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कई मोर्चों पर भड़कता अमेरिका-रूस तनाव
वाशिंगटन और बर्लिन क्रमशः बेलारूस और नवलनी मामले पर एक ही समय साथ-साथ आगे बढ़े हैं। ऐसा लगता है कि एक बड़ा टकराव उबाल ले रहा है।
एम. के. भद्रकुमार
04 Sep 2020
कई मोर्चों पर भड़कता अमेरिका-रूस तनाव
28 अगस्त, 2020 को काला सागर में परमाणु क्षमता वाले US B-52 बमवर्षक के आगे 100 फ़ीट के भीतर की दूरी से गुज़रते हुए रूसी Su-27 फ्लेंकर जेट

चीन के साथ बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका को रूस के साथ अस्थिर रिश्ते को सामान्य रखना चाहिए था। लेकिन, इसके उलट हो रहा है। 9 अगस्त को बेलारूस में राष्ट्रपति चुनाव के बाद पहली बार वाशिंगटन, मिन्स्क में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के साथ खुलकर आ गया है और रूस के हस्तक्षेप को चुनौती दी है।

ठीक उसी समय बर्लिन ने भी यह ऐलान कर दिया है कि रूस के विपक्षी नेता,एलेक्सी नवलनी को नोविचोक नर्व एजेंट द्वारा ज़हर दिया गया है। दिलचस्प तरीक़े से जर्मनी ने पहले मास्को को सूचित किए बिना इस विस्फ़ोटक जानकारी को सार्वजनिक कर दिया। माना जा रहा है कि रूसी राजनीति में नवलनी के रूख़ को देखते हुए इस बात की जानकारी अमेरिका को पहले से थी।

इस बात की ज़्यादा संभावना है कि वाशिंगटन और बर्लिन ने क्रमशः बेलारूस और नवेलनी मामले में साथ-साथ आगे क़दम बढ़ाये हैं। ऐसा लगता है कि एक बड़ा टकराव उबल रहा है। बेलारूस को लेकर यह चेतावनी अमेरिकी उपविदेश मंत्री,स्टीफ़न बेगुन के स्तर पर आयी है, जिन्होंने क्रेमलिन को शीत युद्ध के युग के मेगाफ़ोन रेडियो लिबर्टी के ज़रिये एक कठोर संदेश दिया है:

“पिछले चार साल अमेरिकी-रूसी सम्बन्धों के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण रहे हैं, लेकिन मुमकिन है कि यह और बदतर हों। इसके अलावा, नवंबर में (अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव) के नतीजे की परवाह किए बिना एक चीज़, जो रूस के साथ किसी भी क्षेत्र में ज़्यादा सहकारी सम्बन्ध विकसित करने में किसी भी राष्ट्रपति की क्षमता को सीमित कर सकती है, वह बेलारूस में प्रत्यक्ष रूप से रूसी हस्तक्षेप है।”

घंटों के भीतर,विदेश मंत्री, माइक पोम्पिओ ने विरोध प्रदर्शनों पर अंकुश लगाने के लिए बेलारूस सरकार के क़दमों की तत्काल ख़त्म करने की मांग करते हुए और वाशिंगटन के ट्रांसअटलांटिक भागीदारों के परामर्श से "महत्वपूर्ण लक्षित प्रतिबंधों" की चेतावनी देते हुए हस्तक्षेप किया।

यह एक तरह से राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए एक सीधी चुनौती है, जिन्होंने पिछले सप्ताह ही कहा था कि रूस 1998 के रूस-बेलारूस यूनिटी पैक्ट और सामूहिक सुरक्षा संधि के तहत बेलारूस में हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य है। (30 अगस्त, 2020 को मेरा ब्लॉग पढ़ें-बेलारूस में तख़्तापलट की कोशिश का गहन विश्लेषण)

असल में अमेरिकी इरादा रूस को एक साथ दो मोर्चों पर राजनयिक घरेबंदी करने का है। जर्मनी में रूसी राजदूत को कुछ घंटों पहले बर्लिन स्थित विदेश मंत्रालय में बुलाया गया था; इस बीच, मिन्स्क में विरोध प्रदर्शन एक नयी अंगड़ाई ले रहा है।

