NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
क्या अमेरिकी पूंजीवाद, राष्ट्रवादी बन सकता है?
ट्रंप का राष्ट्रवाद साफ़ है, लेकिन क्या अमेरिका का पूंजीवाद राष्ट्रवादी चोला पहन सकता है?
रिचर्ड डी. वोल्फ़
06 Jul 2020
west street

ट्रंप प्रशासन बड़े स्तर पर ''आर्थिक राष्ट्रवाद'' की तरफ़ मुड़ चुका है। ट्रंप प्रशासन, विश्व व्यापार संगठन, नाटो और संयुक्त राष्ट्र पर हमले करता है और उन्हें कमज़ोर बना रहा है। ट्रंप और उनके दूसरे अधिकारी दुनिया के कई नेताओं का खुले तौर पर अपमान करते हैं। वह ऊंचे टैरिफ़ लगाते हैं। आधिकारिक वक्तव्यों के ज़रिये चीन, वेनेज़ुएला, क्यूबा और ईरान पर शीत युद्ध जैसे हमले करते हैं। ट्रंप खुले तौर पर ''श्वेत वर्चस्व'' और ''मुस्लिमों से घृणा आधारित गतिविधियों'' में संलिप्त राष्ट्रवादियों के साथ विनोदपूर्ण व्यवहार करते हैं।

ट्रंप सरकार अपने राष्ट्रवाद को ज़्यादातर नकारात्मक तौर-तरीकों से प्रदर्शित करती है। सरकार का ध्यान मूलत: ओबामा, ओबामाकेयर और वैश्वीकरण पर होता है। इन्हीं चीजों को अमेरिकी समाज के सभी दुख-दर्द के लिए जिम्मेदार बताया जाता है। वहां की सत्ता सबसे ज्यादा ''गैर-अमेरिकीवाद (Un-Americanism)'' की ओर मुड़ने का विरोध करती है। ट्रंप का विरोध मलूत: दार्शनिक कारणों पर आधारित होता है। इनमें से एक नस्लभेद है। जो भी चीजें ओबामा से जुड़ी हैं, उन्हें नकारा जाता है। साथ में बाहरी तौर पर नस्लभेद को नकारा जाता है, ताकि भीतर छुपे नस्लभेद को एक आवरण दिया जा सके। दूसरा, ''आदिम स्वतंत्रतावाद या प्रिमिटिव लिबरटेरिएनिज़्म'' है। इसके तहत ओबामा केयर को इस आधार पर ख़ारिज किया जाता है कि उससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नुकसान होता है। तीसरा, वैश्वीकरण को नकारना है। इसे अलग-अलग हिस्सों में स्टीव बैनन जैसे विचारकों से लिया गया है। ट्रंप की प्रवासियों और चीन से प्रतिकूल व्यवहार और 'अमेरिका फ़र्स्ट' से इसे उभार मिलता है।

ट्रंप का राष्ट्रवाद साफ़ है, लेकिन क्या अमेरिका का पूंजीवाद राष्ट्रवादी चोला पहन पाएगा?

अमेरिकी नियोक्ता नस्लभेद के बारे में ज़्यादा नहीं सोचते हैं। कुछ लोग कर्मचारियों को विभाजित करने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं, ताकि काम की जगहों के मुद्दों, मज़दूर संगठनों और अनचाही राजनीतिक गतिविधियों के लिए कर्मचारी एक न हो पाएं। ज़्यादातर लोग इसे तब तक नज़रअंदाज़ करते रहते हैं, जब तक बड़े स्तर पर नस्लभेद पीड़ित और नस्लभेद विरोधी लोग सड़कों पर नहीं आ जाते। तब इन नियोक्ताओं का उद्यम या आर्थिक स्थिति खतरे में पड़ जाती है। इसके बाद नस्लभेद पर शब्दों का खेल शुरू होता है। औद्योगिक संस्थान दिखावटी फेरबदल करते हैं, जिनको उनका प्रचारतंत्र बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। अगर बहुत अच्छा हुआ, तो ''नस्लीय एकीकरण'' और ''सांस्थानिक नस्लभेद'' को खत्म करने की दिशा में थोड़े-बहुत पर जरूरी सुधार हो जाते हैं।

