NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
सीवर और सेप्टिक टैंक मौत के कुएं क्यों हुए?
कब तक बना रहेगा प्रशासन इन मौतों का मूक दर्शक?
राज वाल्मीकि
03 Mar 2022
sewer
'प्रतीकात्मक फ़ोटो' फोटो साभार: HindustanTimes

हाल ही में (02 मार्च 2022) को पुणे के एक शहर में चार सफाई कर्मचारियों की सेप्टिक टैंक में दम घुटने से मौत हो गई। मौत की वजह बहुत साफ़ है बिना सुरक्षा उपकरणों  के सफाई कर्मचारियों को सीवर और सेप्टिक टैंक में उतार दिया  गया। ये जानते हुए भी कि उनकी जान को खतरा है। ये काम जानलेवा है। ऐसी घटनाओं से,  जो इन्हें सीवर और सेप्टिक टैंको में उतारते हैं, उनकी मानसिकता उजागर हो जाती है। उनके लिए इनकी जान की क्या कीमत ही क्या होती है। ये लोग गरीब हैं। जाति के निचले पायदान पर हैं। ये मर भी गए तो क्या फर्क पड़ता है?

आप कह सकते हैं कि ऐसे कामों के खिलाफ तो दो-दो कानून (1993 और 2013) बन चुके हैं। इनमे दोषियों के खिलाफ  जुर्माने से लेकर जेल भेजने  तक का प्रावधान है। फिर ऐसे लोगों को जेल क्यों नहीं होती? अब तक दो हजार से ज्यादा लोग सीवर और सेप्टिक टैंको की सफाई के  दौरान मर चुके हैं बल्कि कहिए  मारे जा चुके हैं। ये सुनियोजित हत्याएं है। सफाई कर्मचारियों का दोष यही है कि ये गरीब हैं।दलित हैं।  और इस देश में पैदा हुए हैं जहां छूआछूत और जातिगत भेदभाव व्याप्त है।

जाति की क्रूर सच्चाई

हमारे देश में मानव मल ढोने की प्रथा,  शुष्क शौचालयों की सफाई, सीवर और सेप्टिक टैंक सफाई यहां तक कि सरकार के रेलवे डिपार्टमेंट में रेलवे ट्रैक के बीच  पड़े मानवमल की सफाई ये सारे काम सफाई कर्मचारियों से कराए जाते हैं। और ये सबको को पता है कि मानव मल साफ़ करने वाले सफाई कर्मचारी किस जाति और वर्ग से आते हैं। उन्हें यह कहते हुए भी झिझक नहीं होती कि इनका तो जन्म ही गन्दगी साफ़ करने के लिए हुआ है।

ये तो साफ़ है कि जातिवादी मानसिकता के लोग संविधान को नहीं बल्कि मनुविधान को मानने वाले लोग हैं। और मनुस्मृति ने पूरी व्यवस्था कर रखी है कि दलितों और स्त्रियों को अपना गुलाम बनाए रखना है।

आधुनिक समय में सोच पुरानी

यूं तो हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में जी रहे हैं। पर हमारी सोच सदियों पुरानी है। हम आज भी जाति और स्त्री-पुरुष असमानता की सोच को ढो रहे हैं।

हाल ही में (23 फरवरी 2022) मध्य प्रदेश के ग्वालिअर जिले में  पनिहार थाने  के अंतर्गत बारही  गांव में एक दलित आरटीआई सामाजिक कार्यकर्त्ता शशिकांत जाटव को  पंचायत के सात व्यक्तियों द्वारा बुरी तरह पीटा गया। उसका कसूर यह  था कि उसने पंचायत की जानकारी लेने के लिए आरटीआई डाली थी। उसे न केवल पीटा गया बल्कि जूते में पेशाब डाल कर पिलाया गया। यह किस मानसकिता को दर्शाता है?

