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उत्तराखंड चुनाव 2022 : अल्मोड़ा की पहचान रहा ताम्र उद्योग पतन की ओर, कारीगर परेशान!
कभी उत्तराखंड ही नहीं देश का गौरव रहे तांबा कारीगर आज अपने गुज़र-बसर के लिए मजबूर हो गए हैं। वर्तमान विधानसभा चुनाव में हर दल इस उद्योग को अल्मोड़ा की संस्कृति से जोड़ रहा है और उसे राज्य का गौरव बता रहा है। लेकिन कोई भी दल कोई ठोस रोडमैप लेकर इनके बीच नहीं जा रहा है।
मुकुंद झा
07 Feb 2022
राजेश टम्टा
राजेश टम्टा

उत्तराखंड का अल्मोड़ा शहर कभी ताम्रनगरी के रूप में जाना जाता था, परंतु अब तांबे का काम अपने पतन की ओर है। कभी उत्तराखंड ही नहीं देश का गौरव रहे तांबा कारीगर आज अपने गुज़र-बसर के लिए मजबूर हो गए हैं। लेकिन किसी भी सरकार ने इनके उत्थान के लिए कोई काम नहीं किया है। हालांकि, इनके नाम पर राजनीति होती रही है। इस बार राज्य सरकार ने कुंभ मेले में यहां के बने कलश को मुख्य अतिथियों को दिया। परंतु उसके आगे कुछ नहीं हुआ और अंत में ये एक फ़ोटो Opportunity बनकर रह गया। 

हम इनकी वर्तमान स्थिति को समझने के लिए अल्मोड़ा शहर की ताम्र नगरी टम्टा कालोनी गए, जहां आज भी कुछ परिवार इस काम से जुड़े हुए हैं। 

न्यूज़क्लिक की टीम गुरुवार 3 फरवरी 2022 को अल्मोड़ा शहर के टम्टा कालोनी पहुंची, इस दिन मौसम बहुत खराब था, भारी बारिश और बर्फबारी के बीच जब हम टम्टा कालोनी में पहुंचे, तभी हमें कहीं से हथौड़ों की थाप की आवाज़ सुनाई दी, जिसका पीछा करते हुए हम वहां पहुंचे, जहां लगभग 55 वर्षीय राजेश टम्टा अपने हथौड़े और छेनी की चोट से तांबे के एक बर्तन पर डिज़ाईन बना रहे थे। उन्होंने बताया कि वो पिछ्ले लगभग पांच दशकों से इस काम से जुड़े हुए हैं। जब उनकी उम्र चार-पांच साल की थी, तब से ही वो इस काम में अपने परिवार की मदद करते थे। लेकिन आज के हालात को लेकर बात करते हुए राजेश टम्टा की आंखों में और चेहरे पर एक उदासी छा गई और कहा कि अब इस काम में कुछ नहीं बचा है। मुश्किल से परिवार का खर्च चल पाता है। 

टम्टा ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए बताया कि पहले इस काम से उनका लगभग पूरा मोहल्ला जुड़ा हुआ था परंतु आज गिनती के चार से पांच परिवार ही इस काम को कर रहे हैं।

काफी समृद्ध और प्राचीन ताम्रनगरी का इतिहास 

पारंपरिक तांबे के बर्तनों तक का अल्मोड़ा का सफर बेहद समृद्ध और प्राचीन रहा है। ये चंद वंश के समय से ही ये काम करते रहे हैं।

स्थानीय लोग बताते हैं कि ताम्र नगरी का इतिहास करीब 500 साल पुराना है। बताते हैं कि चंद राजाओं के समय टम्टा परिवार का इनके दरबारों में एक खास औधा था। ये ज़मीन के नीचे तांबे धातु की पहचान व गुणवत्ता परखने में माहिर थे। जब चंद राजाओं ने अपनी राजधानी को चम्पावत से अल्मोड़ा में शिफ्ट किया था, तब राजधानी बनाने के बाद यहां तामता (टम्टा) परिवारों को अल्मोड़ा में बसाया गया। तब ताम्रशिल्प को कुमाऊं के सबसे बड़े उद्योग का दर्जा मिला, जहां इनके द्वारा घरेलू उपयोग के साथ पूजा व धार्मिक आयोजनों में उपयोग होने वाले बर्तनों के साथ सिक्कों की ढलाई व मुहर भी बनाई जाने लगी। वर्तमान में ये बर्तन के अलावा वाद्य यंत्र रणसिंघ, तुतरी आदि बनाते हैं।

