NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
समाजवाद महामारी को हराएगा या फिर महामारी समाजवाद को !
वियतनाम में अब तक कोरोना से कोई मौत नहीं हुई है। इस समाजवादी देश ने संयुक्त राज्य अमेरिका को 450,000 सुरक्षात्मक सूट और फ़्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका को 750,000 मास्क भेजे हैं। जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने यूरोपीय सहयोगियों की सहायता के साथ वियतनाम पर रासायनिक हथियारों (नापाल्म और एजेंट ऑरेंज) सहित साढ़े सात लाख टन विस्फोटक गिराए थे।
ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
24 Apr 2020
समाजवाद
हा मन थंग, स्मृति संख्या 1 नहीं, 2009

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) का कहना है कि ये बड़ा लॉकडाउन, जो कि न जाने कब ख़त्म होगा, 2020 और 2021 के कुल वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 90 ख़रब डॉलर के नुक़सान का कारण बन सकता है; यह संख्या जापान और जर्मनी की संयुक्त अर्थव्यवस्थाओं से ज़्यादा है। IMF की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा का मानना है कि ये परिदृश्य ‘हो सकता है वास्तविकता की एक आशावादी तस्वीर ही हो।'

यूरोप के अंदर क़र्ज़ों को म्युचुअल बनाने की माँग उठ रही है, दुनिया भर में करों को विलंबित करने की माँग हो रही है, और IMF पर विशेष निकासी अधिकार (SDRs) के खरबों डॉलर जारी करने की माँग भी की जा रही है। लेकिन पुरानी आदतें जाती नहीं। जर्मनी और नीदरलैंड दक्षिणी यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के क़र्ज़ माफ़ नहीं करना चाहते, और अमेरिकी राजकोष व लेनदार SDR की राशि जारी करने के इच्छुक नहीं हैं। बल्कि, इस भयावह महामारी के दौरान, संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) में वित्तीय योगदान रोक दोने का फ़ैसला किया है।

दुनिया भर में अब 20 लाख से भी ज़्यादा लोग SARS-CoV-2 से संक्रमित हो चुके हैं, और मौत के आँकड़े लगातार बढ़ रहे हैं, आशावादी रहने की मानवीय क्षमताओं पर वज्रपात हो गया है।

लेकिन उम्मीद की किरणें आती हैं, मुख्यत: दुनिया के उन हिस्सों से जो समाजवाद के लिए प्रतिबद्ध हैं। जनवरी के आख़िर में, जब वुहान (चीन) से आ रही ख़बरों पर दुनिया के अधिकांश देश ध्यान नहीं दे रहे थे, तब वियतनाम के प्रधानमंत्री गुयेन जून्ग फुक ने एक टीम बुनाई और वायरस के प्रसार से निपटने के उपाय करने शुरू कर दिए। उन्होंने कहा कि 'महामारी से लड़ना दुश्मन से लड़ने जैसा है।' वियतनाम की सरकार ने उन लोगों का पता लगाना शुरू कर दिया जो संक्रमित हो सकते थे, उनके सम्पर्क में आने वालों का परीक्षण किया, उनके संपर्क में आए लोगों को क्वारंटाइन किया, और आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए सेवानिवृत्त डॉक्टरों और नर्सों सहित पूरा चिकित्सा प्रतिष्ठान जुटा दिया।

वियतनाम की सैन्य चिकित्सा अकादमी और वियत ए कॉरपोरेशन ने WHO के दिशानिर्देशों के आधार पर एक कम लागत वाली परीक्षण किट तैयार की, ताकि सरकार बीमारी के लक्षण वाले लोगों का परीक्षण शुरू कर सके। ख़ास तौर से सरकार जनता को ज़ैनोफ़ोबीया (नफ़रत फैलाने वाली सूचनाओं) के ख़िलाफ़ सचेत करती रही। वियतनाम के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ऑक्यूपेशनल सेफ़्टी एंड हेल्थ ने वायरस पर और बुनियादी स्वच्छता के बारे में सार्वजनिक जानकारी देने के लिए एक गीत और वीडियो जारी किया। अभियान का ये तरीक़ा इसके बाद कई जगह अपनाया गया।