अमेरिका के नियोक्ता ओबामाकेयर के बारे में भी परवाह नहीं करते। वे जानते हैं कि ओबामा केयर एक समझौता था, जिसे स्वास्थ्य-उद्योग की आपसी जटिलताओं ने परवान चढ़ाया था। दूसरी तरफ निजी स्वास्थ्य सेवा बाज़ार में सरकार के बढ़ते कदमों से उन्हें कुछ चिंता होती है। लेकिन जब भी सरकार के हस्तक्षेप से निजी पूंजीवादियों को मुनाफ़ा होता है, तो यह लोग बहुत दिलचस्पी दिखाते हैं और उसका समर्थन करते हैं। अगर ओबामाकेयर से नियोक्ताओं को अपने कर्मचारियों होने वाले स्वास्थ्य खर्च को जनता और संबंधित कर्मचारियों पर ही डालने में मदद मिलती है, तो ज़्यादातर नियोक्ता इसका समर्थन करेंगे। लेकिन अस्थिर उद्यमों द्वार सरकारी अहस्तक्षेप की नीति और रूढ़ीवाद का समर्थन करने वाले इन विचारकों को उदारवादी आदर्श हमेशा परेशान करते रहेंगे।

ट्रंप की सत्ता के आर्थिक राष्ट्रवाद की ओर मुड़ने से नियोक्ताओं को बहुत चिंता हो रही है। इससे ''वैश्विक आपूर्ति श्रंखला'' और विदेशों में हुए भारी अमेरिकी निवेश को ख़तरा पैदा हो गया है। इस मोड़ से विदेशी प्रतिस्पर्धियों को विदेशी बाज़ारों में अमेरिकी कंपनियों की तुलना में ज़्यादा फायदा मिलेगा। वैश्वीकरण का मतलब है, ''राज्य पूंजीवाद पर आधारित कंपनियों'' और ''पूंजीवादी औद्योगिक घरानों'' या उनके ''गठबंधन'' द्वारा अंतराष्ट्रीय स्तर पर पूंजीवाद (मुनाफ़े पर आधारित) का चलन। इसमें सरकारों का हस्तक्षेप बहुत कम होता है। 

वैश्वीकरण के ज़रिये मुनाफ़ा कमाने वालों को तब दिक्क़त होती है, जब राष्ट्रवादी आर्थिक नीतियां वैश्विक आपूर्ति श्रंखला को प्रभावित करती हैं, टैरिफ और व्यापारिक युद्धों के लिए उकसाती हैं और विशेष औद्योगिक संस्थानों के ख़िलाफ़ सरकारी हमले को जायज़ ठहराती हैं। अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां, ट्रंप और बिडेन के चुनाव में अपने भारी-भरकम मीडिया खर्च को उसी तरह से आवंटित करेंगी, जिससे उन्हें फायदा देने वाले वैश्वीकरण को समर्थन मिले।

अब तक ट्रंप सरकार अपने समर्थकों को खुश करने वाली राष्ट्रवादी भाषणबाजी और वैश्विक अमेरिकी पूंजीवाद के दबाव के बीच घूमती रही है। सरकार को आशा थी कि 2017 के आखिर में बड़ी मात्रा की कर कटौती से वैश्विक औद्योगिक संस्थान, आर्थिक राष्ट्रवाद की तरफ़ मुड़ने में मदद करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बल्कि उलझनों से घिरी ट्रंप सरकार की नीति देखने को मिली। इस नीति के तहत पहले वैश्विक समझौते, वैश्विक व्यापार और निवेश की दोबारा उन्नति का वायदा किया गया। फिर यह नीति अविश्वास से भरे, खराब व्यापारिक और निवेश सहयोगियों के खिलाफ़ हो गई। इस नीति में टैरिफ को बढ़ाने और घटाने, दोनों का काम किया जाता है। टैरिफ थोपने का डर भी दिखाया जाता है।

अमेरिकी व्यापारिक समुदाय का केवल कुछ ही हिस्सा पूरी तरह घरेलू बाज़ारों पर केंद्रित है। यह आयातित माल पर निर्भर नहीं होता। लेकिन यह हिस्सा ट्रंप के आर्थिक राष्ट्रवाद को मदद करने के लिए बहुत छोटा है। 2008 में अमेरिका के ''आयात के हिस्से के रूप में टैरिफ की हिस्सेदारी'' 50 फ़ीसदी तक गिर गई थी। आर्थिक राष्ट्रवाद के लिए ''संरक्षणवाद (Protectionism)'' केंद्र में होता है, लेकिन अमेरिका के हालिया इतिहास में इसे दरकिनार ही किया गया। इसलिए अमेरिका को अब आर्थिक राष्ट्रवाद की तरफ मोड़ने के लिए किसी भी सरकार को बहुत ज्यादा मदद की जरूरत होगी। अब बड़ा सवाल उठता है कि क्या अमेरिकी औद्योगिक कंपनियां वैश्वीकरण के तहत किए गए अपने बहुस्तरीय निवेशों को बदल सकती हैं और राष्ट्रवादी रास्ते पर आ सकती हैं।

