NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
टीआरपी का पूरा सिस्टम ही क्यों सवालों के घेरे में है?
टीआरपी का खेल पूरी तरह से समझने के बाद यही अंतिम निष्कर्ष निकलेगा कि न्यूज़ चैनलों की टीआरपी का सिस्टम ही बेकार है। हमारा सवाल इस पूरे सिस्टम पर ही होना चाहिए।
अजय कुमार
11 Oct 2020
टीआरपी
Image courtesy: Scroll

आम जनता के बीच की बातचीत और खबरों में बहुत अधिक अंतर होता है। इनके बीच के अंतर पर पूरी की पूरी एक किताब लिखी जा सकती है। लेकिन अगर इनके बीच का अंतर एक लाइन में समझना हो तो केवल इतना समझिए कि अगर आम जन की बीच की बातचीत ही सब कुछ होती तो मीडिया की जरूरत ही क्यों पड़ती?

मीडिया की जरूरत इसलिए है क्योंकि समाज और समाज को नियंत्रित करने वाली संस्थाओं के बीच सूचनाओं का ऐसा प्रवाह बने ताकि समाज और समाज को नियंत्रित करने वाली संस्थाएं मुकम्मल बने। लेकिन यहा तो पूरी तरह से सैद्धांतिक और दार्शनिक किस्म की बात हुई।

हकीकत यह है कि मौजूदा समाज में नैतिकताओं का पूरी तरह से पतन हो चुका है। सही गलत, उचित अनुचित, जीना मरना सब कुछ तय करने का पैमाना केवल पैसा कमाना रह गया है। और इसी आधार पर मीडिया भी काम करने लगी है।

मीडिया को लगता है कि जितनी उसकी टीआरपी बढ़ेगी उतनी उसे कमाई होगी। इसलिए आम जन से जुड़े सरोकार के सारे तर्क ताक पर रखकर मीडिया के लिए सबसे बड़ा तर्क यह बन गया है कि उसकी टीआरपी की बढ़ोतरी कैसे हो? कैसे उसकी कमाई अधिक से अधिक बढ़े।

इसीलिए तकरीबन 10 साल पहले से टीआरपी में धांधली को लेकर होने वाली खबरें, मुख्य खबर के रूप में तब्दील तब हुई जब नंबर वन टीआरपी वाला इंडिया टुडे ग्रुप, रिपब्लिक टीवी से टीआरपी के मामले में पिछड़ गया। जब यह घटना घट गई तब पहली बार भारत के प्रशासनिक तबके की तरफ से बाकायदे प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह खबर आई कि टीआरपी रेटिंग में जानबूझकर धांधली की जाती है।

मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने कहा कि ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) इंडिया के डिवाइस में छेड़छाड़ कर टेलीविजन रेटिंग पॉइंट्स (टीआरपी) बढ़ाए जा रहे हैं। उन्होंने रिपब्लिक समेत कुछ चैनल्स के नाम भी लिए।

हालांकि, रिपब्लिक टीवी का दावा है कि एफआईआर में उसका नहीं बल्कि इंडिया टुडे का नाम है। सवाल यह उठता है कि क्या कोई भी चैनल इस तरह टीआरपी प्रभावित कर सकता है? तो चलिए इस बात से ही शुरुआत करते हैं कि टीआरपी होती क्या है?

टीआरपी के खेल को सही तरह से समझने के लिए टीवी के व्यापार को समझना जरूरी है। अंग्रेजी का एक अखबार अधिक से अधिक 500 रुपए महीने में मिल जाता है। लेकिन इतने ही रुपए में अंग्रेजी के एक न्यूज़ चैनल की सब्सक्रिप्शन 4 से 5 साल तक के लिए ली जा सकती है।

इसलिए एक न्यूज चैनल के सब्सक्रिप्शन से जुड़ा सारा पैसा और इससे भी अधिक पैसा न्यूज चैनल को घरों में पहुंचाने में खर्च हो जाता है। या यह कह लीजिए कि न्यूज चैनल के डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट में खर्च हो जाता है। इसलिए न्यूज चैनलों कारोबार का बहुत बड़ा हिस्सा लोगों द्वारा दिए जाने वाले पैसे से नहीं चलता। बल्कि विज्ञापन यानी धन्ना सेठ द्वारा दिए गए पैसे से चलता है। इसे आप मज़बूरी के तौर भी समझ सकते हैं और जरूरत के तौर पर।

चूंकि कम्पनी के विज्ञापन यानी एडवरटाइजमेंट का मकसद अपने माल का प्रचार करना होता है। इसलिए कंपनी यह चाहती है कि उसके विज्ञापन की पहुंच अधिक से अधिक लोगों के पास हो। ऐसा तभी संभव होगा जब जिस चैनल पर विज्ञापन आ रहा होगा उसे अधिक से अधिक लोग देखेंगे।

