NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
छत्तीसगढ़ सरकार के दो साल: कलयुग केवल ‘राम’अधारा
आज इन दो सालों के तमाम जनपक्षीय दावों का मूल्यांकन करने पर हमें निराशा हाथ लगती है। और जो दावा कभी किया ही नहीं गया उसे खूबी और सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर राष्ट्रीय मीडिया में प्रचारित किया जा रहा है।
सत्यम श्रीवास्तव
18 Dec 2020
छत्तीसगढ़ सरकार के दो साल: कलयुग केवल ‘राम’अधारा
फोटो साभार: -फ़ेसबुक

कलयानि 17 दिंसबर को छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार को दो साल पूरे हो गए हैं। ऐसे तो राजस्थान सरकार ने भी तमाम उठा-पटक के बीच दो साल पूरे किए हैं। बक़ौल भाजपा महासचिव और मध्य प्रदेश के बेहद कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय कि अगर स्वयं देश के प्रधानमंत्री प्रदेश की कांग्रेस सरकार को गिराने की साजिश न रचते तो मध्य प्रदेश में भी कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार अपने दो साल पूरी कर चुकी होती।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के दो साल निर्बाध रूप से पूरे हुए। अपार बहुमत की इस सरकार को सत्ता जाने का कोई जोखिम इसलिए नहीं है क्योंकि यहाँ 90 में से 70 विधायक सदन में मौजूद हैं। इसलिए शायद स्वयं प्रधानमंत्री ने इसे अभी तक गिराने का ‘प्रयास’ नहीं किया। छत्तीसगढ़ सरकार ने जिस गाजे-बाजे से अपने दो साल पूरे होने का बेतहाशा और लगभग अवांछित प्रचार किया उसे देखकर लगता है कि जैसे यह सरकार और स्वयं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कांग्रेस नेतृत्व को यह बताना चाहते हैं कि ‘केवल हम में है दम’ और ‘कोई नहीं आस-पास’।

इस प्रचार को देखकर कई निष्कर्षों में से एक और सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भूपेश बघेल और उनकी सरकार की प्रतिस्पर्द्धा भाजपा से नहीं बल्कि अपने ही दल के नेताओं से है और वो हर सफलता को इसी नज़रिये से देखने के अभ्यस्त हो रहे हैं।

इसकी एक बानगी उस दिन भी देखने को मिली जब बिहार विधासभा चुनाव और मध्य प्रदेश के उप-चुनावों के परिणाम आ रहे थे और कांग्रेस दोनों ही प्रदेशों में सत्ता तक पहुँचने से बुरी तरह असफल हो रही थी लेकिन छत्तीसगढ़ के मरवाही विधानसभा सीट पर हुए उप-चुनाव में कांग्रेस की जीत इन दोनों बड़ी विफलताओं को जश्न से चिढ़ा रही थी। जैसे भूपेश बघेल और उनके तमाम मंत्रियों को इस बात का रंज न था कि दो प्रदेशों में कांग्रेस इस तरह हार गयी।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का यह प्रचार अभियान कांग्रेस की संस्कृति नहीं रही है। यह नया तेवर है, नयी मनोवृत्ति है और नया स्वैग है जिसकी होड़ अपनी ही पार्टी और अपनी ही पार्टी के उन नेताओं से हैं जिनका रुतबा और कद इनसे बड़ा बना रहा है और जो इस वक़्त अपने राजनैतिक सफर के सबसे विफल दौर से गुज़र रहे हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी से लड़ने के लिए नए विकल्प नहीं बल्कि अपनी पार्टी के नेताओं की विफलताओं का जश्न मनाते हुए दिखलाई पड़ रहे हैं।

मुख्यमंत्री के तौर पर भूपेश बघेल भाजपा के सामने जैसे कोई विकल्प बनाने से इंकार कर चुके हैं और उसी के बताए मार्ग पर उससे आगे निकल जाने की हास्यास्पद और निरर्थक कोशिश कर रहे हैं। इन दो सालों के कार्यकाल में अगर छत्तीसगढ़ सरकार का कुछ प्राप्य एक शब्द में बताना हो तो उसमें कांग्रेस के राजनैतिक इतिहास और विरासत का अक्स नहीं दिखता बल्कि ऐसा लगता है जैसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा की सांप्रदायिक विचारधारा के लिए प्रदेश में नींव को पुख्ता किया जा रहा है। क्या छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार कलयुग के उस दौर में प्रवेश कर चुकी है जिसके बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने कहा था कलयुग केवल नाम आधारा। राम के नाम पर राजनीति का एक रक्तरंजित दौर यूं तो बीत गया है।

