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यूपी: कृषि कानूनों को रद्दी की टोकरी में फेंक देने से यह मामला शांत नहीं होगा 
ऐसी एक नहीं, बल्कि ढेर सारी वजहें हैं जिसके चलते लोग, खासकर किसान, योगी-मोदी की ‘डबल इंजन’ वाली सरकार से ख़फ़ा हैं।
सुबोध वर्मा
22 Nov 2021
farmers movement

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह घोषणा कि उनकी सरकार तीन कृषि कानूनों को निरस्त्र करने जा रही है, वो भी एक ऐसे समय में जब उत्तरप्रदेश और पंजाब में महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों के लिए बस कुछ ही महीने बाकी हैं, जो इन कुख्यात कानूनों के खिलाफ साल भर से चल रहे किसानों के संघर्ष के लिए फैसला सुनाने की घड़ी थी। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि इस घोषणा और चुनावों के बीच में हर किसी के द्वारा कनेक्शन देखा जा रहा है।

जाहिर सी बात है कि प्रधानमंत्री द्वारा इन चुनावों में अपनी पार्टी की डूबती संभावनाओं की नैय्या पार लगाने की कोशिशें की जा रही हैं। पंजाब में तो वैसे भी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संभावनाएं पहले से ही ना के बराबर हैं, भले ही इसके द्वारा पूर्व-मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के नये संगठन के साथ गठबंधन ही क्यों न कर लिया जाये।

असली जंग का मैदान तो यूपी है, जिसका नेतृत्व मोदी द्वारा चुने गए योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं। योगी के तहत भारत के सबसे बड़े राज्य का जिस प्रकार से कायापलट कर एक और प्रदर्शन में तब्दील कर दिया गया है कि कैसे आक्रामक हिंदुत्व असल में शासन करता है, और प्रधानमंत्री को बार-बार दर्द का अनुभव होने के बावजूद राज्य सरकार को समय-समय पर समर्थन करना पड़ता है। इसके अलावा, यह भी सच है कि यूपी ही वो राज्य है जो लोकसभा में सबसे अधिक संख्या में सांसद सदस्यों को भेजता है और 2024 के आम चुनावों में जीत हासिल करने के लिए राज्य पर मजबूत गिरफ्त का होना बेहद अहम है।

ऐसे में लाख टके का सवाल यह है कि क्या मोदी का यह यू-टर्न यूपी के नाराज और असंतुष्ट किसानों को वापस अपने पाले में खींच लाने में सफल हो सकेगा? क्या भाजपा पिछली बार 2017 के 403 में से 326 सीटें जीतने के अपने रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन को दोहरा सकती है?

इन सबके विश्लेषण में जाने से पहले इस बात को एक बार फिर से दोहराए जाने की जरूरत है कि किसानों के संघर्ष से जुड़े ऐसे ढेर सारे मुद्दे और कानून हैं जो अभी तक अनसुलझे पड़े हैं। असल में देखें तो मोदी सरकार को संसदीय प्रक्रिया के माध्यम से इन कानूनों को निरस्त करना होगा, जिसे इस महीने के अंत में शुरू होने जा रहे शीतकालीन सत्र में पूरा करने का वादा किया गया है।

इसके अलावा, विद्युत अधिनियम संशोधन विधेयक और सबसे महत्वपूर्ण विभिन्न कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए वैधानिक गारंटी की मांग जैसे लंबित मुद्दे अभी भी जस के तस बने हुए हैं। यह आखिरी मांग शायद सबसे महत्वपूर्ण है और मोदी के लिए इसे स्वीकार कर पाना सबसे दुश्कर भी है। वास्तव में, कुछ की राय में सरकार ने इस पहल को एमएसपी की मांग के खिलाफ तीन कृषि कानूनों के बीच किसानों के सामने सौदेबाजी के तौर पर रखा है। आने वाले दिनों में ये सभी मुद्दे लगातार खदबदाते रहने वाले हैं, और संभावना इस बात की है कि किसान वर्तमान जीत से उत्साहित होकर अपनी अन्य मांगों के लिए संघर्ष को जारी रखेंगे।

