम देख सकते हैं जहाँ पर वह लिखते हैं, “आज मैं तो हर विदेशी हुकूमत को बुरा समझता हूँ और साथ-ही-साथ हिंदुस्तान की ऐसी जम्हूरी सल्तनत को भी जिसमें कमजोरों का हक़, हक़ न समझा जाए, या जो हुकूमत  सरमायदारों और जमींदारों के दिमाग का नतीजा हो, या जिसमे बराबर हिस्सा मजदूरों और काश्तकारों का न हो, या बाहम इम्तियाज व तफरीक रखकर हुकूमत के कवानीन बनाये जाएँ। मैं तो कहूंगा कि अगर हिंदुस्तान आज़ाद हुआ और बजाय हमारे गोरे आकाओं के हमारे वतनी भाई सल्तनत व हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में लें और तफरीको-तमीज-आमिर व गरीब, जमींदार व काश्तकार में रहे तो ऐ खुदा मुझे ऐसी आज़ादी उस वक्त तक न देना जब तक मेरी मखलूक (संसार) में मसावात (बराबरी) कायम न हो जाए। मेरे इन खयालात से मुझको इशतिराकि (कम्युनिस्ट) समझा जाए तो मुझे इसकी फिकर नहीं...जमींदार काश्तकारों से, सरमायादार मजदूरों से जोंक की तरह चिपटकर उसका खून चूसते हैं और वे कमजोर हैं, इसलिए लूटे जाते है। यह सब कानून खुदाबन्दी के खिलाफ है। इनका खात्मा करना निहायत ज़रूरी है और उसके खिलाफ जंग फर्ज है।”

समाज में किसानों और श्रमिकों के योगदान का जिक्र करते हुए अशफ़ाक़ अपने एक खत में कम्यूनिस्ट पार्टी को सम्बोधित करते हुए लिखते हैं, “मै तुमसे काफी तौर से सहमत हूँ…हमारे शहरों की रौनक इनके दम पर से है। हमारे कारखाने उनकी वजह से आबाद और काम कर रहे हैं। हमारे पम्पों से इनके ही हाथ पानी निकालते हैं, गर्ज कि दुनिया का हर एक काम इनकी वजह से हुआ करता है। गरीब किसान बरसात के मूसलाधार पानी और जेठ बैसाख की तपती दोपहर में भी खेतों पर जमा होते हैं और जंगल में मंडलाते हुए हमारी खुराक का सामान पैदा करते हैं। यह बिलकुल सच है कि वह जो पैदा करते हैं जो वह बनाते हैं उनमें उनका हिस्सा नहीं होता, हमेशा दुखी और फटेहाल हालत में रहते हैं। मैं इत्तिफाक करता हूँ कि इन तमाम बातों के जिम्मेदार हमारे गोरे आका और उनके एजेंट हैं...मेरे दिल में तुम्हारी इज्जत है और मैं मरते हुए भी तुम्हारी सयासी मकसद से बिलकुल सहमत हूँ"

अशफ़ाक़ के सपनों का भारत

अशफ़ाक़ को काकोरी षड्यंत्र में रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी और रौशन  सिंह के साथ फांसी की सजा हुई। सजा की तारीख 19 दिसंबर 1927 मुक़र्रर की  गई। फांसी से कुछ समय पहले अशफ़ाक़ ने देशवासियो के नाम एक खत लिखा जिसका शीर्षक था, "बिरादराने वतन के नाम कब्र के किनारे से पैगाम"। इस आखिरी संदेश में अशफ़ाक़ ने देशवासियों को धर्म का झगड़ा और दूरी छोड़ कर आज़ादी की लड़ाई में एकजुट होने की अपील यह कह कर की कि गुलाम कौमों का कोई मजहब नहीं होता। अशफ़ाक़ का मानना था कि धर्म के नाम पर सारी लड़ाई अंग्रेज़ और उनके हिंदुस्तानी एजेंटो (दोनों हिन्दू और मुस्लिम) के द्वारा लगवाई जाती है ताकि देश की जनता अंग्रेज़ों के खिलाफ एकजुट न हो सके।

उसी खत में अशफ़ाक़ अपने सपनों के आज़ाद भारत का भी जिक्र करते हैं, जो इस प्रकार है:  "मैं हिंदुस्तान की ऐसी आज़ादी का ख्वाहिशमन्द था जिसमे ग़रीब ख़ुश और आराम से रहते और सब बराबर होते। ख़ुदा मेरे बाद वह दिन जल्द लाए जबकि छत्तर मंज़िल लखनऊ में अब्दुल्ला मिस्त्री, लोको वर्कशॉप और धनिया चमार, किसान भी मिस्टर खलीकुज्जमा और जगत नारायण मुल्ला व राजा साहब महमूदाबाद के सामने कुर्सी पर बैठे हुए नज़र पड़ें।" 

अशफ़ाक़ को सिर्फ एक क्रांतिकारी या 'मुस्लिम' क्रांतिकारी के तौर पर याद करना उनके साथ नाइंसाफी होगी। उन्होंने  अपने छोटे से राजनीतिक जीवन में  सर्व-इस्लामवाद से राष्ट्रवाद और साम्यवाद तक का सफर तय किया था। वो भारतीय क्रांन्तिकारियों के उस पहली खेप में थे जिन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन को साम्यवाद की तरफ उन्मुख किया था जिसको आगे चल कर भगत सिंह और उनके साथियों ने खास मंजिल तक पहुंचाया था।

अशफ़ाक़ की  निम्मलिखित कविता उनके दौर  की राजनीतिक परिस्थिति को दर्शाती है और आज के हालात को भी-

न कोई इंग्लिश है न कोई जर्मन,

न कोई रशियन है न कोई तुर्की।

मिटाने वाले हैं अपने हिंदी,

जो आज हमको मिटा रहे हैं।।

(लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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