इसका जवाब पूंजीवादी प्रतिस्पर्धा में छुपा है। मुक्त व्यापार वैश्वीकरण के दौर में अमेरिकी औद्योगिक कंपनियों का विकास, 1970 के बाद से मूलत: तकनीकी बदलाव और विदेशी निवेश पर आधारित है। टेलीकम्यूनिकेशन, इंटरनेट, सोशल मीडिया, रोबोट्स और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस अमेरिका की मुनाफ़ेदार इंडस्ट्री के पहिए हैं। अमेरिका में स्थित उत्पादन क्षमता को विदेशों में स्थापित किया गया, ताकि तेजी से विकास कर रहे विदेशी बाज़ारों के लिए चीजें बनाई जा सकें, यह अमेरिका के लिए बहुत कमाऊ उपक्रम रहा है। पिछले 50 सालों में वैश्वीकरण एक सच्चाई है। 

लेकिन वैश्विक पूंजीवादी में अमेरिकी नेतृत्व का दबदबा अब कम हो रहा है। हाल में विदेश मामलों के एक लेख में बताया गया कि अमेरिकी एकाधिकार अब खत्म हो रहा है और इसकी वापसी संभव नहीं है। चीन उसका मुख्य प्रतिस्पर्धी है, पर दूसरे देश भी अपनी बिसात बिछा रहे हैं और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने का ख़तरा पैदा कर रहे हैं। अगर कोई अमेरिकी कंपनी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पिछड़ रही है, तब एक बड़े अमेरिकी बाज़ार में खुद को फायदा पहुंचाने वाले राष्ट्रवादी कदमों का कंपनी समर्थन कर सकती है। धीमी रफ़्तार से बढ़ते अमेरिकी बाज़ार के लिए, इस तरह की कंपनियां तेजी से बढ़ते चीन के बाज़ार को भी छोड़ सकती हैं।

बशर्ते उन्हें राष्ट्रवादी कदमों के तहत सहूलियत मिले। अमेरिका और चीन के बीच बढते तनाव से भी अमेरिकी कंपनियां ऐसा करने के लिए प्रेरित हो सकती हैं। अगर अमेरिका में आर्थिक राष्ट्रवाद के तहत बड़े स्तर पर सरकारी सब्सिडी दी जाती हैं, साथ में कर रियायत और बढ़ाई जाती है, तो यह कंपनियां राष्ट्रवादी नीति का समर्थन कर सकती हैं। अगर वे ऐसा करती हैं, तो इससे अमेरिकी उद्योगों की कुलबुलाहट के बड़े स्तर का पता चलेगा।

अमेरिका में आर्थिक राष्ट्रवाद के लिए उठाए जाने कदमों के जवाब में दूसरे देश भी ऐसा करेंगे। उस स्थिति में सभी भागीदार देशों को नुकसान सहना होगा। दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था, उनके व्यापारिक समुदाय और राजनेता, ट्रंप की विदेश और निवेश नीतियों के विकास की तरफ पैनी नज़र से देख रहे हैं। यह लोग खुद के देश में आर्थिक राष्ट्रवाद से होने वाले नुकसान पर चिंतित हैं। वह देख रहे हैं कि अब तक ट्रंप छुपे तौर पर जो कर रहे थे, क्या आने वाले सालों में वह अमेरिका की नीति बनती है या नहीं। अगर चुनाव में बिडेन जीतते हैं, तो ट्रंप के दौर से पहले की वैश्वीकरण समर्थन वाली नीति पर फिर सहमति बन जाएगी। लेकिन औद्योगिक संस्थानों के दबाव में मध्यमार्गी डेमोक्रेट्स अक्सर झुक जाते हैं।

शायद यह अमेरिका एकाधिकार वापस बनाने की योजना है, भले ही यह खुले तौर पर न हो रहा हो। इस बार ''बहुपक्षीयवाद- मल्टीलेटरेलिज़्म'' नहीं चलेगा। 75 साल तक यह खूब चला। लेकिन अब यह थक चुका है। अब नया अमेरिकी राष्ट्रवाद, द्विपक्षीय आधार पर दूसरे पक्षों को सहयोगी बनाकर दबाएगा। शायद इस तरह की योजना का राष्ट्रवादी समर्थन कर सकते हैं। इसमें वैश्वीकरण में यकीन करने वाले लोगों का अहित भी नहीं होगा।

संक्षिप्त में कहें तो वैश्विक व्यापार और निवेश पर, किसी महामारी की तुलना में वैश्विक पूंजीवाद के बिखराव और पर्यावरण परिवर्तन का ज़्यादा भार है। तो सवाल उठता है कि क्या वैश्विक पूंजीवाद ने इतने पीड़ित और आलोचक खड़े कर लिए हैं कि अब इसे कितना भी दोबारा आकार में ढाला जाए, यह फिर से खड़ा नहीं हो पाएगा। अगर ऐसा हुआ और नतीज़तन जो बदलाव होगा, क्या वो पूंजीवाद पर ही आधारित होगा और उसमें ''वैश्वीकरण'' को छोड़ दिया जाएगा। जिससे एक गंभीर राष्ट्रवादी पूंजीवाद की वैश्विक प्रतिस्पर्धा चालू होगी? या फिर हम एक ऐसे पोस्ट-कैपिस्टलिस्ट दुनिया की तरफ मुड़ रहे हैं, जिसमें अलग-अलग तरह के संगठित उद्यम और राजनीतिक संस्थान (राष्ट्र-राज्य समेत) होंगे, जहां उत्पादित संसाधनों और उत्पादों का पूरी दुनिया में आवागमन होगा?