लेकिन यूपी में इसके अलावा भी ऐसे कई कारक हैं जो भाजपा के विजय अभियान को परेशानी में डालने वाले साबित होने जा रहे हैं।

खेती-किसानी से संबंधित अन्य मुद्दे 

यूपी में किसानों को परेशान करने वाले सबसे बड़े मुद्दों में एक मुद्दा आवारा पशुओं का बना हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक राज्य में बड़े पैमाने पर तकरीबन 10 लाख आवारा मवेशी हैं। इन संख्याओं को नियंत्रित करने के किसी भी प्रयास पर योगी सरकार की ओर से कड़ी कार्यवाई की जाती है। इतना ही नहीं, गौ-रक्षकों द्वारा घूम-घूमकर किसी को भी मवेशियों की “तस्करी” करने या “काटने” के लिए ले जाने के संदेह के आधार पर उनके साथ मारपीट करने से लेकर जान से मार डालने तक के लिए तैयार टीमें चक्कर काटती रहती हैं, और किसानों को उनके विवेक के भरोसे छोड़ दिया गया है।

ये आवारा पशु अक्सर खेतों में घुस जाते हैं, और खड़ी फसलों को बर्बाद कर डालते हैं और किसी की हिम्मत नहीं पड़ती कि एक ऊँगली तक उठा दे। इनकी देखभाल के लिए मुख्यमंत्री योगी ने किसानों को 30 रूपये प्रति मवेशी की मामूली धनराशि देने की घोषणा की थी। लेकिन 2020 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक लाख के लक्ष्य में से केवल करीब 43,000 को ही अपनाया जा सका था। अपनी इस बदहाल स्थिति के लिए किसान सीधे तौर पर योगी सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जिसे भारत का चीनी का कटोरा भी कहा जाता है, के गन्ना किसान योगी के इस आश्वासन कि सभी बकाया भुगतानों को चुकता कर दिया जायेगा, के बावजूद बकाया भुगतान न किये जाने के कारण बेहद मुश्किलों से जूझ रहे हैं। मई 2021 के अंत तक वर्ष 2020-21 के लिए कुल बकाया राशि 18,820 करोड़ रूपये की थी, और साथ ही पिछले वर्षों का 2,501 करोड़ रुपया भी चुकता किया जाना शेष था। निर्यात में भारी वृद्धि के चलते इस वर्ष बकाया राशि में कमी आई है, और वर्तमान में चालू वर्ष के लिए बकाया राशि 8,909 करोड़ रूपये लंबित है और पहले के वर्षों का 142 करोड़ रुपया अभी भी दिया जाना शेष है। हालाँकि इस साल लंबित बकाया राशि में काफी कमी आई है, किंतु पिछले वर्षों के भुगतान में हुई देरी के कारण जिन अथाह कष्टों से किसानों को दो-चार होना पड़ा था, वह अभी भी पूरी तरह से समाप्त नहीं हो सका है। इसके अलावा, योगी सरकार द्वारा गन्ने के लिए वर्षों से लंबित राज्य सलाह मूल्य में वृद्धि करने से इंकार कर दिया गया है।

देश के कई अन्य हिस्सों की तरह राज्य में भी कुछ हफ्ते पहले उर्वरक की भारी किल्लत देखने को मिली थी, जब किसान रबी की बुआई की तैयारियों में जुटे हुए थे। कई किसानों को तीन से चार दिनों तक कतारों में लगकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा, जबकि कुछ को तो इस प्रकिया में मौत भी हो गई। उस दौरान ब्लैक में डीएपी (डीअमोनियम फॉस्फेट) 1,350 रूपये प्रति बोरी के हिसाब से बिक रही थी, जबकि राज्य सरकार ने इसकी कीमत 1,200 रूपये प्रति बोरी घोषित की थी। डीएपी की अनुपलब्धता ने किसानों को ब्लैक मार्केट से खरीद करने के लिए मजबूर किया क्योंकि मानसून की वापसी इस बार देर से हुई थी, जिसके चलते गेहूं की बुआई के लिए समय काफी कम बचा था।

