NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कौन हैं ग़दरी बाबा मांगू राम, जिनके अद-धर्म आंदोलन ने अछूतों को दिखाई थी अलग राह
मांगू राम को अपने स्कूली जीवन में वह सब झेलना पड़ा जो उस वक़्त ‘अस्पृश्य’ माने जाने वाली जातियों के बच्चों को झेलना पड़ता था।
हर्षवर्धन
22 Apr 2022
baba mangu ram
फ़ोटो साभार: फेसबुक

मांगू राम का जन्म 14 जनवरी, सन 1886 को पंजाब के होशियारपुर जिले के मुगोवाला नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम हरमन सिंह तथा माता का नाम अत्रि था, जिनका देहांत मांगू राम जब मात्र तीन वर्ष के थे तब हो गया था। जब मांगू राम का जन्म हुआ, उस समय तक उनके पिता जाति निर्धारित चमड़े का काम छोड़ कर चमड़े के व्यापार में हाथ आज़मा रहे थे।  चूंकि व्यापार में अंग्रेजी भाषा का दबदबा था, हरमन सिंह को अपने इलाके के अंग्रेजी जानने वाले लोगों की मदद लेनी पढ़ती थी, जिसके एवज में उनको पैसे देने पड़ते थे। हरमन सिंह ने इस वजह से मांगू राम को छह साल की उम्र में स्कूल में भर्ती करा दिया, ताकि अंग्रेजी का ज्ञान हो जाये और व्यापार में मदद मिल सके।

मांगू राम को अपने स्कूली जीवन में वह सब झेलना पड़ा जो उस वक़्त ‘अस्पृश्य’ माने जाने वाली जातियों के बच्चों को झेलना पड़ता था। प्राथमिक स्कूल में पढ़ने के लिए मांगू राम पे कई शर्तें डाली गईं,  जैसे कि वो कक्षा के भीतर प्रवेश नहीं कर सकते, बैठने के लिए खुद की टाट लानी होगी इत्यादि। इन विषम परिस्थितियों के बावजूद मांगू राम एक अच्छे छात्र साबित हुए और प्राथमिक स्कूल की परीक्षा में तीसरे नंबर पर आये। 1905 में मांगू राम ने स्कूल छोड़ दिया और अपने पिता के साथ व्यवसाय में जुड़ गए और तीन साल तक उनकी मदद की। इसी दौरान उनकी शादी भी हो गयी।  

मांगू राम के जीवन में निर्णायक घड़ी तब आई जब सन 1909 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका जाने का फ़ैसला किया। पिता की आज्ञा पाकर और कुछ स्थानीय जमींदारों से कर्ज ले कर मांगू राम नई दुनिया के लिए निकल पड़े। अमरीका में मांगू राम करीबन चार साल तक रहे अलग-अलग जगहों पर काम किया। पंजाब से ही कुछ प्रवासियों ने सन 1913 में अमेरिका में ग़दर पार्टी की स्थापना की जिसका उद्देश्य भारत को अँग्रेज़ों की गुलामी से मुक्त करना था।

अमेरिका में रहते हुए मांगू राम ने ग़दर पार्टी की सदस्यता ली, और उसके एक प्रमुख कार्यकर्ता और नेता बन गए। सन 1915 में, पहले विश्व युद्ध के दौरान ग़दर पार्टी ने जर्मनी की मदद से  ब्रिटिश भारतीय सेना में बगावत खड़ी कर देश को आज़ाद करने की एक व्यापक योजना तैयार की। इस योजना के तहत ग़दर पार्टी हथियारों का एक बड़ा जखीरा समुद्री जहाज के माध्यम से हिंदुस्तान भेजने वाली थी, इसके लिए पांच लोगों का चयन किया गया जिसमें मांगू राम भी थे।

अमेरिका से पांच ग़दरी नेता एक जहाज में हथियारों का जखीरा ले कर हिंदुस्तान के लिए निकल पड़े। रास्ते में उनको कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। जब यह जहाज जापान के तट पर पहुंचा तो जापानियों ने उनको गिरफ्तार कर अँग्रेज़ों के हवाले कर दिया। अँग्रेज़ों को उस वक़्त तक ग़दर षड्यंत्र का पता चल चुका था। उन्होंने पाँचों को फाँसी देने का निर्णय लिया लेकिन इससे पहले कि अंग्रेज उनको फाँसी दे पाते, कुछ जर्मन जासूसों ने पाँचों ग़दरी नेताओं को कैद से फ़रार करा दिया।

