NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अनफ़ेयर एंड अनलव्ली: एक अच्छे कॉर्पोरेट नागरिक के  मिथक
दुनिया में सिर्फ़ संवेदनशील और चिंतित दिखना ही कॉर्पोरेट जवाबदेही और पारदर्शिता का एक मात्र विकल्प नहीं हो सकता है।
मोज़ेस राज जीएस 
16 Jul 2020
Translated by महेश कुमार
Unfair & Unlovely

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूनिलीवर और उपमहाद्वीप में हिंदुस्तान लीवर ने फ़ेयर एंड लवली से "फ़ेयर" शब्द को हटा दिया है क्योंकि उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि उनका ब्रांड ब्लीचिंग (सफ़ेद बनाने वाला) उत्पाद नहीं है। सौंदर्य के बारे में यह अनोखा विचार है जो ‘ब्लैक लाइव्स मैटरस आंदोलन और जॉर्ज फ्लॉयड की दुखद हत्या के बाद गंभीर आलोचना का भागी बन था, जिसने नकारात्मक घिसी-पिटी चर्चा को नए सिरे से छेड़ा। नीविया अपने गार्नियर ब्रांड के माध्यम से पश्चिम एशिया, नाइजीरिया, घाना और भारत में स्किन-लाइटिंग यानि त्वचा को हल्का करने वाले उत्पाद के रूप में बेचती है और लो’रियाल (L’Oreal) भी बेचती है। इस संदर्भ में, क्या यूनीलीवर का फैंसला अपने उत्पाद की गहरी रीब्रांडिंग और बाज़ार की रणनीति का हिस्सा तो नहीं है?

नकली एकजुटता, अपहृत पहचान: 

यदि व्यापार/विपणन का आम आकर्षण यह है कि ग्राहक राजा है, तो आज की आधुनिक कंपनियां/निगम राजा की ताजपोशी करने वाली हैं। वे एक यूटोपियन राज्य को जीते हैं और उसे ही आगे बढ़ाते हैं जहां बाजार आम इंसान या समाज में प्रवृत्तियों, पैटर्न, विकल्प, वरीयताओं और जीवन शैली के विकल्पों को निर्धारित करता है। पैतृक अनुशासन जो कि खरीदार के व्यवहार की सावधानीपूर्वक निगरानी करता है और बिक्री की स्थिति में उपयोगकर्ताओं के लिए अच्छी-अच्छी वस्तुओं को माँ जैसी गर्माहट के माध्यम से बेचता है - निगमों के मानक में लिंग आधारित तुष्टिकरण का उपयोग किया जाता है- ताकि वे उनके "ब्रांड संरक्षक", "सम्मानित ग्राहक", "व्यवसाय" के भागीदार ”और“ मूल्यवान ग्राहक” बन सके। यह निगमों को दोहरा चेहरा उपलब्ध कराता है: आंतरिक रूप से, वे ग्राहकों के जीवन को प्रभावित करते हैं, जबकि वैश्विक निगमों के समूह के बीच, वे संवेदनशील और चिंतित दिखाई देते हैं। यही कारण है कि एक "अच्छा कॉर्पोरेट नागरिक" एक मिथक है, लेकिन इस अस्पष्टता को उजागर करना बड़ा कठिन काम है।

कॉर्पोरेट हेरफेर और ऐतिहासिक अन्याय की व्यवस्था संयुक्त राज्य अमेरिका के इतिहास में बड़े स्पष्ट रूप से दर्ज़ है, 1776 में स्वतंत्रता की घोषणा के बाद इन निगमों ने कालोनियों की स्थापना की थी। इसके कारण राष्ट्र पीछे की सीट पर सुस्ताने लगा और पूंजीवाद ने सार्वजनिक सेवाओं जैसे कि पानी, बिजली, बैंकिंग और खाद्य वितरण में जड़ें जमा ली। स्वाभाविक रूप से, एकाधिकारवाद चर्चा का केंद्र बन गया और कॉर्पोरेट व्यक्तित्व जल्दी से कॉर्पोरेट राष्ट्र में बदल गया। उपनिवेशवाद की समाप्ति के बाद भी यह नहीं बदला।

