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तमिल फिल्म उद्योग की राजनीतिक चेतना, बॉलीवुड से अलग क्यों है?
हाल ही में लाए गए सिनेमैटोग्राफ़ संशोधन विधेयक 2021 के विरोध में दो ध्रुवों पर खड़े कमल हासन और सूर्या एक साथ आ गए, इस घटना ने तमिल फिल्म जगत में चेतना की एक लहर दौड़ा दी है।
बी. सिवरामन
23 Aug 2021
तमिल फिल्म उद्योग की राजनीतिक चेतना, बॉलीवुड से अलग क्यों है?
'प्रतीकात्मक फ़ोटो' साभार: Scroll

कमल हासन एक वरिष्ठ व लोकप्रिय तमिल एक्टर हैं, जिन्होंने कुछ समय पहले ही राजनीति में कदम रखा। सूर्या नई पीढ़ी के हीरो हैं, जिनका राजनीति से खास लेना-देना नहीं है। जब ये दो अति लोकप्रिय व्यक्तित्व, हाल ही में लाए गए सिनेमैटोग्राफ़ संशोधन विधेयक 2021 के विरोध में एक साथ आ गए, इस घटना ने तमिल फिल्म जगत में चेतना की एक लहर दौड़ा दी है।

यह उद्योग काफी समय से फिल्मों की चोरी या पायरेसी के खिलाफ एक कानून की मांग करता रहा है। पर, फ़िल्म पायरेसी रोकने के नाम पर मोदी सरकार ने पिछले द्वार से एक ऐसा नया विधेयक ला दिया जिसका उद्देश्य सरकारी नौकरशाहों को और अधिक अधिकार देना है ताकि वे सेंसर बोर्ड की अनुमति प्राप्त किसी भी समय की बनी फ़िल्म को बैन कर उसकी किसी भी रूप में स्क्रीनिंग प्रतिबंधित कर दें।

तमिल फ़िल्म उद्योग के कई ऐसोसिएशन और लोकप्रिय फ़िल्म हस्तियां लगातार इस विधेयक पर अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं। इनमें शामिल हैं फ़िल्म निर्माता पीए रंजीत, जिन्होंने दलित-केंद्रित व्लाॅकबस्टर फ़िल्म काला और सारपट्टा परंपरई का निर्माण किया। वेट्रिमारन, जिन्होंने हाल में हाशिये पर जी रहे लोगों पर फिल्म असुरन बनाई, और कई सारे निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, और तकनीकी स्टाफ हैं। बाॅलीवुड की कई फ़िल्म हस्तियों-निर्देशकों जैसे- श्याम बेनेगल, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप और नन्दिता दास ने भी उनके सुर में सुर मिलाते हुए अपना विरोध दर्ज किया। इन सभी ने मोदी पर ‘सुपर-सेन्सर’ बनने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने की चेष्टा करने का आरोप लगाया।

तमिल फ़िल्म हस्तियां अपनी बात जनता को संप्रेशित करने में माहिर मानी जाती हैं। वे लोकप्रिय उदाहरणों की मदद से लोगों को समझा रहे हैं कि प्रस्तावित कानून कितना ख़तरनाक है। फिल्म निर्माता अमीर, जिन्होंने परुतिवीरन और वड चेन्नई जैसी प्रगतिशील फिल्में बनाई हैं, ने न्यूज़क्लिक को बताया कि वे आम लोगों को बता रहे हैं कि यदि विधेयक पारित हो जाता है, परासक्ति जैसी अत्यन्त शक्तिशाली व लोकप्रिय फिल्म तक प्रतिबंधित हो सकती हैं। ‘‘यह अधिनायकवाद के विरुद्ध एक अत्यन्त लोकप्रिय फ़िल्म है, जो तमिल इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। इसने तमिलनाडू में द्रविड़ शासन के पक्ष में जन सांस्कृतिक भावनाओं को जागृत किया था।

अमीर कहते हैं ‘’डीएमके नेता और पूर्व मुख्यमंत्री के. करुणनिधि ने इस फ़िल्म के डायलाॅग लिखे थे और वरिष्ठ एक्टर सिवाजी गणेशन ने बहुत सशक्त तरीके से उन्हें अदा किया था। तानाशाह शासकों के विरुद्ध कई ऐसे डायलाॅग आज की तानाशाह भाजपा सरकार व मोदी के खिलाफ प्रयोग में लाए जा सकते हैं। यदि आरएसएस के कुछ क्षत्रप फ़िल्म के विरोध में अपत्ति उठा सकते हैं, क्या केंद्र परासक्ति जैसी फ़िल्म को प्रतिबंधित करने की हिमाकत करेगी? केवल फ़िल्म उद्योग ही नहीं, बल्कि पूरे तमिल राष्ट्र में जनउभार फूट पड़ेगा, जो जलिकट्टु से भी अधिक भयंकर होगा’’. 