अब क्रांतिकारी संभावनाएं मंडरा रही हैं।

रिचर्ड डी वोल्फ, एमहर्स्ट यूनवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स में इकनॉमिक्स के मानद प्रोफेसर हैं। वे न्यूयॉर्क के न्यू स्कूल यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट प्रोग्राम में अतिथि प्रोफेसर भी हैं। उनका साप्ताहिक ''इकनॉमिक अपडेट'' शो 100 से ज्यादा रेडियो स्टेशन और फ्री स्पीच टीवी द्वारा 5।5 करोड़ टीवी रिसीवर्स तक पहुंचाया जाता है। उनकी ''डेमोक्रेसी एट वर्क'' के साथ दो किताबें ''अंडरस्टेंडिंग मार्क्सिज़्म'' और ''अंडरस्टेंडिंग सोशलिज़्म'' हैं, दोनों democracyatwork।info पर उपलब्ध हैं।

इस लेख को इकनॉमी फ़ॉर ऑल ने प्रोड्यूस किया है, यह इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट का प्रोजेक्ट है।

मूल आलेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Could U.S. Capitalism Turn Nationalist

USA
Donald Trump
capitalism
Democrats
Republicans
Recession

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन में हो रहा क्रांतिकारी बदलाव

अमेरिकी आधिपत्य का मुकाबला करने के लिए प्रगतिशील नज़रिया देता पीपल्स समिट फ़ॉर डेमोक्रेसी

क्यों USA द्वारा क्यूबा पर लगाए हुए प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं अमेरिकी नौजवान

छात्रों के ऋण को रद्द करना नस्लीय न्याय की दरकार है

गर्भपात प्रतिबंध पर सुप्रीम कोर्ट के लीक हुए ड्राफ़्ट से अमेरिका में आया भूचाल

समाजवाद और पूंजीवाद के बीच का अंतर

क्यूबा में नाकाबंदी ख़त्म करने की मांग को लेकर उत्तरी अमेरिका के 100 युवाओं का मार्च

युवा श्रमिक स्टारबक्स को कैसे लामबंद कर रहे हैं

अमेरिका ने रूस के ख़िलाफ़ इज़राइल को किया तैनात


बाकी खबरें

  • लव पुरी
    क्या यही समय है असली कश्मीर फाइल को सबके सामने लाने का?
    04 Apr 2022
    कश्मीर के संदर्भ से जुडी हुई कई बारीकियों को समझना पिछले तीस वर्षों की उथल-पुथल को समझने का सही तरीका है।
  • लाल बहादुर सिंह
    मुद्दा: क्या विपक्ष सत्तारूढ़ दल का वैचारिक-राजनीतिक पर्दाफ़ाश करते हुए काउंटर नैरेटिव खड़ा कर पाएगा
    04 Apr 2022
    आज यक्ष-प्रश्न यही है कि विधानसभा चुनाव में उभरी अपनी कमजोरियों से उबरते हुए क्या विपक्ष जनता की बेहतरी और बदलाव की आकांक्षा को स्वर दे पाएगा और अगले राउंड में बाजी पलट पायेगा?
  • अनिल अंशुमन
    बिहार: विधानसभा स्पीकर और नीतीश सरकार की मनमानी के ख़िलाफ़ भाकपा माले का राज्यव्यापी विरोध
    04 Apr 2022
    भाकपा माले विधायकों को सदन से मार्शल आउट कराये जाने तथा राज्य में गिरती कानून व्यवस्था और बढ़ते अपराधों के विरोध में 3 अप्रैल को माले ने राज्यव्यापी प्रतिवाद अभियान चलाया
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में एक हज़ार से भी कम नए मामले, 13 मरीज़ों की मौत
    04 Apr 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 12 हज़ार 597 हो गयी है।
  • भाषा
    श्रीलंका के कैबिनेट मंत्रियों ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दिया
    04 Apr 2022
    राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के कारण पैदा हुए आर्थिक संकट से सरकार द्वारा कथित रूप से ‘‘गलत तरीके से निपटे जाने’’ को लेकर मंत्रियों पर जनता का भारी दबाव था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License