वहां से फरार हो कर मांगू राम मनिला के लिए निकले लेकिन समुद्री तूफान की वजह से उनका जहाज़ सिंगापूर पहुंच गया जहाँ उनको फिर से अँग्रेज़ों ने गिरफ्तार कर लिया और तोप से उड़ाने का निश्चय किया। एक बार फिर किस्मत ने मांगू राम का साथ दिया और जर्मन जासूस उनको फिर से अँग्रेज़ों की गिरफ्त से बचा कर ले गए और उनको मनिला जाने वाले जहाज़ पर बैठा दिया।

मनिला पहुंच कर मांगू राम ने अख़बार में पढ़ा कि उनको अँग्रेज़ों ने तोप से उड़ा दिया है। यह पढ़ कर मांगू राम ने अनुमान लगाया कि उनके साथी ने उनको बचाने के लिए खुद को मांगू राम बता दिया।  

मांगू राम मनिला में अगले छह वर्षों तक रहे। आखिरकार 1925 में उन्होंने भारत लौटने का निर्णय किया। वे श्रीलंका होते हुए चेन्नई पहुंचे जहाँ उनको मदुरई मंदिर के बाहर ‘अछूतों’ पर हो रहे अत्याचार और भेद-भाव देख कर काफी दु:ख पहुंचा। वह पुणे, मुंबई, सतारा, नागपुर और दिल्ली होते हुए आखिरकार पंजाब पहुँचे। इस यात्रा के दौरान मांगू राम को पूरी तरह विश्वास हो गया कि उनको ‘अछूतों’ के लिए लड़ना है। इसके लिए उन्होंने अमेरिका में ग़दर पार्टी के मुखिया को पत्र लिख उनसे ‘अछूतों’ के बीच काम करने की बात की, जिसको ग़दर पार्टी ने मान लिया। इस दौरान मांगू राम अपने गाँव के स्कूल में पढ़ाने लगे।

मांगू राम के आने से पहले पंजाब में ‘अछूतों’ को हिन्दू धर्म से अलग संगठित करने के कई प्रयास हुए थे। ठाकुर चांद, स्वामी शूद्रानन्द और वसंत राय आदि सन 1922 से ही पंजाब में ‘अछूतों’  को अद धर्म से जोड़ने की कोशिश करने लगे थे लेकिन कोई खास सफलता उनके हाथ नहीं लग रही थी। मांगू राम का ग़दर पार्टी से जुड़ाव और उनके  साथ हुए घटनाक्रम की वजह से स्थानीय लोगों के बीच उनकी छवि लोक नायक की बन गयी थी। उपर्युक्त नेताओं ने मांगू राम की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उनसे  संपर्क साधा और अद धर्म आंदोलन से जुड़ने का प्रस्ताव रखा जिसको मांगू राम ने स्वीकार कर लिया।

अद-धर्म की स्थापना 11-12 जून सन 1926 को उसी स्कूल में हुई जहाँ मांगू राम शिक्षक थे। मांगू राम को अद-धर्म मंडल का अध्यक्ष चुना गया। उनके आने के बाद अद-धर्म आंदोलन को बल मिला और इस आंदोलन की चर्चा पूरे पंजाब सूबे में होने लगी। अपने प्रचार-प्रसार के दौरान अद-धर्मियों को कई बार हिन्दू-मुस्लिम-सिख संगठनों का विरोध झेलना पड़ा लेकिन मांगू राम के करिश्माई नेतृत्व में अद-धर्म आंदोलन अछूत माने जाने वाली जातियों में आग की तरह फैलने लगा, जिसका परिणाम यह हुआ कि 1931 की जनगणना में करीबन 5 लाख लोगों ने खुद को अद-धर्मी बताया।

पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रॉन्की राम के अनुसार मांगू राम और अद धर्म आंदोलन का पंजाब प्रान्त में दलित चेतना के विकास में एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सन 1931 के दूसरे गोलमेज सम्मेलन में जब महात्मा गाँधी ने बाबासाहेब अंबेडकर को दलित और पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधि मानने पर एतराज जताया, तब पंजाब में मांगू राम और संयुक्त प्रान्त (वर्तमान में उत्तर प्रदेश) में स्वामी अछूतानंद ने ‘अछूतों’ को गोलबंद कर गोलमेज सम्मेलन में बाबासाहेब अंबेडकर को ‘अछूतों’ का प्रतिनिधि घोषित करते हुए हज़ारों हज़ार तार लंदन भेजे। इस सम्मेलन में बाबासाहेब अंबेडकर ने ‘अछूतों’ के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की थी जिसका महात्मा गाँधी ने जोरदार विरोध किया था।

जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने बाबासाहेब अंबेडकर की दलील को मानते हुए ‘अछूतों’ के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की घोषणा कर दी तब महात्मा गाँधी ने इसका विरोध करते हुए येरवदा जेल से ही अनशन प्रारंभ कर दिया। जब मांगू राम को इसका पता चला तो उन्होंने गाँधी के अनशन के खिलाफ आमरण अनशन यह कहते हुए आरम्भ कर दिया कि "अगर गाँधी हिन्दुओं के लिए मरने को तैयार हैं , तो मैं भी अपने कौम के लिए मरने को तैयार हूँ!"

महात्मा गांधी के आमरण अनशन के दबाव में बाबासाहेब अंबेडकर को झुकना पड़ा, जिसके परिणाम स्वरूप पूना समझौता हुआ।  उसके अनुसार ‘अछूतों’ को हिंदू निर्वाचन व्यवस्था के अंतर्गत ही  राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुरक्षित करने की बात थी।

मांगू राम ने पूना समझौते का विरोध भी किया लेकिन अंततोगत्वा उसको मान लिया। पूना समझौते के उपरांत ही अद धर्म आंदोलन का पतन शुरू हो गया क्योंकि अगर ‘अछूत’ माने जाने वाले लोग अपने को अलग धर्म बताते तो उनका प्रतिनिधित्व खतरे में पढ़ जाता।

पूना समझौते के बाद आदि धर्म आंदोलन कमजोर तो हुआ लेकिन मांगू राम का हौसला कम नहीं हुआ। वह दलित-अधिकारों के लिए लड़ते रहे और 1946 में पंजाब प्रान्त की विधानसभा में चुने गए। आज़ादी के बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए और 1972 में दुबारा विधानसभा पहुंचे। अपने कार्यकाल में मांगू राम दलितों के लिए नौकरी, शिक्षा और मानवीय अधिकारों के लिए लड़ते रहे। 1970 के शुरुआती दशक में मांगू राम ने दुबारा अद धर्म आंदोलन को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जिसका परिणाम यह हुआ कि अद धर्म रविदासी सम्प्रदाय में विलय हो गया।

मांगू राम और भगत सिंह

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के अध्याय में एक बात जिसका न के बराबर जिक्र हुआ है वह है भगत सिंह के माध्यम से मांगू राम का उनपर प्रभा। भगत सिंह ने सन 1928 में एक बहुत ही महत्वपूर्ण लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ‘अछूत समस्या’। उस लेख में भगत सिंह ने जाति प्रथा की कड़ी निंदा करते हुए उसको पूरी तरह ख़ारिज कर दिया था। साथ ही साथ उन्होंने अछूत समझे जाने वाली सभी जातियों को खुद से संगठित होने की पहल की प्रशंसा करते हुए पूर्ण रूप से समर्थन किया था। उस लेख में भगत सिंह ने 'अद धर्म मंडल' का जिक्र करते हुए लिखा कि अछूत समस्या का हल तब तक नहीं हो सकता जब तक अछूत कौमें अपने आपको संगठित न कर लें। वह अद धर्म मंडल द्वारा प्रस्तावित पृथक निर्वाचन मंडल के भी प्रबल समर्थक थे। हालाँकि इसका कोई प्रमाण नहीं है कि भगत सिंह और मांगू राम का कोई साक्षात्कार हुआ हो, लेकिन ये पूर्णतः संभव है उनके हाथ अद धर्म मंडल द्वारा जारी किये गए बयान और पर्चे लग गए हों जिससे वो काफी प्रभावित हुए और क्रन्तिकारी आंदोलन में जाति प्रश्न को मजबूत तरीके से रखा।

मांगू राम करीबन पैंसठ वर्षों तक दलित और पिछड़ी जातियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत रहे। उनके लम्बे संघर्ष का अंत 22 अप्रैल सन 1980 को उनकी मृत्यु के साथ ही हुआ। आज मांगू राम को बहुत ही समिति दायरे में, सिर्फ एक दलित-नेता के तौर पर याद किया जाता है।