वियतनाम में COVID-19 से अब तक कोई मौत नहीं हुई है।

पिछले हफ़्ते, वियतनाम ने संयुक्त राज्य अमेरिका को 450,000 सुरक्षात्मक सूट और फ़्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका को 750,000 मास्क भेजे हैं। हमारी जीवित स्मृति में ही, संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने यूरोपीय सहयोगियों की सहायता के साथ वियतनाम पर रासायनिक हथियारों (नापाल्म और एजेंट ऑरेंज) सहित साढ़े सात लाख टन विस्फोटक गिराए थे। उन परमाणु बमों की शक्ति से 100 गुना ज़्यादा जो अमेरिका ने जापान पर गिराए थे। इन विस्फोटकों ने वियतनाम के समाज को तहस-नहस कर दिया था और कई पीढ़ियों के लिए वहाँ की कृषि भूमि को ज़हरीला बना दिया था। फिर भी, यह वियतनाम है जिसकी सरकार और लोगों ने वायरस से निपटने के लिए विज्ञान और सार्वजनिक कार्रवाई का उपयोग किया, और संयुक्त राज्य अमेरिका को, जहाँ विज्ञान और सार्वजनिक कार्यों की अनुपस्थिति से समाज बेबस है, एकजुटता में उपकरण भेज रहा है।

letter 1_0.JPG
व्लादिमीर लेबेदेव, कल और आज, 1928

सौ साल पहले, 1918-19 में, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान यूरोप के युद्धक्षेत्रों में/से सैनिकों को लाने/ ले जाने वाले जहाज़ों के द्वारा फैली इन्फ्लूएंज़ा महामारी ने दुनिया को तबाह कर दिया था। कम-से-कम 5 करोड़ लोग इस महामारी की चपेट में आए थे, जिसे ग़लत तरीक़े से स्पैनिश फ़्लू कहा जाने लगा (जबकि वायरस का पता पहली बार मार्च 1918 में अमेरिका के कंसास में चला था)। इससे पहले भी 1889-90 में ये महामारी आई थी। कहा जाता है कि उसका प्रसार समुद्र में और ज़मीन पर चलने वाले भाप के परिवहनों द्वारा मनुष्यों के सफ़र में बढ़ी गति के चलते तेज़ी से हुआ। 1889-90 के इन्फ़्लूएंज़ा से मुख्य रूप से बच्चों और बुज़ुर्गों की मौतें हुई थीं, लेकिन 1918-19 के इन्फ़्लूएंज़ा से बड़े पैमाने पर युवा वयस्कों की भी मौत हुई, हालाँकि इसके कारण अब तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं।

कवि आइजैक रोसेनबर्ग के शब्दों में, मिट्टी, जूँओं और सरसों गैस की ख़ौफ़नाक खाइयों में ‘अपनी जवानी का उत्साही रस खपा चुके’ सैनिकों को अपने घरों में संक्रामक फ़्लू का सामना करना पड़ा था। युद्ध समाप्त होते ही, युद्ध में शामिल देशों ने लीग ऑफ़ नेशंस की स्थापना की और टाइफ़स आयोग का निर्माण किया; जिसका नाम जल्द ही बदलकर महामारी आयोग रख दिया गया। रोग युद्ध का क़रीबी रिश्तेदार था। टाइफ़स, टाइफ़ाइड, पेचिश, चेचक, हैज़ा, इन्फ़्लूएंज़ा जैसी बीमारियाँ युद्ध से लौटे सैनिकों के बीच ही फैलना शुरू होती थीं। महामारी आयोग ने पोलैंड का दौरा किया, बीमारियों को आगे फैलने से रोकने के लिए आयोग ने कॉर्डन सैनिटरी (स्वास्थ्य-संबंधी घेराबंदी) लागू करने की सिफ़ारिश की और सरकार के साथ मिलकर आपातकालीन अस्पताल और पॉली-क्लीनिक बनाने का काम किया। यही आयोग था जो लीग [ऑफ़ नेशंस] के स्वास्थ्य संगठन के रूप में बदल गया, और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) बना।

1917 की अक्टूबर क्रांति के बाद स्थापित हुए नये सोवियत गणराज्य को इसपांस्कायाबोलेज़्न  या 'स्पेनिश रोग’ कही जाने वाली महामारी का प्रकोप सहना पड़ा। 1918 के अंत तक सोवियत संघ में प्रति सप्ताह रोग-पीड़ितों के 150 मामले सामने आने लगे थे;  हालाँकि यह टाइफ़स जितनी बड़ी समस्या नहीं थी, जिसके हर हफ़्ते 1000 मामले अस्पतालों में आते थे। जूँ से होने वाले टाइफ़स के बारे में लेनिन ने कहा था कि, ‘या तो समाजवाद जूँओं को हरा देगा, या जूँएँ समाजवाद को हरा देंगी।’ नये सोवियत गणराज्य को एक जर्जर चिकित्सा प्रणाली और ग़रीब व कमज़ोर स्वास्थ्य वाली आबादी विरासत में मिली थी। गृहयुद्ध, बीमारी और अकाल से समाज के टूटने का ख़तरा लगातार बना हुआ था। इन्हीं कारणों से सोवियत गणराज्य ने जल्दी ठोस काम करने शुरू किए थे:

सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक कमिसारियत बनाया: 21 जुलाई 1918 को सोवियत गणराज्य ने विभिन्न स्वास्थ्य एजेंसियों को केंद्रीकृत किया और निकोलाई सेमाश्को को इस केंद्रीय विभाग का प्रभारी बनाया। यह दुनिया का पहला ऐसा संस्थान था (यहाँ तक कि अमेरिका में भी 1953 तक स्वास्थ्य विभाग नहीं बना था)। कमिसारियत की ज़िम्मेदारी थी कि स्वास्थ्य-देखभाल सबका अधिकार बने, कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं। इसलिए, चिकित्सा-देखभाल मुफ़्त की गई।

स्वास्थ्य क्षेत्र का विस्तार और लोकतंत्रीकरण: सोवियत गणराज्य ने जल्द अस्पताल और पॉलीक्लिनिक्स बनाए, डॉक्टरों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को प्रशिक्षित किया और चिकित्सा स्कूलों तथा बैक्टीरियोलॉजिकल संस्थानों का विस्तार किया। पेट्रोग्रेड कम्यून के सार्वजनिक स्वास्थ्य के कमिश्नर डॉ. ई. पी. पर्वुखिन ने 1920 में कहा कि ‘दवाओं के लिए नये कारख़ाने स्थापित किए गए हैं, और सट्टेबाजों से दवाओं के बड़े स्टॉक ज़ब्त किए गए हैं।’ मुनाफ़े के मक़सद को चिकित्सा क्षेत्र से हटा दिया गया था।

letter 2.JPG

सोवियत बजट के वितरण का वर्णन करने के लिए लिथोग्राफ़, 1930

जनता को लामबंद किया: स्वास्थ्य देखभाल केवल डॉक्टरों और नर्सों के हाथों में नहीं छोड़ी जा सकती थी। सेमाश्को ने स्वस्थ-समाज बनाने के संघर्ष में श्रमिकों और किसानों को लामबंद करना ज़रूरी समझा। 1918 में शहरों और गाँवों में महामारी रोकथाम हेतु श्रमिक समितियों की स्थापना की गई। इन समितियों के प्रतिनिधि- श्रमिक व किसान-ख़ुद से लोगों को स्वास्थ्य और स्वच्छता पर वैज्ञानिक जानकारी देते थे और सुनिश्चित करते थे कि सार्वजनिक स्नान (बॉन्यस) साफ़ के साथ हों। यह सुनिश्चित करने के लिए कि बीमारी का कोई संकेत मिलने पर पेशेवर चिकित्सा-देखभाल ही उपलब्ध कराई जाए, वे अपने समुदायों की निगरानी करते थे। 1920 में सेमाश्को ने लिखा, 'हम बिना अतिशयोक्ति के कह सकते हैं कि टाइफ़स और हैज़ा की महामारियों को मुख्य रूप से कामगारों और किसानों की समितियों की सहायता से ही रोका जा सका।’ सार्वजनिक कार्रवाई (पब्लिक ऐक्शन) सोवियत स्वास्थ्य प्रणाली का एक अभिन्न अंग थी।

रोग-निवारण के उपाय मज़बूती से लागू किए: सोवियत के सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना ​​था कि ज़्यादा संसाधन रोग-निवारण के उपायों में लगाए जाने चाहिए। इन उपायों में सार्वजनिक स्वास्थ्य निर्देश जारी करना और श्रमिकों व किसानों के रहन-सहन की स्थिति में सुधार करना शामिल था। डॉ. पर्वुखिन ने 1920 में एक नॉर्वेजियन पत्रकार से कहा कि ‘सोवियत गणराज्य में, सभी आवास सरकारी हैं, इसलिए अब कोई भी स्वास्थ्य की नज़र से उतनी ख़तरनाक जगहों पर नहीं रहता जैसे पुराने शासन में कई लोगों को रहना पड़ता था। अनाज पर हमारे एकाधिकार के चलते, खाद्य पदार्थों की गारंटी सबसे पहले बीमार और कमज़ोर लोगों को दी जाती है।’ जीने की बेहतर स्थिति और चिकित्सीय देखभाल की लगातार उपलब्धता, बीमारी के प्रसार को रोकने में सक्षम हुई।

इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि डॉ. पर्वुखिन ने कहा था कि ‘हमने स्पैनिश इन्फ़्लूएंज़ा का सामना पश्चिमी दुनिया से बेहतर तरीक़े से किया।’ इन शब्दों को पढ़ते हुए, आज वियतनाम और केरल, चीन और क्यूबा द्वारा कोरोनावायरस का सामना करने के लिए अपनाए जा रहे तरीक़े परिचित से लगते हैं। ये समाजवादी व्यवस्था और पूँजीवादी व्यवस्था के बीच की खाई को रेखांकित करते हैं। एक व्यवस्था जन-हित को मुनाफ़े से ऊपर रखती है और दूसरी केवल मुनाफ़े से प्रेरित है। USA के साउथ डकोटा में स्मिथफ़ील्ड पोर्क प्लांट ने उनके उत्पादन क्षेत्रों में COVID-19 के कई मामले सामने आने के बाद भी प्लांट बंद करने से इंकार कर दिया और प्लांट के श्रमिकों पर काम पर आते रहने का दबाव डाला। ज़ाहिर है श्रमिकों के पास ज़्यादा विकल्प नहीं हैं। इसके बारे में जेसिका लुसेनहॉप की मार्मिक कहानी महामारी की सूरत में भी पूँजीवादी व्यवस्था की [मुनाफ़े की] बाध्यताओं पर बात करती है। स्मिथफ़ील्ड के एक श्रमिक टिम ने कहा कि COVID-19 हो या न हो, उन्हें काम करना पड़ता है क्योंकि ‘मुझ पर चार बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी है। इस वेतन से ही हमारे सर पर छत रहती है।’

letter 3.JPG

लेनिन 150 का आवरण

बुधवार, 22 अप्रैल को लेनिन के जन्मदिन की 150 वीं वर्षगांठ थी। ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान व तीन प्रकाशन संस्थाओं (भारत में लेफ़्टवर्ड बुक्स, ब्राजील में एक्सप्रेसो पॉपुलर, अर्जेंटीना में बटाला डे आइडियाज़) ने इस अवसर पर एक मुफ़्त ऑनलाइन पुस्तक जारी की। अंग्रेज़ी, पुर्तगाली और स्पैनिश में उपलब्ध इस किताब में लेनिन द्वारा मार्क्स के बारे में 1913 में लिखा गया निबंध, लेनिन के बारे में मायाकोवस्की द्वारा 1924 में लिखा महाकाव्य और लेनिन के सिद्धांत और प्रैक्सिस (सिद्धांत तथा व्यवहार का पारस्परिक अंत:संबंध) पर मेरे द्वारा लिखा गया एक छोटा निबंध शामिल हैं।

letter 4.JPG

लेनिन

24 मार्च को केन्याई लेखक न्गूगी वा थीयोंग ने 'अंधेरे की सुबह' नाम से एक कविता लिखी। यह उन्होंने अपने पड़ोसी जेनेट डिविंसेनो के लिए और मुकोमा वा नूगी (कॉर्नेल यूनिवर्सिटी) तथा नवीन किशोर (सीगल बुक्स, कोलकाता, भारत) द्वारा दिए गए उपहार के जवाब में लिखी थी। कुछ दिनों बाद उन्होंने हमारे साथ ये उपहार-समान अपनी कविता साझा की।

मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ,

यह इंसानी रिश्तों के सामान्य संकेतों को ख़तरे में डाल रहा है

हाथ मिलाना,

गले लगाना,

एक दूसरे को रोने के लिए अपने कंधे देना

पड़ोसी-प्रेम को, तथ्य मानकर चलना

इतना कि हम अक्सर अपनी छातियाँ पीटते हैं

चीख़ते हुए निष्ठुर व्यक्तिवाद के बारे में,

प्रकृति का तिरस्कार करते हुए, उस पर भी ज़हर उगलते हैं, और

यह दावा करते हुए कि संपत्ति में व्यक्तिवाद के सारे क़ानूनी अधिकार हैं

आभार व्यक्त करते हैं पूँजी के देवताओं में हमारे हिस्सों के लिए।

 

ओह, अब मैं कितना चाहता हूँ कि मैं अंग्रेज़ी में कविता लिख पाता,

या किसी एक अथवा हर उस भाषा में जो तुम बोलते हो

और साझा कर पाता तुम्हारे साथ, शब्द जो

वांजिको, मेरी यीकोजो माँ, मुझे कहा करती थी:

गुतिरिउतुकूताकिया:

कोई रात इतनी स्याह नहीं होती कि,

वो ख़त्म नहीं होगी दिन में,

या सीधे शब्दों में कहूँ तो,

हर रात ख़त्म हो जाती हैं भोर के साथ।

गुतिरिउतुकूताकिया ।

 