कॉरपोरेशन जो भी आधिकारिक स्टैंड भारत में लेते हैं, जिसके माध्यम से वे आबादी को प्रभावित करने के लिए अपने नवाचारों का उपयोग करते हैं, इसे भी व्हाइट बनाम ब्राउन की औपनिवेशिक समझ के रहस्य के माध्यम से देखा जाना चाहिए। लॉर्ड मैकाले, जिन्हें भारत में अंग्रेजी शिक्षा लाने का श्रेय दिया जाता है, उन्हे काफी स्पष्ट था कि औपनिवेशिक व्यवस्था उनसे क्या मांग रही है: अंग्रेजों की तरह काम करें, अंग्रेजों की तरह बात करें लेकिन रहे भारतीय। इस साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का निर्माण सिर्फ प्रशासनिक जरूरत के लिए नहीं किया गया था, बल्कि यह प्रवृत्ति तीसरी दुनिया में "सभ्यता" के मिशन को तैयार करना था जिससे वे औपनिवेशिक निरंतरता को जारी रख सकें।

इसे शायद ही दोहराया जाना चाहिए कि संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह, बहुराष्ट्रीय ईस्ट इंडिया कंपनी ने कॉर्पोरेट छ्लावे के माध्यम से भारत पर कब्जा किया था। आज हम जो देख रहे हैं, वह एक अंतरराष्ट्रीय पूंजीवादी वर्ग का बढ़ता साम्राज्य है, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के माध्यम से सीमाओं के पार हमारे उपभोग की हर चीज को नियंत्रित कर रहे है। उनके पास इसका बचाव पूंजीवाद का दोस्ताना चेहरा पेश करना है या दूसरे शब्दों में कहें तो ये कंपनियों द्वारा वित्तपोषित कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी कार्यक्रमों हैं जो लोगों और पर्यावरण के साथ शांति बनाने की बात करते हैं।

इन कंपनियों का अभिजात वर्ग जाति-वर्ग की बाधाओं को पार कर लेता है जो सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देता है। उदाहरण के लिए, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष विकासशील या कम विकसित देशों को धन मुहैया कराने में देरी विशेष रूप से इसलिए होती हैं, क्योंकि उनके मुताबिक वहां होमोफोबिया प्रचलित है। जैसा कि एसओएएस (SOAS) में राजनीति के एक वरिष्ठ व्याख्याता राहुल राव का तर्क है, कि यह विकास-बनाम-सामाजिक-नैतिक औचित्य का प्रच्छन्न संकरण है जिसके माध्यम से वे “अंधेरे” में रहने वालों को सभ्यता का पाठ पढ़ाते हैं, जैसा कि अंबेडकर ने बड़े शाश्वत ढंग से "आदिवासी जातियाँ" की तुलना “बर्बर” के साथ के थी जो "जन्मजात मूर्ख" बने रहे जब तक कि हिंदु उन्हें "सभ्यता" सिखाने नहीं आ गए। इसी तरह, 1778 में कैप्टन कुक के कब्जे के बाद से ऑस्ट्रेलिया में आदिवासियों को संपत्ति के स्वामित्व के उनके प्राकृतिक अधिकार से बेदखल कर दिया गया था क्योंकि "सभ्य लोगों" की पश्चिमी अवधारणा में आदिवासी शामिल नहीं थे। भूमि के ऐतिहासिक मालिक 1992 तक भूमिहीन बने रहे, जब तक अदालतों ने इस अन्याय को ठीक नहीं किया और उनकी जन्मभूमि को 200 साल के भेदभाव और रंगभेद के बाद, उनकी भूमि का खिताब बहाल हुआ।

औपनिवेशिक क्षतिपूर्ति:

