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यक्ष प्रश्न : दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण का ज़िम्मेदार कौन?
पंजाब-हरियाणा के किसानों की पराली जलाने की समस्या हो या ऑड-ईवन का फार्मूला पक्ष-विपक्ष एकजुट होने के बजाय आमने-सामने ही भिड़ते नज़र आ रहे हैं।
सोनिया यादव
05 Nov 2019
delhi pollution
Image courtesy: Amar Ujala

राजधानी दिल्ली में छाई जहरीली धुंध की परत फिलहाल छंटती दिखाई दे रही है लेकिन इसके बावजूद अभी भी हवा में ज़हर बना हुआ है। एयर क्वॉलिटी इंडेक्स में हवा का स्तर ख़तरनाक है। सरकारें एक-दूसरे के ऊपर इसका ठीकरा फोड़ने में व्यस्त हैंं। पंजाब-हरियाणा के किसानों की पराली जलाने की समस्या हो या ऑड-ईवन का फार्मूला पक्ष-विपक्ष एकजुट होने के बजाय आमने-सामने ही भिड़ते नज़र आ रहे हैं।

इस संबंध में 4नवंबर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, ‘दिल्ली का हर साल दम घुट रहा है और हम इस मामले में कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। किसी भी सभ्य समाज में ऐसा नहीं हो सकता। केंद्र और राज्य दोनों को कुछ करना होगा।'

पीठ ने कहा कि दो दिन इतनी हालत खराब भी थी कि घर में बेडरूम में भी हवा की गुणवत्ता 500 के पास थी (सामान्यतया यह 100 होनी चाहिए)। यह आपातकाल के हालात से भी खराब हालात थे। हालत ऐसे हैं कि लोगों को सलाह दी जा रही है कि दिल्ली छोड़ दें या दिल्ली न आएं। यह क्या है क्या हम दिल्ली को खाली होने देंगे जो देश की राजधानी है। समय आ गया है हमें कुछ करना ही होगा।

आरोप-प्रत्यारोपों के बीच सबसे अहम बात ये है कि आख़िर साल दर साल बढ़ते प्रदूषण के पीछे कारण क्या हैं? दिवाली और छठ पर जलने वाले पटाखे, किसानों का पराली जलाना, औद्योगिकरण, निर्माण कार्य या दिल्ली की सड़कों पर तेजी से दौड़ते वाहन।

सुप्रीम कोर्ट ने पराली जलाने वाले किसानों के संदर्भ में कहा कि उसे इन किसानों से कोई सहानुभूति नहीं है क्योंकि ऐसा करके वे दूसरों की जिंदगी जोखिम में डाल रहे हैं। न्यायालय ने प्रदूषण की स्थिति से निबटने के लिए तत्काल सभी आवश्यक कदम उठाने का केंद्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली सरकारों को निर्देश दिया है।
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इसी बीच पंजाब सरकार का भू-जल संरक्षण कानून 2009 भी सुर्खियों में आया। जिसे कई जानकारों द्वारा प्रदूषण मेें वृद्धि की वजह माना जा रहा है। पंजाब सरकार भूजल संरक्षण के लिए कानून 2009 में लेकर आई। इसके अनुसार किसानों पर अप्रैल माह में धान की रोपाई पर प्रतिबंध लगा दिया गया और मानसून के बाद रोपाई का कानून बनाया गया, जिससे धान की रोपाई में उपयोग होने वाले पानी को बचाया जा सके। लेकिन समस्या ये है कि धान की रोपाई जून के आखिरी सप्ताह तक लटकने से इसकी कटाई नवंबर तक खिंच जाती है और किसानों के पास धान की कटाई और गेहूं की रोपाई के बीच समय ही नहीं बचता, जिसकी वजह से तुरत-फुरत में खेत खाली करने के लिए किसान पराली जलाते हैं। इसके चलते सर्दियों की शुरुआत में दिल्ली की हवा दमघोंटू हो जाती है।

पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर में कार्यत डॉ. राहुल सिंह ने न्यूज़क्लिक को बताया, 'सर्दियों में अक्सर हवाएं धीमी गति से चलती हैं, वातावरण में नमी की अधिकता होती है जिसके चलते पराली जलाने से जो धुआं निकलता है वो पर्यावरण को ज्यादा प्रदूषित करता है'।
भारतीय मौसम विभाग, चंडीगढ़ के एक अधिकारी ने कहा कि इन दिनों हवाएं उत्तर पश्चिम से दक्षिणपूर्वी सतह की ओर बह रही हैं। गति बहुत सुस्त है, जिसके चलते मौसम में नमी अधिक है। और इसी कारण धुआं आसानी से हवा से खत्म नहीं हो पाता। पहले किसानों का पराली जलाने का समय एक बड़ी समयावधि में फैला हुआ होता था। जो अक्टूबर तक निपट जाता था। तब हवा और नमी दोनों ही अभी के मुकाबले अनुकूल होते थे।

अक्टूबर में जो उतर भारत में विंड पैटर्न होता है वो उस प्रदूषण को समय के साथ बहा ले जाते थे, लेकिन जैसे ही ये साइकिल लेट अक्टूबर और नवंबर में शुरू हुई उत्तर भारत में इस मौसम में स्थिर हो जाने वाली हवा ने इनके बहाव को रोकना शुरू कर दिया।

दिल्ली एनसीआर में वाहनों की बढ़ती संख्या भी प्रदूषण में बढ़ोतरी का अहम कारण है। टाइम्स ऑफ इंडिया अख़बार की खबर के मुताबिक पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) के तहत भारतीय उष्‍णदेशीय मौसम विज्ञान संस्‍थान (आईआईटीएम) पुणे द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में प्रमुख प्रदूषकों के उत्सर्जन सूची में वाहनों के उत्सर्जन की भागीदारी में 2010 की तुलना में 2018 में भारी इजाफा हुआ है।
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अध्ययन के अनुसार 2010-18 की अवधि के दौरान दिल्ली की सड़कों पर वाहनों की संख्या में चार गुना से अधिक की वृद्धि हुई है। 2010 में राजधानी में जहां वाहनों का उत्सर्जन लगभग 25.4% प्रतिशत था तो वहीं 2018 में बढ़कर 41 प्रतिशत हो गया है जबकि एनसीआर में ये आकंड़ा 32.1 प्रतिशत से बढ़कर 2018 में 39.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

एमओईएस द्वारा पिछले साल के अंत में जारी उत्सर्जन सूची रिपोर्ट में राजधानी में विभिन्न प्रकार के वाहनों द्वारा 'वाहन किलोमीटर की यात्रा' (वीकेटी) पर दैनिक डेटा के आधार पर प्रदूषण का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि ओला / उबर / मेरु आदि में प्रति वर्ष लगभग 1,45,000 किमी प्रति वर्ष की उच्च वीकेटी है। जो वायु प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं। दिल्ली के बाहर की कारों ने चार-पहिया वाहनों के कुल उत्सर्जन में लगभग 25-45% का योगदान दिया है।

पर्यावरणविद् राजीव कुमार का कहना है, 'पराली की समस्या तो सिर्फ एक-आध महीने की है लेकिन सड़कों पर लगातार दौड़ते वाहनों की समस्या हमेशा की है। हम आज अपनी-अपनी गाड़ियों में सफर करने को शान समझते हैं, लेकिन इससे पर्यावरण को कितना नुकसान हो रहा है इसकी कोई सुध लेता है? हम रोज़ प्रदूषित हवा में सांस लेने को मज़बूर हैं और इसके जिम्मेदार भी हम ही हैं।'

विकास के नाम पर तेज़ी से बढ़ते निर्माण कार्यों ने भी लोगों का जीना दूभर कर रखा है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण के ख़तरनाक स्तर के मद्देनदर दिल्ली एनसीआर में निर्माण कार्य पर पूरी तरह रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि जो भी ऐसा करेगा उस पर पांच लाख रुपये का जुर्माना किया जाएगा। वहीं कूड़ा जलाने पर पांच हजार रुपये का जुर्माना होगा। ये जुर्माना कोर्ट के इस आदेश के तहत होंगे।

गौरतलब है कि इसी साल जून में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दिल्ली को फिर से विश्व के चौथे सर्वाधिक प्रदूषित शहर की सूची में रखा था। साल दर साल दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का बढ़ता प्रकोप स्थिति को बेकाबू कर रहा है। सरकारे भले ही एक-दूसरे के पाले में जिम्मेदारी की गेंद फेंक रही हों, लेकिन सच्चाई यही है कि इस प्रदूषण में सबकी मिली-जुली भागीदारी है।

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