मांगू राम की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने भारतीय समाज की कुरीतियों से लड़ते हुए भीषण बाधाएँ पार कीं, और राष्ट्रीय पटल पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। उनका जीवन व उनका संघर्ष आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके दौर में था। मानवीय मूल्यों के लिए लड़ने वालों के लिए मांगू राम हमेशा ही एक मिसाल और प्रेरणास्रोत रहेंगे।

(लेखक जेएनयू में समाजशास्त्र के शोधार्थी हैं)

ये भी पढ़ें: कैसे ख़त्म हो दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं के साथ शिक्षण संस्थानों में होने वाला भेदभाव

Ghadri Baba Mangu Ram
Anti-religion movement
Bhagat Singh
B R Ambedkar
Mahatma Gandhi

Related Stories

अलविदा शहीद ए आज़म भगतसिंह! स्वागत डॉ हेडगेवार !

कर्नाटक: स्कूली किताबों में जोड़ा गया हेडगेवार का भाषण, भाजपा पर लगा शिक्षा के भगवाकरण का आरोप

वैष्णव जन: गांधी जी के मनपसंद भजन के मायने

कांग्रेस चिंता शिविर में सोनिया गांधी ने कहा : गांधीजी के हत्यारों का महिमामंडन हो रहा है!

भगत सिंह पर लिखी नई पुस्तक औपनिवेशिक भारत में बर्तानवी कानून के शासन को झूठा करार देती है 

एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण की डॉ. आंबेडकर की परियोजना आज गहरे संकट में

'द इम्मोर्टल': भगत सिंह के जीवन और रूढ़ियों से परे उनके विचारों को सामने लाती कला

गाँधी पर देशद्रोह का मामला चलने के सौ साल, क़ानून का ग़लत इस्तेमाल जारी

मैंने क्यों साबरमती आश्रम को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की है?

शहीद भगत सिंह के इतिहास पर एस. इरफ़ान हबीब


बाकी खबरें

  • मुज़फ़्फ़रनगर: 2013 के दंगों के बाद किसान आंदोलन ने किया जाटों और मुसलमानों को फिर से एकजुट
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    मुज़फ़्फ़रनगर: 2013 के दंगों के बाद किसान आंदोलन ने किया जाटों और मुसलमानों को फिर से एकजुट
    07 Sep 2021
    मुजफ्फरनगर महापंचायत जाट-मुस्लिम एकता प्रदर्शित करने वाले संदेश देने में प्रतीकात्मक रूप से सफल रही।
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: भूखे भजन न होय गोपाला लेकिन...
    07 Sep 2021
    जनता को रोज़ी-रोटी देने में नाकाम हमारी सरकारें, हमारे जनप्रतिनिधि जनता को पूजा-नमाज़ में ही उलझाए रखना चाहते हैं। शायद यही वजह है कि झारखंड के बाद अब उत्तर प्रदेश और बिहार में भी विधानसभा में इबादत…
  • रेलवे के निजीकरण के ख़िलाफ़ रेल कर्मियों का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन कल!
    रौनक छाबड़ा
    रेलवे के निजीकरण के ख़िलाफ़ रेल कर्मियों का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन कल!
    07 Sep 2021
    “चेतावनी दिवस” के रूप में मनाए जाने वाले इस राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम में देश के सभी 68 रेलवे मंडलों के रेलकर्मियों के भाग लेने की उम्मीद है। 
  • गुजरात: गन्ने के खेत में काम करने वाली आदिवासी महिलाओं की बंधुआ ज़िंदगी
    दमयन्ती धर
    गुजरात: गन्ने के खेत में काम करने वाली आदिवासी महिलाओं की बंधुआ ज़िंदगी
    07 Sep 2021
    दक्षिण गुजरात की आदिवासी महिलाओं की कहानी बेहद दर्दनाक है। वे यहां काम कर रहे 2.5 लाख गन्ना श्रमिकों की संख्या की तक़रीबन आधी हैं, लेकिन ये महिलायें चीनी उद्योग में आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से…
  • ओणम व्यापार मेले: कुदुम्बश्री इकाइयों ने की रिकॉर्ड बिक्री
    अज़हर मोईदीन
    ओणम व्यापार मेले: कुदुम्बश्री इकाइयों ने की रिकॉर्ड बिक्री
    07 Sep 2021
    केरल की कुदुम्बश्री इकाइयों ने ओणम व्यापार मेलों का आयोजन किया और इन मेलों जरिए पिछले महीने बाजारों में करीब 12.45 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड बिक्री दर्ज़ की है। कुदुंबश्री ने फिलहाल ऑनलाइन व्यापार मेले…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License