इस लेख के दायरे में औपनिवेशिक भेदभाव पर चर्चा नहीं है, लेकिन बहूनिगमों पर और उनके द्वारा तय एजेंडा पर नज़र डालना है जिसके माध्यम से वे स्वीकार्य और वांछनीय पहचान की अपनी धारणाओं को स्थापित करते हैं। जिस नस्लीय भेदभाव को हम फ़ेयर एंड लवली में देखते हैं, उसे इस संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। फिल्मों, विज्ञापनों और फैशन एंबेसडर के सिंडिकेट के माध्यम से त्वचा के रंग में बहुत अधिक गोरेपन की वकालत की जाती है। जितनी बार हम स्वीकार करना चाहते हैं, उससे कहीं अधिक वे ग्लैमर उद्योग की रैंप वॉक और ब्रांड निष्ठा में पाए जाते हैं, जिसके माध्यम से शरीर से घृणा और छवि-चेतना की पूजा की जाती है।

सवाल यह है कि निगम अचानक मानवीय क्यों हो रहे हैं? ऐसा क्या है जो उन्हें अचानक से जागरूक बना रहा है? कंपनियां प्रकृति के मामले में सक्रिय क्यों हो रही हैं? क्या अच्छा बनना नई सामान्य बात बन रही है? क्या कंपनियां आखिरकार अपने भीतर झांक रही हैं और अपनी आत्मा को झकझोर रही है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के पूर्व महानिदेशक डॉ॰ मार्गरेट चैन ने कहा कि शीर्ष दवा कंपनियों का मुख्यालय संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में है लेकिन दुनिया भर में इसका संचालन होता है। इसी तरह, महिलाओं के सैनिटरी उत्पादों के बाजार में प्रॉक्टर एंड गैंबल (व्हिस्पर) और जॉनसन एंड जॉनसन (स्टेफ्री) का बोलबाला है। याद्द्पि, सेनेटरी नैपकिन को "चिकित्सा उत्पादों" के रूप में वर्गीकृत किया गया है, तो कंपनियों ने उत्पाद पैक बनाने में क्या लगाया है, उसे कानून के मुताबिक खुलासा करने की जरूरत नहीं होती है। यह ग्राहकों को केवल ऊपरी फैंसी पैकेजिंग "पसंद" का विकलप देता है।

एक अन्य उदाहरण में, जब सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में धारा 377 को कमजोर कर दिया था, तो ब्रांड इंद्रधनुषी गौरव को भुनाने के लिए इन्होने दौड़ लगा दी। यह एकजुटता केवल एक थोड़े से वक़्त तक चली और क्वीर समुदाय के लिए हमदर्दी न तो रोजगार पैदा कर पाई और न ही उनके लिए कोई सुरक्षित कार्यक्षेत्र बना पाई। गुलाबी रंग की इस तरह से धुलाई क्वीर समुदाय के अधिकारों के खिलाफ दमनकारी नियमों को छुपाते हुए एक प्रगतिशील छवि बनाने की प्रचार की रणनीति को विश्व स्तर पर उजागर करता है।

उपभोक्ता संरक्षण के प्रति क़ानूनी आशा:

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 को भ्रामक विज्ञापनों और अनुचित व्यापार प्रथाओं को ठिकाने लगाने के लिए एक बढ़िया कदम बताया गया है। उपभोक्ता मामलों के विभाग ने एक केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण और शिकायतों को दर्ज करने के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल, जिसे भ्रामक विज्ञापन के खिलाफ शिकायतें (GAMA) कहा जाता है, आशा है कि उपभोक्ताओं को इसके माध्यम से तेजी से कानूनी समाधान मिलेगा। लेकिन जब माना जाता है कि शक्तिशाली हमेशा सही होता है, तो नकली ब्रांड के किए गए वादे से छले गए कम विशेषाधिकार प्राप्त क्वीर समुदाय के लिए मुश्किल होगा कि वे पहले स्थापित-अधिकृत बड़े कॉर्पोरेट से लड़ें।