टीवी बिजनेस की दुनिया में इससे दो अवधारणाएं निकलती हैं। पहली को रीच कहते हैं और दूसरी को 'एवरेज टाइम स्पेंट' कहते हैं। रीच का मतलब हुआ कि कितने लोगों तक चैनल की पहुंच है और इस टाइम स्पेंट का मतलब हुआ एक दर्शक कितने समय तक चैनल देख रहा है। TV व्यूअरशिप के लिए इन दोनों गणनाओं की जरूरत होती है।

ऐसा हो सकता है कि एक चैनल को बहुत अधिक लोग देखते हो लेकिन बहुत जल्दी ही चैनल बदल भी देते हो। जबकि विज्ञापन देने वाले को मालूम है कि जब तक उसके सामान का विज्ञापन दर्शक कई बार नहीं देखेगा तब तक वह उपभोक्ता में नहीं बदलेगा। इसलिए टीवी व्यूअरशिप की दुनिया में रीच और एवरेज टाइम स्पेंट दोनों को मिलाकर टीवी रेटिंग तय की जाती है।

इसलिए ऐसा बिल्कुल मुमकिन है कि जिन चैनलों की रीच बहुत अधिक हो उनकी रेटिंग कम हो। क्योंकि उन पर एवरेज टाइम स्पेंट कम हो। चूंकि न्यूज़ चैनल का व्यापार विज्ञापनदाता तय करते हैं इसलिए उनके लिए एवरेज टाइम स्पेंड का महत्व कितने लोगों ने देखा इससे अधिक होता है। क्योंकि विज्ञापनदाता को पता है कि अगर उसका विज्ञापन बार-बार दिखेगा तभी उसका माल बिकेगा।

इसलिए रेटिंग टीवी बिजनेस के केंद्र में है। जितनी अधिक रेटिंग होगी उतनी अधिक कमाई होगी। रेटिंग का निर्धारण रेटिंग मीटर से होता है। रेटिंग मीटर पूरे भारत में बंटे होते हैं।

रेटिंग से छेड़छाड़ करने के लिए टीवी न्यूज़ चैनल कैसा तरीका अपनाते हैं इसे एनडीटीवी के पूर्व मैनेजिंग एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार औनिंद्यो चक्रवर्ती ने न्यूज़क्लिक के अपने ख़ास कार्यक्रम ‘Economy का हिसाब किताब'  और अपने टि्वटर अकाउंट के एक लंबे थ्रेड में समझाया है। औनिंद्यो चक्रवर्ती बताते हैं कि भारत में तकरीबन 40 हजार रेटिंग मीटर है। यह रेटिंग मीटर भारत की तकरीबन 80 करोड़ आबादी को कवर करते हैं।

इसलिए तकरीबन 1 रेटिंग मीटर से 20 से से 21 हजार दर्शकों द्वारा देखे गए चैनल का अनुमान लगता है। अंग्रेजी चैनल देखने वाले बहुत कम लोग होते हैं। कुल रेटिंग मीटर में इनका आंकड़ा 1 फ़ीसदी के आसपास बैठता है। इसलिए 400 से 450 मीटर अंग्रेजी चैनल देखने वालों का अनुमान लगाते हैं। भारत में अंग्रेजी चैनल देखने वालों का हर दिन का एवरेज टाइम स्पेंट 8 मिनट के आसपास बैठता है। यानी हर दिन भारत में औसतन केवल 8 मिनट अंग्रेजी न्यूज़ चैनल देखा जाता है।

देखिए पूरा कार्यक्रम : 'रेटिंग चोरी करना है बहुत ही आसान'

पहले कई बार यह बात लीक हुई है कि कि किस एरिया में मीटर लगा हुआ है। जब यह बात पता चल जाती है तो टीवी चैनल का आदमी उस एरिया के किसी स्लम में जाता है। कुछ घरों को नई टीवी थमा देता है। और जिस टीवी में मीटर का कनेक्शन होता है उसके लिए हिदायत देता है कि वह कुछ चैनलों को वह देखते रहे। इसके लिए उन्हें पैसे दिए जाएंगे। इसलिए अचानक यह होता है कि जिस घर में अंग्रेजी देखने समझने वाला कोई नहीं है वहां चार-पांच घंटे अंग्रेजी का कोई न्यूज़ चैनल देखा जा रहा है।