इसके साथ ही योगी सरकार पिछले कुछ वर्षों से खाद्यान्न की खरीद के मामले में गंभीर रूप से पिछड़ रही है। जहाँ वर्ष 2018-19 के दौरान 52.92 लाख टन की रिकॉर्ड खरीद देखने को मिली थी, 2019-20 में यह घटकर 37 लाख टन हो गई थी, और 2020-21 में यह और गिरकर 35.77 लाख टन ही रह गई। चालू वर्ष में अक्टूबर के अंत तक, यह 56.40 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गई है।

लेकिन किसान ख़ुश क्यों नहीं है, उसका कारण यह है: इस साल गेंहू का उत्पादन अनुमानतः 360 लाख टन होने जा रहा है, जबकि खरीद कुल उत्पादन के मात्र 15% हिस्से का ही किया जाना है। इसका अर्थ हुआ कि सिर्फ 15% गेंहूँ उत्पादकों को ही एमएसपी मिलने जा रहा है, जबकि बाकियों को कम कीमतों से ही संतोष करना होगा। 

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की कमी 

योगी-मोदी के “डबल इंजन” शासन के रिकॉर्ड में सबसे घातक अभियोगों में से एक नौकरियों की स्थिति से उत्पन्न होता है। यूपी में जबसे 2017 से योगी सत्ता में आये हैं, के बाद से नौकरीपेशा लोगों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है।

जैसा कि नीचे दी गई तालिका से पता चलता है, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगारशुदा व्यक्तियों की कुल अनुमानित संख्या जहाँ अक्टूबर 2017 में 4.4 करोड़ थी, वह अक्टूबर 2021 में घटकर 4.19 करोड़ रह गई है। शहरी क्षेत्रों में भी गिरावट दर्ज की गई है, हालाँकि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में यह कम है, पहले के 1.4 करोड़ की तुलना में यह संख्या 1.35 करोड़ हो गई है। ये आंकड़े सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के सैंपल सर्वे से लिए गए हैं।

इस तालिका में जिन चार वर्षों को शामिल किया गया है, उसमें यदि श्रमबल में शामिल होने वाले व्यक्तियों की संख्या देखें तो इसकी संख्या दसियों लाख में होगी, इसके बावजूद कुल रोजगार की संख्या में कमी आई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों को अब श्रमबल के तौर पर नहीं गिना जा रहा है, जिसमें रोजगारशुदा और बेरोजगार दोनों ही प्रकार के लोग शामिल हैं। उन्होंने बस श्रमबल से बाहर रहने के विकल्प को चुना है। इसे इस अवधि के दौरान श्रमबल की भागीदारी की दर में चिंताजनक गिरावट में देखा जा सकता है: जो कि अक्टूबर 2017 के 38.94% से घटकर अक्टूबर 2021 में 34.07% रह गई है।  

ग्रामीण रोजगार में गिरावट की दर वैसे भी बेरोजगारी दर में पर्याप्त तौर पर परिलक्षित नहीं हो पाती है, जो कृषि क्षेत्र में गंभीर संकट को दर्शाता है। हालाँकि, मुख्यमंत्री योगी लगातार इस बात का दावा कर रहे हैं कि यूपी सभी राज्यों के बीच में दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, लेकिन यह विकट स्थिति इस “आर्थिक विकास” की आंतरिक स्थिति का पर्दाफाश कर देता है।

इन सभी एवं अन्य कारकों जैसे कि कोविड महामारी के दौरान कुप्रबंधन, पुलिसिया ज्यादती, अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने, विशाल दलित आबादी की उपेक्षा इत्यादि को एक साथ रखने पर देखने पर लगता है कि निश्चित तौर पर उत्तरप्रदेश में योगी के नेतृत्व वाली भाजपा के लिए तस्वीर सुखद नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की कवायद इस दयनीय हालात की स्वीकारोक्ति का प्रमाण है, और आगामी चुनावों में हार की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

UP: It’s not Back to Square One After Farm Law Scrapping

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