रूसी विदेश मंत्री, सर्गेई लावरोव ने गुरुवार को मिन्स्क में विरोध प्रदर्शनों को हवा देने को लेकर "कई विदेशी ताक़तों की तरफ़ से किये जा रहे प्रयासों" की निंदा की और उन्होंने कहा कि "बेलारूस की सीमाओं के पास नाटो गतिविधियों” में वृद्धि देखी जा रही है। रूस और बेलारूस की ख़ुफ़िया एजेंसियां एक दूसरे के संपर्क में हैं।

बेलारूस के विदेश मंत्री, व्लादिमीर मेकी ने लावरोव के साथ वार्ता के लिए गुरुवार को मॉस्को का दौरा किया। रूस और बेलारूस के जनरल स्टाफ़ के प्रमुखों ने गुरुवार को फ़ोन पर "राज्य और द्विपक्षीय सैन्य सहयोग की संभावनाओं और स्लाविक ब्रदरहुड संयुक्त अभ्यास की तैयारियों की स्थिति” पर चर्चा की। बेलारूस के राष्ट्रपति, अलेक्जेंडर लुकाशेंका की मॉस्को की यात्रा जल्दी ही होने की उम्मीद है।

जिस समय पश्चिमी विचार में नवलनी का मामला रूस की प्रतिष्ठा को धूमिल करने की एक बड़ी प्रचार सामग्री है, उस दौरान मॉस्को बेलारूस की स्थिति पर नज़र रखे हुए है। पुतिन ने पिछले सप्ताह इस बात को रेखांकित किया था कि पूर्व सोवियत गणराज्यों में बेलारूस " जातीय निकटता, भाषा, संस्कृति, आध्यात्मिक और साथ ही अन्य पहलुओं के मामले में भी रूस के साथ बहुत मिलता जुलता है। बेलारूस के साथ हमारे लाखों नहीं, तो दर्जनों या शायद सैकड़ों हजारों सीधे-सीधे पारिवारिक सम्बन्ध और करीबी औद्योगिक सहयोग हैं।”

लावरोव ने शब्दों पर ज़ोर नहीं दिया, जब उन्होंने पलटवार करते हुए कहा, "मॉस्को उन्हें तथ्यों के आधार पर पर्याप्त और सख़्त जवाब देगा, जो बेलारूस में स्थिति को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहे हैं...(और) इस गणतंत्र को रूस से दूर करने और इस संघीय राज्य की नींव को कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे हैं।”

सवाल है कि आख़िर वाशिंगटन की योजना क्या है? असल में अगर ट्रम्प प्रशासन रूस पर अपना कड़ा रुख़ अपनाये रखता है, तो यह राष्ट्रपति ट्रम्प के अभियान के लिए फ़ायदेमंद है, सच्चाई यही है कि वाशिंगटन ने शायद यह सोचकर आक्रामक होने का विकल्प चुना है कि बेलारूस की क्रांति के मंचन को अपने मन माफ़िक रंग देने में सीआईए ने जो खाका बनाया है, उसके सामने रूसी ख़ुफ़िया एजेंसी की हालत हवा हो गयी है।

वास्तव में हाल के दिनों में रूस को शामिल करते हुए गतिरोध की एक हैरतअंगेज़ व्यूह रचना बनायी जाती रही है। अमेरिका और रूस की सेना छह दिन पहले तब टकराये थे,जब उत्तर-पूर्वी सीरिया में एक रूसी काफ़िले का हिस्सा बनने वाले किसी वाहन ने एक अमेरिकी बख़्तरबंद वाहन को टक्कर मार दी थी, जिसमें 4 अमेरिकी सैनिक घायल हो गये थे, इसके बाद बिडेन ने ट्रम्प पर ऊंगली उठाते हुए कहा था, "इसे लेकर आपने राष्ट्रपति को एक शब्द भी कहते सुना है? क्या उन्होंने अपनी एक भी उंगली उठायी है? इससे पहले कभी भी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने किसी रूसी नेता के लिए ऐसी अधिनस्थ-भूमिका नहीं निभायी है।”