हालांकि अंग्रेजी हुकूमत में इस उद्योग पर असर पड़ा क्योंकि वो ब्रिटेन से ताँबा मंगाने लगे। लेकिन, फिर भी यह उद्योग खुद को प्रासंगिक बनाए रखने में सफल रहा। 

मशीनीकरण ने उद्योग को ठप करने में निभाई अहम भूमिका

इस उद्योग को पुनः जिंदा करने और नए युवकों को इस कला से जोड़ने के लिए निरंतर काम करने वाले संजय टम्टा ने बताया कि ये अंग्रेजी शासन काल में भी खूब फला-फूला, लेकिन जैसे ही शिल्पकारों की हस्तकला पर मशीनीयुग की काली छाया क्या पड़ी, बुलंदियों पर रही ताम्रनगरी धीरे-धीरे उपेक्षा से बेजार होती चली गई। 

नवीन टम्टा जिनकी उम्र लगभग 58 वर्ष है और वो पिछले 40 साल से इस उद्योग से जुड़े हैं, उन्होंने कहा कि पारंपरिक कारीगरों के घरेलू कारखानों की बजाय जब से आधुनिक फैक्ट्रियों में मशीनों से तांबे का काम होने लगा, तब से ही ताम्र नगरी में तांबे के कारीगर अपने पतन की ओर बढ़े रहे हैं और संकट की स्थिति पैदा हो गई है।

ताम्रनगरी में रहने वाली 58 वर्षीय सावित्री देवी, जो एक ज़माने में इस उद्योग से जुड़ी थी, और कमाई करती थीं, अब अपना परिवार चलाने के लिए लोगों के घरों में काम करती हैं।

उन्हीं के साथ बैठी रमा देवी, जिनकी उम्र लगभग 45 वर्ष है, वो भी इस काम को छोड़ चुकी हैं क्योंकि इस काम में कमाई नहीं बची है और न ही ये काम हमेशा मिलता है। 

उन्होंने हमें बताया कि पहले ताम्रनगरी से हथोडों से तांबे की पिटाई की आवाज़ दिनभर आती थी और बड़े पैमाने पर लोग इस उद्योग से जुड़े हुए थे, लेकिन आज गिने-चुने लोग ही काम कर रहे हैं। 

आपको बता दें कि ताम्रनगरी में वर्कशॉप की स्थापना संयुक्त उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने 1997-98 में की थी, जिसमें 10 से 12 कमरों का एक वर्कशॉप बनाया गया था, जहां ये कारीगर काम किया करते थे, परंतु आज ये वर्कशॉप कम बल्कि, कारीगरों का घर ज्यादा बन गया है क्योंकि काम नहीं होने से ये सभी कारीगर इसी में रहने लगे और अब उनके पास दूसरा कोई आशियाना नहीं है। नीलम ने कहा कि सरकार के आदमी अब इसे भी खाली करने को कह रहे हैं, लेकिन अब वे इसे छोड़कर कहां जाएंगें। 

कोरोना की इन कारीगरों पर दोहरी मार!

पहले से ही कई तरह की समस्या का सामना कर रहे इन कारीगरों पर कोरोना ने दोहरी मार की है। कोरोना और उसके कारण हुए तालाबंदी ने इन्हें भुखमरी की कगार पर ला दिया था। 

मनोज टम्टा जो इस उद्योग से जुड़े हैं, उन्होंने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए बताया कि कोरोना से पहले किसी तरह कुछ काम चल रहा था परंतु तालाबंदी ने कई महीनों तक हमें पूरी तरह बेरोज़गार कर दिया है। अभी भी बज़ार तो खुले हैं, लेकिन कोई खरीदार नहीं है। 