एक्टर-निर्माता अमीर ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा ‘‘आज वृहद् तमिल फ़िल्म उद्योग में हर एक व्यक्ति केंद्र के खिलाफ है और यह लोगों को विद्रोह में उतार देगा, यदि केंद्र ऐसे विधेयक को पारित करने का दुस्साहस करता है।’’ 

काॅलिवुड (Kollywood) की बढ़ती राजनीतिक भूमिका

शायद अमीर सही कह रहे हैं। तमिल फिल्म उद्योग को मीडिया में जिस नाम से जाना जाता है, उस काॅलिवुड ने हाल के दौर में खुले तौर पर जिस तरह की राजनीतिक भूमिका निभाई है, जो उनकी बात को प्रमाणित भी करती है। काॅलिवुड संपूर्ण फ़िल्म बिरादरी के बतौर नए कृषि कानूनों के खिलाफ़ किसानों के समर्थन में सड़कों पर उतरा। बहुतों ने सड़कों पर आकर मोदी द्वारा थोपे जा रहे सीएए का प्रतिकार किया। साल 2017 में जलिकट्टु आंदोलन के दौरान पूरा तमिल फ़िल्म उद्योग प्रतिरोध के कार्यक्रमों का हिस्सा बन गया था। संवेदनशील कावेरी जल बंटवारे पर हुए विवाद में भी वे सड़कों पर उतरे। इससे पहले भी देखा गया था कि वे श्रीलंका में तमिल लोगों के जनसंहार पर अपने राज्य की जनता का समर्थन करते रहे। 

ऐसा नहीं है कि चंद मीडिया प्रचार के भूखे व राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले ही आगे आए, बल्कि संपूर्ण उद्योग लगभग सभी प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दों पर एक राजनीतिक संस्था के रूप में आचरण करने लगा। और,खास तौर पर वे जो संघीय अधिकारों के मामले पर आवाज़ बुलंद करने में विशेष दिलचस्पी दिखाते हैं।

आइये, हम हाल ही के कुछ मिसालों की चर्चा करें। तमिल फिल्म उद्योग के सभी हिस्सों ने 2017 में जीएसटी (GST) के विरुद्ध प्रदर्शन किये और राज्य के 1100 थियेटर बंद कर दिये क्योंकि मनोरंजन कर के अतिरिक्त फ़िल्म उद्योग की गतिविधियों पर 28 प्रतिशत जीएसटी भी लगााया गया। जीएसटी कुछ कम किये जाने के बावजूद, पुनः 2020 में भी जीएसटी कटौती के लिए आवाज़ उठी, इस बार इसलिए क्योंकि महामारी के दौरान फिल्म उद्योग को भारी नुकसान हुआ था तो कम-से-कम उसकी आंशिक भरपाई के लिए जीएसटी को कम करने की जरूरत महसूस की गयी। तमिल फ़िल्म कर्मचारियों ने यह भी मांग की कि उनके काम बंद होने और आय घटने के कारण जो हानि हुई थी उसका मुआवजा दिया जाए।

वे उद्योग-संबंधी मुद्दों पर तो और भी मुखर हैं। मसलन, सभी तमिल फ़िल्म निर्माताओं ने 2018 में इसलिए फ़िल्में बनानी बंद कर दी थीं कि वे बड़े काॅरपोरेट डिजिटल फिल्म वितरकों यानि डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर्स (DSPs) का विरोध कर रहे थे। फ़िल्म निर्माताओं को डीएसपीज़ को वर्चुअल प्रिंट फ़ी (VPF) के नाम से वसूला जा रहा भारी डिजिटलाइज़ेशन व वितरण शुल्क देना पड़ रहा था। 