जरा सोच कर देखिए कि जिस अंग्रेजी चैनल को देखने वाले लोग महज 400 से 450 मीटर तक सीमित होते हैं, जिसकी एवरेज टाइम स्पेंट पर डे 8 मिनट के आसपास रहता है, अगर वहां गिन कर 4 से 5 मीटर से जुड़े एरिया में छेड़छाड़ कर दी जाए, लोग घंटे किसी अंग्रेजी न्यूज़ चैनल को देखने लगे तो किसी अंग्रेजी न्यूज़ चैनल की रेटिंग मैं कितना बड़ा उछाल आ सकता है। तकरीबन रेटिंग एक बार में ही 6 से 7 गुना बढ़ जाती है।

NDTV चैनल ने रेटिंग को लेकर कई बार शिकायत की है। लेकिन इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। क्योंकि सभी रेटिंग छेड़छाड़ का हिस्सा थे। अब जब रिपब्लिक टीवी उनको उन्हीं के खेल में मात देकर आगे निकल चुका है। तो वे अचानक से अंधकार से रोशनी में ले जाने की बात कह रहे हैं। जबकि हकीकत यही है कि उन्होंने भी यह सारे हथकंडे पहले अपनाए हैं।

लेकिन इन सबके साथ यह भी समझिए की हिंदी न्यूज़ चैनल की रेटिंग में खिलवाड़ करना थोड़ा मुश्किल काम होता है। क्योंकि यह बहुत बड़े स्तर पर देखा जाता है। तकरीबन 18 से 20 फ़ीसदी मीटर हिंदी न्यूज़ चैनलों की वजह से एक्टिव रहते हैं। इसलिए इनके द्वारा कवर होने वाला एरिया बहुत बड़ा होता है। यहां पर रेटिंग से छेड़छाड़ करना मुश्किल होता है।

लेकिन असली सवाल कुछ दूसरा है। असली सवाल है कि क्यों कुछ न्यूज़ चैनलों की स्थिति सामान्य तौर पर देखने पर बढ़िया दिखाई देती है लेकिन रेटिंग में वह बहुत कमजोर होते हैं। जैसे एनडीटीवी में रवीश कुमार के प्राइम टाइम को यूट्यूब पर लाइव तकरीबन 35000 लोग देखते हैं और यूट्यूब पर एक वीडियो का व्यू 8 से 10 लाख से ऊपर होता है। फिर भी रेटिंग कम क्यों रहती है। इसकी वजह यह है कि कई इलाकों में एनडीटीवी दिखाया ही नहीं जाता है।

कई शहरों के केबल नेटवर्क 7 दिन में से 4 दिन एनडीटीवी दिखाते ही नहीं है। अगर दिखाते भी हैं तो वह कभी झिलमिल आने लगता है तो कभी आवाज आनी बंद हो जाती है। तो कभी कोई समस्या तो कभी कोई समस्या.....

अब जरा सोचिए कि अगर वैसे इलाके में जहां मीटर का कंसंट्रेशन है वहां एनडीटीवी इंडिया नहीं दिखाया जा रहा है तब एनडीटीवी इंडिया की रेटिंग क्या होगी? तब एनडीटीवी रेटिंग इंडिया की रेटिंग पूरी तरह से गिर जाएगी। भले ही सच्चाई यह हो की एनडीटीवी देखने वाले बहुत लोग हैं लेकिन मापने के तरीके में छेड़छाड़ की वजह से निष्कर्ष निकलेगा कि एनडीटीवी की रेटिंग बहुत कम है।

इस तरह की छेड़छाड़ की जांच होना बहुत अधिक जरूरी है। इसमें केवल किसी एक चैनल का हाथ नहीं है। यह बहुत बड़े लेवल पर खेला जाने वाला खेल है। इसका असल मकसद यह है कि मीडिया का एजेंडा सेट किया जाए। ऐसे निष्कर्ष दिए जाएं जिससे यह लगे कि जनता अपने सरोकार से जुड़ी बातों को नहीं देखना चाहती है।

इस निष्कर्ष के आधार पर ही एडवर्टाइजमेंट बिकते हैं। तो अगर सरोकार से जुड़ी बातें दिखाई जाएंगी तो कंपनियां एडवर्टाइजमेंट नहीं देंगे और ठीक-ठाक काम करने वाला चैनल बंद होने के कगार पर आ जाएगा।

अगर सही तरीके से रेटिंग दिखाई जाने लगे और मीडिया हाउस को यह पता चले कि सरकार से सवाल पूछने के बाद भी उन्हें ठीक-ठाक रेटिंग मिल रही है तो वे सरकार से सवाल पूछना शुरू कर देंगे। खेल का असली मैदान यही छुपा हुआ है जहां पर कई तरह की धांधलियां कर कई तरह के गलत लोगों ने कब्जा जमाया हुआ है।

