NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
पश्चिम महाराष्ट्र : अखाड़ों में दंड-बैठक, ताल ठोंकने की आवाजें बंद, पहलवानों के बुरे दिन
कुश्ती यहां का इतना अधिक लोकप्रिय खेल है कि इससे स्थानीय स्तर पर कई लोगों को रोज़ी-रोटी मिलती है। इसके अलावा लगातार दूसरे साल भी कुश्ती से जुड़ी सारी गतिविधियां बंद होने से पहलवान खाली हाथ हो गए हैं और इन दिनों भयंकर तंगी के दौर से गुजर रहे हैं।
शिरीष खरे
18 Apr 2021
'एकेटी पट' दांव से प्रतिद्वंदी पहलवान को चित करता एक पहलवान। फाइल फोटो साभार: कुश्ती मल्लविद्यालय, सांगली (महाराष्ट्र)
'एकेटी पट' दांव से प्रतिद्वंदी पहलवान को चित करता एक पहलवान। फाइल फोटो साभार: कुश्ती मल्लविद्यालय, सांगली (महाराष्ट्र)

सांगली: यहां कुश्ती के मैदानों से सुनाई देने वाली दंड, बैठक और ताल ठोंकने की आवाजें बंद हो चुकी हैं। कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण और बचाव के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण पश्चिम महाराष्ट्र में पहलवानी के लिए प्रसिद्ध सांगली में पिछले दो वर्षों से कुश्ती के अखाड़े बंद हैं। कुश्ती यहां का इतना अधिक लोकप्रिय खेल है कि इससे स्थानीय स्तर पर कई लोगों को रोज़ी-रोटी मिलती है और हर साल कुश्ती के क्षेत्र में 15 से 20 करोड़ रुपए का कारोबार होता है। लेकिन, लगातार दूसरे साल भी कुश्ती से जुड़ी सारी गतिविधियां बंद होने से पहलवान खाली हाथ हो गए हैं और इन दिनों भयंकर तंगी के दौर से गुजर रहे हैं।

इस बारे में यहां कुश्ती की एक बड़ी प्रतियोगिता 'महाराष्ट्र केसरी' के विजेता रहे अप्पासाहेब कदम बताते हैं, "कुश्ती का पूरा खेल दो पहलवानों के शारीरिक स्पर्श और तेज सांस लेने से जुड़ा है। इसलिए, कोरोना के कारण सबसे बड़ा झटका कुश्ती के क्षेत्र में देखने को मिला है। फिर कुश्ती का खेल मुख्य रूप से गरीब परिवार के बच्चों के लिए है। इसलिए चुनौती यह है कि वे इस परंपरागत खेल के लिए अपना बहुत कुछ दांव पर नहीं लगा सकते हैं।"

कोरोना से पहले सांगली में आई बाढ़ की वजह से भी कुश्ती के क्षेत्र से जुड़े पहलवान और संचालकों को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा था। अकेले सांगली जिले में विशेष तौर पर कुश्ती के लिए साठ से सत्तर अखाड़े हैं जहां बीते कई महीनों से न कुश्ती के बड़े आयोजन हो रहे हैं और न ही पहलवान रिहर्सल या प्रशिक्षण हासिल कर पा रहे हैं। हालांकि, इस दौरान कुछ पहलवान अपने व्यक्तिगत प्रयासों से पहलवानी का अभ्यास करते रहे हैं, लेकिन मैदानों पर बड़ी संख्या में लगने वाले ट्रेनिंग कैंप और नए-पुराने पहलवान तथा प्रशिक्षक पूरे तरह से गायब हो गए हैं। लिहाजा, सांगली में अब न तो पहले की तरह कुश्ती का माहौल नजर आता है और न ही कुश्ती के प्रति पहले जैसा जोश या उत्साह ही दिखाई देता है।

दो साल पहले सांगली जिले में कृष्णा और वारणा नदियों में आई महाविनाशकारी बाढ़ के चलते कुंडल, पलूस देवराष्ट्र, बंबावडे और बोरगांव में अखाड़ों में कुश्ती की गतिविधियां बंद करनी पड़ी थीं। तब बाढ़ ने यहां कुश्ती से जुड़े पहलवान, संचालक और दर्शकों के मंसूबों पर पानी फेर दिया था। हालांकि, यह उम्मीद जताई गई थी कि फरवरी से मई महीने के दौरान जब जब मौसम कुश्ती के लिए अनुकूल रहेगा और गांव-गांव में जात्रा (मेलों) का आयोजन होगा तो फिर कुश्ती के बड़े आयोजन भी होंगे। इस तरह, बाढ़ के कारण कुश्ती कारोबार को हुए नुकसान की भी भरपाई हो जाएगी। सांगली जिले में जिन साठ-सत्तर मैदानों पर कुश्ती के खेल निरंतर आयोजित होते रहे हैं उनमें चिंचोली, वीटा, पाडली, बेनापुर और खवसपुर प्रमुख स्थान हैं जहां जात्रा के दौरान भी कुश्ती की प्रतियोगिता कराई जाती हैं।