दो प्रमुख काॅरपोरेट-क्यूब (CUBE)और यूएफओ (UFO) तमिलनाडु के 80 प्रतिशत थियेटरों को फ़िल्म वितरण करने का काम अपने हाथ में रखे हुए हैं। लाइवस्ट्रीमिंग खण्ड में नेटफ्लिक्स, अमेज़ाॅन और सोनी लाइव जैसे ग्लोबल कारपोरेट्स का कब्जा है। भारत के सभी फ़िल्मों के लाइव स्ट्रीमिंग समय का 34 प्रतिशत हिस्सा तमिल फ़िल्मों का है। उद्योग के अन्य समस्त हिस्से इन दोनों एकाधिकारी कम्पनियों का विरोध कर रहे थे। हड़ताल 48 दिनों तक चली और निर्माताओं ने दोबारा फिल्में बनाना तभी आरंभ किया जब DSPs VPF में 35 प्रतिशत कटौती के लिए राज़ी हुए।

पर फिर, उद्योग के भीतर, थियेटर मालिकों के ऐसोसिएशन ने एक शक्तिशाली प्रतिरोध संगठित किया और यहां तक कर दिखाया कि उन्होंने उन फिल्म निर्माताओं का बाॅयकाॅट किया जो अपनी फ़िल्मों को पहले ओटीटी (OTT or Over the Top) प्लेटफाॅर्म पर डिजिटल माध्यम से टीवी चैनेलों या डीटीएच सर्विस द्वारा जारी करते हैं।

न केवल ये पैसे वाले मालिकान, बल्कि काॅलिवुड में काम कर रहे श्रमिकों के विभिन्न हिस्से बहुत ही हिम्मती व मुखर हैं। नादिगार संघम  यानि एक्टर्स ऐसोसिएशन में संगठित एक्टरों के अलावा अकुशल स्पाॅट बाॅयज़, कला निर्देशकों, लाइटमैन से लेकर कुशल सिनेमैटोग्राफर, स्टंट मास्टरों से लेकर ध्वनि इंजीनियरों तक, जूनियर कलाकारों से प्रख्यात एक्टरों तक, फिल्म प्रमोशन कर्मचारियों, सेट निर्देशकों, संगीत निर्माताओं और गायक कलाकारों, कारियोग्राफरों को फ़िल्म उद्योग की रीढ़ कहा जा सकता है। इन श्रमिकों व कलाकारों का प्रत्येक हिस्सा बेहतर रूप से संगठित है, ये कुल 24 संगठन हैं। कितना ही धनी फिल्म निर्माता हो या कितना ही प्रभावशाली निर्देशक क्यों न हो, ऐसा कोई रास्ता नहीं जिससे वह कर्मचारियों पर राज कर सके और उन्हें वाजिब मेहनताने से वंचित कर सके।

कर्मचारी एकता इतनी मजबूत है कि श्रमिक अधिकारों का उलंघन करने वाले या श्रमिकों का शोषण करने वाले निर्माताओं के लिए संभव नहीं कि वे उद्योग में ऐसे ही फ़िल्में बनाते रहें। शुरू में वे केरल के श्रमिक थे जिन्हें उनके मुखर व बुलंद चरित्र के लिए जाना जाता था। और मालिकों के लिए बाहर से कर्मचारी लाकर श्रमिक एकता को खण्डित करना या श्रमिकों के एक हिस्से को दूसरे के खिलाफ खड़ा करना असंभव था। अब तमिलनाडु के काॅलिवुड वर्कर उनसे भी एक कदम आगे हैं। उनकी एकता और दृढ़निश्चयता भरी दावेदारी को स्वयं आखों से देखकर ही विश्वास किया जा सकता है। कई बार तो जब निर्देशकों ने ऊँची आवाज़ में बात की या कर्मचारियों के साथ गलत तरीके से बर्ताव किया, तब कई-कई शूटिंग शिड्यूल रोक दिये गए।

शुद्ध रूप से वर्गीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो वे मिश्रित कम्पोजिशन के हैं। पर कुछ, जैसे निर्माता बन बैठे एक्टर और जिनके अपने संगीत रिकाॅर्डिंग स्टूडियो हैं, ऐसे लोग, पूंजीपति वर्ग में आते हैं। सिनेमैटोग्राफ़ी के कुछ अति कुशल विशेषज्ञ और निर्माण के बाद का प्रसंसकरण यानि पोस्ट प्रोडक्शन प्रोसेसिंग करने वाले एक्सपर्ट बुर्जुआ पेशेवर होते हैं। श्रमिकों की भारी तादाद उच्च कौशल से समृद्ध होती है और यद्यपि वे अच्छी रकम कमाते हैं, वे पूंजी-श्रम संबंध के मामले में सर्वहारा होते हैं, जो संस्कृति-मनोरंजन के बाज़ार में पूंजी के कर्मचारी होते हैं।