राम मंदिर निर्माण की योजना के रूप में इस दौर के अवशेष बचे हैं जिन्हें भाजपा निरंतर भुनाने की कोशिश कर रही है और हम देख रहे हैं इसे कुछ खास तवज्जो समाज की तरफ से मिल नहीं रहा है। घनघोर साम्प्रादायिक और अस्मितावादी अभियानों को इसी वजह से अभियान के सफल होने से डर भी लगता है।

महाराष्ट्र में शिवसेना जैसी एक दौर की विकट सांप्रदायिक पार्टी भी जैसे महाभारत के युद्धोपरांत युधिष्ठिर की गति को प्राप्त चुकी है। युधिष्ठिर ने युद्ध में हुई हिंसा की निरर्थकता को समझा लिया था और शिवसेना ने राम के नाम की राजनीति की निरर्थकता स्वीकार कर ली है।

सवाल है कि छत्तीसगढ़, जहां इस नाम की न तो कभी ज़रूरत ही रही और न ही इसे लेकर बहुसंख्यक -अल्पसंख्यक जैसी भावनाएं ही रहीं और न ही कभी राम को प्रदेश की राजनीति में कोई सिंहासन ही मिला वहाँ डेढ़ दशक बाद जनता की आकांक्षाओं पर सवार अपार बहुमत से बनी सरकार आखिर राम के सहारे क्यों खड़ी हो गयी?

अपने ही दल और अपने ही नेताओं से प्रच्छन्न प्रतिद्वंद्विता आम तौर पर प्रादेशिक राजनीति की अंतरधारा रहती है लेकिन यह अंतर्धारा कब और कैसे विपक्षी दल के विराट वृक्ष की जड़ों को सींचने लगती है इसे लेकर यह आश्वासन नहीं मिलता कि भूपेश बघेल और उनकी सरकार तनिक भी सतर्क या जागरूक है। ऐसे में यह अटकल लगाई जा सकती है कि कहीं भूपेश बघेल अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की गति को प्राप्त करने जा रहे हैं जो आर्थिक सुधारों के एजेंडे में केंद्र की यूपीए सरकार के चहेते मुख्यमंत्री थे? उस दौर में कहा जाता था कि डॉ. मनमोहन सिंह के मन में आर्थिक सुधार और कोरपोरेट्स को मुनाफा पहुँचाने का ख्याल क्या आया डॉ. रमन सिंह योजना पेश कर देते थे। यहाँ मामला आर्थिक सुधारों के साथ- साथ केंद्र सरकार के सांप्रदायिक एजेंडे को लेकर भी है। पूर्ण बहुमत और ऊर्जावान नेतृत्व की यह गति इसलिए भी समझ से परे है क्योंकि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व और पार्टी के नेता राहुल गांधी इन दोनों ही मोर्चों पर लगातार भाजपा और केंद्र सरकार से लोहा ले रहे हैं। तमाम विपक्षी दलों के नेताओं में भी वो इन दोनों ही मामलों में निरंतर मुखर और स्पष्ट हैं?

पंद्रह साल के भाजपा सरकार से बेतहाशा परेशान होकर प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को बहुत उम्मीद से अपार बहुमत दिया था। शुरुआत में ऐसा लगा भी कि जिन वर्गों ने कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया उनके मुद्दों को प्राथमिकता में रखा जा रहा है। तमाम ऐसे क्रांतिकारी दावे हुए जिनसे लगा कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व जिन बातों को देश के सामने रख रहा है उसे छत्तीसगढ़ में करके दिखलाया जाएगा। बात चाहे किसानों की कर्ज़ माफी, फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की हो या आदिवासी व अन्य परंपरागत जंगल आश्रित समुदायों के हक़-हुकूकों को देने की हो, सोना खान में वेदांता को सोने के खनन की लीज़ निरस्त करने की हो, बस्तर में आदिवासियों को उनकी अधिग्रहित ज़मीन लौटाने के दावे हों, कोयला खनन से बर्बाद हो रहे प्राकृतिक जंगलों और उनमें बसे लोगों की सुरक्षा की बात हो, इन सभी मोर्चों पर बड़े बड़े दावे किए गए थे। और प्रदेश की जनता ने उन पर एतबार भी किया था।