24 फरवरी 2022 को राजस्थान के बाढ़मेर जिले में सेडवा थाने के अंतर्गत गोडा गांव में एक दलित परिवार को इसलिए गांव से बहिष्कृत कर दिया गया कि उनके परिवार का एक लड़का कथित उच्च जाति की लड़की से प्रेम करने का दुस्साहस कर रहा था। इतना ही नहीं इस परिवार पर 15 लाख रपये का जुरमाना भी लगाया गया।

23 फरवरी 2022 को झारखण्ड के डोमचंच क्षेत्र के बगारीडीह गांव में एक 21 वर्षीया दलित लड़की से तीन लोगों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसे कुएं में फेंक दिया गया।

जाहिर है इस आधुनिक समय में भी जातिवादी और सामन्तवादी सोच अभी भी बनी हुई है।

अमानवीय अत्याचारों से मुक्ति कब?

जब हम मानव मल ढोने वाली महिलाओं से बात करते हैं तब पता चलता है कि किस अमानवीय  घृणित कार्य को करने को वे विवश हैं। शुष्क शौचालय से मल उठाने वाले वीडियो देखकर ही लोगों को उलटी आने लगती है। जब इस प्रथा से लोगों को अवगत कराने के लिए मानव मल उठाती साफ़ करती महिलाओं और पुरुषों का वीडियो दिखाया जाता है तो  हमारे सभ्य समाज के लोग कहते हैं कृपया हमें ऐसे वीडियो न दिखाएं हम से खाना नहीं खाया जाता।

ऐसे में सोचा जा सकता है कि इसे करने वालों को कैसा लगता होगा।

क्या गरीबी अशिक्षा और आर्थिक असमानता  है कारण?

ऑक्सफेम की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 10% लोगों के पास 60% संपत्ति  है। यह आंकड़ा ही अपने आप में बहुतकुछ कह जाता है। देश की व्यवस्था ही ऐसी है कि अमीर और अमीर होता जा रहा है गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है।

अमीर करोड़ों का घोटाला कर के ऐश कर रहा है. गरीब मंहगाई की मार से इतना परेशान है कि कुछ रुपयों के लिए सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में अपनी जान गवां रहा है।

चुनाव में राजनैतिक दल विकास के नाम पर वोट मांगते हैं। बेरोजगारी दूर करने के नाम पर वोट मांगते हैं। पर असल में कहां  है विकास? कहां है रोजगार?

यदि सही अर्थों में विकास होता और लोगों को रोजगार मिलता तो क्या ये गरीब सफाई कर्मचारी चंद रुपयों के लिए अपनी जान जोखिम में डालते?

कब तक बना रहेगा प्रशासन इन मौतों का मूक दर्शक?

क्या शासन प्रशासन कभी इस ओर भी सोचता है कि जब एक परिवार का एकमात्र कमाने वाला शख्स सीवर या सेप्टिक टैंक के अन्दर इस तरह अपनी जान गवां देता है तब उस परिवार पर क्या बीतती है?

उसके बच्चे अनाथ हो जाते हैं। पत्नी विधवा और मां-बाप बेसहारा। कैसे चलता है उस परिवार का भरण-पोषण? 

उसके परिवार में खाने-पीने के भी लाले पड़ जाते हैं। बच्चे शिक्षा से दूर हो जाते हैं। किराए पर रहने वालों की स्तिथि और बदतर हो जाती है।

ऐसी घटनाएं पूरे देश में हो रही हैं। बाबजूद इसके सरकार कोई सख्त कदम क्यों नहीं उठाती?

जो प्रधानमंत्री एक आदेश से देश भर में नोटबंदी करवा देते हैं। वे इस आमानवीय प्रथा, घृणित कार्य को बंद करवाने के लिए कोई सख्त आदेश क्यों नहीं देते? इस मुद्दे पर क्यों मौन धारण कर लेते हैं? क्या ये देश के लिए शर्मनाक नहीं?