तमिल फ़िल्म उद्योग साल में औसतन 200 फ़िल्में बनाता है, जो देश में सबसे अधिक है। इसका नंबर बाॅलिवुड के बाद आता है, जो साल में 1000 फ़िल्में बनाता है। कई तमिल फ़िल्में तो हिंदी में भी बनीं हैं। तमिल फ़िल्म उद्योग को यदि देखें, तो इसमें करीब 3 लाख वर्कर काम करते हैं, जिनमें 1500 थियेटरों में कार्यरत 30,000 थियेटर वर्कर भी शामिल हैं, महामारी ने उन्हें महीनों से बेरोज़गार बना रखा है।

अब ये कर्मचारी एक नई व बढ़ती हुई प्रवृत्ति के कारण खतरा झेल रहे हैं जैसे कि नई फ़िल्मों को सीधे ओटीटी पर जारी कर देना। 2020 में 10 तमिल फ़िल्में ओटीटी पर रिलीज़ हुई थीं और वे हिट हो गईं। उन्होंने उतना या उससे अधिक भी कमाया जो वे थियेटरों में जारी कर बाॅक्स-ऑफिस से कमा सकते थे। 

अब अमेज़ाॅन प्राइम, नेटफ्लिक्स, डिज़नी प्लस हाॅटस्टार जैसे डीएसपीज़, जो वैश्विक इज़ारेदार हैं और घरेलू ज़ी प्लेक्स, ज़ी-5 आदि इन फ़िल्मों को जारी कर रहे हैं। 2021 में अब तक के 20 टाॅप-रेटेड फ़िल्में या तो ओटीटी पर रिलीज़ हुईं या निकट भविष्य में होंगी, तब लगता है पिछले वर्ष की संख्या से इस वर्ष की संख्या तीन गुना होगी ही। 

महामारी के कारण जब थियेटर बंद हो गए, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को काफी बड़ा बूस्ट मिला और देश में ओटीटी दर्शक 2020 में ही 31 प्रतिशत बढ़ गए थे। चार दक्षिण भारतीय भाषाओं में, यानि तमिल, तेलुगू, मल्यालम और कन्नड़ में ओटीटी द्वारा जारी फ़िल्में भारत के ओटीटी दर्शकों का 25 प्रतिशत हिस्सा हैं। इसके मायने हैं कि भारत के कुल 6.5 करोड़ ओटीटी दर्शकों में से 1.62 करोड़ इन्हीं 4 राज्यों के फ़िल्म उद्योग से ताल्लुक रखते हैं। 

यह बड़े बजट की फ़िल्मों के लिए काफी बड़ा बाज़ार है। ऐसी ही पृष्ठभूमि में ओटीटी रिलीज़ के विरुद्ध प्रतिरोध सामने आया। जहां एक ओर थियेटर मालिक फ़िल्म निर्माताओं का विरोध इसलिए कर रहे थे कि वे ओटीटी पर अपनी फ़िल्में रिलीज़ कर रहे था; बाकी कर्मियों ने भी इसलिए संयुक्त प्रतिरोध किया कि कुछ काॅरपोरेट इजारेदार (corporate monopolies) OTT वितरण के लिए भारी शुल्क वसूल रहे थे। पर सारा पैसा निर्माताओं के पास, और उनके माध्यम से कलाकारों के पास नहीं पहुंचता। काफी बड़ा हिस्सा डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर इजारेदारों के पास जाता है। यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिसके कारण काॅलिवुड में विरोध का स्वर बढ़ता जा रहा है।

रचनाशील कर्मियों द्वारा ‘पोस्ट-फोर्डिस्ट’ प्रतिरोध

वैश्विक स्तर पर, सैद्धांतिक तौर पर यदि परिभाषित करें, तो फ़िल्म और मीडिया कर्मियों, जो कि नाॅलेज वर्कर्स में गिने जाते हैं, की दावेदारी व संघर्ष को ‘पोस्ट-फोर्डिस्ट असर्शन’ कहा जाता है। यह परंपरागत फोर्डिस्ट उद्योगों, जैसे ऑटोमोबाइल्स, रेलवेज़, आदि उद्योगों में श्रमिकों के संगठन व आंदोलन से भिन्न हैं। इन रचनाशील कर्मियों के विरोध का गतिविज्ञान अलग है। ये काफी बिखरे हुए हैं और छोटी फ़िल्म यूनिटों व लैब में काम करते मिलेंगे। पर जब उन्हें अपने अधिकारों की दावेदारी जतानी होती है, वे अधिक संगठित पाए जाते हैं, जबकि ट्रेड यूनियन जैसे उनके कोई औपचारिक संगठन नहीं हैं। उनके ऐसोसिएशन अक्सर ट्रेड यूनियनों के औपचारिक व सामान्य प्रक्रियाओं के हिसाब से नहीं काम करते। बावजूद इसके, वे अपने मालिकों से भिड़ लेते हैं।