चलते चलते एक और बात समझिए। टीआरपी के पूरे सिस्टम पर रवीश कुमार ने बहुत जरूरी सवाल उठाया है। यह सवाल ऐसा है जो कि पूरे टीआरपी के सिस्टम को खारिज करता है। TRP का एक फ़्राड यह भी होता है कि आप मीटर किन घरों या इलाक़े में लगाते हैं।

मान लें आप किसी कट्टर समर्थक के घर मीटर लगा दें। आप उसे पैसा दें या न दें वो देखेगा नहीं चैनल जिन पर सांप्रदायिक प्रसारण होता है। आज कल किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रोफ़ाइल जानने में दो मिनट लगता है। क्या यह मीटर दलित, आदिवासी और मुस्लिम घरों में लगे हैं? क्या ये मीटर सिर्फ़ भाजपा समर्थकों के घर लगे हैं? हम कैसे मान लें कि TRP का मीटर सिर्फ़ एक सामान्य दर्शक के घर में लगा है। सवाल ये कीजिए।

TRP
TRP System
Fake TRP
Indian news channels
TRP Game
Godi Media

Related Stories

ज़ोरों से हांफ रहा है भारतीय मीडिया। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पहुंचा 150वें नंबर पर

कैसे चुनावी निरंकुश शासकों के वैश्विक समूह का हिस्सा बन गए हैं मोदी और भाजपा

आर्थिक मोर्चे पर फ़ेल भाजपा को बार-बार क्यों मिल रहे हैं वोट? 

क्या आपको पता है कि ₹23 हजार करोड़ जैसे बैंक फ्रॉड भी महंगाई के लिए जिम्मेदार है? 

यूपी चुनावः कॉरपोरेट मीडिया के वर्चस्व को तोड़ रहा है न्यू मीडिया!

सिर्फ साम्प्रदायिक उन्माद से प्रचार होगा बीजेपी?

यूपी चुनाव को लेकर बड़े कॉरपोरेट और गोदी मीडिया में ज़बरदस्त बेचैनी

फ़ैक्ट-चेक: क्या शाहजहां ने ताजमहल बनाने वाले मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे?

कृषि कानून वापसी पर संसद की मुहर, लेकिन गोदी मीडिया का अनाप-शनाप प्रलाप जारी!

"न्यूज़ चैनल प्रदूषण फैलाते हैं !"


बाकी खबरें

  • aicctu
    मधुलिका
    इंडियन टेलिफ़ोन इंडस्ट्री : सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के ख़राब नियोक्ताओं की चिर-परिचित कहानी
    22 Feb 2022
    महामारी ने इन कर्मचारियों की दिक़्क़तों को कई गुना तक बढ़ा दिया है।
  • hum bharat ke log
    डॉ. लेनिन रघुवंशी
    एक व्यापक बहुपक्षी और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता
    22 Feb 2022
    सभी 'टूटे हुए लोगों' और प्रगतिशील लोगों, की एकता दण्डहीनता की संस्कृति व वंचितिकरण के ख़िलाफ़ लड़ने का सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि यह परिवर्तन उन लोगों से ही नहीं आएगा, जो इस प्रणाली से लाभ उठाते…
  • MGNREGA
    रबीन्द्र नाथ सिन्हा
    ग्रामीण संकट को देखते हुए भारतीय कॉरपोरेट का मनरेगा में भारी धन आवंटन का आह्वान 
    22 Feb 2022
    ऐसा करते हुए कॉरपोरेट क्षेत्र ने सरकार को औद्योगिक गतिविधियों के तेजी से पटरी पर आने की उसकी उम्मीद के खिलाफ आगाह किया है क्योंकि खपत की मांग में कमी से उद्योग की क्षमता निष्क्रिय पड़ी हुई है। 
  • Ethiopia
    मारिया गर्थ
    इथियोपिया 30 साल में सबसे ख़राब सूखे से जूझ रहा है
    22 Feb 2022
    इथियोपिया के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में लगभग 70 लाख लोगों को तत्काल मदद की ज़रूरत है क्योंकि लगातार तीसरी बार बरसात न होने की वजह से देहाती समुदाय तबाही झेल रहे हैं।
  • Pinarayi Vijayan
    भाषा
    किसी मुख्यमंत्री के लिए दो राज्यों की तुलना करना उचित नहीं है : विजयन
    22 Feb 2022
    विजयन ने राज्य विधानसभा में कहा, ‘‘केरल विभिन्न क्षेत्रों में कहीं आगे है और राज्य ने जो वृद्धि हासिल की है वह अद्वितीय है। उनकी टिप्पणियों को राजनीतिक हितों के साथ की गयी अनुचित टिप्पणियों के तौर पर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License