ये अंधेरा भी बीत जाएगा

हम बार-बार मिलेंगे

और अंधेरे और सवेरे के बारे में बात करेंगे

गाएँगे हँसेंगे और शायद गले भी मिलेंगे

प्रकृति और लालन एक हरे आलिंगन में बंद

जश्न माना रहे हैं एक सामान्य अस्तित्व की हर धड़कन का

जो सही मायने में फिर से खोजा और पोसा जा रहा है

अंधेरे की रौशनी और नयी सुबह में।

यह अंधेरा भी बीत जाएगा। जो रौशनी हमारा स्वागत कर रही है, वह जैसा कि न्गूगी ने लिखा है, पुरानी रौशनी नहीं बल्कि एक नयी सुबह होगी।

Coronavirus
vietnam
Vietnam War
Socialist Counties
Capitalist Countries
United States
Europe

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में आज फिर कोरोना के मामलों में क़रीब 27 फीसदी की बढ़ोतरी

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के घटते मामलों के बीच बढ़ रहा ओमिक्रॉन के सब स्ट्रेन BA.4, BA.5 का ख़तरा 

कोरोना अपडेट: देश में ओमिक्रॉन वैरिएंट के सब स्ट्रेन BA.4 और BA.5 का एक-एक मामला सामने आया

कोरोना अपडेट: देश में फिर से हो रही कोरोना के मामले बढ़ोतरी 

कोविड-19 महामारी स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में दुनिया का नज़रिया नहीं बदल पाई

कोरोना अपडेट: अभी नहीं चौथी लहर की संभावना, फिर भी सावधानी बरतने की ज़रूरत

कोरोना अपडेट: दुनियाभर के कई देशों में अब भी क़हर बरपा रहा कोरोना 

कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामलों की संख्या 20 हज़ार के क़रीब पहुंची 

देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, PM मोदी आज मुख्यमंत्रियों संग लेंगे बैठक


बाकी खबरें

  • indian student in ukraine
    मोहम्मद ताहिर
    यूक्रेन संकट : वतन वापसी की जद्दोजहद करते छात्र की आपबीती
    03 Mar 2022
    “हम 1 मार्च को सुबह 8:00 बजे उजहोड़ सिटी से बॉर्डर के लिए निकले थे। हमें लगभग 17 घंटे बॉर्डर क्रॉस करने में लगे। पैदल भी चलना पड़ा। जब हम मदद के लिए इंडियन एंबेसी में गए तो वहां कोई नहीं था और फोन…
  • MNREGA
    अजय कुमार
    बिहार मनरेगा: 393 करोड़ की वित्तीय अनियमितता, 11 करोड़ 79 लाख की चोरी और वसूली केवल 1593 रुपये
    03 Mar 2022
    बिहार सरकार के सामाजिक अंकेक्षण समिति ने बिहार के तकरीबन 30% ग्राम पंचायतों का अध्ययन कर बताया कि मनरेगा की योजना में 393 करोड रुपए की वित्तीय अनियमितता पाई गई और 11 करोड़ 90 लाख की चोरी हुई जबकि…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 6,561 नए मामले, 142 मरीज़ों की मौत
    03 Mar 2022
    देश में कोरोना से अब तक 5 लाख 14 हज़ार 388 लोगों अपनी जान गँवा चुके है।
  • Civil demonstration in Lucknow
    असद रिज़वी
    लखनऊ में नागरिक प्रदर्शन: रूस युद्ध रोके और नेटो-अमेरिका अपनी दख़लअंदाज़ी बंद करें
    03 Mar 2022
    युद्ध भले ही हज़ारों मील दूर यूक्रेन-रूस में चल रहा हो लेकिन शांति प्रिय लोग हर जगह इसका विरोध कर रहे हैं। लखनऊ के नागरिकों को भी यूक्रेन में फँसे भारतीय छात्रों के साथ युद्ध में मारे जा रहे लोगों के…
  • aaj ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव : पूर्वांचल में 'अपर-कास्ट हिन्दुत्व' की दरार, सिमटी BSP और पिछड़ों की बढ़ी एकता
    03 Mar 2022
    यूपी चुनाव के छठें चरण मे पूर्वांचल की 57 सीटों पर गुरुवार को मतदान होगे. पिछले चुनाव में यहां भाजपा ने प्रचंड बहुमत पाया था. लेकिन इस बार वह ज्यादा आश्वस्त नहीं नज़र आ रही है. भाजपा के साथ कमोबेश…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License