31 अगस्त को अमेरिकी सेना ने ऐलान किया कि अगले 10 दिनों में यह रूसी सीमा से महज़ 70 मील की दूरी पर लाइव-फ़ायर अभ्यास करेगी। 28 अगस्त को अमेरिका ने एक बड़े सैन्य प्रदर्शन में 30 नाटो देशों के छह परमाणु-सक्षम बी-52 बमवर्षक विमान उड़ाये। उनमें से दो ने काले सागर पर उड़ान भरे और दो रूसी फ़ाइटर जेट्स द्वारा उन्हें बीच में ही रोक दिया गया, जो बमवर्षकों में से एक के अगले हिस्से के 100 फ़ीट के भीतर से गुज़र गया, कथित तौर पर इन जेटों ने बमवर्षकों के वहन क्षमता को बाधित कर दिया।

27 अगस्त को रूसी गाइडेड मिसाइल पनडुब्बी, ओम्स्क अलास्का के तट से दूर निकल गयी और बेरिंग सागर में लाइव-फ़ायर अभ्यास में भाग लिया। इसके अलावा, 27 अगस्त को, नोराद ने अलास्का तट से रूसी सैन्य समुद्री गश्ती विमान के तीन समूहों को रोकने के लिए दो एफ़-22 जेट भेजे।

रूस के लिए खंदक खोदने के बढ़ते संकेतों के साथ बेलारूस पर प्लान बी अब ज़मीन पर उतरने लगा है। बेलारूस और नवलनी,दोनों ही ऐसे सटीक कारण हैं,जो वॉशिंगटन के लिए यूरोप को एकजुट करने और अपने उस ट्रांसअटलांटिक नेतृत्व को फिर से क़ायम करने के काम आ सकते हैं, जो ट्रम्प प्रशासन की तरफ़ से ईरान के ख़िलाफ़ "दुबारा" प्रतिबंध लगाये जाने की कोशिश को रूस और चीन के साथ मिलकर यूरोपीय संघ, फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन द्वारा नाकाम कर दिये जाने के सिलसिले में चिंदी-चिंदी हो गया था।

बह बड़ी बात, जो वाशिंगटन को गहरी निराशा में डालती है कि रूस और चीन के बीच दरार पैदा करने की बेढंगी कोशिशें एकदम से काम नहीं कर पा रही हैं। चीन लुकाशेंका के समर्थन में आगे आया है; ईरान के ख़िलाफ़ ट्रम्प की अधिकतम दबाव की रणनीति में चीन-रूस की जुगलबंदी हर तरफ़ से सेंध लगा रही है। पश्चिम के साथ संघर्ष, रेडियो लिबर्टी को ध्यान में रखते हुए हाल ही में रूस-चीन सम्बन्धों को बढ़ावा देने के लिए अनेक आर्थिक परियोजनायें दोनों देशों के बीच सूचीबद्ध हैं।

इन परियोजनाओं में शामिल हैं- चीन के विशाल सिनोपेक समूह के सहयोग से 11 बिलियन डॉलर की लागत वाली चीनी सीमा के पास स्थित अमूर में रूस द्वारा निर्मित दुनिया के सबसे बड़े संयंत्रों में से एक पॉलिमर प्लांट; 2,900 किलोमीटर पॉवर ऑफ़ साइबेरिया पाइपलाइन के ज़रिये चीन को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति शुरू करना; एक दूसरी पाइपलाइन पर काम शुरू करने की योजना, पॉवर ऑफ़ साइबेरिया 2; चीन को तिगुनी मात्रा से भी ज़्यादा रूसी गैस देने की योजना; कोविड-19 के नये टीके के लिए वैज्ञानिक सहयोग परीक्षण; द्विपक्षीय लेन-देन आदि को लेकर डॉलर के इस्तेमाल को सीमित करने के उद्देश्य से "डी-डॉलराइजेशन" योजना।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

US-Russia Tensions Flare up on Multiple Fronts

US-Russia
Belarus
Alexei Navalny
Donald Trump
vladimir putin
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US-China

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