‘लोक संरक्षित वन’ के रूप में लेमरू हाथी रिजर्व की अवधारणा इस सरकार की एक ठोस धरातलीय उपलब्धि हो भी सकती है लेकिन उसे लेकर जिस तरह जान -बूझकर कन्फ़्यूजन फैलने दी गईं और उनका निराकरण न किए जाने की सुचिन्तित निष्क्रियता बरती गयी उससे लगता है कि इस सरकार में अपने केंद्रीय नेतृत्व की तमाम वैचारिक सदिच्छाओं के खिलाफ जाने का माद्दा भरपूर है।

आज इन दो सालों के तमाम जनपक्षीय दावों का मूल्यांकन करने पर हमें निराशा हाथ लगती है। और जो दावा कभी किया ही नहीं गया उसे खूबी और सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर राष्ट्रीय मीडिया में प्रचारित किया जा रहा है। यह आत्म-प्रशंसा से ग्रसित ऐसी सरकार का दो सालों का प्रतिवेदन है जिसने पूछे गए सवालों के जवाब तो नहीं दिये लेकिन जो नहीं नहीं पूछा गया था उसमें डिस्टिंक्शनलाने की बात की जा रही है। इतना ही नहीं राम और राम की राजनीति के इर्द-गिर्द नया विमर्श कैसे रचा जा रहा है यह जानना भी बड़ा दिलचस्प है। इंडियन एक्सप्रेस (18 दिसंबर 2018) में प्रकाशित एक खबर में राज्य के मंत्रियों के बयान शाया हुए हैं। उनके राम नाम की वैचारिकी और उसके कांग्रेसी संस्करण मिलते हैं। श्री रवींद्र चौबे कहते हैं कि –“भाजपा, कांग्रेस सरकार द्वारा राम का नाम लिए जाने से ईर्ष्या कर रही है। भाजपा केवल धनिकों की बात करती है और उसने राम की महिमा में ‘केवट और सबरी’ को भुला दिया। भाजपा, राम का नाम केवल वोट, नोट और चोट के लिए करती है जबकि प्रदेश की कांग्रेस सरकार अपनी हर योजना में राम राज की कल्पना को साकार कर रही है”। उदाहरण के तौर पर वो ‘सुराजी ग्राम योजना’ का ज़िक्र करते हैं। और यह भी बताते हैं कि ‘हम (प्रदेश सरकार) हर काम की शुरूआत राम के नाम से करते हैं’।

एक और मंत्री श्री शिव दहरिया, अपने सहयोगी मंत्री से एक कदम आगे बढ़कर बताते है कि “हर कांग्रेसी हनुमान की तरह है। जिस तरह हनुमान के हृदय में राम का वास है उसी प्रकार अगर हर कांग्रेसी का हृदय चीर कर देखा जाये वहाँ राम विराजमान मिलेंगे”।

यह हास्यास्पद ही है कि एक स्थिर सरकार को क्यों भाजपा के सेट किए एजेंडे पर चलना पड़ रहा है? प्रचार की ऐसी भूख और उसका ऐसा गैर-ज़रूरी मुजाहिरा क्यों करना पड़ रहा है? अपने दो साल के कार्यकाल की उपलब्धि क्या केवल राम की माँ कौशल्या का मंदिर निर्माण, राम जिस रास्ते वनवास को गए थे उनके पदचिह्न तलाशने जैसी अ-वैज्ञानिक और अविवेकी उपलब्धियाँ होना चाहिए या छत्तीसगढ़ के गठन का बायस रही वहाँ की विशेष जनजातीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उठाए गए कुछ ठोस लोकतांत्रिक कदम? छत्तीसगढ़ को इस कदर ‘राममय’ बनाने में ज़रूर उनकी होड़ प्रदेश पिछली भाजपा सरकार से रही है। लेकिन इसका कोई लाभ कांग्रेस को या उनकी सरकार को होगा कहना इसलिए मुश्किल है क्योंकि आज भी लोगों का ‘ओरिजिनल’ के प्रति एक आस्था है और बात सांप्रदायिकता या राम के नाम पर दोनों दलों में से किसी एक को चुनने की होगी तो जनता कांग्रेस को कभी नहीं चुनेगी बल्कि वह जाँची-परखी भाजपा की शरण में जाएगी। कांग्रेस महज़ उस रास्ते में लगे मार्गदर्शक चिन्हों से ज़्यादा कुछ हो नहीं पाएगी।