फाइल फोटो साभार: कुश्ती मल्लविद्यालय, सांगली (महाराष्ट्र)

दूसरी तरफ, शिरोड गांव के एक पहलवान भरत पाटिल बताते हैं, "कुश्ती के मैदान दो साल के लिए बंद कर दिए गए हैं। इनसे हम जैसे पहलवानों को बहुत नुकसान हुआ है। अब महंगाई पहले से काफी बढ़ गई है, कोई भी चीज सस्ती नहीं है, जबकि पहलवानों को अतिरिक्त खुराक चाहिए होती है। मुझे घर की भैंस का दूध तो मिल रहा है, पर बाकी कोई पौष्टिक चीज खरीदकर नहीं खा सकता हूं। सामान्य खाने के लिए ही मैं बड़े लोगों के खेतों में काम करता हूं, ताकि कुछ कमा सकूं और जिंदा रहने लायक भोजन खा सकूं।"

देखा जाए तो सांगली में कुश्ती के कारोबार का पूरा एक अर्थचक्र होता है। पूरे साल भर अभ्यास करने वाले पहलवान कुश्ती के खेल में इस उम्मीद से प्रवेश करते हैं कि वे कुश्ती प्रतियोगिता में जीतकर एक दिन इलाके के बड़े विजेता पहलवान के रुप में पहचाने जाएंगे और एक समय के बाद उनके नाम पर कई नए पहलवान उनके शिष्य बनें। इस तरह वे बाद में नामी प्रशिक्षक के तौर पर भी अपना कैरियर बना सकते हैं। इसलिए हर पहलवान पूरे साल कुश्ती आयोजन में विजेता बनने की चाहत से कड़ी मेहनत और पैसा खर्च करते हैं। लेकिन, जब बाढ़ और उसके बाद कोरोना के कारण आयोजन बंद हुए तो पहलवानों ने सोचा कि यह एक ब्रेक है और जल्द कुश्ती के आयोजन फिर शुरू होंगे। लेकिन, अब यहां के पहलवान एक लंबे और अनिश्चितकालीन ब्रेक लगने के बाद बहुत परेशान नजर आ रहे हैं। वजह यह है कि जब खेल होते थे तो विजेता के अलावा पराजित पहलवानों को भी कुछ रकम मिलती थी और उससे वे पहलवानी का अभ्यास करते रहते थे। इसके अलावा कुश्ती का आयोजन जब खत्म होता था तो अगले वर्ष फिर से कुश्ती का आयोजन करने के लिए खर्च का पैसा निकल आता था और इस तरह कुश्ती को परंपरागत रुप से आयोजित कराने का सिलसिला भी बना रहता था। लेकिन, अब जब पिछले दो वर्षों से यह क्रम टूटा है तो कुश्ती के नए कार्यक्रम आयोजित कराने के लिए फंड भी नहीं बचा है।

हर वर्ष मई में जब कुश्ती की ज्यादातर खेल प्रतियोगिता समाप्त हो जाती हैं तो सभी पहलवान उनके अपने गांव चले जाते हैं और जून यानी बरसात के दौरान जब कुश्ती प्रतियोगिता नहीं होती तो यह ऐसा समय होता है जब पहलवान अपनी कमजोरियों पर कार्य करते हैं और अभ्यास के दौरान प्रतियोगिता में हुईं गलतियों से सबक लेकर खुद को बेहतर पहलवान बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन, पिछले दो वर्षों से कुश्ती प्रतियोगिताएं बंद हैं तो एक पहलवान के रूप में यह समझना मुश्किल हो रहा है कि उनकी पहलवानी में गलतियां क्या हैं और वे किन तरीकों से उनकी अपनी गलतियों को दूर करके एक अच्छा पहलवान बन सकते हैं। वहीं, जब कुश्ती का कारोबार लंबे समय से बंद हो तो हर एक पहलवान के लिए सुविधाएं जुटाना भी मुश्किल हो जाता है और यहां तक की उन्हें खेलने के मौके तक नहीं मिलते हैं। ऐसे में कुश्ती में लंबा ब्रेक खास तौर पर उम्र की ढलान पर खड़े पहलवानों के कैरियर के लिए बुरा साबित हो रहा है।

यही वजह है कि ज्यादातर पहलवान कोरोना और उसके कारण लगाए गए लॉकडाउन से निजात पाने का इंतजार कर रहे हैं। ज्यादातर पहलवान निम्न-मध्यम वर्ग परिवारों से हैं, इसलिए वे अपनी पहलवानी छोड़कर इस महामारी के मुश्किल दौर में अपने और अपने परिवार की घर-गृहस्थी चलाने के लिए दूसरे काम-धंधे ढूंढ़ रहे हैं और परिजनों को अपना आर्थिक योगदान दे रहे हैं। वहीं, कुछ गिने-चुने पहलवान ही हैं जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है और जो कोरोना लॉकडाउन में भी पहलवानी पर पूरी तरह से ध्यान देकर अभ्यास कर रहे हैं।