सरकार के इस मौन पर, इस सोच पर,  इस नीति और नीयत पर सवाल उठाना लाज़मी है। सोच ईमानदार और काम दमदार वाली सरकार कब तक इस सच्चाई से मुंह छुपाती रहेगी? कब उठाएगी कोई सकारात्मक और सख्त कदम?

आखिर कब तक चलता रहेगा सीवर और सेप्टिक टैंको में घुसकर दलितों को मारने का सिलसिला?

लेखक सफाई कर्मचारी आन्दोलन से जुड़े हैं।

SEWER DEATH
deaths in sewer
septic tanks
manual scavenging
manual scavenging Deaths
Scheduled Caste
caste politics

Related Stories

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

सीवर कर्मचारियों के जीवन में सुधार के लिए ज़रूरी है ठेकेदारी प्रथा का ख़ात्मा

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सवर्णों के साथ मिलकर मलाई खाने की चाहत बहुजनों की राजनीति को खत्म कर देगी

ग्राउंड रिपोर्ट: ‘पापा टॉफी लेकर आएंगे......’ लखनऊ के सीवर लाइन में जान गँवाने वालों के परिवार की कहानी

यूपी: सफ़ाईकर्मियों की मौत का ज़िम्मेदार कौन? पिछले तीन साल में 54 मौतें

सीवर में मौतों (हत्याओं) का अंतहीन सिलसिला

यूपी चुनाव: पूर्वी क्षेत्र में विकल्पों की तलाश में दलित

यूपी चुनाव: दलितों पर बढ़ते अत्याचार और आर्थिक संकट ने सामान्य दलित समीकरणों को फिर से बदल दिया है


बाकी खबरें

  • up elections
    असद रिज़वी
    लखनऊ में रोज़गार, महंगाई, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन रहे मतदाताओं के लिए बड़े मुद्दे
    24 Feb 2022
    लखनऊ में मतदाओं ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर वोट डाले। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन की बहाली बड़ा मुद्दा था। वहीं कोविड-19 प्रबंधन, कोविड-19 मुफ्त टीका,  मुफ्त अनाज वितरण पर लोगों की अलग-अलग…
  • M.G. Devasahayam
    सतीश भारतीय
    लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों को उजाकर करती एम.जी देवसहायम की किताब ‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘
    24 Feb 2022
    ‘‘चुनावी लोकतंत्र?‘‘ किताब बताती है कि कैसे चुनावी प्रक्रियाओं की सत्यता को नष्ट करने के व्यवस्थित प्रयासों में तेजी आयी है और कैसे इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
  • Salempur
    विजय विनीत
    यूपी इलेक्शनः सलेमपुर में इस बार नहीं है मोदी लहर, मुकाबला मंडल-कमंडल के बीच होगा 
    24 Feb 2022
    देवरिया जिले की सलेमपुर सीट पर शहर और गावों के वोटर बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कोविड के दौर में योगी सरकार के दावे अपनी जगह है, लेकिन लोगों को याद है कि ऑक्सीजन की कमी और इलाज के अभाव में न जाने कितनों…
  • Inequality
    प्रभात पटनायक
    आर्थिक असमानता: पूंजीवाद बनाम समाजवाद
    24 Feb 2022
    पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के चलते पैदा हुई असमानता मानव इतिहास में अब तक पैदा हुई किसी भी असमानता के मुकाबले सबसे अधिक गहरी असमानता है।
  • putin
    अब्दुल रहमान
    मिन्स्क समझौते और रूस-यूक्रेन संकट में उनकी भूमिका 
    24 Feb 2022
    अति-राष्ट्रवादियों और रूसोफोब्स के दबाव में, यूक्रेन में एक के बाद एक आने वाली सरकारें डोनबास क्षेत्र में रूसी बोलने वाली बड़ी आबादी की शिकायतों को दूर करने में विफल रही हैं। इसके साथ ही, वह इस…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License