(लेखक पिछले 15 सालों से सामाजिक आंदोलनों से जुड़कर काम कर रहे हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

 

Chhattisgarh government
Chhattisgarh
bhupesh baghel
Congress

Related Stories

छत्तीसगढ़ : दो सूत्रीय मांगों को लेकर बड़ी संख्या में मनरेगा कर्मियों ने इस्तीफ़ा दिया

छत्तीसगढ़ः 60 दिनों से हड़ताल कर रहे 15 हज़ार मनरेगा कर्मी इस्तीफ़ा देने को तैयार

हार्दिक पटेल भाजपा में शामिल, कहा प्रधानमंत्री का छोटा सिपाही बनकर काम करूंगा

राज्यसभा सांसद बनने के लिए मीडिया टाइकून बन रहे हैं मोहरा!

ED के निशाने पर सोनिया-राहुल, राज्यसभा चुनावों से ऐन पहले क्यों!

भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से हर साल 1.3 मिलियन लोगों की मौत

ईडी ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी को धन शोधन के मामले में तलब किया

राज्यसभा चुनाव: टिकट बंटवारे में दिग्गजों की ‘तपस्या’ ज़ाया, क़रीबियों पर विश्वास

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

छत्तीसगढ़ के ज़िला अस्पताल में बेड, स्टाफ और पीने के पानी तक की किल्लत


बाकी खबरें

  • water pump
    शिवम चतुर्वेदी
    हरियाणा: आज़ादी के 75 साल बाद भी दलितों को नलों से पानी भरने की अनुमति नहीं
    22 Nov 2021
    रोहतक के ककराणा गांव के दलित वर्ग के लोगों का कहना है कि ब्राह्मण समाज के खेतों एवं अन्य जगह पर लगे नल से दलित वर्ग के लोगों को पानी भरने की अनुमति नहीं है।
  • ATEWA
    सरोजिनी बिष्ट
    पुरानी पेंशन बहाली की मांग को लेकर अटेवा का लखनऊ में प्रदर्शन, निजीकरण का भी विरोध 
    22 Nov 2021
    21 नवंबर को लखनऊ के इको गार्डेन में नेशनल पेंशन स्कीम यानी एनपीएस को रद्द करने, पुरानी पेंशन सिस्टम यानी ओपीएस को पुनः बहाल करने और रेलवे के निजीकरण पर रोक लगाने की मांगों के साथऑल इंडिया टीचर्स एंड…
  • COP26
    डी रघुनंदन
    कोप-26: मामूली हासिल व भारत का विफल प्रयास
    22 Nov 2021
    इस शिखर सम्मेलन में एक ओर प्रधानमंत्री के और दूसरी ओर उनकी सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों तथा आला अफसरों के अलग-अलग रुख अपनाने से ऐसी छवि बनी लगती है कि या तो इस शिखर सम्मेलन के लिए भारत ने ठीक से तैयारी…
  • birsa
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : ‘जनजातीय गौरव दिवस’ से सहमत नहीं हुआ आदिवासी समुदाय, संवैधानिक अधिकारों के लिए उठाई आवाज़! 
    22 Nov 2021
    बिरसा मुंडा जयंती के कार्यक्रमों और सोशल मीडिया के मंचों से अधिकतर लोगों ने यही सवाल उठाया कि यदि बिरसा मुंडा और आदिवासियों की इतनी ही चिंता है तो आदिवासियों के प्रति अपने नकारात्मक नज़रिए और आचरण में…
  • kisan mahapanchayat
    लाल बहादुर सिंह
    मोदी को ‘माया मिली न राम’ : किसानों को भरोसा नहीं, कॉरपोरेट लॉबी में साख संकट में
    22 Nov 2021
    आज एक बार फिर कॉरपोरेट-राज के ख़िलाफ़ किसानों की लड़ाई लखनऊ होते हुए देश और लोकतंत्र बचाने की लड़ाई और नीतिगत ढांचे में बदलाव की राजनीति का वाहक  बनने की ओर अग्रसर है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License