सांस्कृतिक रूप फ़ेयर और लवली जैसे सौंदर्य उत्पाद जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गए हैं, एक और बड़ा जोखिम यह है कि अधिक से अधिक लोग अब डिजिटल स्वीकृति की दुनिया की तलाश में भाग रहे है। इंस्टा-योग्य होना डिजिटल समाज में नया प्रतिमान बन गया है। फैशन पत्रिका वोग ने अपने घने नियमों को स्पष्ट किया है कि कैसे किसी को इंस्टाग्राम पर अपनी तस्वीर को पोस्ट करना चाहिए, जिसे फेसबुक द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जो व्हाट्सएप और स्नैपचैट का मालिक है।

ऑनलाइन प्रशंशा/अनुमोदन हासिल करने से लेकर सेल्फी संस्कृति में बहुत वृद्धि हुई है, जो अब एक घोषित मानसिक विकार बन गया है। किसी भी फोटो/छवि को वांछित "पसंद" नहीं मिलती है, तो उसे कई परीक्षणों और त्रुटियों से गुजरना पड़ता है, और असंख्य डिजिटल फ़िल्टर के माध्यम से उसे सुविधा-वर्धक बनाया जाता है, जब तक कि वह पोस्ट के लिए "फिट नहीं हो जाती" है। सेल्फी को पुरानी लत कॉस्मेटिक उत्पाद कंपनियों द्वारा बढ़ावा दिया गया है जो नियमित रूप से सेल्फी प्रतियोगिता में शामिल रहती हैं।

जैसा कि वैश्विक निगमों को व्यवसाय और मानवाधिकार ढांचे के साथ देखा जाता है, एक ऐसा ढाँचा जिसे प्रोफेसर जॉन रग्गी ने तैयार किया है, जो कि हार्वर्ड कैनेडी स्कूल के शिक्षक हैं, और  जिन्हें संयुक्त राष्ट्र ने कॉरपोरेट से निपटने के लिए एक रूपरेखा विकसित करने को कहा था। चूंकि कॉर्पोरेट निगम दुनिया भर में बेंतहा अन्याय करने के लिए जाने जाते हैं और वे कभी भी इन अन्यायों केआर प्रति  जवाबदेह नहीं होना चाहते हैं, इसलिए उनके बचाव के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि को खारिज कर दिया गया था। इसका परिणाम ये निकाला कि देश को मानव अधिकारों का सम्मान करने के लिए कॉरपोरेट निवेश और कंपनियों की रक्षा के "सिद्धांतों का मार्गदर्शन करना" तय हुआ। पारदर्शिता और जवाबदेही चौराहे पर खड़ी नज़र आती है जबकि सत्ता और ताक़त समान अधिकार और न्याय के मुक़ाबले प्रमुख बन जाती हैं।

कॉर्पोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी रिपोर्टिंग अब कंपनियों में सामान्य वित्तीय रिपोर्टिंग से जुड़ गई है, इसलिए सामाजिक अच्छाई अब वित्तीय अच्छाई के बराबर है। इंसानियत क्या है, इसे कैसे परिभाषित किया जाए, इस बुनियादी गलतफहमी के साथ, एक अच्छा कॉर्पोरेट नागरिक होने का विचार एक बड़ी मिथ्या है। और यह सही नहीं है।

लेखक बैंगलोर के सेंट जोसफ़ कॉलेज ऑफ़ लॉ में सहायक प्रोफ़ेसर हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

इस आलेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Unfair & Unlovely: Myth of a Good Corporate Citizen

Corporate power
Accountability
Corporate colonialism
CSR

Related Stories

तमिलनाडु में गंगा सफ़ाई के नाम पर लाखों खर्च, क्या वाकई यहां गंगा बहती है?

कॉरपोरेट सामाजिक ज़िम्मेदारी: कॉरपोरेट फायदे के लिए, कॉरपोरेट की, कॉरपोरेट द्वारा बनायी गयी व्यवस्था!

बीजेपी ने पिछले पांच वर्षों में 'पारदर्शिता' को कुचल दिया!


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License