शादी के सीज़न में तांबे के तौले देने की प्रथा अब कम रह गई है, लेकिन गगरी आदि की खूब मांग रहती है। कोरोना ने इस बार शादियों को स्थगित करवा दिया है। इसके चलते काम पूरी तरह प्रभावित हो गया था। इसके साथ ही इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी भी आते थे जो इन हस्तशिल्पों को बहुत पसंद करते थे और कारीगरों को उनका उचित दाम भी देते थे, परंतु कोरोना के बाद से ही विदेशी सैलानी नहीं आ रहे हैं, जिस कारण इनके व्यापार पर गहरा असर पड़ा है। 

मनोज ने कहा, "इस दौरान सरकार ने भी हमारी कोई मदद नहीं की। उन्होंने केवल पांच किलो राशन देकर अपना पल्ला छुड़ा लिया। लेकिन खाना क्या सिर्फ़ गेहूं और चावल से बनता है?"

राजेश टम्टा ने कहा कि इस दौरान तांबे के रेट में भी भारी वृद्धि हुई जिसने इस पर काफ़ी विपरीत असर डाला है। 

सरकार द्वारा ईमानदार प्रयास की कमी

लगभग सभी कारीगरों ने एक बात दोहराई कि उनकी नई पीढ़ी इस काम से दूर जा रही है क्योंकि इससे परिवार चलाना भी मुश्किल हो गया है। पुराने कारीगर भी इस काम से बाहर चले गए हैं। पुराने कारीगरों में कुछ दिहाड़ी मज़दूरी करने लगे हैं, जबकि महिला कारीगर जो पहले काफ़ी बड़ी संख्या में इस उद्योग से जुड़ी थीं, वे भी आज इससे बाहर हो गई हैं और लोगों के घरों में काम करने के लिए मजबूर हो गई हैं। 

सरकार ने उनके उत्थान के लिए कागज़ों पर कई नीतियां बनाई हैं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं दिखता है। पहले से ही अपने बुरे दौर से गुज़र रहे इस उद्योग पर कोरोना महामारी ने और अधिक बुरा असर डाला है। लोगों ने शिकायत की कि इस दौरान सरकार ने इस वक्त में भी इनकी कोई मदद नहीं की।

इनकी सबसे बड़ी समस्या कोई सीधा मार्किट का न होना है। इन्हें अपने सामान को बिचौलियों को बेचना पड़ता है, जो इन्हें मामूली भुगतान कर खुद मुनाफा कमाते हैं। मनोज ने कहा कि हम निजी व्यापारियों के भरोसे रहते हैं। सरकार हमें अगर कोई मार्किट उपलब्ध करा दे तो हमें अपने सामान को बेचने में आसानी होगी और मुनाफा भी मिलेगा। 

उन्होंने खादी का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार खादी के शो-रूम हर राज्य और प्रमुख जिलों में खोल सकती है तो फिर हमारे हस्तशिल्प के लिए भी ऐसे शोरूम क्यों नहीं बन सकते हैं?

अभी वर्तमान विधानसभा चुनाव में हर दल इस उद्योग को अल्मोड़ा की संस्कृति से जोड़ रहा है और उसे राज्य का गौरव बता रहा है। लेकिन कोई भी दल कोई ठोस रोडमैप लेकर इनके बीच नहीं जा रहा है। अल्मोड़ा में मुख्य चुनावी लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी में है। कांग्रेस ने यहां से मनोज तिवारी को उम्मीदवार बनाया है, जबकि बीजेपी ने वर्तमान विधायक रघुनाथ सिंह चौहान को उतारा है। 

वर्तमान विधायक के प्रति टम्टा समाज में भारी गुस्सा दिखा क्योंकि उनका विधायक पर आरोप है कि वो पिछ्ले पांच सालों में उनके बीच नहीं आए। जब कोरोना जैसी भीषण आपदा थी, तब भी उन्होंने कोई मदद नहीं की। 

राज्य बनने के बाद हुए चार विधानसभा चुनावों में यहां पर दो बार भाजपा ने जीत दर्ज की, तो वहीं दो बार कांग्रेस ने जीत दर्ज़ की है।

कारीगरों की मांग है कि सरकार किसी की भी बने, उनका भला तभी होगा जब इस कला को बचाने के लिए एक समुचित योजना बनाकर काम किया जाए।

(सभी तस्वीर अविनाश सौरभ ने ली है )

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