दूसरी तरफ, सांगली में प्रतिवर्ष आयोजित महाराष्ट्र केसरी प्रतियोगिता में दूर-दूर से पहलवान सांगली आते हैं। लेकिन, यह प्रतियोगिता रद्द होने से सांगली और सांगली के बाहर राज्य के कई पहलवानों में कुश्ती को लेकर शिथिलता आई है। वहीं, सांगली में कुश्ती के सारे मैदान बंद होने और कई करोड़ रुपए की कमाई से हाथ धोने के कारण यहां के पहलवान तथा कारोबारियों में हताशा की स्थिति बनी हुई है।

इस बारे में और अधिक जानकारी देते हुए कोल्हापुर में पहलवान रहे कुश्ती प्रतियोगिता के संचालक और प्रशिक्षक मौली जमादे बताते हैं, "गांव-गांव में कुश्ती के मैदान बंद करने से पहलवानों में एक तनाव पैदा हो गया है। उनकी सारी कवायद और कसरत भी एक ठहराव की स्थिति में आ गई हैं। छोटे गांवों में तक हर वर्ष यह देखने को मिलता था कि प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण शिविर में सौ से अधिक बच्चे आया करते थे। बीच भी जब लॉकडाउन शिथिल हुआ था तब कुछ बच्चे सीखने आए भी, लेकिन उनकी संख्या पांच से तक तक थी, क्योंकि कोरोना का डर तो सबके मन में है ही कि कहीं वे बीमार न हो जाएं! अभी कोरोना की दूसरी लहर ने सारी उम्मीद तोड़ दी है।"

सांगली जिले में कई स्थानों पर कुश्ती के प्रमुख मैदान हैं जहां इन दिनों कुश्ती की गतिविधियां बंद हैं। इनमें सांगली, मिरज, कवठेपिरान, कसबे डिग्रज, तुंग, समडोली, खंडेराजुरी, भोसे, सोनी, धुलगांवव, कवलापुर, बुधगांव, पदमाले, जुनी धामणी, वालवा, बोरगांव, जुनेखेड, मसुचीवाडी, ताकारी, तुपारी, रेठरे हरणाक्ष, कासेगाव, कुरलप, वाटेगांव, नेर्ले कामेरी, पेठ, मांगरूल, शिराला, चिंचोली, मणदूर, पुनवत, पणुंब्रे, शेडगेवाडी, वारूण शित्तुर, पलूस, किर्लोस्करवाडी, रामानंदनगर, पुणदी, दुधोंडी, नागराले, आमनापूर, देवराष्ट्रे, कुंडल, बांबवडे, नागाव निमणी, कवठे एकंद, तासगांव, नागांव, यमगरवाडी, विसापुर, हातनूर, हातनोली, पाडली, पारे, वीटा, खानापुर, बेनापुर, बलवडी, लेंगरे, खवासपूर, जत, बागेवाडी, नागज ,जुनोनी, कवठेमंकाल, करोली और अन्य कई मैदान प्रमुख हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Maharastra
West Maharastra
Kusti
Wrestlers
COVID-19
Coronavirus

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • hunger crisis
    डॉ. राजू पाण्डेय
    चिंता: ग्लोबल हंगर इंडेक्स को लेकर भी असहिष्णु सरकार
    29 Oct 2021
    पिछले कुछ समय से सरकार ऐसे हर आकलन को खारिज करती रही है जो उसकी असफलताओं को उजागर करता है।
  • climate
    टिकेंदर सिंह पंवार
    जलवायु परिवर्तन का संकट बहुत वास्तविक है
    29 Oct 2021
    भविष्य में आने वाली अधिक आपदाओं का मुक़ाबला करने के लिए आपदा जोखिम को कमतर करने वाले सिद्धांतों को मज़बूत करने की ज़रूरत है।
  • Supreme Court on Pegasus
    अजय कुमार
    पेगासस जासूसी कांड पर सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी: 46 पन्नों के आदेश का निचोड़
    29 Oct 2021
    केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का जिक्र कर सरकार को निजता के अधिकार के उल्लंघन से जुड़े सवालों के जवाब देने से छूट नहीं मिल सकती है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 14,348 नए मामले, 805 मरीज़ों की मौत
    29 Oct 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 0.47 फ़ीसदी यानी 1 लाख 61 हज़ार 334 हो गयी है।
  • exxon
    इलियट नेगिन
    प्रतिबंधित होने के बावजूद एक्सॉनमोबिल का जलवायु विज्ञान को ख़ारिज करने वालों को फंड देना जारी
    29 Oct 2021
    अमेरिकी तेल और गैस की प्रमुख कंपनी एक्सॉनमोबिल ने जलवायु विज्ञान को लेकर संदेह पैदा करने के लिए 39 मिलियन डॉलर से ज़्यादा ख़र्च किए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License