ऐसा क्यों है कि तमिल फ़िल्म उद्योग श्रमिक और यहां तक कि पूरा उद्योग ही उच्च दर्ज़े की राजनीतिक चेतना का परिचय देता है, जोकि मुम्बई के बृहद बॉलीवुड उद्योग या पश्चिम बंगाल और केरल में नहीं पाया जाता है, यद्यपि वहां सशक्त ट्रेड यूनियन आंदोलन दिखाई पड़ता है. निर्देशक अमीर कहते हैं कि यह इसलिए है कि 1950 के दशक से ही तमिल फ़िल्म उद्योग, तमिल मुख्यधारा की राजनीति के साथ मजबूती से गुंथा हुआ था। वह द्रविड़ आंदोलन के संदेश को जनता तक पहुंचाने का प्रमुख माध्यम रहा है। और तमिल फ़िल्म माध्यम के जरिये ही 1967 में डीएमके सत्ता में आई। अमीर कहते हैं, ‘‘डीएमके मुख्यमंत्री अन्नादुरई और करुणानिधि फ़िल्म की पटकथा लिखते थे और एमजीआर व जयललिता नामचीन एक्टर थे। डीएमके और एआइएडीएमके दोनों ही प्रभावशाली फ़िल्म हस्तियों के साथ हमेशा काम करते थे। तो यह उद्योग काफी राजनीतिक हो चुका था।’’

इसी प्रश्न पर न्यूज़क्लिक से बात करते हुए सुश्री रोहिणी, जिन्होंने बाहुबली सहित करीब 130 दक्षिण भारतीय फ़िल्मों में अदाकारी की है, कहती हैं कि इसका कारण है वर्तमान दौर में उच्च राजनीतिक चेतना। उन्होंने कहा, ‘‘सारे प्रमुख लोकप्रिय राजनीतिक मुद्दे उद्योग में हर स्तर पर चर्चा में रहते हैं और इसके कारण लोगों की राजनीतिक चेतना बढ़ी हुई होती है। यह दलित उत्पीड़न व महिलाओं के साथ भेदभाव जैसे सामाजिक विषयों पर एक नए ट्रेंड के रूप में तमिल फ़िल्मों में प्रतिबिंबित होता है। अब तमिल फ़िल्मकार निर्भीक होकर लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे प्रत्यक्ष रूप में राजनीतिक विषयों पर फ़िल्में बना रहे हैं।‘’ 

आगे वह बताती हैं कि निर्माता इतनी अधिक पूंजी निवेशित कर देते हैं कि यदि उनके मन में डर बना रहे कि सेंसर बोर्ड से हरी झंडी के बाद भी उनकी फ़िल्म प्रतिबंधित हो सकती है तो यह काफी भयावह परिदृश्य होगा। फ़िल्मों की संख्या काफी कम हो जाएगी और तब रोजगार की संभावनाएं व श्रमिकों की आय को भारी नुक्सान पहुंचेगा। फ़िल्म निर्माता तो भारी मात्रा में पूंजी लगाते हैं, पर काॅरपोरेट इजारेदार सैटेलाइट टेलिकास्ट अधिकारों (satellite telecast rights) पर हक जमा लेते हैं। निर्माता को आर्थिक घाटा सहना पड़ा तो सभी फ़िल्म उद्योग कर्मचारी झटका खाएंगे।’ सुश्री रोहिणी प्रोग्रेसिव राइटर्स एंड आर्टिस्ट्स ऐसोसिएशन की उपाध्यक्ष हैं, जो सीपीआईएम से जुड़ा हुआ है। उन्होंने आगे कहा ‘‘विधेयक केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं, पूरे फिल्म उद्योग के विरोध में है। स्वाभाविक है कि अभी से सभी एकताबद्ध हुए हैं और भी जुटेंगे।’’

लेखक आर्थिक और श्रम मामलों के जानकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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